
- April 30, 2026
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कलाकार को समझें मिथलेश राय की कलम से....
भारतीय आत्मा का फ़ोटोग्राफ़र रघु राय
भारतीय फ़ोटोग्राफ़ी के शिखर पुरुष रघु राय पिछले दिनों हमारे बीच नहीं रहे लेकिन उनकी खींची गयी तस्वीरें भारत के बदलते स्वरूप की गवाह रहेंगी। पद्मश्री से सम्मानित रघु राय केवल एक फ़ोटोग्राफ़र नहीं, बल्कि वे एक ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने बीते पाँच दशकों में भारत की आत्मा को अपने लेन्स में क़ैद किया।
रघु राय का जन्म 1942 में अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत (अब पाकिस्तान में) के झंग में हुआ था। उनके पिता का नाम लाला जगरनाथ था, वे पंजाब में ब्रिटिश शासन के दौरान एक राजस्व अधिकारी थे। एक सख़्त लेकिन अनुशासित व्यक्ति थे। विभाजन के बाद, उनके परिवार को सब कुछ छोड़कर भारत आना पड़ा, शरणार्थी के रूप में उनका परिवार पंजाब के अमृतसर और बाद में रोहतक के पास के गांवों में बसा। बचपन में उन्होंने विभाजन का दर्द भी सहा और ग़रीबी भी देखी।
रघु राय के पिता चाहते थे उनके बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त करें। उन्हीं की सलाह पर उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग के लिए दाख़िला लिया परंतु एक साल के बाद ही उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया तथा अपने बड़े भाई एस. पॉल, जो स्वयं एक जाने-माने फ़ोटोग्राफ़र थे, के पास दिल्ली आ गये।
अपने एक साक्षात्कार में रघु राय बताते हैं, “मैं जब दिल्ली आया तो क्या करना है मुझे स्वयं पता नहीं था, मेरे बड़े भाई फ़ोटोग्राफ़र थे उनके सूटकेस में उतने कपड़े नहीं होते जितने फ़ोटोग्राफ़ होते। उन्हीं दिनों एक व्यक्ति जो मूलतः किसान थे, उनके भाई एस. पॉल से फ़ोटोग्राफ़ी सीखने आते थे। एक दिन जब वे अपने गांव जा रहे थे, मैं भी उनके साथ साथ उनके गांव चला गया, वहां वे मुझे गांव घुमाने ले गये। वहां पहुंचकर उन्होंने कुछ लेना शुरू किया, मेरे पास भी कैमरा था, मैंने भी फ़ोटो लेना चाहा। ठीक उसी समय एक खच्चर के बच्चे को देखा, जो एक जगह चुपचाप खड़ा था, यह दृश्य मुझे बहुत अच्छा लगा, मैं खच्चर के बच्चे की तस्वीर क़रीब से लेने के लिए कैमरा लेकर उसके पास तक गया। मेरे पास जाते ही वह वहां से भाग लिया और ऐसा करते देख गांव के बच्चे हंसने लगे, फिर मैंने उसका पीछा किया और उस खच्चर के बच्चे की तस्वीर ली जो अख़बार में प्रकाशित हुई, मुझे प्रशंसा और प्रेरणा दोनों मिली।”
इस तरह 1965 में एक साधारण ‘बॉक्स कैमरा’ के साथ शुरू हुआ रघु राय का सफ़र देखते ही देखते एक जुनून में बदल गया और 1966 में वे ‘द स्टेट्समैन’ अख़बार में मुख्य फ़ोटोग्राफ़र के रूप में शामिल हुए। यहीं से उनके पेशेवर करियर की शुरूआत भी हुई। उनके पहले गुरु उनके बड़े भाई एस. पॉल थे, उन्होंने फ़ोटोग्राफ़ी की अनेक बारीकियां उन्हें सिखायीं।
रघु राय की कला दृष्टि
रघु राय की फ़ोटोग्राफ़ी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी संयोजन कला है। वे ‘स्ट्रीट फ़ोटोग्राफ़ी’ में माहिर माने जाते रहे। उनके फ़्रेम में अक्सर बहुत कुछ एक साथ घटित हो रहा होता है, एक तरफ़ कोई प्रार्थना कर रहा है, दूसरी तरफ़ कोई जानवर गुज़र रहा है, और तीसरी तरफ़ कोई बच्चा खेल रहा है। वे अलग अलग चीज़ों को लेकर इस तरह अपने फ़ोटो में रखते थे कि वह फोटो स्वमेव एक संपूर्ण कविता या कहानी बन जाता।
रघु राय ब्लैक एंड व्हाइट फ़ोटोग्राफ़ी के दीवाने थे। उनका मानना था कि रंग विषय की गंभीरता से ध्यान भटका देते हैं जबकि ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर उस दृश्य में छिपे मूल विषय को उजागर करती है। उनकी तस्वीरों में हमें रोशनी और परछाईं का खेल न केवल प्रभावित करता है बल्कि यथार्थ को समझने में सहायता ही करता है।

राय ने अपनी तस्वीरों में केवल दृश्य रंग या परिवेश को ही महत्व नहीं दिया, इसलिए उनकी तस्वीरें केवल तकनीकी कौशल पर नहीं टिकी हैं, इसके इतर उनकी तस्वीरों में विषय के प्रति गहरी संवेदना और जुड़ाव दिखायी देता है। उन्होंने दृश्यों को सजाने के बजाय सच को दिखाया, जैसा कि वे स्वयं कहते थे, “सच्चाई से सुंदर कुछ नहीं होता।”
वे अपनी तस्वीरों में बहुत अधिक ताम-झाम तथा कृत्रिम रोशनी की जगह प्राकृतिक प्रकाश का उपयोग करना पसंद करते थे। उनका मानना था कि कैमरा केवल एक माध्यम है असली काम फ़ोटोग्राफ़र की आँख और उसका दिल करता है। विषय को क़रीब से देखने के लिए वे वाइड-एंगल लेन्स का प्रयोग करते थे, जिससे विषय के आसपास के परिवेश को भी एक फ्रेम में ला सकें। उन्होंने खुले वातावरण को तथा सड़कों, गली, चौराहों को अपना स्टूडियो माना इसलिए भी उनकी शैली में जीवंतता बनी रही तथा उनकी तस्वीरें कभी स्थिर व निर्जीव नहीं लगीं।
उनकी तस्वीरों की शैली “दृश्य कविता” सी लगती हैं, जिनमें पत्रकारिता की सटीकता और सत्यता तो है ही, एक कलाकार की कल्पनाशीलता और संवेदनशीलता भी झलकती है। वे दृश्यों को देखने के बजाय अनुभव करने पर ज़ोर देते रहे। इसलिए भी उनकी शैली को दुनिया भर में “भारतीय फ़ोटो-पत्रकारिता का मानक” माना जाता है।
रघु राय के लिए जीवन और कला कोई दो अलग-अलग चीज़ें नहीं हैं। उनके दर्शन में जीवन ही कला है और कला ही जीवन का प्रतिबिंब है। उन्होंने कभी भी फ़ोटोग्राफ़ी को केवल एक पेशे या तकनीकी कौशल के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे एक ‘साधना’ और ‘जीवन जीने के तरीक़े’ के रूप में स्वीकार किया। वे मानते थे हर क्षण अपने आप में अनूठा है और दोबारा कभी नहीं लौटेगा। इस क्षण को पकड़ना ही कला का चरमोत्कर्ष है।
सरोकारों के साथ कला
रघु राय के करियर में 1984 की भोपाल गैस त्रासदी का कवरेज एक महत्वपूर्ण क्षण साबित हुआ, जब यूनियन कार्बाइड कारख़ाने से ज़हरीली गैस लीक हुई, तो राय उन पहले कुछ फ़ोटोग्राफ़रों में से थे, जो घटनास्थल पर पहुँचे। उनकी खींची गयी एक तस्वीर जिसमें एक मृत बच्चे को दफ़नाया जा रहा है और उसकी पथराई आँखें मिट्टी से बाहर झाँक रही हैं, पूरी दुनिया के लिए इस त्रासदी का प्रतीक बन गयी। इस तस्वीर ने न केवल मानवीय संवेदनाओं को झकझोर दिया, बल्कि औद्योगिक लापरवाही के ख़िलाफ़ एक वैश्विक बहस भी छेड़ दी।
राय ने इस घटना के माध्यम से दिखाया कि एक फ़ोटोग्राफ़र का काम केवल फ़ोटो खींचना नहीं, बल्कि न्याय की सशक्त आवाज़ बनना भी है। इसके आलावा 1972 में बांग्लादेश युद्ध के दौरान उन्होंने उत्कृष्ट कवरेज किया। इस तरह रघु राय ने अपनी तस्वीरों से यह दावा करने की हैसियत हासिल की, कि एक कैमरा कलम से भी ज़्यादा ताक़तवर तरीक़े से इतिहास लिख सकता है।
रघु राय की शैली के केंद्र में हमेशा आम आदमी रहा। चाहे वे किसी बड़े राजनेता की फ़ोटो खींच रहे हों या सड़क पर सोते किसी मज़दूर की, उनका कैमरा हमेशा व्यक्ति की गरिमा को बनाये रखता है। उनकी तस्वीरों में आँखें अक्सर बहुत कुछ बोलती हैं। वे ‘कैंडिड’ फ़ोटोग्राफ़ी के पक्षधर थे यानी वे लोगों को पोज़ देने के बजाय उन्हें उनकी स्वाभाविक अवस्था में क़ैद करना पसंद करते थे।
रघु राय ने इंदिरा गांधी और मदर टेरेसा के साथ भी काम किया। उनके द्वारा खींची गयी इंदिरा गांधी की तस्वीरें केवल एक प्रधानमंत्री की तस्वीरें नहीं थीं, बल्कि उनमें एक नेता की दृढ़ता, अकेलेपन और मानवीय पहलुओं का अद्भुत संतुलन था। इसी तरह, मदर टेरेसा के साथ बिताये समय ने उन्हें आध्यात्मिकता की एक नयी दृष्टि दी। एक प्रेस फ़ोटोग्राफ़र के तौर पर उन्होंने नेहरू से लेकर, वर्तमान दौर के नेताओं तक की ऐसी तस्वीरें लीं, जो उनके मानवीय पक्ष को उजागर करने में सक्षम रहीं।
उन्होंने भारत की सांस्कृतिक विविधता को बड़े मनोयोग से अपनी तस्वीरों में समेटा। बनारस के घाटों, दिल्ली की गलियों, कुंभ मेले और विभिन्न धार्मिक उत्सवों को कैमरे में क़ैद किया। मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक भवनों पर उनके काम को सदा याद किया जाएगा।
उनकी 50 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। सबसे प्रतिष्ठित किताबों में A Portrait of India, Bhopal A Prayer for Rain, Mother Teresa-Faith and Compassion, Reflections in Black and White हैं। उन्हें पद्मश्री सहित कई राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाज़ा गया।
उन्होंने जिस तरह से ग्रामीण भारत की सादगी से लेकर आधुनिक महानगरों की भागदौड़ तक को अपनी तस्वीरों में दर्ज किया, वह इतिहास और वर्तमान का संगम है।

मिथलेश रॉय
पेशे से शिक्षक, प्रवृत्ति से कवि, लेखक मिथिलेश रॉय पांच साझा कविता संग्रहों में संकलित हैं और चार लघुकथा संग्रह प्रकाशित। 'साहित्य की बात' मंच, विदिशा से श्रीमती गायत्री देवी अग्रवाल पुरस्कार 2024 से सम्मानित। साथ ही, साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका "वनप्रिया" के संपादक।
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