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पाक्षिक ब्लॉग ए. जयजीत की कलम से....

हमारी पूरी आबो-हवा बर्बाद कर देगी AI?

          दुनिया का तो पता नहीं, मगर भारत की जनता इस समय गर्मी से त्राहिमाम कर रही है। निश्चित ही, गर्मी कितनी बढ़ेगी, मौसम का क्या हाल रहेगा, जलवायु परिवर्तन की स्थिति क्या रहेगी, गर्मी से कैसे निपटें जैसे नाना प्रकार के सवालों के जवाब एआई पर तलाशे जा रहे होंगे। वो बहुत अच्छे से जवाब दे भी रहा होगा। कितना आसान हो गया ना सब कुछ? मगर हर सुविधा की एक क़ीमत चुकानी पड़ती है। इस सुविधा की भी जो हमें एआई से मिल रही है। और क़ीमत क्या? वही जो हम इस समय भुगत रहे हैं- प्रचंड गर्मी। हो सकता है, आगे और भी ज़्यादा भुगतें।

भविष्य के भारत में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस पहले से तप रहे भारतीय शहरों को और कितना गर्म कर सकती है, इसकी चर्चा इसी आलेख में आगे करेंगे। पहले वैश्विक स्तर पर एआई की वजह से संसाधनों पर पड़ने वाले दबावों को समझना ज़रूरी है। एआई को गेम चेंजर माना जा रहा है, लेकिन साथ ही अब कई विशेषज्ञ इसे ‘एनवॉयरमेंट चेंजर’ भी बता रहे हैं। जैसे-जैसे एआई का विकास हो रहा है, नये-नये मॉडल्स आ रहे हैं और बड़े-बड़े डेटा सेंटर्स का निर्माण हो रहा है, बिजली और पानी जैसे क़ीमती संसाधनों का इस्तेमाल भी बढ़ता जा रहा है। बिजली और पानी के उपयोग में बढ़ोतरी का मतलब है हमारे प्राकृतिक संसाधनों पर भी बढ़ता दबाव। इन दोनों की कितनी ज़्यादा खपत हो रही है, यह अधिकांश लोगों के अनुमान से भी कहीं परे है।

बिजली की कितनी खपत?

एआई से जुड़ी गतिविधियों पर कितनी बिजली ख़र्ची जा रही है, इसको लेकर सबसे महत्वपूर्ण रिपोर्ट इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) की है। इसकी 2025 की रिपोर्ट कहती है कि साल 2024-25 में एआई के डेटा सेंटर्स के लिए 460 TWh (टेरावाट प्रति घंटा) बिजली का इस्तेमाल किया गया और यह आंकड़ा 2030 तक बढ़कर 945 TWh हो जाएगा। बिजली की यह मात्रा कितनी ज़्यादा है, इसका अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि महज़ एक टेरावाट बिजली से भारत के क़रीब 4 से 6 लाख घरों के लिए सालभर तक विद्युत आपूर्ति की जा सकती है। और 460 TWh का मतलब है भारत के प्रत्येक घर तक बिजली की निर्बाध आपूर्ति, पूरे एक वर्ष तक।

कितना पानी ख़र्च?

अधिकांश एआई डेटा सेंटर कूलिंग के लिए उस फ्रेश या मीठे पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो दुनिया के सकल जलभंडार का केवल 4 फ़ीसदी है। अलबत्ता, गूगल और माइक्रोसॉफ़्ट के कुछ डेटा सेंटर्स ज़रूर समुद्री पानी का उपयोग करने की दिशा में आगे बढ़े हैं, लेकिन इसको लेकर अलग समस्याएं हैं। पूंजीपति एक हद तक ही जटिलताओं में जाते हैं और इसलिए ज़्यादातर मामलों में इसी नॉन-सॉल्टी वाटर यानी मीठे पानी का उपयोग किया जा रहा है। एनवायरमेंट एंड एनर्जी स्टडी इंस्टीट्यूट (EESI) के Miguel Yanez-Barnuevo की एक रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक़ एक बड़े डेटा सेंटर को रोज़ाना 50 लाख गैलन पानी की ज़रूरत हो सकती है। इतने पानी से 5 हज़ार की आबादी वाले क़स्बे की प्रतिदिन की आवश्यकताएं पूरी की जा सकती हैं। केवल अमेरिका में छोटे-बड़े मिलाकर 5,300 डेटा सेंटर्स हैं, जिनमें से क़रीब 900 एआई फाेकस्ड और हाइपरस्केलर्स (विशालकाय एआई डेटा सेंटर्स) हैं। इनमें हर दिन करोड़ों गैलन पानी का इस्तेमाल हो रहा है। उत्तरी वर्जीनिया को डेटा सेंटर्स की राजधानी कहा जाता है, जहां इस समय 300 से भी अधिक डेटा सेंटर्स ऑपरेशनल हैं, जिनमें बड़ा हिस्सा एआई फोकस्ड डेटा सेंटर्स का है। इनके लिए 2 अरब गैलन पानी उपलब्ध करवाया जा रहा है, जिसकी वजह से वहां पानी के स्थानीय स्रोतों पर ज़बरदस्त दबाव पड़ रहा है।

अमेरिकी ख़फ़ा, विरोध पर उतरे

अर्थ जस्टिस (Earthjustice) अमेरिका का ऐसा ग़ैर-लाभकारी संगठन है, जिसके वकील अदालतों में पर्यावरण की लड़ाई लड़ते हैं। इस समय यह अमेरिका में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की वजह से पर्यावरण को पहुंच रहे नुक़सान के ख़िलाफ़ अनेक अदालतों में लड़ रहा है। अर्थ जस्टिस इस आधार पर इन डेटा सेंटर्स का विरोध कर रहा है कि बिजली की ज़रूरतों को देखते हुए डेटा सेंटर्स के कर्ता-धर्ता क्लीन एनर्जी के साधनों को छोड़कर अब जीवाश्म ऊर्जा की तरफ़ बढ़ रहे हैं, जिसका नतीजा अंतत: पर्यावरण की गंभीर क्षति के रूप में सामने आएगा। बिजली की आपूर्ति के लिए जल आधारित बिजली संयंत्रों के निर्माण पर भी ज़ोर दिया जा रहा है। यह एक दूसरी तरह की पर्यावरण समस्या की तरफ़ इशारा कर रहा है।

वैसे संस्था को चिंता इस बात की ज़्यादा है कि एआई कंपनियां अब विशालकाय डेटा सेंटर्स (जिन्हें हाइपरस्केलर कहा जाता है) स्थापित करने जा रही हैं। कई डेटा सेंटर्स तो दो-दो हज़ार एकड़ ज़मीन पर निर्मित किये जा रहे हैं। इनके वास्ते बिजली की सतत आपूर्ति के लिए पास में ही जीवाश्म ऊर्जा आधारित पावर प्लांट भी बनाये जा रहे हैं (देखें तस्वीर: यह वर्जीनिया के लीसबर्ग में निर्माणाधीन डेटा सेंटर की है। इसके पीछे ही गैस पावर प्लांट से निकलता धुआं देखा जा सकता है। तस्वीर साभार: Earthjustice.)

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अमेरिका में जितनी तेज़ी से डेटा सेंटर्स बढ़ रहे हैं, उतनी ही मुखरता से इनका विरोध भी हो रहा है। पिछले छह माह के दौरान कम से कम 100 जगहों पर डेटा सेंटरों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन रिपोर्ट हुए हैं। यहां तक कि अमेरिकी संसद में कुछ सांसदों ने नये डेटा सेंटर्स के निर्माण पर प्रतिबंध लगाने तक की मांग की है। डेटा सेंटर्स विरोधी पानी और बिजली के बेतहाशा दुरुपयोग के ख़िलाफ़ हैं। उनका एक ही स्टैंड है- विकास के नाम पर हमें हमारे पर्यावरण के साथ समझौता मंज़ूर नहीं है।

समस्या कार्बन उत्सर्जन की, जो सभी समस्याओं की जड़!

Earth.org में ‘The Green Dilemma’ (पर्यावरणीय दुविधा) नामक आलेख में ओपनएआई के शोधकर्ताओं के हवाले से लिखा गया है कि उन्नत एआई मॉडलों के प्रशिक्षण में कम्प्यूटिंग पावर की मात्रा की ज़रूरत प्रत्येक 3.4 महीने (यानी क़रीब 102 दिन) में दोगुनी हो जाती है। इस हिसाब से ऐसा अनुमान है कि वर्ष 2040 तक दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (जिसमें मुख्य रूप सें एआई फ़ोकस्ड डेटा सेंटर्स और कम्युनिकेशन नेटवर्क की भूमिका रहेगी) का हिस्सा 14 फ़ीसदी तक पहुंच जाएगा। यह बेहद डरावना आंकड़ा है, यानी हमारी जलवायु और हमारा स्वास्थ्य बड़ी टेक कंपनियों द्वारा एआई पर किये जा रहे सट्टा रूपी निवेश पर आश्रित हो जाएगा। यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैम्ब्रिज के शोधकर्ताओं का एक रिसर्च तो और भी डराता है। इसके अनुसार डेटा सेंटर्स के आसपास के क्षेत्रों में तापमान में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखी गयी है। बड़े सेंटर्स औसतन 93 हज़ार वर्गमीटर क्षेत्र में निर्मित हैं और ये एक तरह से हीट आईलैंड बन गये हैं, जिनके तापमान में 2 से 9 डिग्री सेल्सियस की औसत बढ़ोत्तरी हो जाती है। इस गर्मी का भारी असर डेटा सेंटर्स के आसपास के 10 किमी तक के दायरे में तो होता ही है, लेकिन आगे चलकर इसका विस्तार कई सौ किमी तक हो सकता है।

भारत में क्या स्थिति?

बात भारत से शुरू हुई थी और समापन भी इसी से करते हैं। आग उगलती गर्मी के बीच इसी मंगलवार यानी 28 अप्रैल को विशाखापटनम के तरलुवाडा में एक विशालकाय डेटा सेंटर का शिलान्यास किया गया। अडानी और एयरटेल के साथ पार्टनरशिप में बनने वाले इस डेटा सेंटर पर गूगल 15 अरब डॉलर (1.35 लाख करोड़ रुपए) का निवेश करेगा। यह क़रीब 601 एकड़ क्षेत्रफल में बनेगा और इससे लगभग 3,000 लोगों को नौकरियां मिलेंगी। डेटा सेंटर के समर्थन में ये आंकड़े तो बताये गये हैं, लेकिन वे आंकड़े सार्वजनिक नहीं किये गये कि इसके लिए कितनी बिजली ख़र्च होगी, कितने पानी की खपत होगी और यह पानी आख़िर आएगा कहां से!

फिर इस डेटा सेंटर की वजह से कितना कार्बन फुटप्रिंट पैदा होगा, यह भी हम कभी नहीं जान पाएंगे। हम लगातार बढ़ती गर्मी की चिंता में सूखते रहेंगे, मगर समस्या की कोर वजहों पर कभी चर्चाएं नहीं करेंगे, क्योंकि ये हमारे तथाकथित विकास की धारणाओं की राह में आड़े आती हैं। ऐसी चर्चाएं आम भारतीयों की चिंता के दायरे में तो कभी रहती भी नहीं हैं। हम फ़ैशन, ट्रेंड्स, फ़िल्मों के मामलों में भले ही ‘अमेरिकी’ बन जाएं, मगर पर्यावरणीय जागरूकता के मामले में अमेरिकी बनने में हमें कुछ और पीढ़ियां लग जाएंगी।

इस विशाखापटनम वाले डेटा सेंटर के अलावा भी भारत के अलग-अलग शहरों में कम से कम 10 बड़े एआई डेटा सेंटर्स पर काम चल रहा है, जिनमें गूगल, मेटा, माइक्रोसॉफ़्ट और अमेज़न जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का भारी निवेश है। अगले कुछ वर्षों में अगर अमेरिका में डेटा सेंटर्स को लेकर बढ़ते विरोध के चलते वह अपने अधिकांश नये डेटा सेंटर्स भारत और ब्राज़ील जैसे विकासशील देशों में स्थापित करने लगे या पुराने भी यहीं स्थानांतरित होने लगें तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। क्योंकि हमारे कर्णधारों की नज़रों में विकास और विनाश के बीच की उस महीन रेखा को पहचानने की अब भी वह दृष्टि पैदा नहीं हो पायी है। वे उनका खुलकर और हंसकर स्वागत ही करेंगे (विशाखापटनम में एआई सेंटर के शिलान्यास समारोह की तस्वीर देखें। कितने प्रसन्नतचित्त दिखायी दे रहे हैं हमारे नेता और उद्यमी!)। इसी आधार पर वे भारत को ‘विश्वगुरु’ साबित करने की तरफ़ भी बढ़ेंगे और हम आम लोग भी इस पर गर्व से भर उठेंगे।

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बेशक, डेटा की गोपनीयता को लेकर चिंताएं अपनी जगह हैं और इसलिए हमारा डेटा भारत में स्थित डेटा सेंटर्स में रखे जाने की पैरवी की जाती रही है। लेकिन इसके लिए पर्यावरण के साथ कितना समझौता किया जा सकता है, इसको लेकर तो कोई लाइन खींचनी ही होगी। कौन खींचेगा, कैसे खींचेगा; मालूम नहीं। मगर याद रखें, अभी हम जो गर्मी देख रहे हैं, वह तो महज़ ट्रेलर है। कहीं ऐसा न हो कि अंतत: किसी दिन हमारे पास विकास और अस्तित्व को बचाने के बीच किसी एक का चुनाव करने की नौबत आ जाये!

ए. जयजीत

ए. जयजीत

27 वर्षों से हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल तीनों माध्यमों में और रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क पर कार्य करने का लंबा अनुभव। ये अपने आप को व्यंग्यकार भी मानते हैं। प्रमाण-स्वरूप 'पाँचवाँ स्तंभ' नाम से व्यंग्य संग्रह भी प्रकाशित करवा चुके हैं। अनुवाद इनकी वर्क प्रोफ़ाइल का हिस्सा होने के साथ-साथ शौक़ भी रहा। स्टीव जॉब्स की ऑफ़िशियल बायोग्राफी ‘स्टीव जॉब्स’ (वॉल्टर आइज़ैक्सन) के हिंदी अनुवाद का श्रेय इन्हीं को है। कुछ और पुस्तकों का अनुवाद भी कर चुके हैं।

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