
- April 30, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से....
सोते हुए जागना और जागते हुए सोना!
अलसाई आंखें रात के अधूरे ख़्वाबों की दास्तां कह देती हैं। जागती आंखों में रात का वक़्त चहलक़दमी करते हुए कहता है, अभी नींदों के काफ़िले दौड़ रहे हैं। सोते हुए जागने और जागते हुए सोने की कश्मकश इस वक़्त हर ज़िन्दगी के साथ जुड़ी हुई है। नींद जागने के लिए ज़रूरी है। जो नींद में है उसे जगाना बहुत ज़रूरी है लेकिन जो जागते हुए सो रहा है उसे जगाना और भी ज़रूरी है।
नींद के अपने दायरे हैं और ये दायरे निरंतर घट रहे हैं। ज़िन्दगी की भाग-दौड़ ने लोगों की नींद छीन ली है, इसीलिए जागने के वक़्त भी इंसान सो रहा है और अपने इर्द-गिर्द मंडराते ख़तरों को नहीं पहचान पा रहा है। वह उसके पीछे भागे जा रहा है जो उसे कभी नहीं मिलना है और उसको तलाश कर रहा है जो उसके भीतर ही है।
भक्तकवि तुलसीदास कहते हैं:
घट में है सूझत नहीं, लानत ऐसी जिन्द
तुलसी या संसार को, भयो मोतियाबिंद
इस मोतियाबिंद के धुंधलके ने उसकी नींदों को उड़ा दिया है। आंखों में नींद और नींदों में ख़्वाब हों, इसके लिए ज़रूरी नहीं कि चैन का बिस्तर हो। मखमल की सेज सजी हुई हो। कई आंखों में तमाम सुविधाओं के बाद भी नींद नहीं आती है और कई आंखें ऐसी हैं, जो खुली ज़मीन पर भी चैन की नींद ले लेती हैं। जहां श्रम होता है, मेहनत होती है, वहां नींद अपने आप आती है।
हमारी ज़िन्दगी से मेहनत कम हो रही है और सुविधाओं के घेरे बढ़ रहे हैं। सुविधाओं की सेज पर निद्रा के फूल नहीं ठहरते। आरामदायक बिस्तर पर सपनों के समुच्चय नहीं बनाये जा सकते हैं। नींद तो वहां आती है जहां सुकून हो, चैन हो। जहां ज़िन्दगी के प्रति समर्पण हो। इसी बात को ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी यूं कहते हैं:
नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है
उनकी आग़ोश में सर हो ये ज़रूरी तो नहीं
नींद की चाह में दुनिया की एक बड़ी आबादी नींद की गोलियों का सेवन करती है। कई तरह के नशों का सहारा लेती है। फिर भी आंखों से नींद ओझल रहती है। नींद को बुलाने के लिए तरह-तरह के जतन करना, तरह-तरह के प्रयास करना, इसी तरह है जैसे न आने वाले मेहमान के लिए बार-बार मिन्नतें करना।
नींद ज़िन्दगी के लिए बहुत ज़रूरी है। पर्याप्त नींद ही जीवन को एक सुखद दिन की तरफ़ अग्रसर करती है। नींद को बुलाने के लिए जो ग़लत साधनों का सहारा लेते हैं, वे नींद के ग़लत पैमाने तय करते हैं। ऐसे लोगों की ज़िन्दगी में न ख़्वाहिशें होती हैं, न चाहतें होती हैं, न प्यार होता है, न ही ज़िन्दगी के प्रति कोई आकर्षण। ऐसे लोगों को जीने के लिए किसी तरह की मशक्कत की ज़रूरत नहीं होती। सब कुछ उनके सामने उपलब्ध होता है। ऐसे में नींद कैसे आ सकती है? मुनव्वर राना कहते हैं:
सो जाते हैं फुटपाथ पे काग़ज़ को बिछाकर
मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाते
नींद को बुलाने के लिए तो शरीर को मेहनत के गलियों से गुज़रना पड़ता है। कभी हाथों में कोई औज़ार थामना पड़ता है। कभी कांधे पर ज़िम्मेदारी का बोझ उठाना पड़ता है। कभी पैरों को ज़मीन पर चलने की तालीम देना पड़ती है। नींद के सिलसिले यूं ही नहीं बनते। विडंबना यह है कि इस वक़्त जिन्हें जागना चाहिए वे गहरी नींद में हैं और जिन्हें नींद की ज़रूरत है वे सदियों से सोये नहीं हैं। ख़्वाब दर-ब-दर हैं। परवीन शाकिर ने कहा है:
बजा कि आँख में नींदों के सिलसिले भी नहीं
शिकस्त-ए-ख़्वाब के अब मुझमें हौसले भी नहीं
अच्छी नींद के लिए ज़रूरी है कि नींद के दुश्मनों की पहचान की जाये। इस वक़्त नींद का सबसे बड़ा दुश्मन हमारा स्क्रीन समय है। आंखें स्क्रीन के आगे से हटती ही नहीं। जब तक हाथ से मोबाइल छूट कर गिर नहीं जाये, टीवी के आगे झोंके न आने लग जाएं या कंप्यूटर के कीबोर्ड पर सर न टकरा जाये, तब तक। इतनी थकी आंखों में भला नींद कहां से आएगी?
आज आसमान में सजे ख़ूबसूरत सितारों को देखने की किसी को चाहत नहीं। सितारे उस दौर को याद करते हुए दुःखी हैं जब रात को छतों पर लेटकर पूरा घर उन्हें तकता था। हर एक तारे के क़िस्से सुनता था। क़तील शिफ़ाई ने कहा भी है:
हमें भी नींद आ जाएगी हम भी सो ही जाएँगे
अभी कुछ बे-क़रारी है सितारो तुम तो सो जाओ
इस बेक़रारी को ही कम करने की ज़रूरत है। इस समय अपने आप को सोते हुए जागने और जागते हुए सोने से बचाना ज़रूरी है।

आशीष दशोत्तर
ख़ुद को तालिबे-इल्म कहते हैं। ये भी कहते हैं कि अभी लफ़्ज़ों को सलीक़े से रखने, संवारने और समझने की कोशिश में मुब्तला हैं और अपने अग्रजों को पढ़ने की कोशिश में कहीं कुछ लिखना भी जारी है। आशीष दशोत्तर पत्र पत्रिकाओं में लगातार छपते हैं और आपकी क़रीब आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं।
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