
- July 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग डॉ. संजीव जैन की कलम से....
लेखन में भाषा की आत्मा को कैसे समझें?
ध्वनि से अर्थ तक लेखन की आंतरिक यात्रा का नौवां अध्याय… “शब्दों की प्रकृति से अर्थ की सुपरपोज़िशन तक”।
यदि इस प्रश्न का उत्तर केवल इतना होता कि लेखन विचारों को शब्दों में व्यक्त करने की कला है, तो संसार के अधिकांश लिखे हुए ग्रंथ जीवित न रह पाते। विचार तो हर मनुष्य के भीतर होते हैं, भाषा भी लगभग सभी के पास होती है, किंतु हर व्यक्ति लेखक नहीं हो जाता। इसका कारण यह है कि लेखन केवल भाषा का उपयोग नहीं है; वह मनुष्य की देखने की क्षमता, अनुभव की गहराई, संवेदना की तीक्ष्णता और शब्दों के स्वभाव को पहचानने की साधना है।
लेखन वहाँ शुरू होता है, जहाँ मनुष्य वस्तुओं को उनके उपयोग से अलग देखना आरंभ करता है। जब वह पेड़ को केवल लकड़ी नहीं, बल्कि एक मौन जीवित उपस्थिति की तरह देखता है; जब वह नदी को केवल जल का प्रवाह नहीं, बल्कि समय की चलती हुई स्मृति की तरह अनुभव करता है; जब वह किसी बूढ़े आदमी के चेहरे की झुर्रियों में केवल उम्र नहीं, बल्कि संघर्ष, पराजय, धैर्य और समय की धीमी लिखावट पढ़ लेता है – तब लेखन की पहली सीढ़ी निर्मित होती है।
लेखन का सबसे बड़ा रहस्य शब्दों की आत्मा को पहचानने में है। हर शब्द का अपना शरीर, अपना ताप, अपनी चाल और अपनी नैतिकता होती है। कुछ शब्द पर्वत की तरह होते हैं – कठोर, ऊँचे, अडिग और विद्रोही। “प्रतिरोध”, “अस्वीकार”, “विद्रोह”, “आक्रोश”, “संघर्ष” – इन शब्दों को लिखते ही भाषा की मुद्रा बदल जाती है। वाक्य अचानक सीधा खड़ा हो जाता है। उसकी रीढ़ तन जाती है। यदि कोई लिखे – “उसने मना कर दिया”, तो यह एक सामान्य सूचना है; किंतु यदि लिखा जाये – “उसने अस्वीकार कर दिया”, तो उसमें एक नैतिक दृढ़ता आ जाती है। “मना” व्यवहार का शब्द है, “अस्वीकार” चेतना का। यही अंतर लेखन को सामान्य अभिव्यक्ति से अलग करता है।
इसके विपरीत कुछ शब्द नदी की तरह होते हैं। वे बहते हैं, छूते हैं, अपने किनारों को धीरे-धीरे काटते हैं। “स्मृति”, “करुणा”, “आहट”, “सांझ”, “प्रतीक्षा”, “स्पर्श”, “थकान” – ये ऐसे शब्द हैं जो पाठक पर अचानक नहीं गिरते; वे धीरे-धीरे भीतर उतरते हैं। यदि कोई लिखे – “वह शाम को घर लौटा”, तो यह मात्र घटना है। लेकिन यदि लिखा जाये – “वह सांझ की बुझती हुई रोशनी और अपने कंधों पर दिन भर की धूल लेकर लौटा”, तो यहाँ शब्द केवल सूचना नहीं दे रहे; वे दृश्य, वातावरण और मनःस्थिति बना रहे हैं। लेखन की वास्तविक शक्ति इसी में है कि वह घटना को अनुभव में बदल दे।
महान लेखन हमेशा दृश्यात्मक होता है। वह विचार को भी दृश्य में बदल देता है। उदाहरण के लिए “दुख” एक सामान्य अमूर्त शब्द है, लेकिन जब कोई लेखक लिखता है – “उसकी आँखों में ऐसा अँधेरा था जैसे बरसों से बंद किसी घर में जमी धूल”, तब दुख दृश्य बन जाता है।
इसी तरह “अकेलापन” को यदि केवल कहा जाये तो वह विचार है, लेकिन यदि लिखा जाये – “वह भरे हुए बाज़ार में ऐसे चल रहा था जैसे उसकी आवाज़ किसी तक पहुँचती ही न हो”, तब अकेलापन अनुभव बन जाता है। लेखन की संवेदना इसी परिवर्तन में छिपी है – अमूर्त को मूर्त बनाना।
लेखन के लिए केवल शब्द जानना पर्याप्त नहीं। शब्दों के पीछे का मनुष्य जानना आवश्यक है। “रोटी” शब्द का अर्थ भूख से जुड़ा हुआ है, लेकिन एक किसान के लिए रोटी का अर्थ श्रम है, मजदूर के लिए जीवित रहने की लड़ाई, माँ के लिए बच्चों की चिंता, और ग़रीब बच्चे के लिए कभी-कभी एक सपना। लेखक वही है जो एक ही शब्द के भीतर छिपे इन अनेक जीवनों को देख सके। इसी कारण शब्द कभी अकेले नहीं होते; वे अपने साथ पूरा सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास लेकर चलते हैं।
मुहावरे इसी इतिहास की सबसे जीवित अभिव्यक्तियाँ हैं। वे भाषा के भीतर समाज की सामूहिक स्मृतियाँ हैं। “दिल पर पत्थर रखना” केवल कठोर निर्णय लेना नहीं है; यह उस मनुष्य की छवि है जो अपनी करुणा को दबाकर विवशता में कोई निर्णय ले रहा है। “पानी-पानी होना” केवल शर्मिंदा होना नहीं; यह उस स्थिति का दृश्य है जिसमें आत्मविश्वास मानो पिघलकर बह गया हो। “आसमान सिर पर उठाना” केवल शोर मचाना नहीं; यह बेचैनी का वह दृश्य है जिसमें व्यक्ति अपने भीतर की अस्थिरता को पूरे वातावरण में फैला देता है। मुहावरे भाषा को दृश्यात्मक और जीवित बनाते हैं। वे बताते हैं कि मनुष्य केवल विचारों में नहीं, चित्रों में सोचता है।
लेखन की महत्वपूर्ण शर्तें
लेखन का एक महत्वपूर्ण पक्ष ध्वनि भी है। शब्द केवल अर्थ से काम नहीं करते; उनकी ध्वनि भी पाठक के भीतर असर पैदा करती है। “खनखनाहट”, “फुसफुसाहट”, “छनन”, “घरघराहट”, “धप्प” – ये शब्द पढ़ते समय कानों में बजते हैं। इसी तरह कुछ शब्दों में स्वाभाविक कोमलता होती है, कुछ में कठोरता। “माँ”, “नींद”, “बादल”, “नदी” – इनकी ध्वनि में नरमी है। “प्रहार”, “विस्फोट”, “आक्रमण”, “ध्वंस” – इनकी ध्वनि में तनाव है। लेखक जब शब्द चुनता है, तब वह केवल अर्थ नहीं चुन रहा होता; वह ध्वनि, लय और मानसिक प्रभाव भी चुन रहा होता है।
लेखन की सबसे बड़ी शर्त संवेदना है। संवेदना का अर्थ केवल भावुकता नहीं है। संवेदनशील होना और भावुक होना अलग चीजें हैं। भावुक व्यक्ति जल्दी प्रभावित हो जाता है; संवेदनशील व्यक्ति गहराई से देखता है। वह उन चीज़ों को भी महसूस करता है जिन्हें सामान्य दृष्टि अनदेखा कर देती है। सड़क किनारे बैठा हुआ एक मोची, बारिश में भीगती हुई एक किताब, रात के अंतिम पहर में जलता हुआ एक अकेला बल्ब – संवेदनशील लेखक इन सबमें जीवन के अर्थ खोज लेता है। उसके लिए संसार निर्जीव वस्तुओं का समूह नहीं रह जाता; हर वस्तु एक मौन कथा बन जाती है।
लेखन की दूसरी बड़ी शर्त है – देखने की कला। अधिकांश लोग संसार को केवल उतना देखते हैं जितना उनके काम के लिए आवश्यक है। लेखक उपयोगिता से आगे देखता है। वह चेहरे पढ़ता है, चाल पढ़ता है, मौन पढ़ता है। एक सामान्य व्यक्ति किसी मज़दूर को सड़क पर चलते हुए देखेगा और आगे बढ़ जाएगा; लेखक उसकी चाल में थकान, उसके कपड़ों में श्रम की धूल, उसकी आँखों में अधूरी नींद और उसके मौन में जीवन की अनकही कठोरता देख लेगा। यही देखने की क्षमता लेखन को गहराई देती है।
लेखन में स्मृति का भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। स्मृति केवल घटनाओं का संग्रह नहीं होती; वह अनुभवों की पुनर्रचना है। कुछ स्मृतियाँ गंध के रूप में लौटती हैं, कुछ ध्वनियों में, कुछ प्रकाश की तरह। किसी पुराने घर की सीलन, दादी की आवाज़, गर्मियों की दोपहर में आम के पेड़ की छाया – ये सब स्मृतियाँ भाषा में प्रवेश करके लेखन को जीवित बनाती हैं। महान लेखक स्मृति को केवल याद नहीं करते; वे उसे पुनः जीते हैं।
भाषा का चयन भी लेखन की आत्मा को प्रभावित करता है। संस्कृतनिष्ठ शब्द भाषा में गंभीरता और ऊँचाई लाते हैं – “अस्तित्व”, “संवेदना”, “अनुगूँज”, “प्रज्ञा”, “निस्तब्धता”। दूसरी ओर लोकभाषा के शब्द मिट्टी और जीवन की गंध लाते हैं – “धुर”, “भकुआना”, “चिरई”, “कनकनी”, “टोह”। जब कोई लेखक इन दोनों धाराओं को संतुलित करता है, तब उसकी भाषा बहुस्तरीय हो जाती है। वह एक साथ विचारशील भी होती है और जीवित भी।
लेखन के और पक्ष
लेखन का संबंध केवल सौंदर्य से नहीं, नैतिकता से भी है। शब्दों का चयन लेखक की दृष्टि को प्रकट करता है। यदि कोई लिखता है – “उसे मार गिराया गया”, तो यह सत्ता की भाषा हो सकती है; लेकिन यदि लिखा जाये – “उसकी हत्या कर दी गई”, तो भाषा नैतिक हो जाती है। शब्दों के भीतर छिपी हुई यह राजनीति लेखन का अत्यंत महत्वपूर्ण आयाम है। भाषा कभी पूरी तरह निष्पक्ष नहीं होती। हर शब्द किसी न किसी पक्ष में खड़ा होता है। इसलिए सच्चा लेखक केवल सुंदर वाक्य नहीं बनाता; वह भाषा को झूठ और छल से बचाने का काम भी करता है।
लेखन का एक और सूक्ष्म पक्ष है – मौन। महान लेखन वह नहीं जो सब कुछ कह दे; महान लेखन वह है जो कुछ अनकहा छोड़ दे। जो बात सीधे कह दी जाती है, वह जल्दी समाप्त हो जाती है; जो बात संकेत में छोड़ी जाती है, वह पाठक के भीतर लंबे समय तक काम करती रहती है। यही कारण है कि श्रेष्ठ साहित्य में रिक्त स्थानों का बहुत महत्व होता है। वे पाठक को अर्थ निर्माण की प्रक्रिया में सहभागी बनाते हैं।
लेखन अंततः मनुष्य की उस बेचैनी का परिणाम है जिसमें वह अपने अनुभव को क्षणभंगुर नहीं रहने देना चाहता। जीवन बहुत तेज़ी से बीत जाता है। चेहरे बदल जाते हैं, शहर बदल जाते हैं, समय बदल जाता है; लेकिन लेखन उस बीतते हुए को भाषा में रोकने का प्रयास है। जब कोई लेखक लिखता है – “उसकी माँ के हाथों में आटे और धूप की मिली-जुली गंध थी”, तो वह केवल एक स्त्री का वर्णन नहीं कर रहा होता; वह पूरे घरेलू जीवन, श्रम और स्नेह की स्मृति को बचा रहा होता है।
केवल तकनीक नहीं है लेखन
इसीलिए लेखन केवल तकनीक नहीं है। वह जीवन को देखने का ढंग है। जो मनुष्य भीतर से सूखा है, वह चाहे कितनी भी भाषा जानता हो, महान लेखन नहीं कर सकता। महान लेखन के लिए मनुष्य को भीतर से खुला होना पड़ता है। उसे दुख से गुजरना पड़ता है, प्रेम से, पराजय से, प्रतीक्षा से, अकेलेपन से। क्योंकि जिन शब्दों के पीछे जीवन नहीं होता, वे चमकते तो हैं, जीवित नहीं रहते।
अंततः लेखन वही है – संसार को दूसरी बार जन्म देना। पहली बार वस्तुएँ प्रकृति में जन्म लेती हैं; दूसरी बार भाषा में। और इस दूसरी सृष्टि में शब्द केवल शब्द नहीं रहते – वे मनुष्य की आत्मा के चलने की ध्वनि बन जाते हैं।
इस तरह भाषा एक जीवित पारिस्थितिकी बन जाती है – इस वाक्य को यदि केवल एक सुंदर रूपक मान लिया जाए, तो उसके भीतर छिपा हुआ सबसे बड़ा सत्य हमसे छूट जाएगा। वास्तव में भाषा किसी शब्दकोश का व्यवस्थित संग्रह नहीं है; वह एक जीवित जैविक संसार है, जिसमें शब्द पेड़ों की तरह उगते हैं, अर्थ नदियों की तरह बहते हैं, मौन मिट्टी की तरह सबको धारण करता है, और समय ऋतुओं की तरह उसके स्वभाव को बदलता रहता है। कोई भी भाषा मृत नियमों से नहीं चलती; वह मनुष्यों की साँसों, स्मृतियों, संघर्षों, प्रेम, भय, श्रम और इतिहास से निर्मित होती है। इसीलिए जब कोई लेखक लिखता है, तो वह केवल वाक्य नहीं बना रहा होता; वह एक जीवित पारिस्थितिकी में हस्तक्षेप कर रहा होता है।
एक जंगल की कल्पना कीजिए। वहाँ केवल पेड़ नहीं होते। वहाँ हवा की दिशा, मिट्टी की नमी, पक्षियों की आवाज़ें, कीड़ों की अदृश्य गतिविधियाँ, जड़ों का फैलाव, सूखे पत्तों का विघटन, जल का चक्र – सब मिलकर जीवन का एक जटिल संतुलन रचते हैं। भाषा भी ठीक इसी तरह काम करती है। एक शब्द अकेले अर्थ नहीं बनाता। उसका अर्थ उसके आसपास उपस्थित शब्दों, उसकी ध्वनि, उसके सांस्कृतिक इतिहास, उसके प्रयोग की परिस्थिति और उसके मौन से निर्मित होता है।
लेखन का नैतिक संकट
“घर” शब्द को ही देखिए। शब्दकोश कहेगा – रहने का स्थान। किंतु भाषा की जीवित पारिस्थितिकी में “घर” माँ की आवाज़ है, रसोई की गंध है, वापसी की थकान है, बचपन की सुरक्षा है, कभी-कभी हिंसा भी है, निर्वासन भी है, स्मृति भी है। यही कारण है कि एक विस्थापित व्यक्ति “घर” शब्द सुनकर टूट सकता है, जबकि किसी सम्पन्न व्यक्ति के लिए वही शब्द केवल संपत्ति का संकेत हो सकता है।
यहीं से लेखन का नैतिक संकट शुरू होता है। अधिकांश लेखक शब्दों का उपयोग करते हैं, लेकिन शब्दों के जीवन को नहीं समझते। वे भाषा को उपकरण मानते हैं, जीवित सत्ता नहीं। वे शब्दों को ऐसे इस्तेमाल करते हैं जैसे कोई उद्योगपति जंगल को केवल लकड़ी समझकर काटता चला जाए। परिणाम यह होता है कि भाषा धीरे-धीरे बाँझ होने लगती है। उसमें जीवन की नमी कम होने लगती है। शब्द चमकते बहुत हैं, लेकिन उनके भीतर अनुभव का रस नहीं बचता।
आज का एक बड़ा संकट यही है कि भाषा का जैविक संतुलन टूट रहा है। शब्दों का अत्यधिक उपयोग उन्हें थका देता है। कुछ शब्द इतने बार बोले और लिखे जा चुके हैं कि उनका आंतरिक रक्त सूख गया है। “संघर्ष”, “क्रांति”, “प्रेम”, “आत्मा”, “संवेदना”, “विकास”, “आज़ादी” – ये शब्द कभी जीवित अनुभव थे; अब बहुत बार केवल सजावटी मुद्रा बनकर रह जाते हैं। लेखक जब इन शब्दों का प्रयोग करता है, तो उसे स्वयं से पूछना चाहिए – क्या मैं इस शब्द को उसके पूरे जीवन के साथ लिख रहा हूँ, या केवल उसकी लाश का उपयोग कर रहा हूँ?
एक सच्चा लेखक शब्द को लिखने से पहले उसके भीतर उतरता है। वह देखता है कि उस शब्द के पीछे कितनी सदियाँ खड़ी हैं। “रोटी” शब्द को ही लीजिए। एक भूखे बच्चे के मुँह से निकली “रोटी” और किसी पाँच सितारा होटल के मेन्यू में लिखी “रोटी” – दोनों एक ही शब्द हैं, पर उनकी पारिस्थितिकी अलग है। एक में भूख का काँपता हुआ शरीर है, दूसरे में स्वाद का उपभोग। यही अंतर भाषा को जीवित बनाता है। लेखक यदि इस अंतर को नहीं पहचानता, तो उसका लेखन सतही रह जाएगा।
भाषा का पारिस्थितिक तंत्र
भाषा की पारिस्थितिकी में स्मृति जल की तरह काम करती है। जिस भाषा की स्मृतियाँ सूख जाती हैं, वह धीरे-धीरे कृत्रिम होने लगती है। इसीलिए लोकभाषाएँ इतनी जीवित लगती हैं, क्योंकि उनमें जीवन का प्रत्यक्ष स्पर्श बचा रहता है। गाँव की बूढ़ी स्त्री जब कहती है – “आज हवा कुछ उदास है” – तो वह मौसम का वैज्ञानिक वर्णन नहीं कर रही; वह प्रकृति और मनुष्य के बीच उस पुराने आत्मीय संबंध को व्यक्त कर रही है जिसे आधुनिक सभ्यता खो चुकी है। यही कारण है कि लोकभाषा के छोटे-छोटे शब्द भी कई बार महान साहित्य से अधिक जीवित लगते हैं।
एक अच्छे लेखक को यह समझना होगा कि भाषा केवल अर्थ की प्रणाली नहीं है; वह संवेदना की जैविक संरचना है। जैसे मिट्टी में अनगिनत सूक्ष्म जीव काम करते हैं और उन्हीं के कारण धरती उपजाऊ बनती है, वैसे ही भाषा के भीतर भी अनेक सूक्ष्म स्तर काम करते हैं – ध्वनियाँ, लय, सांस्कृतिक संकेत, स्मृतियाँ, मिथक, मौन, छवियाँ। जब कोई लेखक केवल विचार लिखता है और इन स्तरों की उपेक्षा करता है, तब उसकी भाषा बंजर हो जाती है।
यही कारण है कि महान लेखक शब्दों को केवल रखते नहीं, उन्हें उगाते हैं। प्रेमचंद की भाषा में खेतों की धूल है, रेणु की भाषा में देहाती हवा चलती है, निर्मल वर्मा की भाषा में यूरोपीय उदासी और भारतीय स्मृति का धुंधलका है, मुक्तिबोध की भाषा में मानसिक अंधकार की जटिल सुरंगें हैं। इन लेखकों को पढ़ते समय लगता है कि भाषा केवल माध्यम नहीं रही; वह एक संपूर्ण वातावरण बन गई है जिसमें पाठक प्रवेश करता है।
भाषा की पारिस्थितिकी का सबसे महत्वपूर्ण तत्व मौन है। जैसे जंगल केवल ध्वनियों से नहीं बनता, वैसे ही भाषा केवल शब्दों से नहीं बनती। कुछ अर्थ शब्दों के बीच के अंतराल में पैदा होते हैं। एक माँ अपने बेटे से केवल इतना पूछती है – “खा लिया?” – लेकिन इस छोटे-से वाक्य के भीतर चिंता, प्रेम, देखभाल, थकान और जीवन भर का संबंध छिपा हो सकता है। भाषा का वास्तविक जीवन इन्हीं अदृश्य स्तरों में धड़कता है।
आज बहुत-सा लेखन इसलिए खोखला लगता है क्योंकि उसमें अनुभव की जैविकता नहीं बची। लेखक जीवन से अधिक भाषा के प्रदर्शन में रुचि लेने लगे हैं। वे शब्दों को सजाते हैं, लेकिन जीते नहीं। वे दुख पर लिखते हैं, पर दुख की गंध नहीं जानते। वे श्रम पर लिखते हैं, पर कभी किसी मजदूर के पसीने की नमकभरी गंध के पास नहीं गए। वे प्रेम पर लिखते हैं, पर प्रेम की प्रतीक्षा में जागी हुई रातों की चुप्पी नहीं जानते। ऐसी भाषा ऊपर से सुंदर हो सकती है, लेकिन उसमें जीवन नहीं होता।
भाषा की रक्षा लेखन का धर्म
सच्चा लेखन तब शुरू होता है जब लेखक अपनी सुविधा से बाहर निकलता है। जब वह अपने भीतर की नकली आवाज़ों को पहचानना शुरू करता है। जब वह यह देख पाता है कि उसके बहुत-से शब्द वास्तव में उसके अपने नहीं हैं, बल्कि उधार लिए हुए हैं – समाज से, फैशन से, विचारधाराओं से, साहित्यिक परंपराओं से। एक बड़ा लेखक बनने से पहले मनुष्य को अपने भीतर की भाषा की सफाई करनी पड़ती है। उसे यह पहचानना पड़ता है कि उसके कौन-से शब्द सचमुच उसके अनुभव से निकले हैं और कौन-से केवल प्रभाव पैदा करने के लिए हैं।
भाषा की पारिस्थितिकी में सबसे खतरनाक चीज़ कृत्रिमता है। कृत्रिम शब्द वैसे ही होते हैं जैसे प्लास्टिक के फूल – दूर से सुंदर, लेकिन उनमें न गंध होती है, न ऋतु का स्पर्श, न मृत्यु का सत्य। जीवित भाषा हमेशा अपूर्ण होती है, उसमें टूटन होती है, हकलाहट होती है, साँस होती है। मनुष्य जब सचमुच टूटता है, तब वह सबसे सुंदर भाषा नहीं बोलता; वह सबसे सच्ची भाषा बोलता है।
शायद इसीलिए महान साहित्य हमें भीतर तक हिला देता है। क्योंकि वहाँ भाषा “बनाई” हुई नहीं लगती; वह जीवन से फूटी हुई लगती है। कबीर की पंक्तियाँ इसलिए अमर हैं क्योंकि उनमें अनुभव की आग सीधे जलती है। निराला इसलिए बड़े हैं क्योंकि उनकी भाषा में भूख, विद्रोह और करुणा सचमुच काँपती है। मुक्तिबोध इसलिए बेचैन करते हैं क्योंकि उनकी भाषा में विचार नहीं, पूरा मानसिक संघर्ष जीवित है।
एक अच्छा लेखक अंततः शब्दों का मालिक नहीं, उनका संरक्षक होता है। वह भाषा का शोषण नहीं करता; उसकी रक्षा करता है। वह शब्दों को थकाता नहीं; उन्हें उनके सबसे सच्चे अर्थ में वापस लौटाता है। वह भाषा को बाज़ार, सत्ता और खोखली बौद्धिकता से बचाने की कोशिश करता है। क्योंकि भाषा मरती है तो केवल शब्द नहीं मरते – मनुष्य की संवेदना मरती है, उसकी कल्पना मरती है, उसका नैतिक साहस मरता है।
और शायद यही वह जगह है जहाँ हर लेखक को अपने भीतर झाँकना चाहिए। क्या उसकी भाषा सचमुच जीवित है? क्या उसके शब्दों में अनुभव की धड़कन है? क्या उसकी वाणी मिट्टी, पसीने, प्रेम, भय, पराजय, स्मृति और जीवन के वास्तविक ताप से होकर आई है? या वह केवल साहित्य का अभिनय कर रहा है?
क्योंकि भाषा को अंततः छलना संभव नहीं। मृत शब्द कुछ समय तक प्रभाव पैदा कर सकते हैं, लेकिन वे किसी मनुष्य के भीतर जीवन नहीं जगा सकते।

संजीव कुमार जैन
लंबे समय से साहित्य के स्वाध्याय एवं अध्यापन से जुड़े संजीव शासकीय कन्या महाविद्यालय, भोपाल यानी नूतन कॉलेज में हिंदी के सह प्राध्यापक हैं। आपकी अभिरुचि पढ़ना लिखना है लेकिन अधिक प्रकाशन से आप गुरेज़ करते हैं।
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