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हास्य-व्यंग्य डॉ. मुकेश असीमित की कलम से....

राम के चढ़ावे का चुग्गा

          राम के चढ़ावे का चुग्गा
          खाओ चिड़िया भर-भर पेट

“राम मंदिर में चढ़ावा चोरी हो गया।”

जब सब लोग इस चिंता में पगलाये जा रहे थे, तो मुझे लगा कि कहीं मैं ही इस राष्ट्रीय चिंता में शामिल होने से वंचित न रह जाऊँ। इसलिए मैंने यही चिंता हमारे एकमात्र चिंतक, विचारक और प्रत्येक बात में मीन-मेख निकालने वाले बब्बन चाचा के सामने रखकर उनकी सोयी हुई आत्मा को सुलगा दिया।

बब्बन चाचा ने मेरा उधार लिया हुआ अख़बार मोड़ते हुए कहा-

“अरे, काहे को इतना हंगामा बरपा रखा है रे! बड़ी चिल्ल-पों मची हुई है कि राम मंदिर का चढ़ावा चला गया, दान ग़ायब हो गया, आभूषणों का हिसाब नहीं मिल रहा। अरे भाई, दान दिया है, कोई निवेश थोड़े ही किया है कि अब ‘रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट’ खोज रहे हो! विलाप तो ऐसे कर रहे हैं, मानो धन कोई पैदल तीर्थयात्री हो, जो जीपीएस का सिग्नल न मिलने के कारण रास्ता भटक गया हो।

तुम लोगों को हर बात में चोरी ही दिखायी देती है। परिवार में थोड़ी-बहुत वस्तुएँ इधर से उधर हो जाएँ तो उसे चोरी कहेंगे क्या? घर की बात घर में रहनी चाहिए कि नहीं?”

मैंने पूछा, “चाचा, यह कैसी बात कर रहे हैं आप? मंदिर कोई परिवार थोड़े ही है!”

“और क्या है!” वे बोले, “मंदिर भगवान का घर है। भगवान हमारे हैं। हम भगवान के हैं। अतः घर भी हमारा हुआ कि नहीं? अब आदमी अपने ही घर से कुछ ले ले, तो पुलिस थोड़े ही बुलाता है!”

मैंने चाचा के ग़ुस्से की आग में थोड़ा और घी डालना उचित समझा।

“लेकिन चाचा, दान तो श्रद्धालुओं ने दिया था। कई लोगों को रसीद नहीं मिल पायी होगी, क्योंकि धन शायद काला रहा हो; लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि उसे चट ही कर लिया जाये!”

मेरी आशा के विपरीत चाचा ने ग़ुस्सा दबाकर मुस्कुराते हुए कहा-

“यही तुम्हारी समस्या है। तुम देने के बाद भी वस्तु को अपना ही समझते हो। दान देकर हिसाब माँगना वैसा ही है, जैसे कन्यादान के बाद दामाद से पूछो कि दहेज का सारा सामान सुरक्षित है या नहीं।”

मैंने कहा, “तो दानदाता कुछ पूछे भी नहीं? यह तो कोई बात नहीं हुई चाचा! आपने भी न जाने कैसी बात कह दी।”

“पूछ सकता है,” चाचा बोले, “पूछने पर थोड़े ही कोई रोक है! बस उत्तर मिलने की आशा न रखे। सच्चे भक्त की पहचान ही यही है कि वह प्रश्न करे और उत्तर न मिले तो उसे भगवान की इच्छा मानकर खिसक ले।”

मैंने कहा, “लेकिन लोग रसीद माँग रहे हैं। पावती तो बनती है न?”

चाचा का चेहरा अचानक गहरे दुःख से भर गया।

“कलियुग है! भगवान से कृपा भी चाहिए और रसीद भी! हे भगवान, ऐसे पापियों को अवश्य दंड देना। इन्होंने भक्ति को आयकर की धारा बना दिया है। अरे, रामजी ने तुम्हें इतना दिया कि तुम दान देने योग्य हुए और तुम उन्हीं के दरबार में पावती खोज रहे हो! यह भक्ति है या बही-खाता?”

मैंने कहा, “लेकिन शास्त्रों में दान की शुद्धता की बात भी तो कही गयी है।”

“बिल्कुल कही गयी है,” चाचा बोले, “दाएँ हाथ से दान दो तो बाएँ हाथ को पता न चले। यहाँ देखो— दाता ने दाएँ हाथ से दान दिया, बाएँ हाथ से वीडियो बनाया और दोनों हाथों से उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया। यह भी कोई दान हुआ?

“दान ऐसे दो कि पता ही न चले कि दिया हुआ कहाँ गया और किसके पेट में समा गया। आख़िर सब रामजी का पेट ही तो है! उन्हीं के दिये हुए निवाले हैं।”

चाचा अब कबीराना अंदाज़ में कोई सूफ़ियाना राह पकड़ने ही वाले थे कि मैंने तुरंत उनके हाथ में चाय का कप थमा दिया।

चाचा ने चाय की एक लंबी चुस्की ली और बोले-

“जिस दान का फ़ोटो हो, प्रेस-नोट हो, नामपट्ट लगा हो और बाद में हिसाब माँगा जाये, वह दान नहीं, दीर्घकालीन निवेश कहलाता है, भतीजे! और निवेश में जोखिम तो होता ही है। श्रद्धा-बाज़ार में तो जोखिम और भी अधिक होता है।”

मैंने उन्हें और कुरेदने के उद्देश्य से पूछा, “फिर जाँच क्यों न हो?”

चाचा बोले-

“जाँच अवश्य होनी चाहिए। हमारे यहाँ जाँच वह पवित्र नदी है, जिसमें प्रत्येक घटना स्नान करके निर्मल हो जाती है। पहले एक समिति बनेगी। समिति एक उपसमिति बनाएगी। उपसमिति रिपोर्ट देगी कि विस्तृत जाँच आवश्यक है। विस्तृत जाँच यह निष्कर्ष निकालेगी कि प्रारंभिक जाँच पर्याप्त नहीं थी।

भतीजे, यह माया ठगिनी है। न जाने कितनी जाँचों के भवसागर पार करके अंत में मोक्ष प्राप्त करती है।”

मैंने पूछा, “और चाचा, दोषी पकड़ा गया तो?”

“दोषी अवश्य पकड़ा जाएगा,” चाचा ने मुझे विश्वास दिलाया, “बस पहले यह तय हो जाये कि दोषी किस राजनीतिक दल के काम आ सकता है। कोई बलि का बकरा मिल जाये, वही बहुत है। आख़िर जो लोग चढ़ावे के सिंहासन पर विराजमान हैं, उन्हें अपने सिंहासन को सुरक्षित रखने की भी तो चिंता है। कोई न कोई रास्ता निकाल ही लिया जाएगा।”

टेलीविज़न पर बहस चल रही थी। चाचा कुछ देर उसमें तल्लीन रहे।

एक प्रवक्ता बता रहे थे कि यह आस्था पर हमला है। दूसरे बता रहे थे कि यह शासन की विफलता है। तीसरे, जिन्होंने कभी राम के अस्तित्व पर ही बहस छेड़ रखी थी, आज राम के कोष की चोरी पर आँसू बहाये जा रहे थे।

चाचा बोले-

“देखा! चिल्ल-पों दिखायी दे रही है न? थोड़े दिनों की बात है। बॉलीवुड के किसी अभिनेता ने तीसरी शादी कर ली, तो सारे चैनल वहाँ व्यस्त हो जाएँगे। ज़रा धैर्य रखो।”

मैंने कहा, “लेकिन विपक्ष तो अपनी भूमिका निभा रहा है। वह सवाल उठा रहा है।”

“उठाने दो,” चाचा बोले, “विपक्ष का धर्म सवाल उठाना है और सत्ता का धर्म सवाल उठाने वाले की नीयत पर सवाल उठाना। यही लोकतांत्रिक संतुलन है।”

मैंने पूछा, “सरकार क्या करेगी?”

“कठोर कार्रवाई,” चाचा ने तुरंत कहा, “और क्या करेगी! यह वाक्य हमारे प्रशासन की हनुमान चालीसा है। प्रत्येक संकट में पढ़ा जाता है।”

मैंने धीरे-से पूछा, “लेकिन अगर सचमुच किसी ने चढ़ावा ले लिया हो तो?”

चाचा ने मेरी ओर दया से देखा। उन्हें शायद मेरे धर्मनिष्ठ होने पर संदेह होने लगा था।

“राम के नाम पर आया धन यदि किसी रामभक्त के काम आ गया तो इसमें अधर्म कहाँ है? धन विदेश तो नहीं गया। देश में ही रहा। किसी खाते में जमा हुआ होगा, किसी भवन में लगा होगा, किसी गाड़ी में घूम रहा होगा। अर्थव्यवस्था में गति आयी कि नहीं?

माया एक जगह जम जाएगी तो उससे काम कैसे चलेगा? इसीलिए तो उसे चंचला कहा गया है।”

मैंने फिर वही पुराना राग छेड़ दिया-

“मगर धन तो मंदिर का था!”

चाचा बोले—

“मंदिर देश का है। देश जनता का है। जनता हम हैं। अतः धन अंततः हमारे ही पास आया। यह चोरी नहीं, राष्ट्रीय संपत्ति का विपणन है।”

मैं निरुत्तर हो गया।

चाचा बोले-

“तुम रामलीला को बहुत संकीर्ण दृष्टि से देखते हो। राम सर्वव्यापी हैं। सीसीटीवी जहाँ नहीं पहुँचता, वहाँ भी वे उपस्थित रहते हैं। उन्होंने घटना को रोका नहीं, इसका अर्थ है कि घटना उनकी जानकारी में हुई।”

मैंने पूछा, “तो पुलिस की आवश्यकता ही नहीं है?”

“रामराज्य में पुलिस भी राम की, प्रशासन भी राम का, ताला भी राम का और चाबी भी राम की। फिर बीच में आदमी क्यों हस्तक्षेप करे?”

चाचा अपनी जगह से उठे और कपड़े झाड़ते हुए बोले-

“सीधी-सी बात समझो। मंदिर राम का खेत है और हम राम की चिड़िया:

राम की चिड़िया, राम का खेत,
चुग ले चिड़िया भर-भर पेट”

मैंने पूछा, “और खेत खाली हो गया तो?”

चाचा बोले-

“फिर नया चढ़ावा आ जाएगा। आस्था की फसल कभी समाप्त नहीं होती। केवल किसान बदलते रहते हैं।”

दूर कहीं भजन बज रहा था: “रामचन्द्र कह गये सिया से रे, ऐसा कलियुग आएगा…”

चाचा ने जाते-जाते पंक्ति पूरी की: “दान भक्त चढ़ाएगा, हिसाब अधर्मी माँगेगा”।

डॉ. मुकेश असीमित, dr mukesh aseemit

डॉ. मुकेश असीमित

हास्य-व्यंग्य, लेख, संस्मरण, कविता आदि विधाओं में लेखन। हिंदी और अंग्रेज़ी में लिखे व्यंग्यों के संग्रह प्रकाशित। कुछ साझा संकलनों में रचनाएं शामिल। देश-विदेश के प्रतिष्ठित दैनिक, साप्ताहिक, मासिक, पाक्षिक, त्रैमासिक पत्र-पत्रिकाओं एवं साहित्यिक मंचों पर नियमित प्रकाशन।

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