
- July 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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आशा के कमल: रचनाधर्मियों की नज़र में
हाल ही, स्मृतिशेष हुईं आशा सक्सेना (25.07.1958-08.07.2026) जी के दोहों का संग्रह ‘आशा के कमल’ शीर्षक से 2021 में प्रकाशित हुआ था। आशा जी की स्मृतियों को जीवन्त रखने के क्रम में आब-ओ-हवा की इस प्रस्तृति में पुस्तक अंश और इस पुस्तक पर विद्वान समीक्षकों के अभिमत…

आशान्विति
-यतींद्रनाथ राही, भोपाल (वयोवृद्ध कवि)
…रागात्मक साहित्य से आशा का सम्बन्ध बहुत पुराना रहा है। वर्षों तक उन्होंने अपने पति यशशेष श्री कमलकांत सक्सेना द्वारा प्रकाशित ‘साहित्य सागर’ की सह संपादक के रूप में कार्य किया है। वह ‘साहित्य सागर’ के प्रथम स्थायी स्तम्भ ‘लोकगीत’ की नियमित कवयित्री रही हैं। कभी जगत प्रचलित लोकगीतों तो कभी स्वरचित काव्य द्वारा उन्होंने यह स्तम्भ अविरत चलाया।
दुर्भाग्यवश, कमलकान्त नहीं रहे, बच्चों ने प्रयास किये परन्तु दोनों बेटों और बहुओं के कार्यक्षेत्र भिन्न होने के कारण विवशताएं थीं। प्रकाशन बन्द हुआ। मानसिक आघात और परिस्थितिवश आशा को साहित्य से दूरी झेलना पड़ी। वर्षों के बिखराव के बाद अब भोपाल का घर फिर चहक-महक उठा है। आशा की गुनगुनाहट और कलम भी चल पड़ी, सो दोहे भी लिखे जाने लगे, लिखते चले गये।
सो, प्रस्तुत हैं आशा के दोहे, इनमें आशा भी है और आगत की आशा भी। ये दोहे नारी हृदय की निश्चल और सहज अभिव्यक्ति हैं। इनमें न किसी वाद की छाया है, न किसी सामाजिक दुष्वृत्ति की और न सियासत का रजस-तमस। एक मां की सहज वत्सलता है, प्यार है, समाज के प्रति सात्विक संस्कार, लुप्त पारिवारिक सरोकार है। जनमन और प्रकृति का सहज साहचर्य है। न ही कोई कटोक्ति, न व्यंग्य की चुभन और न वक्रोक्ति की चिकोटी। आशा के अधिकांश दोहे पारिवारिक परिवेश से उठायी अनुभूति हैं, जिनमें बच्चों के साथ घुल-मिलकर आनन्द की अनुभूतियां भी हैं।
…इस संग्रह में उन्होंने क्या लिखा है, कितना लिखा है, शिल्प की ऊंचाई, भाव की गहराई और कथ्य की समाहारता, यह सब समीक्षकों का काम है। मैं तो देखता हूं इनमें कितनी सहजता है, कितनी पावनता है, इस निसृति में। आशा करता हूं यह छोटा-सा संग्रह भविष्य में किसी बड़ी कृति का जनक बनेगा।
(‘आशा के कमल’ की भूमिका से अंश)
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दोहों की पर्याय आशा जी
-अनीता सक्सेना, भोपाल (पूर्व अध्यक्ष, हिंदी लेखिका संघ, म.प्र.)
आशा जी से मेरी मुलाक़ात हिंदी लेखिका संघ की गोष्ठी में हुई थी। आपके सहज और मधुर स्वभाव तथा मीठी वाणी ने मुझे बहुत प्रभावित किया था। मुझे सबने बताया था सक्सेना साहब बहुत वरिष्ठ साहित्यकार और संपादक रहे। उनके दोनों बेटे भी अच्छे साहित्यकार हैं लेकिन मेरी परिवार से कभी मुलाक़ात नहीं हो पायी।
लेखिका संघ का कार्यकाल संभालने के बाद जब सारस्वत मंच प्रारम्भ हुआ, तब आशा जी से बातों का सिलसिला प्रारम्भ हुआ, आशा जी ने स्वयं बढ़कर सारस्वत मंच की ज़िम्मेदारी संभाल ली। बाद में पता चला आपके पास संपादन का अनुभव था, आप दो पत्रिकाओं की सह संपादक रह चुकी थीं। हिंदी लेखिका संघ का सारस्वत मंच और आशा सक्सेना जी दोनों जैसे एक हो गये। प्रतिदिन मंच पर सबको आमंत्रित करने का एक नया तरीक़ा आपने निकाला। आप सुबह-सुबह एक दोहा मंच पर प्रेषित करके शुभारम्भ करतीं। पिछले पांच वर्षों से यह क्रम लगातार चल रहा है और अब तो यह कहना चाहिए कि आशा सक्सेना जी दोहों का पर्याय बन गयी हैं। आशा जी के दोहे एक सन्देश देते हैं।
अनेक सम्मानों से सम्मानित आशा जी को हिन्दी लेखिका संघ, म.प्र., भोपाल का प्रतिष्ठित डॉ. सुशीला कपूर हिन्दी सेवी सम्मान मिल चुका है। यह इस बात का प्रमाण है कि आशा जी हिंदी के प्रति कितनी समर्पित हैं। मृदुभाषी आशा जी कभी किसी का दिल नहीं दुखातीं और इसका राज़ अपने एक दोहे में भी आप उकेर देती हैं:
घृणा अपने आप में, ना बसने दें आप
प्रेम बांटने से बढ़े, घृणा देय सन्ताप
…आशा जी अनेक कठिनाइयों से गुज़री हैं, पर उन्होंने हिम्मत कभी नहीं हारी। वह लिखती हैं:
घोर निराशा, घात या कठिन समय की मार
आशा सब कुछ झेलती, उठती बारम्बार
आशा जी दोहों के साथ लोकगीत, भक्तिगीत, कविता, गीत और मुक्तक भी बहुत बढ़िया लिखती हैं। आशा जी ने ज़िन्दगी को बहुत क़रीब से जाना है, अपनी ज़िम्मेदारियों को पहचाना है इसलिए आपके दोहे एकदम दिल के पास नज़र आते हैं। मैं आशा जी को बहुत-बहुत बधाइयां देती हूं, साथ ही ईश्वर से प्रार्थना भी करती हूं कि आशा जी की क़लम सतत यूं ही चलती रहे।
(‘आशा के कमल’ के अग्रलेख से अंश)
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अपने किंजल्क की आभा बिखेरता ‘आशा के कमल’
-वंदना मिश्र (वरिष्ठ साहित्यकार)
मानव जीवन अन्तर संवेदनाओं का पुँज है, जिसमें परिवार, समाज, राष्ट्र से जुड़े साहित्य संस्कृति और संस्कार के प्रतिबिंब लक्षित होते हैं। किसी भी साहित्य में इन दृश्यबंधों से लोकरंजिता आती है। ‘आशा के कमल’ भी इसी लोक की उपज है, जो दोहा शिल्प में ढलकर आकार पाते हैं। कथ्य की द़ृष्टि से आशा जी ने इन दोहों को क्रमश: आशागीत, आशातीत, प्रकृति/पर्यावरण, त्योहार/पर्व, देशराग, भक्ति रस, विरह, सखी सहेली, कुटुम्ब में विभाजित कर मानवीय सरोकारों की पहल की है।
वास्तव में शिल्प की दृष्टि से दोहा अत्यंत सरल सहज और बोधगम्य है। रामचरित मानस से ही दोहा छंद ने हर ज़बान पर प्रतिष्ठा पायी है। साहित्य और समाज की तनिक भी समझ रखने वाला व्यक्ति दोहे से अनभिज्ञ नहीं है।
भक्तिकालीन कवियों ने तो दोहा छंद के विशिष्ट प्रयोग किये हैं। भक्ति, रीति, नीति, सत्य, उपदेश सभी में दोहा निस्पृह भाव से मौजूद है।
लोक जीवन में दोहा अहाने, दृष्टांतों में प्रयुक्त है। गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस में चौपाई और सोरठा के साथ दोहे ने समपूर्णता दी है। रामचरितमानस में निश्चित चौपाइयों के बाद दोहे से ही टेक है। कह सकते हैं चौपाई गति है, तो दोहा इसमें यति का कार्य भी करता है। अपितु निश्चित गति और यति क्रम और मात्राभार ही छंद है। बरवै रामायण, बरवै छंद का ही उदाहरण है।
रहीम के दोहे, कबीर के दोहे, बिहारी के दोहे, जो बिहारी सतसई के नाम से उपलब्ध हैं, के अलावा साहित्य जगत में दोहा छंद के विविध प्रयोग किये गये हैं।
‘आशा के कमल’ आशा सक्सेना के 285 दोहों का लोक कलश धारण करता हुआ ‘दोहा संग्रह’ है। ये दोहे परिवार, समाज, प्रथित परम्पराओं, संस्कार, संस्कृति, प्रकृति का स्पर्श करते भक्ति, शृंगार, वात्सल्य, आश्चर्य लोक में अपनी आभा बिखेरते हैं। असल में आशा जी ने गतिशील समय के अनुभूत तथ्यों से ही अपने दोहा संग्रह का ताना-बाना बुना है। इनमें आशा जी का आशावादी दृष्टिकोण एकदम परिलक्षित है। वे सब ओर प्रेम बाँटने में विश्वास करती हैं- “प्रेम बाँटने से बढ़े, घृणा देय संताप।”
या फिर “सपना अपना छोड़कर कर लो मन से प्रीत”, इस तरह की पंक्तियाँ प्रीत का आग़ाज़ करती पर्व, उत्सव, तीज, त्यौहारों को भी उमंगित प्रेम में रंग कर सारे मलाल मिटा देना चाहती हैं।
“आ जाओ सब पास में खेलें रंग गुलाल”, इस बासंती गूँज में फागुन का गान है। आशा जी के दोह संग्रह में जन्मदिवस की शुभकामनाएं हैं, हिन्दी का स्नेह है, तो सत्य, अहिंसा को अभिमंत्रित करने वाले बापू और नेताजी का स्मरण भी है। पुलवामा में शहीद हुए वीरों के पक्ष में खड़ी आशा जी कह उठतीं हैं- “पुनरावृत्ति न हो कभी, हो रक्षित अनुबंध”।
मौत जीवन का शाश्वत सत्य है, पर दुनिया में सबसे दुखद और निर्मम भी। परिवार पर आयी यह आपदा समूचे वातावरण को हिला देती है। आदरणीय कमलकांत सक्सेना का जाना आशा जी के जीवन में विरह, वेदना को जन्म देकर जीवन गति को ठहराव देता है परन्तु उनकी कर्मचेतना उन्हें साहित्य से पुनः जोड़कर इस संग्रह को जन्म देती है।
आदरणीय कमलकांत जी के साथ काव्यगोष्ठी का अवसर भी मुझे मिला और मेरी चैतुआ कविता पढ़ने पर सार्थक हस्तक्षेप से जाना कि उनका भी हमीरपुर, बुंदेलखंड से परिचय है। यह हम्मीरपुर अक्सर अपने पूज्य श्वसुर से सुना करते थे कि हम लोग वहाँ के मिश्र हैं। ख़ैर, आशा जी कमलकांत जी के बिना तन्हाई में अश्रुपूरित प्रेम श्रृद्धांजलि भी अर्पित करती हैं-
“पत्र तुम्हारे बन गये यादों की तस्वीर
आँसू आँखों को नहीं दें अब मन को धीर”
अपनी सृजन ऊर्जा प्रेरणा, संबल, प्रोत्साहन से भरे अनुभव की सरस रचनाधर्मिता
“मन मंदिर में आप ही, आपहि आशा धाम
हैं ये आशा के कमल, कमल आपके नाम”
आशा का यह कमल दोहा संग्रह के रूप में अपने किंजल्क की आभा बिखेरेगा, इसी विश्वास के साथ।
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मेरी दृष्टि में ‘आशा के कमल’
-कान्ति शुक्ला उर्मि (वरिष्ठ साहित्यकार)
काव्य-साधना में शिल्पगत दृष्टि एक विशेष रूप रचना होती है। इस विशिष्टता में ही रसोद्रेक की शक्ति निहित होती है। दोहा एक सर्वाधिक लोकप्रिय विधा है, जिसके चार चरणों से ही लक्ष्य की प्राप्ति हो जाती है। अपने आदर्श की रक्षा में कविता को बड़ी कठिन साधना करनी पड़ती है। अर्थ गांभीर्य और भाव सूक्ष्मता का लययुक्त शिल्पबद्ध कला सौन्दर्य विमुग्धकारी, रुचिकर और आकर्षण का केन्द्र होता है। दोहे आज की सशक्त और सर्वप्रिय विधा के रूप में प्रभावी सिद्ध भी हो रहे हैं। जीवन की अनेक परिस्थितियों में हर्ष-विषाद, राग-द्वेष, उत्कर्ष-अपकर्ष की चेतनामूलक स्वानुभूतियों पर लिखे दोहों के प्रभामंडल की आभा साहित्य जगत में उद्भाषित हो रही है। इसी शृंखला में सुप्रसिद्ध, संवेदनशील, वरिष्ठ रचनाकार आशा सक्सेना का दोहा संग्रह “आशा के कमल” एक पठनीय और सराहनीय कृति है।
प्रस्तुत संग्रह में सहजता, भाषा-सौष्ठव, वर्णन का प्रवाह, भाव-विशदता, ओजस्विता तथा गीतिमत्ता का सुंदर समावेश है। जीवन के व्यवहार पक्ष के कार्य वैविध्य और अन्तर्पक्ष की वृत्ति विविधता है, नैतिक संदेश है।
प्राकृतिक भव्य दृश्यों की पृष्ठभूमि में कथ्य की अवधारणा में कलात्मकता और सूक्ष्मता का समावेश है। प्रायः सभी मौसमों पर लिखे दोहों में आशा जी ने रंग भरे हैं। प्रकृति के ह्रदयग्राही मनोरम रूप-वर्णन में भाव, गति और भाषा की दृष्टि से परिमार्जन स्पष्टतः परिलक्षित है-
पोर पोर में बस रही, पावन सुरभित गंध
सुधा बरसती प्रकृति की, ग्रहण करो स्वच्छंद
वासंती ऋतु देखकर, मन में जागे प्यार
मधुप मधुप हर फूल से, करे प्रेम मनुहार
आशा जी के अधिकांश दोहों में जीवन की शिवता का आभास जगत के विराट सौन्दर्य से मिलन जहाँ पर चेतनता का आभास है। व्यष्टि के अन्तर्जगत की गहनता, अंतस की निगूढ़ वृत्तियों की अभिव्यंजना है।
जीवन ही क्या मृत्यु भी, गीतों का विन्यास
गीतों का नैवैद्य है, गीतों का उपवास
चिंतन मन से कीजिए, तो निकलेगा सार
जीवन यों न गंवाइए, चिंतन सबका सार
आशा जी कितनी सरलता और सहजता से जीवन दर्शन के सार को अभिव्यक्त कर देतीं हैं-
रेखाएं कब वृत्त में, सीधी हों या वक्र
उगना खिलना टूटना, रूप रंग का चक्र
मानसिक वृत्तियों के सूक्ष्म सत्य को उसके मूल चारुत्व में ग्रहण करने का सफल और उत्कृष्ट प्रयास देखें-
आशा ही संस्कार है, आशा ही विज्ञान
आशा के पर्याय हैं, बीज, प्रीत औ’ प्राण
समय मिलन की आस है, समय विरह का ताप
समय अगर अनुकूल है, मिटें सभी संताप
नारी के संवेदनशील मन, समर्पण और विगत की स्मृतियों में लीन मनोदशा को दर्शाते दोहे अत्यंत मर्मस्पर्शी हैं-
पत्र तुम्हारे बन गए, यादों की तस्वीर
आँसू आँखों को नहीं, दें अब मन को धीर
सांसों में तड़पन भरी, पल पल आती याद
धरा गगन सी दूरियां, कैसे सहूँ विषाद
नीतिगत, भक्तिपरक और नेह सम्बंधों से उपजे उनके दोहे भी सहज और भावपूर्ण हैं। सामाजिक संवेदना को संरक्षित और भारतीय मूल्यों की रक्षा करता उक्त दोहा संग्रह अपने नाम के अनुरूप सुरुचिपूर्ण सटीक मृदु निनाद का आलोक होकर “आशा के कमल” प्रफुल्लित कर नव रचनाकारों की प्रेरणा बन आशा जी के यश का भागी बनेगा, ऐसा मेरा विश्वास है।
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