
- July 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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यादें अशोक ‘मिज़ाज’ बद्र की कलम से....
मुझे ख़ुशनसीब बना गये बशीर बद्र साहब
मैं जागता रहा तो ग़ज़ल जागती रही
मैं सो गया तो साथ मेरे सो गयी ग़ज़ल
डॉ. बशीर बद्र को शमशान भूमि पर समर्पित किया गया, यह मेरा शे’र इस बात का द्योतक है कि बशीर साहब अपनी ग़ज़ल में जिस मुलायमियत और अंदाज़े-बयाँ की ख़ूबी साथ लेकर आये थे, वह उन्हीं के साथ जागृत हुई थी और उन्हीं के साथ सो भी गयी। अब जो ग़ज़लें कही जा रही हैं, उनमें बो बात नहीं दिखायी दे रही है, जिसे शाइरी की ग़िज़ा कहा जाता था। वो बहुत डूबकर और बहुत ही आसानी के साथ आसान शब्दों में बिल्कुल नयी और सटीक उपमाओं और इमेजरी के साथ शेर कहते थे। उसका नतीजा यह हुआ कि उनके शे’र दिलो-दिमाग़ पर छा जाते थे और आँखों में किसी फ़िल्म के दृश्य की तरह उस दर्द या विषय को पिक्चराइज़ कर देते थे। इतना ग़ज़ब का संप्रेषण और आकर्षण उनकी ग़ज़ल में मिलता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात उनकी शाइरी में भाषा पर उनकी पकड़ थी, तो पुराने रवायती शाइरी के इशारों, इस्तआरों और तरक़ीबों को मूलतः नकारते हुए एक आसान हिन्दुस्तानी ज़बान देने में कामयाब रही, जिसमें बोलचाल के हिन्दी शब्द, उर्दू शब्द और अंग्रेज़ी के शब्दों का ऐसा समन्वय होता था कि कोई भी शब्द ठूँसा हुआ नहीं लगता था और एक नयापन और ताज़गी पैदा करता था। उनकी इस ग़ज़ल को जदीद ग़ज़ल का नाम दिया गया और वो जदीद ग़ज़ल के जनक के नाम से हमेशा जाने जाएंगे।
मीर, ग़ालिब, फ़ैज़, जिगर आदि पुराने शाइरों के शेर कुछ उर्दू वाले और कुछ अन्य कोट करते रहते हैं लेकिन बशीर बद्र के सैकड़ों शेर आम पब्लिक की ज़ुबान पर मिल जाएंगे। ये उनकी भाषा, सम्प्रेषण, इमेजरी और ताज़गी के कारण सम्भव हुआ है। कोई दो-चार शेर कोट करने की मैं आवश्यकता नहीं समझ रहा हूँ क्यूँकि उनकी पूरी की पूरी शाइरी जो सबको याद है, वही इसका जीता-जागता उदाहरण है। 15 वर्ष से बिस्तर पर होने के बाद भी उनके शेर सरहद पार तक का सफ़र कर रहे हैं और करते रहेंगे, वो अमर रहेंगे और नये लिखने वालों को हौसला देते रहेंगे।
कुछ व्यक्तिगत बातें और उनके साथ के अनुभव साझा करने को भी कहा गया है तो सबसे पहले मैं बता दूँ कि शायद पूरी दुनिया में उनके परिवार के अलावा अगर कोई उनके इतने नज़दीक इतने लम्बे समय तक रहा, तो वो ख़ुशनसीब मैं हूँ।
14 फरवरी 1992 को सागर के एक मुशायरे में वो आये थे। मेरे ही घर ठहरे, मुझसे शेर सुनाने को कहा तो मैंने 2-4 शेर सुनाये। कुछ मिसरे याद आ रहे हैं:
हाय अफ़सोस मेरा कैसा मुक़द्दर निकला
मैं जिसे पूज रहा था वही पत्थर निकला
मैं तो इक धूप में तपता हुआ सहरा हूँ अशोक
जो तेरी प्यास को पानी से भरा लगता है
और वो कहने लगे कि अगर तुम ऐसे शेर कहते हो तो छोड़ दो बैंक की नौकरी, मेरे साथ चलो, तुम जैसे लोग शाइरी में आएंगे तो बड़ा इन्क़िलाब आएगा- मैंने कहा, शाइरी उस्तादों की चीज़ है मुझे तो कुछ नहीं आता। वो अँग्रेज़ी में बोले- आइ एम हियर टु टीच यू। उसी मुशायरे में रात 12 बजे के बाद मैंने उन्हें शॉल उढ़ाया, हाथ में श्रीफल दिया और शागिर्दी की रस्म अदा हुई। यह तारीख़ थी 15 फरवरी जो उनकी जन्म तारीख़ भी है।
जाते हुए वो अपनी तीनों किताबें इकाई, आमद और इमेज दे गये। वो उर्दू में थीं। मैंने उसी दिन से दोस्तों की मदद से उर्दू लिखना-पढ़ना सीखना शुरू किया और 45 दिन में उर्दू लिखने-पढ़ने लगा। जब मैं पहली बार भोपाल उनके पास 8 ग़ज़लें लेकर गया, तो वो उर्दू में थीं। 4-6 महीने बाद मैंने कहा कि मैं उर्दू में शाइरी करता हूँ, मेरा तख़ल्लुस उर्दू में रख दीजिए। उस दिन मैंने उन्हें एक ग़ज़ल सुनायी थी, जो उन्हीं के रंग में थी। मतला था:
मैं समन्दरों का मिज़ाज हूँ अभी उस नदी को पता नहीं
सभी मुझसे आ के लिपट गयीं मैं किसी से जा के मिला नहीं
वह बहुत खु़श हुए और कहने लगे इस मतले में जो ‘मिज़ाज’ शब्द आया है वही तुम्हारा तख़ल्लुस होगा, उसी रात सागर में ही मुशायरे में सबके सामने उन्होंने मेरा नामकरण किया और मेरा नाम ‘मिज़ाज’ हो गया।
उस दिन उन्होंने मुझे दो शिक्षाएं दीं, जिन पर मैं आज भी अक्षरशः चल रहा हूँ- पहली ये कि ग़ज़ल ऐसी ज़ुबान में कही जानी चाहिए जो उर्दू में छपे तो उर्दू ग़ज़ल कहलाये और हिन्दी में छपे तो हिन्दी ग़ज़ल कहलाये और दूसरी ये कि शाइरी में अगर कुछ नया नहीं कह पाओ तो शाइरी छोड़ दो।
उनकी इन बातों का इतना गहरा असर हुआ कि धीरे-धीरे मैंने उर्दू ग़ज़ल की तमाम ख़ूबियाँ, बारीकियाँ सीखकर और उन्हें ध्यान में रखकर अपनी एक भाषा तय की और हिन्दी ग़ज़ल की ओर रुझान किया- सामाजिक मुद्दे, राजनीति, व्यवस्था और आज के समसामयिक विषयों पर कलम चलायी। नतीजा हुआ कि जो किताबें उर्दू में छपीं, उस पर म.प्र. उर्दू अकादमी ने सन् 2000 में शिफ़ा ग्वालियरी पुरस्कार और सन् 2022 में ‘ताज भोपाली’ पुरस्कार प्रदान किया व हिंदी में वाणी प्रकाशन से 2 ग़ज़ल संग्रह और भारतीय ज्ञानपीठ से 2 संग्रह प्रकाशित हुए, उन पर विभिन्न राज्यों में हिन्दी ग़ज़ल के पुरस्कार मिले, साथ ही चार विश्वविद्यालयों में हिन्दी विभाग में मेरी ग़ज़लों पर पीएचडी हुई। उर्दू में मौलाना आज़ाद उर्दू केन्द्रीय विश्वविद्यालय में मुझे ‘बुन्देलखण्ड के प्रॉमिनेंट’ उर्दू शाइरों में शामिल किया गया। कहने का मक़सद यह कि मुझे उर्दू और हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र में समान स्थान प्राप्त होने का श्रेय भी उनकी दी हुई शिक्षा को जाता है।
मेरे नाम की कहानी
मिज़ाज के साथ बद्र नाम लिखे जाने का भी बड़ा ख़ूबसूरत वाक़या है। वो मुझे शिष्य नहीं पुत्र ही मानते थे। कोई पूछता कि अशोक मिज़ाज के साथ बद्र क्यों लिखते हैं? तो बड़े गर्व से कहते, वो मेरा बेटा है जैसे तैय्यब बद्र वैसे मिज़ाज बद्र। अंजुम बाराबंकवी उन पर पीएचडी कर रहे थे। उन्होंने मेरे सामने उनसे पूछा कि क्या अशोक मिज़ाज का ज़िक्र आपके शिष्य की हैसियत से कर दें तो उन्होंने कहा वो मेरा शिष्य नहीं है, बेटा है। वो जब मुझे पोस्ट कार्ड लिखते थे, तो पते पर मेरा नाम अशोक मिज़ाज बद्र ही लिखते थे। यहां एक पोस्टकार्ड की फ़ोटो दे रहा हूँ।

एक सनद यह भी कि उनकी एक किताब ‘ग़ज़ल-2000’ सन 2000 में आयी थी, उसमें उनके अलावा छह लोगों ने सह-सम्पादन किया था। उन्होंने मुझसे किताब में छापने के लिए फ़ोटो मंगवायी। मैंने भेज दी। किताब छप कर आयी, तो उस पर भी मेरा नाम अशोक मिज़ाज बद्र लिखा है।
बशीर बद्र का जाना
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनका दिल समन्दर की तरह विशाल और मर्यादित था। वो हर चीज़ को, हर घटना को अच्छी या बुरी या सही-ग़लत नहीं समझते थे वो कहते थे, ये सब तो होता ही रहता है। शायद उन्होंने जीवन में इतने कटु अनुभव झेल लिये थे, जिस वजह से ये सब हुआ, लेनिक वो इतने संवेदनशील और भावुक थे कि अपनों द्वारा दिये गये दुःखों को शायद भूल नहीं पाये। मैंने उनके साथ रहकर अनुभव किया कि उन्होंने जिस-जिसका भला किया, उन्होंने ही उन्हें सबसे ज़ियादा दुःख पहुँचाया। वो अक्सर ये अनुभव मुझसे शेयर करते थे।
होता यही है शायद हम जिन लोगों को साथ लेकर चलते हैं, आगे बढ़ाते हैं, वे भी और समकक्ष और जलने वाले लोग भी बढ़ती हुई शोहरत को देखकर दूर हो जाते हैं या दुश्मन बन जाते हैं। नये चाहने वालों की भीड़ में पीछे छूट गये तथाकथित अपनों के दिये दुःखों को मिटा नहीं पाता इसलिए इतना मशहूर आदमी इस भीड़ में भी खुद को तन्हा महसूस करता है और डिप्रेस भी हो सकता है। उनकी बीमारी में बहुत बड़ा हाथ इस दुःख का रहा। अत्यधिक भावुक होना भी एक आफ़त से कम नहीं।
आख़िर 28 मई को दोपहर 12 बजकर 34 मिनट पर मैंने ईद की मुबारकबाद देने को फ़ोन लगाया तो भाभी (आदरणीया राहत बद्र) का फ़ोन बिज़ी आ रहा था। उस वक़्त वो डॉक्टर से बात कर रहीं थीं। बद्र साहब दुनिया को छोड़कर जा चुके थे, मेरा ये फ़ोन आख़िरी दुआ-सलाम बनकर रह गया। दोपहर दो बजे मुझे आलोक श्रीवास्तव से मालूम पड़ा कि डॉक्टर साहब नहीं रहे। मैं 2 बजकर तीस मिनट पर चार्टर्ड बस से भोपाल के लिए निकल पड़ा था सागर से। 6 बजे उनके निवास पर पहुँचा, अन्तिम दर्शन किये। जनाज़े की नमाज़ में शामिल हुआ, मिट्टी भी दी, वहीं शमशान में न्यूज़ चैनल सबकी बाइट ले रहे थे। मेरे पास भी आये और बोले कोई शे’र इस मौक़े पर आप कहना चाहेंगे तो बड़ी रोती हुई-सी आवाज़ में मैंने वह शेर उनकी नज़्र किया, जिससे इस लेख का आग़ाज़ किया है।
वो ईद के दिन गये हैं, जो एक मुबारक दिन था। उनके जनाज़े में 250-300 लोग थे। ईद की वजह से कुछ चाहने वाले चाहकर भी नहीं आ सके, कुछ को ख़बर भी देर से मिली होगी। जो भी रहा हो। फ़िलहाल बात को विराम उनके ही शेर से देता हूँ:
रोने वालों ने उठा रक्खा था घर सर पर मगर
उम्र भर का जागने वाला पड़ा सोता रहा
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