
- July 28, 2026
- आब-ओ-हवा
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हास्य-व्यंग्य मुकेश असीमित की कलम से....
त्यागपत्र की ताक़त
वो त्यागपत्र अपनी जेब में रखते हैं… ये क्या कम बात है! जेब जो बनी है सिर्फ़ भ्रष्टाचार और घोटालों की लम्बी सूची को रखने के लिए, उसमें इतनी जगह त्यागपत्र के काग़ज़ को भी देना… क्या कम बात है साहब..! कौन इस राजनीति के कीचड़ में आज तक गंदा नहीं हुआ है? लेकिन उन्हें देखो— आज भी अपनी जनता की आशाओं के ख़ून से रंगे हाथ और भ्रष्टाचार की काली कमाई से काले हुए हाथ तुरंत त्यागपत्र के साबुन से धो लेते हैं।
उन्हें कुर्सी से कोई लगाव नहीं… जब चाहे, जी चाहे, रात के 2 बजे भी त्यागपत्र अपनी जेब से निकालकर जनता को दिखा सकते हैं। आलाकमान को फ़ोन करके त्यागपत्र देने की धमकी दे सकते हैं… और अगर चुनाव नज़दीक हो, तो वो सच में त्यागपत्र दे भी सकते हैं…!
त्याग का अपना जलवा होता है। जो त्याग करता है, त्यागी कहलाता है। त्याग किसी नेता जी और अफ़सर का वैसे दिखता नहीं, इसलिए उसे पत्र रूप में टाइप कराकर जेब में रखना पड़ता है। आदर्श भी आजकल पहुँच वाले लोगों की जेब में ही शोभा देते हैं। अब किसी छोटे-मोटे सरकारी नौकर के त्यागपत्र की क्या बिसात! उनके द्वारा त्यागपत्र दिये नहीं जाते… उन्हें नौकरी से धक्का मारकर निकाला जाता है। त्याग करना तो बड़े लोगों का काम है!

त्याग आपको अपने आदर्शों को ताक़ पर रखकर भी टिके रहने की सुविधा दे जाता है। त्याग आपकी डूबती राजनीतिक नैया के लिए पतवार का काम करता है। त्यागपत्र वो वॉशिंग मशीन है, जिसमें आपके काले कारनामों की कालिख तुरंत धुल जाती है। त्यागपत्र के रंडी-रोने से निकला नेता जनता की नज़रों में देवता बन जाता है— उसके सौ ख़ून माफ़!
हमारे एक दोस्त हैं— संस्थाजीवी दोस्त… पदजीवी भी हैं। पद प्राप्ति हेतु अपने पाँव एक संस्था से दूसरी संस्था में घुमाते रहते हैं। वो भी त्यागपत्र तैयार रखते हैं… त्यागपत्र भी इस अंदाज़ में देते हैं कि लेने वाले की हिम्मत ही जवाब दे जाये! लेने वाला थर-थर काँपने लगता है। उनका कहना होता है—
“हम त्यागपत्र दे रहे हैं, आप लेकर तो दिखाइए!”
त्यागपत्र देने से पहले वो सुनिश्चित कर लेते हैं कि कहीं उनका त्यागपत्र असल में स्वीकार न कर लिया जाये! और जानकार सूत्रों से ख़बर आती है कि कोई वर्मा या शर्मा का बच्चा कुर्सी पर नज़र टिकाये बैठा है, तो वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में पहले दूसरी संस्था में बात करके रखते हैं।
रिश्वतख़ोर अधिकारी तो इस त्यागपत्र ब्रह्मास्त्र के सुरक्षा-कवच में बेख़ौफ़ मलाई चाटते हैं। जैसे ही कोई जाँच कमिटी बैठेगी, त्यागपत्र दे देंगे! कैबिनेट में किसे मंत्री बनाना है और किसे नहीं, यह इसी पर निर्भर करता है कि पिछले रिकॉर्ड के अनुसार उसने ज़रूरत पड़ने पर त्यागपत्र की पेशकश करने में कोई कोताही तो नहीं बरती है।
त्यागपत्र जेब में रखना, जनाब, एक कला है। यह कोई मामूली काग़ज़ का टुकड़ा नहीं, बल्कि राजनीतिक ज़िंदगी की बीमा पॉलिसी है। इसे धारण करने वाला हर राजनीतिज्ञ एक जादूगर है, शतरंज का खिलाड़ी, जिसके पास हमेशा एक आख़िरी चाल होती है।
जब जनता के सवालों की बौछार तेज़ हो, जब घोटालों की गाथाएँ सुर्ख़ियाँ बनने लगें, तब यह त्यागपत्र जेब से निकलकर पिस्तौल की तरह जनता की कनपटी पर आ धमकता है। इसे दिखाते ही सारे गिले-शिकवे धुल जाने का अहसास होता है…
“तुम त्यागपत्र नहीं रे बाबा, माफ़ीनामा जैसा कुछ हो!”
त्यागपत्र बने हैं पद पर बने रहने के लिए… त्यागपत्र बने हैं पद की गरिमा को बनाये रखने के लिए…
त्यागपत्र वर्तमान परिस्थितियों के चुंगल से निकलकर भविष्य की नींव भी मज़बूत बनाता है। निकम्मेपन और निठल्लेपन की नींव! जैसे कोई रूठी पत्नी रूठकर मनायी जाये, तो प्यार का ग्राफ़ बढ़ता है… है कि नहीं? बस ऐसे ही, जब कोई व्यक्ति पद छोड़कर दोबारा पद ग्रहण करता है, तो उसके हितैषी उस पर और अधिक जान छिड़कने लगते हैं। त्यागपत्र की भट्टी में पककर कुंद, कुंठित, कुत्सित आदमी भी खरा सोना नज़र आने लगता है। बेचारा… जैसे जेल से छूटकर आया कोई अपराधी या डाकू अब संत-सा नज़र आने लगा हो! अब उसकी मनमर्ज़ी और घोटालों को सब नज़रअंदाज़ करने लगते हैं।
त्यागपत्र कब देना है और कब नहीं… यह भी बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है। जब कोई मांगे, तब तो हरगिज़ नहीं देना है! स्वेच्छा से त्यागपत्र की पेशकश, त्यागपत्र के स्वीकृत होने की संभावनाओं को कम कर देती है। त्यागपत्र देने की पूर्व संध्या पर अपने ख़ेमे के चाटुकारों और चमचों को तैयार करना पड़ता है। उन्हें बताना पड़ता है कि “आप सभी को शोर मचाना है, नारे लगाने हैं, आंसू बहाने हैं… जैसे कि तुम्हारा नेता शहीद होने जा रहा हो!” इसे विरोधियों का षड्यंत्र बताना है!
अपने आलाकमानों से बात करके, किसी मनहूस मुहूर्त में यदि त्यागपत्र देना भी पड़ जाये, तो कोई वैकल्पिक व्यवस्था भी कंटिंजेंसी प्लान के तहत पहले से ढूंढ लेना बुद्धिमानी का काम है।
रही बात कुर्सी की, तो देखिए… सबसे पहले परिवार का कोई सदस्य तैयार कर लीजिए जो उस पर फिट हो जाये! क्योंकि सत्ता की कुर्सियां बनी ही ऐसी हैं कि सत्ताधारी उस पर बैठकर सबसे पहले इसे अपने परिवार के उत्तराधिकारी के लिए सुरक्षित करने का प्रण ले लेता है। बाप हटा, तो बेटा बैठा देंगे, बेटा हटा, तो बहू! राजनीति हर किसी के बूते की बात नहीं… सीमित विकल्प हैं जी, क्या करें!
राजगद्दियों पर नये राजतिलक से पहले कुर्सियां ऐसे ही नहीं छोड़ी जातीं… उन्हें त्यागपत्र की धौंस जमाकर छोड़ा जाता है। जिस कुर्सी पर जमकर लूट-खसोट का नंगा नाच किया जाता है, अंत में उसी पर त्यागपत्र की लंबी लात जमायी जाती है। फिर जनता को बताया जाता है—
“देखो, इन कुर्सियों की फ़ितरत ही यही है… लात खाने की! हमने तो खा लिये अपने सौ चूहे, अब हम तो चले हज को!”
जाते-जाते, ख़ाकसार का यह दो कौड़ी का शेर तो सुनते जाइए—
जिस कुर्सी ने खिलायी दावत-ए-ख़ास,
उसी पर अंत में जमायी गयी लात!

डॉ. मुकेश असीमित
हास्य-व्यंग्य, लेख, संस्मरण, कविता आदि विधाओं में लेखन। हिंदी और अंग्रेज़ी में लिखे व्यंग्यों के संग्रह प्रकाशित। कुछ साझा संकलनों में रचनाएं शामिल। देश-विदेश के प्रतिष्ठित दैनिक, साप्ताहिक, मासिक, पाक्षिक, त्रैमासिक पत्र-पत्रिकाओं एवं साहित्यिक मंचों पर नियमित प्रकाशन।
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