
- April 30, 2026
- आब-ओ-हवा
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विश्लेषण डॉ. आक़िब जावेद की कलम से....
युद्ध, बचपन के चित्र और आता कल
बच्चे स्कूल जाने का रास्ता देख रहे हैं, लेकिन युद्ध ने उनका बस्ता छीन लिया है और उनके कंधे पर लाद दिये हैं मासूम लेकिन चुभते सवाल।
मरियम: “क्या स्कूल भी मर जाते हैं?”
गाज़ा की 10 साल की मरियम ने तीन बार अपना स्कूल टूटते देखा। उसके पिता एक हवाई हमले में मारे गये। वह अब भी पढ़ना चाहती है, लेकिन हर तेज़ आवाज़ पर काँप जाती है। एक दिन उसने अपनी माँ से पूछा: “क्या स्कूल भी मर जाते हैं?”
यह सवाल सिर्फ़ एक बच्ची का नहीं, पूरी मानवता के लिए एक आईना है। उसकी माँ कुछ पल चुप रही। बाहर दूर कहीं धुएँ की एक पतली रेखा आसमान में उठ रही थी। उसने मरियम को अपनी बाँहों में भर लिया और धीरे-से कहा:
“नहीं बेटा… स्कूल नहीं मरते। इमारतें टूट जाती हैं, लेकिन स्कूल तो तुम्हारी किताबों में, तुम्हारे सपनों में और तुम्हारे सीखने की इच्छा में रहते हैं।”
मरियम ने कुछ नहीं कहा… उसने अपनी पुरानी, धूल भरी किताब को कसकर पकड़ लिया जिसके कुछ पन्ने फटे हुए थे, लेकिन अक्षर अब भी साफ़ थे। अगले दिन, वह उसी मलबे के पास बैठी, जहाँ कभी उसकी कक्षा हुआ करती थी। टूटी दीवारों के बीच, उसने ज़मीन पर उंगली से अक्षर लिखने शुरू किये अ, आ, इ…
हर अक्षर के साथ, जैसे वह अपने डर पर थोड़ी-थोड़ी जीत हासिल कर रही थी।
पास ही कुछ और बच्चे भी आकर बैठ गये। किसी के पास कॉपी नहीं थी, किसी के पास पेंसिल नहीं, लेकिन सबके पास सीखने की एक ज़िद थी। मरियम ने जाने कितनी मुद्दत बाद पहली बार हल्की-सी मुस्कान दी।
शाम को उसने अपनी माँ से कहा, “शायद स्कूल मरते नहीं… वे बस जगह बदल लेते हैं।”
उसकी माँ की आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार वे सिर्फ़ दुख के नहीं थे। एक छोटी-सी उम्मीद की मिट्टी भी नम थी।
मरियम का सवाल अब भी हवा में गूंजता है: क्या स्कूल मर सकते हैं?
और जवाब हर उस बच्चे में छिपा है, जो मलबे के बीच बैठकर भी सीखना नहीं छोड़ता। 12 साल के अली की कहानी भी रोंगटे खड़े कर देती है। वास्तव में, युद्ध बच्चों की भाषा छीन लेता हैं और तब वे कला में बोलते हैं। फ़लस्तीनी कवि की पंक्तियाँ जैसे इन बच्चों की आवाज़ बन जाती हैं: “हम यहाँ जीने आये थे, पर हमें मरना सिखाया जा रहा है।”
सीरिया और गाज़ा के बच्चों की पेंटिंग्स में अक्सर एक ही दृश्य का दोहराव है: घर, धुएँ से भरा आसमान, और छोटे-छोटे स्टिक फ़िगर्स, जो भागते नज़र आते हैं। जैसे अली कहता है “अब सपना क्या, बस ज़िंदा रहना है”। यह भागना है, पलायन है या कुछ और..?
12 वर्षीय अली कभी शिक्षक बनना चाहता था। वह अपने दोस्तों को खेल-खेल में पढ़ाया करता था, कभी ब्लैकबोर्ड बनाकर, कभी ज़मीन पर चॉक से लिखकर। उसे लगता था एक दिन वह भी बच्चों को अक्षरों की दुनिया दिखाएगा।
लेकिन फिर एक दिन उसका स्कूल बदल गया। वही कक्षाएँ, जहाँ कभी बच्चों की आवाज़ें गूंजती थीं, अब ख़ामोश थीं। दीवारों पर लिखे अक्षरों की जगह सख़्ती और डर का साया था। अली ने पहली बार महसूस किया कि कुछ चीज़ें सिर्फ़ टूटती नहीं, छिन भी जाती हैं।
घर की हालत बिगड़ती गयी। किताबें धीरे-धीरे किनारे रख दी गयीं और उनकी जगह काम ने ले ली। अब सुबह उठते ही वह स्कूल नहीं, काम पर जाता है.. ईंटें उठाना, बोझ ढोना, दिन भर धूल और थकान से लड़ना।
एक दिन किसी ने पूछा, “तुम बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?” अली कुछ पल चुप रहा, फिर हल्की आवाज़ में बोला:
“पहले मैं पढ़ना चाहता था… अब बस ज़िंदा रहना चाहता हूँ।”
उसके शब्दों में कोई ग़ुस्सा नहीं था, बस एक थकी हुई सच्चाई थी जैसे सपनों ने ख़ुद…
कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती। कभी-कभी, काम से लौटते वक़्त अली उसी पुराने स्कूल के पास से गुज़रता है। वह कुछ सेकंड के लिए रुकता है, टूटी खिड़कियों को देखता है और फिर चुपचाप आगे बढ़ जाता है।
एक शाम, उसने मलबे के पास पड़ी एक आधी फटी किताब उठायी। उसे साफ़ किया, कुछ पन्ने पलटे और धीरे-धीरे पढ़ने लगा। शब्द कुछ धुंधले थे, पर पहचान अभी बाक़ी थी।
उस दिन पहली बार, लंबे समय बाद अली ने आसमान की ओर देखा। शायद उसके भीतर कहीं एक छोटा-सा सपना अब भी ज़िंदा है… कमज़ोर, लेकिन पूरी तरह बुझा नहीं।
युद्ध बच्चों के सपनों को धीरे-धीरे नहीं, एक झटके में ख़त्म कर देता है। लेकिन कुछ सपने ऐसे होते हैं, जो हर मुश्किल के बाद भी, किसी कोने में चुपचाप धड़कते रहते हैं।
असहज करते कुछ चित्र
अली जैसे जाने कितने ही बच्चे हैं, जो सपनों और यथार्थ के बीच ख़ुद की तलाश में गुम हो चुके हैं या टूट रहे हैं। कविताएं या चित्र या अन्य कला माध्यम इन संवेदनों को जब दर्ज कर रहे हैं तो शब्दों, चित्रों में ऐसा लगता है कि यह कला नहीं, एक मानसिक नक़्शा है, जहाँ बचपन का रंग सिर्फ़ धूसर रह गया है।

कला हमेशा सिर्फ़ सुंदरता का उत्सव नहीं रही, कई बार वह मानव इतिहास के सबसे भयावह अनुभवों की साक्षी भी रही है। चित्रों में जब आसमान से फूलों की जगह बम गिरते दिखते हैं, तो वह सिर्फ़ दृश्य नहीं, बल्कि एक गहरा बयान होता है युद्ध, हिंसा और मानवीय पीड़ा के ख़िलाफ़।
इन सबसे प्रसिद्ध उदाहरणों में से एक है पाब्लो पिकासो की कृति Guernica, जिसे उन्होंने 1937 में बनाया। यह चित्र स्पेन के गृहयुद्ध के दौरान हुए गुएर्निका शहर में बमबारी हमले की प्रतिक्रिया था। इसमें टूटी हुई आकृतियाँ, चीखते चेहरे और बिखरी हुई देहें दिखती हैं, मानो पूरा आकाश ही हिंसा बनकर धरती पर टूट पड़ा हो।
इसी तरह, फ्रांसिस्को गोया की शृंखला The Disasters of War युद्ध की क्रूरता को बिना किसी सौंदर्यीकरण के सामने लाती है। यहाँ भय किसी प्रतीक में नहीं छुपा, वह सीधा, असहज और कच्चा है।
ऐसी कला हमें असहज करती है और यही उसका उद्देश्य भी है। यह हमें मजबूर करती है कि हम उन सच्चाइयों का सामना करें, जिन्हें हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
आधुनिक समय में भी कई कलाकारों ने इस परंपरा को जारी रखा है। उदाहरण के लिए की स्ट्रीट आर्ट अक्सर बच्चों, फूलों और बमों को एक साथ रखती है, एक तीखा विरोधाभास, जो यह सवाल उठाता है कि दुनिया ने मासूमियत को हिंसा से क्यों बदल दिया।
ज़ख़्म जो दिखते नहीं, पर स्थायी हैं
युद्ध के घाव सिर्फ़ शरीर पर नहीं होते वे मन के भीतर गहराई तक उतर जाते हैं। ये ऐसे ज़ख्म हैं जो दिखते नहीं, लेकिन लंबे समय तक, कभी-कभी पूरी ज़िंदगी तक बने रहते हैं।मरियम जैसे बच्चे, जो हर तेज़ आवाज़ पर सिहर उठते हैं, अक्सर Post-Traumatic Stress Disorder (PTSD) का सामना करते हैं। अचानक डर जाना, बुरे सपने आना, हर वक़्त ख़तरे का एहसास.. ये सब उस मानसिक आघात के संकेत हैं, जिसे शब्दों में पूरी तरह समझाना मुश्किल है।
अली की कहानी भी अलग नहीं है। सपनों का अचानक ख़त्म हो जाना, उम्मीद का टूटना, और जीवन के प्रति सिर्फ़ “बस जिये जाने” का नज़रिया.. ये गहरे मनोवैज्ञानिक असर की ओर इशारा करते हैं। ऐसे अनुभव अक्सर Depression और Anxiety disorder जैसी स्थितियों में बदल सकते हैं।
सबसे मुश्किल बात है कि इन ज़ख़्मों को अक्सर देखा नहीं जाता। एक टूटी हुई इमारत दिखायी देती है, एक टूटा हुआ मन नहीं। एक घायल शरीर का इलाज होता है, लेकिन घायल यादों का क्या?
जिनके बचपन ही हादसे होंगे
उम्र से अपनी वो बड़े होंगे
होंठ चुप-चुप ये बोलती आंखें
जंग ख़ुद से बहुत लड़े होंगे
-भवेश दिलशाद
बचपन, जो खेल, सीखने और सपनों का समय होना चाहिए, वह डर, असुरक्षा और खोने की यादों में बदल रहा है। ऐसे बच्चे जल्दी बड़े हो रहे हैं लेकिन भीतर से कहीं न कहीं अधूरे रह जाते हैं। फिर भी, पूरी तस्वीर सिर्फ़ अंधेरी नहीं है। सही सहारा, सुरक्षित माहौल, और भावनात्मक समर्थन ये सब मिलकर धीरे-धीरे इन घावों को भर सकते हैं। कला, कहानियाँ, और शिक्षा कई बार ऐसे बच्चों के लिए एक रास्ता बनते हैं, जहाँ वे अपने डर को शब्द दे सकें और फिर उसे पीछे छोड़ने की कोशिश कर सकें।
मनोवैज्ञानिक ज़ख़्म हमें याद दिलाते हैं कि युद्ध ख़त्म होने के बाद भी उसका असर ख़त्म नहीं होता। शायद सबसे ज़रूरी बात, शांति सिर्फ़ गोलियों के रुकने का नाम नहीं, बल्कि उन ख़ामोश ज़ख़्मों के भरने का नाम भी है, जो दिल और दिमाग़ में रह जाते हैं। अब यहां सवाल उठता है कि दुनिया के पास घाव तो हैं, मरहम क्या कोई नहीं?
संस्थाएँ: इरादे बनाम हक़ीक़त
कुछ वैश्विक संस्थाएँ वर्षों से बच्चों की सुरक्षा की बात करती रही हैं। घोषणाएँ होती हैं, संकल्प लिये जाते हैं, रिपोर्टें जारी होती हैं लेकिन ज़मीन पर तस्वीर उतनी बदलती नहीं:
— स्कूल आज भी निशाना बनते हैं
— बच्चों की जबरन भर्ती जारी है
— सहायता कई बार राजनीति में उलझ जाती है
यह कहना ग़लत नहीं होगा कि अक्सर ये प्रयास “प्रतीकात्मक” ज़्यादा और “परिवर्तनकारी” कम लगते हैं। मदद पहुँचती है पर अक्सर देर से और अधूरी।
दुनिया भर में कई संस्थाएँ इस वादे के साथ बनी हैं कि वे बच्चों, शिक्षा और मानवाधिकारों की रक्षा करेंगी। कागज़ों पर उनके इरादे मज़बूत, संवेदनशील और स्पष्ट दिखते हैं। हर बच्चे को शिक्षा, हर नागरिक को सुरक्षा, और हर समाज को शांति। यूनिसेफ़ UNICEF का उद्देश्य है बच्चों के अधिकारों की रक्षा और उनकी शिक्षा सुनिश्चित करना। इसी तरह संयुक्त राष्ट्र United Nations वैश्विक शांति और सुरक्षा बनाये रखने के लिए काम करता है। सिद्धांतों और घोषणाओं में ये संस्थाएँ उम्मीद का प्रतीक हैं। लेकिन हक़ीक़त अक्सर इन इरादों से पीछे रह जाती है। जहाँ एक ओर नीतियाँ बनती हैं, दूसरी ओर ज़मीनी हालात जैसे युद्ध, राजनीतिक संघर्ष और संसाधनों की कमी इन प्रयासों को कमज़ोर कर देते हैं। गाज़ा जैसे क्षेत्रों में, जहाँ बच्चे बार-बार स्कूल खोते हैं, यह सवाल उठता है कि क्या सिर्फ़ घोषणाएँ पर्याप्त हैं?
संस्थाएँ मदद पहुँचाती हैं राहत सामग्री, अस्थायी स्कूल, मनोवैज्ञानिक सहयोग। लेकिन क्या यह उस स्थिरता की जगह ले सकता है, जो एक बच्चे को सुरक्षित बचपन के लिए चाहिए?
यहीं इरादों और हक़ीक़त के बीच की दूरी साफ़ दिखायी देती है। इसका मतलब यह नहीं कि ये संस्थाएँ बेकार हैं बल्कि यह कि उनकी सीमाएँ हैं। वे प्रयास करती हैं, लेकिन हर समस्या का हल उनके हाथ में नहीं। राजनीतिक इच्छाशक्ति, स्थानीय हालात और वैश्विक सहयोग, इन सबका मेल ही असली बदलाव ला सकेगा।
अली और मरियम जैसे बच्चों की कहानियाँ हमें याद दिलाती हैं कि सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि संस्थाएँ क्या करना चाहती हैं बल्कि यह है कि वे वास्तव में क्या बदल पा रही हैं। और शायद सबसे ज़रूरी सवाल यह है हम सिर्फ़ इरादों से संतुष्ट हो जाएँ, या हक़ीक़त को बदलने के लिए कुछ और करने की ज़रूरत है?
खोयी हुई पीढ़ी.. किसका नुक़सान?
जब एक पीढ़ी शिक्षा से वंचित होती है, तो उसका असर पीढ़ियों तक जाता है।
अशिक्षा → बेरोज़गारी → अस्थिरता
मानसिक आघात → हिंसा का चक्र
असुरक्षित बचपन → अस्थिर समाज
युद्धग्रस्त बच्चे सिर्फ़ पीड़ित नहीं हैं, वे आने वाले समाज के निर्माता हैं। अगर उनका बचपन बर्बाद होता है, तो दुनिया का भविष्य भी कमज़ोर हो जाता है। जब युद्ध उनसे बचपन छीन लेता है, तो नुक़सान सिर्फ उन बच्चों का व्यक्तिगत नहीं रहता, पूरी मानवता का हो जाता है। एक “खोयी हुई पीढ़ी” सिर्फ़ उन बच्चों की कहानी नहीं है, जो स्कूल नहीं जा पाये या अपने सपने पूरे नहीं कर सके; यह उस भविष्य की भी कहानी है, जो कभी बन ही नहीं पाया।

इतिहास में “खोयी हुई पीढ़ी” शब्द का इस्तेमाल अर्नेस्ट हेमिंग्वे Ernest Hemingway जैसे लेखकों ने पहले विश्व युद्ध के बाद के युवाओं के लिए किया था, एक ऐसी पीढ़ी, जो अंदर से टूट चुकी थी। आज वही स्थिति अलग रूप में फिर सामने आती है, जहाँ मरियम और अली जैसे बच्चे अपने समय से पहले ही बड़े हो जाते हैं।
जब एक बच्चा स्कूल छोड़ता है, तो सिर्फ़ उसकी पढ़ाई ही नहीं रुकती.. एक संभावित शिक्षक, डॉक्टर, कलाकार या वैज्ञानिक भी खो जाता है। जब डर और असुरक्षा उसकी पहचान बन जाती है, तो समाज एक ऐसा नागरिक खो देता है, जो आत्मविश्वास और रचनात्मकता से भरा हो सकता था। इसका असर पीढ़ियों तक जाता है। कम शिक्षा, कम अवसर और लगातार मानसिक आघात.. ये सब मिलकर ऐसा चक्र बनाते हैं, जिसे तोड़ना बेहद कठिन होता है। यही वह बिंदु है, जहाँ नुक़सान की भयावहता दिखती है।
क्योंकि दुनिया आज पहले से कहीं ज़्यादा जुड़ी हुई है, एक क्षेत्र की अस्थिरता, हिंसा और निराशा धीरे-धीरे वैश्विक असर पैदा करती है, चाहे वह आर्थिक हो, सामाजिक या मानवीय लेकिन यह कहानी सिर्फ़ नुक़सान की नहीं होनी चाहिए। अगर एक पीढ़ी खो सकती है, तो उसे संभाला भी जा सकता है, बशर्ते कि हमारी नीयत और नीति हो। हमने क्या खोया से ज़्यादा ज़रूरी अब यह है कि हम अब बचा क्या सकते हैं…
(चित्र परिचय : युद्ध की विभीषिका को दर्शाते विश्वविख्यात चित्रकार पाब्लो पिकासो के चित्र, साभार।)

डॉ. आकिब जावेद
बांदा, उत्तर प्रदेश में शिक्षक तथा शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार हेतु सतत प्रयासरत आकिब शिक्षकों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में जुड़े रहे हैं। शिक्षा के साथ ही साहित्य में आपकी उपस्थिति निरंतर है। ग़ज़ल, कविता, कथा तथा बाल साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन एवं संग्रह। देश-विदेश की प्रतिष्ठित साहित्यिक वेबसाइटों एवं मंचों के साथ ही पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाओं का प्रकाशन। साहित्यिक संस्था 'आवाज़-ए-सुख़न-ए-अदब' के संस्थापक और ब्लॉगर। शिक्षा एवं साहित्य दोनों क्षेत्रों में अनेक सम्मान भी प्राप्त। अपने साहित्य को समाज के प्रति सजग दृष्टिकोण, मानवीय संवेदनाओं और जनसरोकारों की प्रतिबद्धता प्रमुख मानते हैं। संपर्क: 9506824464।
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