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पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आलोक त्रिपाठी की कलम से....

ज़हरीला विकास और हमारे बच्चों का कल

           भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ ‘विकास’ का अर्थ केवल आर्थिक विस्तार नहीं, बल्कि उसके साथ आने वाली अदृश्य क़ीमतों को समझना भी है। लेकिन क्या हम सच में उस क़ीमत का अंदाज़ा लगा भी पा रहे हैं? या फिर हम एक ऐसे रास्ते पर बढ़ रहे हैं जहाँ आने वाली पीढ़ियाँ हमारी आज की नीतियों का बोझ अपने शरीर में ढोएंगी?

दुनिया के कई हिस्सों में आज एक शब्द तेज़ी से चर्चा में है— PFAS, आम भाषा में “फ़ॉरएवर केमिकल्स” कहा जाता है। ये ऐसे सिंथेटिक रसायन हैं जो न तो पर्यावरण में टूटते हैं, न ही मानव शरीर आसानी से इन्हें बाहर निकाल पाता है। एक बार संपर्क में आने के बाद ये सालों, बल्कि पीढ़ियों तक हमारे भीतर बने रह सकते हैं।

अमेरिका इन रसायनों के स्वास्थ्य प्रभावों की गहराई से जांच कर रहा है। यूरोप ने इनके उपयोग पर कड़े प्रतिबंध लगाये हैं। लेकिन भारत? यहाँ कहानी उल्टी दिशा में जाती दिखती है।

इटली की ‘आपदा’ रत्नागिरी में ‘अवसर’

2025 की शुरूआत में महाराष्ट्र के रत्नागिरी ज़िले के लोटे परशुराम MIDC में एक नया औद्योगिक अध्याय शुरू हुआ। लक्ष्मी ऑर्गेनिक इंडस्ट्रीज़ की सहायक कंपनी, विवा लाइफ़साइंसेज़ ने यहाँ PFAS आधारित फ्लोरोकेमिकल्स का उत्पादन शुरू किया।

यह कोई साधारण औद्योगिक विस्तार नहीं था। इसकी जड़ें यूरोप के एक बड़े पर्यावरणीय घोटाले से जुड़ी थीं। इटली का ट्रिस्सिनो स्थित मितेनी प्लांट (जिसे 2018 में बंद कर दिया गया) PFAS प्रदूषण के सबसे गंभीर मामलों में से एक था। इसने लगभग 3.5 लाख लोगों के पीने के पानी को दूषित कर दिया। वर्षों तक लोगों ने अनजाने में ज़हर पिया। परिणाम सामने आने पर न केवल प्लांट बंद हुआ, बल्कि जून 2025 में एक इतालवी अदालत ने 11 अधिकारियों को कुल 141 वर्षों की सज़ा सुनायी।

कहानी यहीं ख़त्म नहीं हुई!

2019 में इस प्लांट की मशीनरी, पेटेंट और तकनीकी जानकारी नीलामी में बेची गयी और इसे भारत में खरीदा गया। 300 से अधिक कंटेनरों में यह पूरा ढांचा यहाँ लाया गया और फिर से स्थापित किया गया। यूरोप ने जिस तकनीक को न केवल अस्वीकार किया बल्कि अपराध माना, दंडित किया, भारत ने उसे अवसर के रूप में स्वीकार कर लिया।

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यह केवल औद्योगिक निवेश नहीं था, यह एक जोखम का स्थानांतरण भी था।

नियमन का अभाव: ख़तरनाक ख़ालीपन

भारत में PFAS को लेकर स्थिति चौंकाने वाली है। न पीने के पानी में इनके लिए कोई राष्ट्रीय मानक। न औद्योगिक अपशिष्ट के लिए स्पष्ट सीमा। न हवा, न मिट्टी, न उपभोक्ता उत्पादों के लिए ठोस दिशा-निर्देश।

अक्टूबर 2025 में FSSAI ने खाद्य पैकेजिंग में PFAS पर प्रतिबंध का एक मसौदा ज़रूर जारी किया लेकिन वह भी अभी विचाराधीन है। उत्पादन, उत्सर्जन और दीर्घकालिक निगरानी जैसे मूलभूत प्रश्न अब भी अनुत्तरित हैं। जब नीति शून्य हो, तो जोखम स्वतः बढ़ जाता है।

अदृश्य ज़हर, वास्तविक प्रभाव

PFAS की सबसे ख़तरनाक विशेषता यही है कि यह तुरंत दिखायी नहीं देता। कोई तीखी गंध नहीं, कोई रंग नहीं लेकिन प्रभाव गहरे और स्थायी। भारत में विभिन्न अध्ययनों में इसके निशान पहले ही मिल चुके हैं— तलछट में, बेंगलुरु के भूजल में, मछलियों में, और यहाँ तक कि स्तन दूध में भी। इसका मतलब है कि यह केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं, बल्कि सीधे मानव जीवन चक्र में प्रवेश कर चुका है। चूंकि यह जंतुओं और पौधों के शरीर में संचित होता है, अतः यह कई माध्यमों से शरीर में प्रवेश कर सकता है।

अभी तक जो प्रभाव बताये गये हैं, उनमें हार्मोनल असंतुलन, प्रतिरक्षा प्रणाली की कमज़ोरी, बच्चों में टीकों की प्रभावशीलता में कमी, कैंसर के बढ़ते जोखम, गर्भ में शिशु के विकास पर विपरीत असर तथा कम जन्म वज़न, न्यूरोलॉजिकल समस्याएं, ADHD और संज्ञानात्मक विकास में बाधा है।

यह केवल एक पीढ़ी की समस्या नहीं है। PFAS शरीर में जमा होता है और धीरे-धीरे अगली पीढ़ियों तक पहुंचता है। यानी, आज का संपर्क कल की विरासत बन सकता है।

स्थानीय विरोध और नियंत्रित राजनैतिक शोर

रत्नागिरी में इस परियोजना के ख़िलाफ़ आवाज़ें उठी हैं। स्थानीय समुदायों ने विरोध प्रदर्शन किये। लेकिन मुख्यधारा के समाचार पत्रों में स्थान शून्य है। राजनैतिक विरोध भी इतना दोयम दर्जे का है कि संतुलित शोर से ज़्यादा कुछ भी नहीं। महाराष्ट्र विधानसभा में भी सवाल उठे। कुछ नेताओं ने जांच और प्लांट बंद करने की मांग की। लेकिन व्यापक राजनीतिक परिदृश्य में एक अजीब-सी ख़ामोशी है। हर छोटी-सी बात पर आसमान सर पर उठा लेने वाली मीडिया लगभग चुप ही रही। न कोई निरंतर बहस, न कोई राष्ट्रीय स्तर का विमर्श।

किन्तु यह सोची समझी ख़ामोशी है, कोई ऐसी बात नहीं थी जो मुख्यधारा की मीडिया या सोशल मीडिया चुपचाप ख़ामोश रह जाता।

पिछले कुछ महीनों से खाद्य पदार्थों की मिलावट और लोगों की सेहत को लेकर जिस तरह से चर्चाएं चल रही हैं, देखकर तो लगता है कि भारतीयों ने अमरत्व को प्राप्त कर लिया है। क्योंकि मीडिया की ख़बरों पर यक़ीन करें तो आम लोग तो सिर्फ़ ज़हर ही खा रहे हैं। पर उससे भी विचित्र बात यह कि मिलावटी खाने/पीने से उस अनुपात में कहीं से कोई दुर्घटना सामने नहीं आ रही, जिस हिसाब से जनता ज़हरीले पदार्थ का सेवन कर रही है। ख़ैर इसके कारण पर अगले अंक में बात करेंगे, पर यह ज़रूर कहूंगा कि यह सामान्य नहीं है।

वैसे PFAS जैसे मुद्दे, जिनका असर वर्षों में दिखता है, शायद उस “तत्काल सनसनी” के दायरे में नहीं आते। कुछ रिपोर्ट्स, मूलतः अंतरराष्ट्रीय पत्रों के माध्यम से कुछ चीज़ें ज़रूर सामने आयीं— मितेनी कनेक्शन पर, राजनीतिक आरोपों पर— लेकिन वे जल्दी ही ग़ायब हो गयीं। कोई लंबी जांच नहीं, कोई राष्ट्रीय बहस नहीं। क्या यह इसलिए कि इसमें बड़े उद्योग शामिल हैं? या इसलिए कि इसका असर धीरे-धीरे सामने आता है, बिना शोर के?

आपके रूटीन में PFAS

वैसे हम भी कम महान नहीं हैं। PFAS में रोज़मर्रा की चीज़ें भी इसमें योगदान देती हैं— नॉन-स्टिक बर्तन, वॉटरप्रूफ़ या दाग़-रोधी कपड़े, फ़ास्ट-फ़ूड पैकेजिंग, कॉस्मेटिक्स और कुछ दवाएं— इन सभी में PFAS का उपयोग होता है, जो धीरे-धीरे पर्यावरण में मिलते रहते हैं। जब ये रसायन पानी या मिट्टी में पहुंचते हैं, तो फसलों, मछलियों और पशुओं के ज़रिये हमारी खाद्य शृंखला (food chain) में प्रवेश कर जाते हैं।

एक और अहम स्रोत ठोस कचरे का निपटान है— लैंडफ़िल साइट्स से रिसाव (leachate) के ज़रिये ये केमिकल्स भूजल में मिल सकते हैं। समस्या यह है कि PFAS आसानी से टूटते नहीं, इसलिए एक बार फैलने के बाद ये लंबे समय तक वातावरण में बने रहते हैं और धीरे-धीरे हमारे शरीर में जमा होते जाते हैं।

असली सवाल

मैं बेशक विकास का पक्षधर हूं। विकास ज़रूरी है, इस पर कोई विवाद नहीं हो सकता। लेकिन संतुलित और प्रकृति के साथ सामंजस्य में होना चाहिए न कि विकास के नाम पर पश्चिम का अंधाधुंध अनुकरण। मैं दो उदाहरण आपके सामने रखता हूँ।

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पहला: 1990 के दशक में भारत से मेढ़कों (frog legs) का बड़े पैमाने पर निर्यात किया गया, जिससे लगभग 1 करोड़ रुपये की कमाई हुई, लेकिन इसका पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। मेढ़क खेतों और जलाशयों में मच्छरों के लार्वा सहित कीटों को नियंत्रित करते हैं, इसलिए उनके अत्यधिक शिकार से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ गया और मच्छरों की संख्या बढ़ने लगी। इसके परिणामस्वरूप Malaria जैसे रोगों के मामलों में वृद्धि हुई, जिससे देश को मलेरिया की दवाइयों और नियंत्रण उपायों पर 10 करोड़ रुपये से अधिक ख़र्च करना पड़ा था। यह उदाहरण दर्शाता है कि अल्पकालिक आर्थिक लाभ के लिए पर्यावरण की अनदेखी करने पर दीर्घकाल में अधिक नुक़सान उठाना पड़ सकता है।

एक दूसरा उदाहरण अमेरिका का देखिए। कोरोना महामारी के दौरान United States की स्वास्थ्य व्यवस्था दवाओं, उपकरणों और बुनियादी ढांचे के मामले में India की तुलना में अधिक सुदृढ़ थी, फिर भी पहली लहर में संक्रमण और मृत्यु के अनुपात के मामले में भारत की स्थिति बेहतर रही।

फिर विकास किस क़ीमत पर?

अगर आर्थिक प्रगति के बदले हम अपने पानी, मिट्टी और शरीर में स्थायी ज़हर भर रहे हैं, तो क्या यह सौदा सही है? भारत को यह तय करना होगा कि वह केवल उत्पादन का केंद्र बनेगा या ज़िम्मेदार विकास का उदाहरण भी पेश करेगा। PFAS का मुद्दा सिर्फ़ एक केमिकल का मुद्दा नहीं है— यह नीति, प्राथमिकताओं और भविष्य की दिशा का प्रश्न है। और सबसे महत्वपूर्ण— यह हमारे बच्चों के अधिकार का प्रश्न है। एक ऐसा भविष्य, जहाँ विकास का अर्थ सुरक्षित जीवन हो… न कि एक धीमा, अदृश्य जानलेवा संकट।

डॉ. आलोक त्रिपाठी

डॉ. आलोक त्रिपाठी

2 दशकों से ज्यादा समय से उच्च शिक्षा में अध्यापन व शोध क्षेत्र में संलग्न डॉ. आलोक के दर्जनों शोध पत्र प्रकाशित हैं और अब तक वह 4 किताबें लिख चुके हैं। जीवविज्ञान, वनस्पति शास्त्र और उससे जुड़े क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले डॉ. आलोक वर्तमान में एक स्वास्थ्य एडवोकेसी संस्था फॉर्मोन के संस्थापक हैं।

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