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21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से चयन और इन फ़िल्मों का दस्तावेज़ीकरण...
पाक्षिक ब्लॉग (भाग-11) मानस की कलम से...

लगान: क्या है उपलब्धि और विरासत?

“सच और साहस है जिसके मन में, अंत की जीत उसी की रहे।”

           आशुतोष गोवारिकर का एक निर्देशक के रूप में ‘सच’ और आमिर ख़ान का निर्माता के रूप में ‘साहस’ का नतीजा है- लगान।

आज से 25 साल पहले 15 जून साल 2001 में रिलीज़ हुई लगान सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं थी। वह एक ऐसे सिनेमा का अनुभव थी, जिसने दर्शकों को यह याद दिलाया कि भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी ताक़त उसकी अपनी मिट्टी, अपने लोग और उनकी कहानियाँ हैं। पच्चीस वर्षों के बाद भी जब लगान का नाम लिया जाता है, तो याद केवल एक क्रिकेट मैच की नहीं आती, बल्कि उस रोमांच, उम्मीद, संघर्ष और विजय की आती है जिसने करोड़ों दर्शकों को एक साथ बांध दिया था।

हिंदी सिनेमा के इतिहास में लगान का स्थान असाधारण है। यह उन चुनिंदा फ़िल्मों में शामिल है जिन्होंने मनोरंजन और कला के बीच की दूरी को लगभग समाप्त कर दिया। यही कारण है यह फ़िल्म आठ राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली भारतीय सिनेमा की सबसे सम्मानित फ़िल्मों में गिनी जाती है। यह वही फ़िल्म है, जिसने भारत को वैश्विक मंच पर एक नयी पहचान दी और 1957 की मदर इंडिया तथा 1988 की सलाम बॉम्बे! के बाद अकादमी पुरस्कार के अंतिम चरण तक पहुँचने वाली तीसरी भारतीय फ़िल्म बनी।

यह उपलब्धि और भी बड़ी इसलिए लगती है क्योंकि लगान का जन्म उन तमाम नियमों को तोड़कर हुआ था, जिन्हें उस समय बॉलीवुड की सफलता का सूत्र माना जाता था।

जावेद अख़्तर ने एक बार कहा था जब उन्होंने पहली बार फ़िल्म का विचार सुना, तो उन्हें लगा कि इसके निर्माताओं ने सिनेमा में असफल होने वाली हर चीज़ की सूची बनाकर उसे एक ही कहानी में डाल दिया है। क्रिकेट पर आधारित फ़िल्म, ग्रामीण पृष्ठभूमि, उन्नीसवीं सदी का कालखंड, धोती पहनने वाला नायक, अवधि भाषा और स्विट्ज़रलैंड के बजाय भारतीय गांवों की धूल-मिट्टी… उस दौर के व्यावसायिक सिनेमा के लिहाज़ से यह आत्महत्या जैसा निर्णय था। लेकिन आमिर ख़ान ने जोखिम उठाया।

दरअसल, आमिर ख़ान को सिर्फ़ कहानी पर भरोसा नहीं था, उन्हें सिनेमा के व्याकरण पर भरोसा था। उन्हें पता था कि अगर कहानी सही ढंग से कही जाये तो दर्शक किसी भी दुनिया में प्रवेश कर सकते हैं। और चंपानेर गाँव की दुनिया और इसके दृश्य भारतीय दर्शक एक तरह से भूल चुके थे।

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अगर सिनेमा के व्याकरण की बात करें तो लगान किरदारों से भरी फ़िल्म है। ऐसी फ़िल्मों का ट्रीटमेंट मुश्किल होता है। सभी किरदारों को दिखाने के चक्कर में फ़िल्म बोझिल होने लगती है। और न दिखाया जाये तो अलग मुश्किल। इसलिए पहले 4 मिनट के मोंटैज में ही, मूविंग शॉट्स के माध्यम से, सारे किरदार, उनका नाम, उनका व्यवहार, मूड, उनका आपसी रिलेशन और वो करते क्या हैं… सब कुछ स्थापित कर दिया गया। वो सभी किरदार, सिर्फ़ एक किरदार के बारे में बात कर रहे हैं- हमारा हीरो भुवन। कि भुवन कहाँ है? इससे स्थापित होता है कि भुवन एक डिज़ायरेबल किरदार है।

यह केवल एक प्रश्न नहीं है। यह पटकथा का एक बेहद चतुर उपकरण है। दर्शक भुवन को देखे बिना ही समझ जाता है कि यह व्यक्ति गांव के लिए कितना महत्वपूर्ण है। उसके आने से पहले ही उसकी उपस्थिति महसूस होने लगती है। एक नायक को स्थापित करने का सबसे बेहतर तरीक़ा होता है।

इसके बाद हिरण वाला दृश्य एक तरह से पूरी फ़िल्म है।

भुवन एक असहाय हिरण को अंग्रेज़ अफ़सर की बंदूक़ से बचाने की कोशिश करता है। इस एक दृश्य में उसके चरित्र की लगभग सारी विशेषताएँ सामने आ जाती हैं। वह दयालु है, इसलिए कमज़ोर के पक्ष में खड़ा होता है। वह साहसी है, इसलिए बंदूक़धारी सत्ता से टकराता है। वह जुझारू है, इसलिए हथियार न होने के बावजूद हार नहीं मानता। वह बुद्धिमान है, इसलिए पत्थर का इस्तेमाल करके परिस्थिति बदल देता है। और सबसे महत्वपूर्ण, वह नैतिक रूप से दृढ़ है, इसलिए परिणामों की परवा किये बिना सही बात का साथ देता है।

उसी दृश्य में फ़िल्म अपने खलनायक को भी स्थापित कर देती है।

कैप्टन रसेल के पास सत्ता है, शक्ति है, संसाधन है। लेकिन वह शेर का नहीं, एक बेज़ुबान हिरण का शिकार करने आया है। इससे उसकी क्रूरता और मानसिकता दोनों सामने आ जाती हैं। दिलचस्प बात यह है कि वह पारंपरिक बॉलीवुड खलनायकों की तरह चिल्लाता नहीं। वह शांत है, संयमित है और इसी वजह से अधिक ख़तरनाक लगता है।

वह भुवन को शारीरिक चोट नहीं पहुँचाता। वह उसके आत्मसम्मान को चोट पहुँचाता है।

हिरण को बचाने वाले भुवन के सामने वह एक मासूम खरगोश को मार देता है। यह केवल हिंसा नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक युद्ध है। वह भुवन को बताना चाहता है कि सत्ता उसके पास है और वह जब चाहे किसी भी जीवन को समाप्त कर सकता है। और अगर मुझसे टकराओगे तो मैं शारीरिक रूप से ज़्यादा मानसिक रूप से प्रहार करता हूँ।

यहीं से फ़िल्म का मूल संघर्ष जन्म लेता है।

एक तरफ़ औपनिवेशिक सत्ता का प्रतिनिधित्व करता हुआ शक्तिशाली अंग्रेज़ अफ़सर और दूसरी तरफ़ एक साधारण किसान। एक के पास साम्राज्य की ताक़त है, दूसरे के पास केवल विश्वास। और फिर हीरो कहता है- “सरत मंजूर है”।

लेकिन लगान की ख़ूबसूरती यह है कि यह संघर्ष युद्ध के मैदान में नहीं, क्रिकेट के मैदान में लड़ा जाता है… एक ऐसा खेल जिसे भारतीय ग्रामीण जानते तक नहीं।

यहीं से फ़िल्म एक साधारण स्पोर्ट्स ड्रामा से ऊपर उठ जाती है। क्रिकेट यहां केवल खेल नहीं है। यह सम्मान का प्रश्न है। यह लगान से मुक्ति का प्रश्न है। यह सामूहिक अस्मिता का प्रश्न है। और क्योंकि विरोधी ब्रिटिश साम्राज्य है, इसलिए यह औपनिवेशिक दमन के विरुद्ध सांकेतिक प्रतिरोध भी बन जाता है। ये हीरो के अपने अंदर विश्वास की परीक्षा है। इतने स्टेक लगने के बाद वो क्रिकेट का खेल सिर्फ़ खेल नहीं दिखता। और फ़िल्म कहीं-कहीं ओवर ड्रामेटिक होने के बाद भी लगती नहीं है।

फ़िल्म का हर किरदार इस यात्रा में महत्वपूर्ण है। लाखा का विश्वासघाती से नायक में बदलना भारतीय सिनेमा के सबसे संतोषजनक चरित्र-परिवर्तनों में से एक है। अंतिम मैच में उसके द्वारा लिया गया कैच फ़िल्म इतिहास में रोंगटे खड़े कर देने वाला मोमेंट है।

इसी तरह गौरी, एलिज़ाबेथ और भुवन के बीच का प्रेम त्रिकोण कहानी में भावनात्मक जटिलता जोड़ता है। ईर्ष्या, प्रेम, त्याग और सम्मान जैसे तत्व खेल और राजनीति से भरी कहानी को मानवीय बनाते हैं।

और फिर आता है संगीत।

ए. आर. रहमान का संगीत, जावेद अख़्तर के गीत और के. पी. सक्सेना के संवाद मिलकर लगान को एक दुर्लभ सांस्कृतिक अनुभव में बदल देते हैं। “घनन घनन” से लेकर “ओ पालनहारे” और “चले चलो” तक हर गीत कहानी को आगे बढ़ाता है। कोई भी गीत फ़िल्म की गति को रोकता नहीं, बल्कि उसे और समृद्ध करता है।

फ़िल्म का वैश्विक प्रभाव

शायद यही कारण था लगान केवल सिनेमाघरों तक सीमित नहीं रही। फ़िल्म पर आधारित कॉमिक्स, रंग भरने की किताबें, मास्क बुक और क्रिकेट बोर्ड गेम तक बाज़ार में आये। इसकी डीवीडी और वीसीडी की बिक्री ने उस दौर में रिकॉर्ड बनाये और यह शोले जैसी कालजयी फ़िल्मों को भी पीछे छोड़ने लगी।

इसकी लोकप्रियता भारत की सीमाओं से भी आगे पहुँची। वर्षों बाद गार्डियंस ऑफ़ द गैलेक्सी के निर्देशक जेम्स गन ने इसे अपनी पसंदीदा भारतीय फ़िल्म बताया। वहीं ब्रिटिश समीक्षक पीटर ब्रैडशॉ ने लिखा, लगान शायद भारतीय सिनेमा के लिए वही साबित हो सकती है जो क्राउचिंग टाइगर हिडन ड्रैगन एशियाई सिनेमा के लिए साबित हुई थी— एक ऐसा काम, जो पूरी दुनिया को एक नयी सिनेमाई संस्कृति से परिचित कराये।

आज जब हम लगान को देखते हैं तो महसूस होता है कि इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि ऑस्कर नामांकन, पुरस्कार या बॉक्स ऑफ़िस नहीं है। सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने भारतीय सिनेमा को अपनी जड़ों की तरफ़ लौटने का विश्वास दिया। भारतीय सिनेमा की अपनी एक सांस्कृतिक अस्मिता को जीवन्त किया और भारतीय राष्ट्रीय चरित्र को वैश्विक पटल पर उभारने का महत्वपूर्ण बीड़ा भी उठाया।

इस फ़िल्म ने यह तो साबित किया ही कि दर्शक केवल विदेशी लोकेशन, चमकदार सेट और फ़ैशन नहीं चाहते। वे ऐसी कहानियाँ भी चाहते हैं जो उनकी मिट्टी से निकलती हों, उनके संघर्षों को समझती हों और उन्हें उम्मीद देती हों।

लगान अंततः क्रिकेट की कहानी नहीं है। यह ब्रिटिश राज से विद्रोह की कोई सपाट कहानी भी नहीं है। यह आत्मसम्मान की कहानी है। यह सामूहिकता की कहानी है। यह उस विश्वास की कहानी है कि असंभव दिखने वाली लड़ाइयाँ जीती जा सकती हैं। यानी “सच और साहस है जिसके मन में, अंत की जीत उसी की रहे”।

और यह ट्रिविया भी…

यह अपने समय में अनूठी बॉलीवुड फ़िल्म थी, जिसमें सिंक्रोनाइज़्ड साउंड का इस्तेमाल किया गया। सिंक-साउंड रिकॉर्डिंग को आसान बनाने के लिए जर्मनी से मंगाये गये Arri535 कैमरे का इस्तेमाल किया गया था। ज़्यादातर भारतीय फ़िल्मों की डबिंग पूरी तरह से स्टूडियो में ADR प्रोसेस के ज़रिये की जाती है। लेकिन लगान के निर्माताओं को पता था कि सिंक-साउंड ऑस्कर नॉमिनेशन का एक क्राइटेरिया भी है।

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मानस

विवेक त्रिपाठी उर्फ़ मानस पूर्व बैंककर्मी हैं लेकिन फ़िल्मों के जुनून ने नौकरी छुड़वायी और फ़िल्में बनाने की दिशा में प्रेरित किया। आधा दर्जन शॉर्ट फ़िल्में बना चुके मानस की कुछ फ़िल्मों को फ़ेस्टिवलों में सराहना व पुरस्कार मिले हैं। फ़िल्म लेखन व निर्देशन के अलावा मानस का एक कहानी संग्रह 'बालकनी' प्रकाशित है। इन दिनों वह पूरी लंबाई की फ़िल्म के निर्माण के लिए संघर्षरत हैं।

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