
- July 26, 2026
- आब-ओ-हवा
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डॉ. आकिब जावेद की कलम से....
छात्र आंदोलन का मंत्र, निडर नागरिक ही लोकतंत्र
“जब युवाओं का विश्वास डगमगाने लगता है, तब समाज का भविष्य प्रश्नों के घेरे में आ जाता है। और जब संवाद की जगह टकराव ले लेता है, तब लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होती है।”
दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का केंद्र बना। इस बार मुद्दा किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं का था जो प्रतियोगी परीक्षाओं, भर्ती प्रक्रियाओं और अपने भविष्य को लेकर चिंता व्यक्त कर रहे थे। NEET परीक्षा से जुड़े विवादों ने छात्रों में व्यापक असंतोष पैदा किया और धीरे-धीरे यह आंदोलन शिक्षा व्यवस्था, पारदर्शिता तथा संस्थागत जवाबदेही पर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र से इस आंदोलन को सफल ज़रूर कहा जा रहा है, लेकिन इस आंदोलन की चिंताओं की दिशा में इसे केवल एक सकारात्मक क़दम ही कहा जाना उचित हो सकता है। अभी इस घटनाक्रम से आंदोलन की चिंताओं को क्या दिशा मिलेगी, समय के गर्भ में ही है। लेकिन इतना तो कहा ही जाना चाहिए कि इस आंदोलन ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में फिर एक आशा की किरण फूंक देने का काम तो किया ही, भले ही इस आंदोलन की राह में कांटे कम नहीं थे।
आंदोलन के दौरान सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को लेकर तीखी राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ सामने आयीं। उनके समर्थकों और आलोचकों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला। उनके अनशन और प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर भी व्यापक चर्चा हुई तथा न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद घटनाक्रम ने नया मोड़ लिया। इन घटनाओं ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण विरोध और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे प्रश्नों को भी केंद्र में ला दिया।
मुद्दे से अधिक आंदोलनकारियों पर बहस
आंदोलन के शुरूआती दिनों में सार्वजनिक विमर्श का बड़ा हिस्सा छात्रों की मांगों के बजाय आंदोलनकारियों की छवि पर केंद्रित दिखायी दिया। विदेशी फ़ंडिंग, राजनीतिक प्रेरणा, असामाजिक तत्वों की मौजूदगी और विभिन्न प्रकार के आरोप लगाये गये। समर्थकों और विरोधियों के बीच तीखी बहस चली। परिणामस्वरूप मूल प्रश्न परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और जवाबदेही कुछ समय के लिए पीछे छूटता हुआ दिखायी देने लगा था।

लोकतांत्रिक समाज में किसी आंदोलन की आलोचना स्वाभाविक है, लेकिन स्वस्थ लोकतंत्र की कसौटी यही है कि बहस व्यक्ति या समूह की निराधार आलोचना पर नहीं, बल्कि उसकी मांगों और तथ्यों पर केंद्रित रहे।
पुलिस और लोकतांत्रिक संवेदनशीलता
आंदोलन के दौरान कुछ स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की घटनाएँ सामने आयीं, तो पुलिस सवालों के कठघरे में दिखी। प्रदर्शनकारियों ने बल प्रयोग और दुर्व्यवहार के आरोप लगाये, जबकि प्रशासन ने अपने क़दमों को क़ानून-व्यवस्था बनाये रखने की आवश्यकता बताया। इन घटनाओं ने यह प्रश्न उठाया कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाये।
लोकतंत्र की शक्ति केवल क़ानून लागू करने में नहीं, बल्कि असहमति को सम्मानपूर्वक सुनने की क्षमता में भी निहित होती है।
मीडिया और सोशल मीडिया
इस आंदोलन ने मीडिया की भूमिका पर भी नयी बहस छेड़ दी। कई प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि मुख्यधारा के कुछ समाचार माध्यम उनकी मांगों की अपेक्षा राजनीतिक विमर्श को अधिक महत्व दे रहे थे। दूसरी ओर, सोशल मीडिया छात्रों के लिए अपनी बात सीधे जनता तक पहुँचाने का प्रमुख माध्यम बनकर उभरा।
डिजिटल युग में सूचना के अनेक स्रोत उपलब्ध हैं। ये अवसर भी है और चुनौती भी। इसलिए नागरिकों के लिए आवश्यक है कि वे किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले विभिन्न स्रोतों से जानकारी का मिलान करें।
संवाद की ओर बढ़ते क़दम
जैसे-जैसे आंदोलन व्यापक हुआ, विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और नागरिक समूहों ने अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएँ दीं। सरकार पर संवाद का दबाव बढ़ा और शिक्षा व्यवस्था में सुधार, जवाबदेही तथा संस्थागत बदलावों पर चर्चा तेज़ हुई। कुछ प्रशासनिक क़दम उठाये गये और परीक्षा प्रणाली में सुधार संबंधी अनेक प्रस्ताव सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बने। हालाँकि अनेक मांगों पर बहस और प्रक्रिया अभी भी जारी है।
सरकार को जो समझ आता है, वह कुछ समर्थकों को क्यों नहीं समझ आता?
इस प्रश्न का उत्तर केवल राजनीति में नहीं, बल्कि मनोविज्ञान में भी खोजा जा सकता है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मनोवैज्ञानिकों ने यह समझने का प्रयास किया कि स्पष्ट तथ्यों के बावजूद लोग किसी नेता या विचारधारा का अंध-समर्थन क्यों करते हैं। इसी संदर्भ में संज्ञानात्मक असंगति (Cognitive Dissonance) का सिद्धांत महत्वपूर्ण माना जाता है।
इस सिद्धांत के अनुसार जब व्यक्ति अपनी पहचान किसी नेता, दल या विचारधारा से गहराई से जोड़ लेता है, तब उस पक्ष की ग़लती स्वीकार करना उसे अपने ही निर्णय पर प्रश्नचिह्न लगाने जैसा प्रतीत होता है। इस मानसिक असुविधा से बचने के लिए कई लोग विरोधाभासी तथ्यों की अनदेखी करते हैं या हर आलोचना को विरोधियों की साज़िश मानने लगते हैं।
यदि इसके साथ लगातार भय, असुरक्षा या पहचान के संकट की भावना भी जुड़ जाये, तो व्यक्ति और अधिक रक्षात्मक हो सकता है। ऐसे में सरकार, दल और राष्ट्र के बीच का अंतर धुंधला पड़ने लगता है, जबकि लोकतंत्र में सरकार और राष्ट्र समानार्थी नहीं होते।
सत्ता से प्रश्न पूछना लोकतांत्रिक अधिकार
लोकतंत्र में सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी होती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, परीक्षा व्यवस्था या प्रशासनिक निर्णयों पर प्रश्न पूछना नागरिक का संवैधानिक अधिकार है।
असहमति का अर्थ राष्ट्र-विरोध नहीं होता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की आलोचना और राष्ट्र के प्रति सम्मान दोनों साथ-साथ संभव हैं। यही लोकतांत्रिक परिपक्वता का आधार है। इस संदर्भ में यह भी जिज्ञासा आती है कि Gen Z की राजनीति क्यों अलग दिखायी देती है?
आज की पीढ़ी पहले की पीढ़ियों से कई मायनों में भिन्न है।
यह पीढ़ी केवल एक माध्यम पर निर्भर होकर राय नहीं बनाती। यह अनेक स्रोतों से जानकारी प्राप्त करती है, वीडियो देखती है, दस्तावेज़ पढ़ती है, सोशल मीडिया पर चर्चा करती है और फिर अपनी समझ विकसित करती है।
इस पीढ़ी के प्रश्न व्यक्तियों से अधिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं पर केंद्रित हैं:
- – परीक्षा पारदर्शी क्यों नहीं है?
- – जवाबदेही तय क्यों नहीं होती?- ग़लती होने पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?
- – संस्थाएँ अधिक सक्षम और विश्वसनीय क्यों नहीं बनतीं?
यही कारण है आज का युवा व्यक्तित्व-आधारित राजनीति की अपेक्षा व्यवस्था-केंद्रित सुधारों पर अधिक ज़ोर देता दिखता है।
दुनिया में बदलती युवा राजनीति
भारत अकेला देश नहीं है, जहाँ युवा अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे हैं। विश्व के अनेक देशों में युवाओं ने रोज़गार, शिक्षा, पारदर्शिता, भ्रष्टाचार और सुशासन जैसे मुद्दों पर लोकतांत्रिक तरीक़े से अपनी चिंताएँ व्यक्त की हैं।
हालाँकि प्रत्येक देश की राजनीतिक, सामाजिक और संवैधानिक परिस्थितियाँ अलग होती हैं, फिर भी यह स्पष्ट है कि नयी पीढ़ी अधिक जवाबदेह, पारदर्शी और सहभागी शासन व्यवस्था की अपेक्षा रखती है।
- भारत अकेला देश नहीं है, जहाँ युवा अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे हैं।
- बांग्लादेश में आरक्षण नीति को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन व्यापक राजनीतिक संकट में बदल गया।
- नेपाल में युवाओं ने भ्रष्टाचार और सुशासन के प्रश्न उठाए।
- इंडोनेशिया में आर्थिक असमानता और सरकारी नीतियों के विरोध में बड़े प्रदर्शन हुए।
- फ़िलीपीन्स में जवाबदेह शासन की मांग को लेकर युवा सक्रिय हुए।
- सर्बिया में एक रेल दुर्घटना के बाद छात्रों ने लंबे समय तक शांतिपूर्ण विरोध कर सरकारी जवाबदेही का प्रश्न उठाया।
इन सभी आंदोलनों की परिस्थितियाँ अलग थीं, लेकिन उनकी मूल चिंताएँ लगभग समान थीं रोज़गार, पारदर्शिता, अवसरों की समानता, भ्रष्टाचार और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व।
क्या आंदोलनों से नेता पैदा होते हैं?
कई लोगों को आशंका होती है कि आंदोलनों से नये राजनीतिक नेता उभर आते हैं।
वास्तव में नेतृत्व केवल आंदोलन से नहीं, बल्कि साहस, ज़िम्मेदारी, संवाद और निरंतर जनविश्वास से विकसित होता है। जो व्यक्ति कठिन समय में लोगों के साथ खड़ा रहता है, समाधान खोजने का प्रयास करता है और सार्वजनिक उत्तरदायित्व निभाता है, वही दीर्घकाल में नेतृत्व अर्जित करता है।
यदि शिक्षित, संवेदनशील और उत्तरदायी युवा सार्वजनिक जीवन में आते हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत माना जाना चाहिए।
समाधान: टकराव नहीं, संस्थागत सुधार
किसी भी आंदोलन का स्थायी समाधान केवल विरोध या दमन से नहीं, बल्कि संस्थागत सुधारों से निकलता है। इसके लिए कुछ बुनियादी क़दम आवश्यक हैं:
- – परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी और तकनीकी रूप से सुरक्षित बनाना।
- – भर्ती प्रक्रियाओं को समयबद्ध और उत्तरदायी बनाना।
- – शिक्षा को कौशल, अनुसंधान, नवाचार और रोज़गार से बेहतर ढंग से जोड़ना।
- – सरकार और युवाओं के बीच नियमित संवाद की संस्थागत व्यवस्था विकसित करना।
- – शांतिपूर्ण विरोध और संवैधानिक अधिकारों की प्रभावी सुरक्षा सुनिश्चित करना।
- – प्रशासनिक निर्णयों में पारदर्शिता और जवाबदेही को प्राथमिकता देना।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति
भारत का लोकतंत्र तभी मज़बूत होगा, जब नागरिक निडर होकर प्रश्न पूछ सकें और सरकार धैर्यपूर्वक उत्तर देने की संस्कृति विकसित करें।
सरकारें बदलती हैं, राजनीतिक दल बदलते हैं और नेतृत्व भी बदलता रहता है, लेकिन राष्ट्र इन सबसे बड़ा होता है। इसलिए लोकतंत्र की सफलता किसी एक दल या विचारधारा की जीत में नहीं, बल्कि मज़बूत संस्थाओं, जागरूक नागरिकों और सतत संवाद में निहित है।
युवा केवल अपने भविष्य की चिंता नहीं कर रहे, वे व्यवस्था में विश्वास की पुनर्स्थापना की मांग कर रहे हैं। यदि इस ऊर्जा को सकारात्मक संवाद, पारदर्शी नीतियों और संस्थागत सुधारों से जोड़ा जाये, तो यही पीढ़ी भारत की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति बन सकती है।
अंततः लोकतंत्र का मूल संदेश यही है संवाद, संतुलन और शुचिता पर आधारित व्यवस्था ही सबसे अधिक टिकाऊ होती है।

डॉ. आकिब जावेद
बांदा, उत्तर प्रदेश में शिक्षक तथा शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार हेतु सतत प्रयासरत आकिब शिक्षकों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में जुड़े रहे हैं। शिक्षा के साथ ही साहित्य में आपकी उपस्थिति निरंतर है। ग़ज़ल, कविता, कथा तथा बाल साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन एवं संग्रह। देश-विदेश की प्रतिष्ठित साहित्यिक वेबसाइटों एवं मंचों के साथ ही पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाओं का प्रकाशन। साहित्यिक संस्था 'आवाज़-ए-सुख़न-ए-अदब' के संस्थापक और ब्लॉगर। शिक्षा एवं साहित्य दोनों क्षेत्रों में अनेक सम्मान भी प्राप्त। अपने साहित्य को समाज के प्रति सजग दृष्टिकोण, मानवीय संवेदनाओं और जनसरोकारों की प्रतिबद्धता प्रमुख मानते हैं। संपर्क: 9506824464।
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