![jantar mantar, protest poetry, हम बोलेंगे] आंदोलन, शायराना](https://aabohawa.org/wp-content/uploads/2026/07/poem.jpg)
हम बोलेंगे… यहां आंदोलन शायराना
कोई आंदोलन होता है, तो उसकी भूमिका से लेकर प्रभाव तक में काव्य धड़कता रहता है। ऐसी कविताओं का इतिहास पुराना रहा है, जो आंदोलनों का सुर बनी हैं। जंतर मंतर पर इन दिनों छात्रों और युवाओं का जो आंदोलन चर्चा में है, उसके संदर्भ में आब-ओ-हवा की इस प्रस्तुति में मौजूदा दौर के शायरों की ताज़ा रचनाएं पढ़िए। सोशल मीडिया पर इन्हें पढ़ा-सुना-शेयर किया जा रही है…
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1. भवेश दिलशाद रचित नज़्म
नारों की ताक़त तोलेंगे
हम बोलेंगे
चुप्पी में चीखें घोलेंगे
हम बोलेंगे
हम बोलेंगे हम ये टंटा नहीं सहेंगे
झूठों का अब काला धंधा नहीं सहेंगे
हम बोलेंगे तुम मारोगे तो सुन लो तुम
हम ज़बान के एवज़ डंडा नहीं सहेंगे
हम बोलेंगे हम बोलेंगे…
बेशर्म तमाशे बंद करो
नज़रों पे ख़राशें और नहीं
खिलती नस्लों के कंधों पर
ख़्वाबों की लाशें और नहीं
हम पूछेंगे किसकी है ये ज़िम्मेदारी
खोटी नीयत और खरे फ़रेब और अय्यारी
हम पूछेंगे हम पूछेंगे हम लेंगे जवाब
हम हिसाब के एवज़ डंका नहीं सहेंगे
हम पूछेंगे हम बोलेंगे…
आंधी होगी अब सांस-सांस
सहरा-सहरा थर्राएगा
कड़वा सच काली तख़्ती पर
हर चौक से लिक्खा जाएगा
सब देख चुके हम अब तो हल्ला बोलेंगे
सुन बहरी दिल्ली चिल्ला चिल्ला बोलेंगे
हम सवाल के एवज़ हिंसा नहीं सहेंगे
हम अवाम के एवज़ राजा नहीं सहेंगे
हम बोलेंगे हम बोलेंगे…
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2. दीपक रूहानी रचित गीत
युद्ध अभी अवरुद्ध न होगा।
सत्ता में यदि कौरव हैं तो क्यूँ पाण्डव से युद्ध न होगा?
कल तक जो आदर्शवाद का शंख बजाया करते थे।
वही जो कल तक राष्ट्र-प्रेम का पाठ पढ़ाया करते थे।
उच्च स्वरों में मातृभूमि के गीत सुनाया करते थे।
बात-बात में राम-नाम की महिमा गाया करते थे।
बात-बात में रामराज का ख़्वाब दिखाया करते थे।
सिर्फ़ स्वयं को भारत माँ का पुत्र बताया करते थे।
वही धूर्त अब रावण बनकर जनता के उत्पीड़क हैं,
निरा नपुंसक होगा जो ये देख तनिक भी क्रुद्ध न होगा।
युद्ध अभी अवरुद्ध न होगा।।01।।
आज़ादी का सारा सपना किसने चकनाचूर किया।
लोकतंत्र को घुटनों के बल चलने पर मजबूर किया।
जिसे पता हो आगे आये, आये और गवाही दे।
इतनी तेज़ गवाही दे कि संसद तलक सुनाई दे।
कहे कि ये सब चोट्टे हैं और चोरी इनका धंधा है।
कहे कि संसद का रखवाला बहरा है और अंधा है।
रामराज का वादा करके, लोकतंत्र की हत्या की,
उसे कहेंगे रामराज जब कुछ भी लोक-विरुद्ध न होगा।
युद्ध अभी अवरुद्ध न होगा।।02।।
आज तुम्हारे हाथों में ही सत्ता वाला कोड़ा है।
बारी-बारी सबको मारा, किसको तुमने छोड़ा है?
छात्र-किसान-जवान को मारा, महिलाओं को मारा है।
उसकी सत्ता पर लानत जो जनता हत्यारा है।
तुम बस इतना चाह रहे हो, केवल सत्ता बची रहे।
भले नीचता में डूबे हो, मगर महत्ता बनी रहे।
राष्ट्र प्रदूषित कर डाला है, इन काले अंग्रेज़ों ने,
बिना तपाये क्रान्ति-अग्नि में, ‘राष्ट्र’ शब्द अब शुद्ध न होगा।
युद्ध अभी अवरुद्ध न होगा।। 03।।
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3. नोमान शौक़ रचित ग़ज़ल
छोड़ें मोह और माया अपना मन बहलाएं बस
रोटी, कपड़ा और मकान से बाहर आएं बस
सारे आसन योग के लगवा डाले एक ही दिन
दुनिया हाथ आये तो ऐसा नाच नचाएं बस
राजमहल में ख़ासम-ख़ास की होगी रेलम-पेल
गलियों के नुक्कड़ पर होंगी आम-सभाएं बस
मंदिर दान की पेटी से अल्लाह मियां को क्या
चौकीदार को देखें हम और शोर मचाएं बस
आपके वैभव के आगे है नत-मस्तक संसार
पर्वत की चोटी पर जाएं धूनी रमाएं बस
बच्चे बूढ़े जवान ईंधन हैं सारे सियासत के
घूर रही हैं जेलें, क़ब्रें और चिताएं बस
आप तो शव-आसन भी कुर्सी पर ही कर लेंगे
अपना क्या है आगे आएं पीछे जाएं बस
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4. बाबुषा कोहली रचित कविता
उनके माथे से ख़ून बह रहा है
उनके हाथों से ख़ून बह रहा है
उनकी आँखों से खून बह रहा है
उनके स्वप्नों से खून बह रहा है
उनकी साँसों से ख़ून बह रहा है
उनके शब्दों से खून बह रहा है
वे बच्चे मेरे भी हैं
उनके ख़ून में मेरा खून बह रहा है
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Aab kannon hai unke hath m
Jo chahe kar jaye vo AI k sath m
Ram ram bol kar apna pet ab bhar lo tum
Roti na ayegi ab hisse m in k daam h bhram.
भवेश दिलशाद जी, बहुत बहुत धन्यवाद
आपकी पोस्ट “शायरों का जंतर मंतर” पढ़ी चारों रचनाओं ने दिल को छू लिया।
मुझे “जंतर मंतर” बहुत ही आक्रोशित कर रहा है मेरी तकलीफ उन रचनाओं में दिखी ,लगा कि बहुत लोग हैं जो जंतर मंतर में हो रहे जुल्म से आहत हैं।
जब जब नजर, जुबान और कलम अपना फर्ज भूलते हैं तब तब अहंकारी का अहंकार आसमान छूता है, और उसका “मैं” जब भी “हम” के आत्मसम्मान को ठोकर मरता है “जंतर मंतर” को आगे आना ही पड़ता है।
शर्म तो तब आती है जब हमारे बच्चे लहूलुहान हो रहे हैं, बच्चियों की अस्मिता से खेला जा रहा हो, निहत्थे बच्चों पर बर्बरता की इंतेहा हो और हम चुप है,उनके साथ खड़े नहीं है न ही व्यक्तिगत और ना ही नैतिक रूप से क्योंकि वो हमारे बच्चे नहीं है, हमारे बच्चे सेफ हैं और इसके विपरीत ‘अहंकार’ को बढ़ावा दे रहे हैं
अहंकारी का गुणगान करके।
पर अब वक्त आ रहा है।
कहते हैं जिस पर महादेव की कृपा थी जिसके पास दस सिर थे,नाभि में अमृत था, समय को पैरो में बाँध रखा था उस दशानन का अहंकार ना रहा, उसके “मैं” को भी “हम” ने ख़त्म किया था । बच्चों का समय भी आयेगा,
विजयदशमी आ रही है –