उमराव जान अदा: पतनशील लखनऊ का कष्ट-काव्य

उमराव जान अदा: पतनशील लखनऊ का कष्ट-काव्य               “उमराव जान अदा” एक मशहूर नॉवल है। पहली बार 1899 में प्रकाशित हुआ था। कुछ...

कृष्ण कल्पित की ‘पुरानी धारा’ की नयी करतूत

कृष्ण कल्पित की ‘पुरानी धारा’ की नयी करतूत                साहित्य जगत का मी टू (#MeToo) कांड कहिए या बिग बॉस, लेकिन प्रतिक्रियाओं और...

सेक्युलर, समाजवाद… शब्दों की लाश पर वबाल क्यों?

सेक्युलर, समाजवाद… शब्दों की लाश पर वबाल क्यों?               असल बात नीयत की है। जब संविधान बन रहा था, तब जवाहरलाल नेहरू और...

दॉस्तोएव्स्की के बहाने

दॉस्तोएव्स्की के बहाने           इन दिनों दॉस्तोएव्स्की फिर चर्चा में हैं। उनकी लघुकथा ‘व्हाइट नाइट्स’ ज़ोरों से पढ़ी जा रही है। पिछले सवा-सौ बरसों में दॉस्तोएव्स्की की उपस्थिति हमारे...

शिक्षा नीति को समझें

शिक्षा नीति को समझें            औपचारिक शिक्षा व्यवस्था की पूरी इमारत खड़ी ही इस आधार पर है कि वह नयी पीढ़ी में बदलते समय के अनुकूल क्षमताओं या क़ाबिलियत...

मैं तो दरिया हूं, समंदर में उतर जाऊंगा

मैं तो दरिया हूं, समंदर में उतर जाऊंगा            अहमद नदीम क़ासमी एक हरफ़न-मौला अदीब थे। उनके चाहे अफ़साने देख लीजिए, चाहे गज़ल़ें-नज़्में, पंजाब के देहातों की सुंदर अक्कासी...

कविता, लोकप्रियता और ब्राह्मणवाद-2

कविता, लोकप्रियता और ब्राह्मणवाद-2 …पिछले अंक से जारी             पिछले सत्तर साल से जिसे कविता कहा जा रहा है, उसकी उपस्थिति समाज में शून्य है। और विनोद कुमार शुक्ल...

स्त्री-पराधीनता का प्रामाणिक दस्तावेज़

स्त्री-पराधीनता का प्रामाणिक दस्तावेज़            इन दिनों बुकर पुरस्कार से सम्मानित कन्नड़ लेखिका बानू मुश्ताक़ का कहानी-संग्रह ‘हार्ट लैम्प’ चर्चा में है। बानू मुश्ताक़ कन्नड़ भाषा की जानी-मानी प्रतिष्ठित...

दिलीप कुमार: आवाज़ का जादू

दिलीप कुमार: आवाज़ का जादू          हिंदी फिल्मों के प्रेमी यह जानते ही होंगे कि वर्ष 1957 में ऋषिकेश मुखर्जी ने फ़िल्म ‘मुसाफ़िर’ के साथ अपनी निर्देशकीय पारी शुरू...
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