GD Agrawal, sonam wangchuk, सोनम वांगचुक, जीडी अग्रवाल
देश की दिलचस्पी तो ‘सोनम रघुवंशियों’ में है…! आप शिक्षा जैसे व्यर्थ के मसलों पर क्यों जान देने पर उतारू हैं मिस्टर सोनम वांगचुक?
ए. जयजीत की कलम से....

आप ग़लती कर रहे हैं मिस्टर वांगचुक!

             बायीं ओर की तस्वीर (स्वर्गीय) प्रोफ़ेसर डॉ. जी.डी. अग्रवाल की है। बर्कले की यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया से पीएच.डी. होल्डर और आई.आई.टी. कानपुर में प्रोफ़ेसर रहे डॉ. अग्रवाल ने गंगा को बचाने के लिए आमरण अनशन किया और अनशन करते-करते ही अपने अमूल्य प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। यह वर्ष 2018 की बात थी।

GD Agrawal, sonam wangchuk, सोनम वांगचुक, जीडी अग्रवाल

दायीं ओर की तस्वीर सोनम वांगचुक की है। वांगचुक के बारे में काफ़ी कुछ कहा और लिखा जा चुका है। बी.टेक. इंजीनियर वांगचुक वे नवाचारी हैं, जिनके नाम आज एक भी पेटेंट नहीं है। क्योंकि उनका मानना है कि उनके नवाचार मानवता और पर्यावरण की भलाई के लिए हैं। वे अपने आविष्कारों को कॉमर्शियल बनाने के बजाय ओपन सोर्स रखना पसंद करते हैं, ताकि दुनिया का कोई भी व्यक्ति या समुदाय उनकी इस तकनीक का इस्तेमाल बिना किसी क़ानूनी या आर्थिक पाबंदी के फ़्री में कर सके।

यह लिखने का मक़सद केवल उन सोशल मीडियाई ‘ज्ञानियों’ को यह बताना है कि अनशन पर बैठने वाला कोई भूखा-नंगा आदमी नहीं होता। कम से कम, प्रतिभा के मामले में। कुछ ‘ज्ञानियों’ ने यह भी तर्क दिया था कि वांगचुक कोई नवाचारी नहीं हैं, क्योंकि उनके नाम पर एक भी पेटेंट नहीं है (ऐसे ज्ञानियों पर बस तरस खाइए)।

ख़ैर, यह विषयांतर था। मुद्दे पर आता हूं। जी.डी. अग्रवाल से जो मेरी शिकायत थी, वही सोनम वांगचुक से है। डॉ. अग्रवाल ने बेमतलब में उस गंगा के लिए अपनी जान दे दी, जिसको बचाने का ठेका तो कुछ अन्य लोगों के पास था। करोड़ों-अरबों रुपये डकारने के बाद भी गंगा आज उतनी ही बाधित और मैली है। हम-आप जैसे ‘आम मासूम’ लोगों को तो इसके पर्यावरणीय पहलुओं से न कोई तब मतलब था और न आज। हमें तो बस डुबकी लगाने से मतलब रहा। तो व्यर्थ ही रहा डॉ. अग्रवाल का जान देना।

यही ग़लती सोनम वांगचुक कर रहे हैं। क्या उन्हें पता नहीं है कि इस देश की दिलचस्पी ‘सोनम रघुवंशी’ जैसे मामलों में ज़्यादा है! शिक्षा जैसे मसलों से इस देश के लोगों का क्या लेना-देना? शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण जैसे मसलों पर अगर कोई जान गंवाने के तैयार बैठा है तो यह निरी मासूमियत से कम काम नहीं है (समझें मूर्खता, हालांकि सम्मान के भाव में लिखना नहीं चाहता)। शिक्षा और स्वास्थ्य के माफ़िया पहले से ही इन दोनों क्षेत्रों को अच्छे से संभाल रहे हैं और आम जनता ख़ुश भी है। मेडिकल की पढ़ाई के लिए एक-एक दो-दो करोड़ रुपये देने को तैयार है। तो आप बेमतलब में ‘काज़ी’ क्यों बन रहे हैं?

मिस्टर वांगचुक, यह शिक्षा जैसे बेमतलब के मुद्दों पर भावुक होने का वक़्त नहीं है। सीखिए, हमारे माननीयों से। क़रीब 30 फ़ीसदी माननीयों पर हत्या के प्रयास से लेकर दुष्कर्म तक के गंभीर आरोप हैं (सोर्स-ADR)। भ्रष्ट तो कमोबेश सारे होंगे ही। पर उनके चेहरे पर कोई शिकन आपने कभी देखी है? सबसे बड़ी बात, उन्हें वोट देने वालों को कभी उनसे तकलीफ़ हुई?

पुनश्च… फेसबुक पर पढ़ रहा था- आज़माये हुए को फिर से नहीं आज़माना। मिस्टर वांगचुक, ये शानदार पंक्तियां आपके लिए हैं। और क्या चाहिए आपको? मैं आपकी तरफ़ से कह रहा हूं- “मत आज़माइए हम जैसे लोगों को। आप उन्हीं भ्रष्ट और बलात्कार के आरोपियों को बार-बार आज़माइए। सोनम वांगचुक कोई आज़माने वाली चीज़ नहीं है!”

देश में ‘भगवानों’ पर भरोसा लगातार बढ़ रहा है। अच्छी बात है। बनाये रखिए। यही बचाएगा!

ए. जयजीत

ए. जयजीत

27 वर्षों से हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल तीनों माध्यमों में और रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क पर कार्य करने का लंबा अनुभव। ये अपने आप को व्यंग्यकार भी मानते हैं। प्रमाण-स्वरूप 'पाँचवाँ स्तंभ' नाम से व्यंग्य संग्रह भी प्रकाशित करवा चुके हैं। अनुवाद इनकी वर्क प्रोफ़ाइल का हिस्सा होने के साथ-साथ शौक़ भी रहा। स्टीव जॉब्स की ऑफ़िशियल बायोग्राफी ‘स्टीव जॉब्स’ (वॉल्टर आइज़ैक्सन) के हिंदी अनुवाद का श्रेय इन्हीं को है। कुछ और पुस्तकों का अनुवाद भी कर चुके हैं।

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