
- July 15, 2026
- आब-ओ-हवा
- 13
पाक्षिक ब्लॉग भवेश दिलशाद की कलम से....
बशीर बद्र, मैं और वो क़िस्से...
कहूं किस तरह मैं कि वो बेवफ़ा है
मुझे उसकी मजबूरियों का पता है
ख़ुमार साहब का यह शे’र और बशीर बद्र साहब का बड़ा पॉपुलर शे’र ‘यूं कोई बेवफ़ा नहीं होता’, मुझे अक्सर सोचने पर मजबूर करते रहे कि ये माजरा क्या है? क्या यह चर्बा है? इस सवाल के जवाब में कोई हां की तरफ़ है कोई न की। हां या न से अलग क्या इसका जवाब कुछ और हो सकता है? ख़ुमार साहब ने अगर पहले कह दिया तो, बाद में बशीर बद्र साहब ने इसी बात को शे’र में क्यूं कहा होगा?
एक वाक़या बताता हूं शायद बद्र साहब की सोच-समझ का कोई सुराग़ मिले। 1997 में एक फ़िल्म आयी थी ‘बॉर्डर’। उसमें जावेद अख़्तर के लिखे गाने भी बड़े मशहूर हो गये थे। ग़ालिबन 1998 की बात है, डॉक्टर साहब बोले, “भवेश एक शे’र कहा है, ज़रा बताओ क्या राय है:
मुझे तुमसे मुहब्बत हो गयी है
ये दुनिया ख़ूबसूरत हो गयी है”
मैं तब फ़िल्मी गानों का बड़ा शौक़ीन था। चौंक गया। मुझे लगा डॉक्टर साहब को फ़िल्मों से क्या वास्ता इसलिए इसे अपना शे’र समझ रहे हैं। “एक गाना है बॉर्डर फ़िल्म में, जावेद साहब ने लिखा है, उसके बोल हैं: हमें जबसे मुहब्बत हो गयी है… दूसरा मिसरा एकदम वही है। क्या आप इसे अब भी अपना शे’र कहेंगे? यह चोरी का शे’र नहीं कहा जाएगा?”
हुज़ूर ने फ़रमाया, ‘यही तो मैं साबित करना चाहता हूं, अब कोई ‘आय लव यू’ लिखकर उसके नीचे अपना नाम कैसे लिख सकता है? जो बात सदियों से कही जा रही है, सदियों कही जाती रहेगी, कोई एक शायर उस मिसरे पर अपना हक़ आख़िर कैसे जमा सकता है? मिसरा चुराना तो दरअसल ये हुआ, नहीं!”

डॉक्टर बशीर बद्र से हासिल दर्स और ग़ज़ल की बारीकियों की बातें करना तो क्लासरूम टॉक्स जैसा हो जाएगा। इसलिए मैं यहां वो बातें करना चाहता हूं, जो मेरे और उनके बीच बनते और मिटते रहे रिश्ते से जुड़ी रहीं और शायरी के चाहने वालों के लिए किसी मतलब की भी हों।
उनकी बातें तब सुनकर कभी-कभी तो लगता कि मीर या ग़ालिब होना बड़ी बात नहीं है। यहां तक भी कि इन दोनों से बड़ा शायर होना मुमकिन भी है और बहुत मुश्किल भी नहीं। मैं ख़ुद को मन ही मन भरोसा दिलाता कि एक रोज़ यह कारनामा मैं डॉक्टर साहब को कर दिखाऊंगा। कुछ वक़्त बाद ही मंज़र भाई का यह शे’र पढ़कर तो यह इरादा और पक्का हो गया था:
कह दो मीरो-ग़ालिब से हम भी शेर कहते हैं
वो सदी तुम्हारी थी ये सदी हमारी है
अब कुछ याराने-ग़ज़ल कहते हैं, “यार हमें यक़ीन है अब कोई मीर या ग़ालिब तो हो नहीं सकता, जो ऐसा मान रहा है उसकी ख़ुशफ़हमी पर क़ुर्बान न हुआ जाये तो भला क्यूं!” मैं अब भी पसो-पेश में रहता हूं कि डॉक्टर साहब ने जो मासूमियत दी थी, उसे संभाले रखूं या उठाकर कहीं फेंक दूं!
डॉक्टर साहब बातचीत में ग़ालिब के सामने मीर को बड़ा शायर बतलाया करते थे और फिर इन दोनों के सामने ख़ुद को। उनका ढंग ऐसा होता कि बालिग़ होने से ऐन पहले की उम्र का लड़का उन पर यक़ीन न करने का कोई बहाना न खोज पाता। इस तरह के दावे करने की उनकी पेशकश कमाल की होती थी। उस लड़के को ऐसा लगता कि इस दौर में शायरी के अजूबे के सामने वह खड़ा है और उसे एक दिन इससे भी बड़ा अजूबा बन जाना है। इस हसरत की वजह भी डॉक्टर साहब के ये अल्फ़ाज़ होते कि “अब ग़ज़ल का मुस्तक़बिल उस शायर से मंसूब है, जो हिंदी के बैकग्राउंड से आएगा उर्दू के नहीं”।
अपनी शायरी को पॉपुलर बनाने की उनकी कोशिशों की बातें भी याद आती हैं। बाद के बरसों में वाते साहब डॉक्टर साहब से मिली सीख के तौर पर बताते कि हर शे’र को अपने बच्चे की तरह सबके सामने पेश करना होता है, खड़ा करना होता है फिर उसका अपना मुक़द्दर। उस नौजवान भवेश (जो तब ‘दिलशाद’ न हुआ था) से डॉक्टर साहब कहते थे कि शायर वो मां है जिसके सैकड़ों, हज़ारों बच्चे हैं और उसे पता होता है कौन-सा बच्चा किस लायक़ है इसलिए मां समझती है किस बच्चे को किस तरह पालना है।
हज़ारों शेर मेरे सो गये काग़ज़ की क़ब्रों में
अजब माँ हूँ कोई बच्चा मिरा ज़िंदा नहीं रहता
1985 में अपने ग़ज़ल संग्रह ‘आमद’ के लिए पेशलफ़्ज़ के तौर पर डॉ. साहब ने जो ख़त लिखा था ‘2035 के पढ़ने वालों के नाम’, उसमें किये गये दावों को लेकर वह 15 साल बाद भी उतने ही उत्साहित और मो’तबर दिखा करते थे। नौजवान भवेश को उन दावों पर यक़ीन दिलाने के लिए पुरज़ोर कोशिश करते हुए।
दरसअल, मेरी यादों में डॉ. साहब की आवाज़ है, उनका मुस्कुराता हुआ चेहरा है और उनकी वह तसल्लीबख़्श हथेली भी, जो मेरे सर को सहला दिया करती थी। उनकी न जाने कितनी ही बातें हैं, उनके न जाने कितने क़िस्से हैं और न जाने क्या-क्या… उनकी ज़ुबान से मैंने उन मिसरों को सुना, जो वो बस तभी कह रहे होते थे, मसलन:
नफ़रत को मुहब्बत का इक गीत सुनाता हूं
मैं लाल पिसी मिर्चें पलकों से उठाता हूं
फिर एक वक़्फ़ा आया जब पापा (कीर्तिशेष श्री कमलकांत सक्सेना) द्वारा संपादित ‘साहित्य सागर’ के लिए मैं उनकी ताज़ा ग़ज़लें ले आता था। पापा बताते थे जब वह मेरठ से भोपाल आये थे तब, भोपाल में बसने में उनकी मदद पापा ने बतौर पत्रकार की थी, लेकिन पापा को शिकायत थी कि बशीर बद्र साहब ने उस मदद को ठीक से याद न रखा। मैंने जब उनसे पापा का ज़िक्र किया तब उन्होंने पहचाना तो था लेकिन बात को टाल देना ही ठीक समझा था।
डॉक्टर साहब की मुझसे मुहब्बत यह भी थी कि मेरे एक इसरार पर कुछ एक किताबों के पेशलफ़्ज़ लिखने को राज़ी हो गये थे। मुझे याद है मैं शंकर सक्सेना जी को उनके घर लेकर गया था। शंकर जी ने उन्हें अपने कुछ शे’र सुनाये और डॉक्टर साहब ने उनके मुंह पर कहा था, “भवेश आपको लाया है, मैं आपके लिए ज़रूर लिखूंगा बस मुझे नागरी नहीं आती, उर्दू रस्मुलख़त में ही दूंगा।”
उनसे लगातार मुलाक़ातों का वह दो-ढाई बरसों का दौर मेरी शायराना ज़िंदगी का सरमाया है। वह डॉक्टर बशीर बद्र ही थे, जिन्होंने मुझे शायरी के उस्ताद तक पहुंचाया। “तुम स्वामी जी से मिलो, वह हमारे भी उस्ताद हैं, उनसे सीखो ग़ज़ल..”। अगले रोज़ मुझे पता चला कोई स्वामी श्यामानंद सरस्वती ‘रौशन’ हैं, उनकी शायरी की किताब आयी है और उसका इजरा डॉ. साहब करेंगे। यह भी पता चला कि स्वामी जी ने वह किताब डॉ. साहब को ही समर्पित की थी। बस उसके अगले रोज़ मैं स्वामी जी की शरण में था। इसके बाद उन्होंने मुझे बाक़ायदा शागिर्दी में लेकर ग़ज़ल कहने के कुछ उस्लूब सिखाये, समझाये और मैं नादान पता नहीं क्या, कितना जान सका… हां, स्वामी जी ने ही मुझे ‘दिलशाद’ बना दिया। इस क़िस्से को जाने देते हैं, फिर बात करते हैं डॉ. साहब की।
21वीं सदी आने को थी या शायद आयी-आयी ही थी। डॉक्टर साहब की एक किताब कलेक्टर्स एडिशन के रंग-रूप में आयी थी। भारी-भरकम, सजी-धजी और ख़ासी महंगी किताब। एक पन्ने पर सिर्फ़ एक शेर पूरी साज-सजावट के साथ तीन लिपियों में दर्ज और शायद उसका अर्थ या अनुवाद भी। ऐसे दर्जनों बल्कि शायद दो सौ से भी ज़ियादा अशआर उस किताब में थे… ख़ैर, इस किताब को लेकर जब बात हुई तब, मुझे याद है अपने किसी इंटरव्यू में दिये बयानों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा था, हिंदोस्तान के किसी उर्दू शायर को नोबेल पुरस्कार मिलने का सही वक़्त आ गया है।
मुझे नहीं पता वह इस तरह की कोशिशें कर रहे थे कि नहीं, कर रहे थे तो किस तरह लेकिन उनके दिल में कहीं यह हसरत ज़रूर थी कि वह ऐसा कारनामा करें।
इन हसरतों के बीच, उनके किरदार का एक और पहलू मुझ पर खुला। अचानक यह बात वो अक्सर बताने लगे कि अटल जी के साथ उनके दोस्ताना रिश्ते कितने गहरे हैं। और जल्द ही नयी सदी में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी से नाता जोड़ लिया। ज़रा-से वक़्फ़े में ही उर्दू अकादमी के प्रमुख हो गये। मुझसे अपने ख़ास नाज़-ओ-अंदाज़ के साथ कहते, “अटल जी ख़ुद भी शायर हैं, लेकिन सरकारी पोस्टर के लिए उन्हें मेरे शे’र से बड़ी शायरी अपने बयाज़ में भी नहीं मिली”। माजरा यह था कि दंगों के बाद सरकारी प्रचार में उनका एक शे’र कोट किया गया था:
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में
हालांकि वह बीजेपी जॉइन करने को लेकर बहुत बातें नहीं करते थे। उन दिनों मैं भी पत्रकारिता के पेशे में आ गया था, तो हमारे बीच इस तरह की बातें जो पहले खुलकर हो जाया करती थीं, कम होने लगी थीं। तब मंज़र भोपाली और उनके बीच एक विवाद भी हो गया था, जिसे मैंने अख़बार के लिए रिपोर्ट किया था। दोनों के बीच तनातनी के पीछे बताया जाता था मंज़र भाई की हसरत भी उर्दू अकादमी थी और इसलिए वह भी बीजेपी के हलक़ों में उभरता नाम थे, लेकिन बाज़ी डॉक्टर साहब ने मार ली थी। अब सच्चाई क्या थी, किसे पता! पर उन दिनों अदबी और अख़बारी हलक़ों में क़िस्से कम नहीं थे।
डॉक्टर साहब ने अपने ढंग की शायरी की, शायरी के लिए अपने ढंग से बातें कीं और अपने ही ढंग की शख़्सियत भी तामीर की। उनके ढंग को बड़बोलापन कहने वाले आलोचकों की तादाद अच्छी-ख़ासी तब भी थी, अब भी है। भोपाल के एक व्यंग्यकार ने पिछले दिनों बातचीत में बताया कि उन दिनों उन्होंने अख़बार में लिख दिया था:
कुछ तो मजबूरियां रही होंगी
यूं कोई भाजपा नहीं होता
या फिर मिज़ाह के शायर साग़र ख़य्यामी साहब का खुलेआम बशीर बद्र साहब का मख़ौल उड़ाना कौन भूल सकता है। बशीर बद्र साहब जब बीती 28 मई को फ़ानी दुनिया से शरीरी तौर से रुख़सत हो गये, उसके बाद एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगा, जिसमें साग़र साहब यह बताते हैं कि कैसे ग़ालिब और अन्य असातिज़ा के अशआर से बशीर बद्र ज़मीनें उठाते थे। मसलन डॉ. साहब का बड़ा प्रसिद्ध शेर है:
कुछ तो मजबूरियां रही होंगी
यूं कोई बेवफ़ा नहीं होता
साग़र साहब इस शे’र की ज़मीन ग़ालिब के उस शे’र को बताते हैं:
हुई ताख़ीर तो कुछ बाइस-ए-ताख़ीर भी था…
साग़र साहब को मुंबई में एक महफ़िल में मैंने सुना था, जिसमें उन्होंने बशीर बद्र पर चार मिसरे पढ़ दिये थे और पूरी महफ़िल ठहाकों में बह गयी थी। 2009 की बात है, एक अदबी गुफ़्तगू में उन चार मिसरों के बारे में मैंने जब ईशान भाई से ज़िक्र किया तो उन्होंंने फ़ौरन अपने पिता ओम प्रभाकर साहब को फ़ोन मिलाया और मेरी बात करवा दी। फ़ोन पर मैंने उन्हें इन मिसरों के बारे में बताया तो वह भी एक क़हक़हा लगाने से ख़ुद को रोक नहीं सके।
है तअल्लुक़ कबीर के घर से
रिश्ता रखते हैं मीर के घर से
डाका ग़ालिब के घर पड़ा साग़र
माल निकला बशीर के घर से
डॉ. बशीर बद्र के दावे यक़ीनन हैरत में डाल देते थे। जैसे वो कहते थे कि उनसे पहले अंग्रेज़ी के अल्फ़ाज़ ग़ज़ल में सलीक़े से नहीं आये या फिर यूं भी कहते कि ऐसे कई लफ़्ज़ तो वो ही लेकर आये। एक लफ़्ज़ मुझे याद आता है ‘गिलास’, जिसे वो इस तरह की बातचीत में बतौर दलील और हम नौजवानों के सामने बतौर सबक़ भी पेश किया करते थे। बहुत बाद के बरसों में मैंने सुरूर जहानाबादी (1873-1910) का शेर पढ़ा:
बजाय मय दिया पानी का इक गिलास मुझे
समझ लिया मेरे साक़ी ने बद-हवास मुझे
कभी यूं भी कहते थे कि जदीद शायरी को इज़ाफ़त से किनारा करना होगा। हालांकि बाद में मैंने उनके वो अशआर देखे, जिनमें इज़ाफ़त है। शायद वो उनके शुरूआती दौर के रहे हों। कोई उन्हें कैसेटों और गवैयों का शायर कहता तो कोई मुशायरेबाज़ शायर भी…
21वीं सदी के शुरूआती बरसों की ही बात है, मैं सुना करता था बशीर बद्र साहब तड़प-तड़पकर रह गये कि उर्दू अदब के दो बड़े आलोचकों ने उनकी शायरी पर क़लम न उठाया। दूसरी तरफ़, मुज़फ़्फ़र हनफ़ी साहब ने ‘बशीर बदरम’ लिखकर हंगामा खड़ा करने में कसर न छोड़ी। हनफ़ी साहब के बारे में बात करते हुए मेरे कानों ने डॉक्टर साहब के बोलों की कड़वाहट चखी थी… तो डॉक्टर साहब ऐसे शायर थे, जिन्हें चाहने वाले समकालीन भी कम न थे और नापसंद करने वाले समकालीन भी।
मेरा ख़याल है एक कामयाब शायर होने का एक सबूत यह भी है। उनका किर्दार, उनकी बातें जैसी भी रही हों, उन्होंने यक़ीनन वो शायरी की, जो बरसों अपनी गूंज रखेगी।
चाय की प्याली में नीली टेबलेट घोली
सहमे-सहमे हाथों ने इक किताब फिर खोली
डॉक्टर बशीर बद्र की इस या ऐसी चंद ग़ज़लों से आप गुज़रेंगे तो जाने क्या समझेंगे और क्या सोचेंगे! इनसे क्या मतलब निकालेंगे और वाक़ई ये शे’र खुल पाएंगे या नहीं! मुमकिन है पहेली बनकर रह जाएं ऐसे शे’र लेकिन मुझे लगता है डॉक्टर साहब ने प्रयोग करने की हिम्मत बहुत दिखायी, कहीं वह पास हुए या कहीं भले ही फ़ेल हो गये हों लेकिन उन्होंने उस डर और हिचक से काम नहीं लिया कि लोग क्या कहेंगे? मुझे कैसे याद किया जाएगा?
बेशक वह यादों में रह जाना चाहते थे। “यह देखो इंदिरा गांधी ने मेरा शेर पढ़ा था… यह वाला देखो फ़लां ने कोट किया था…”। उनकी यादों का अपना संसार था। तक़रीबन हर हफ़्ते जब मैं उनके घर जाया करता था, न जाने कितने ही अख़बारों की कटिंग्स की फ़ाइलें चाव से दिखाते, कितनी ही तस्वीरें और न जाने कितने ही काग़ज़ात, जो अपनी शायरी की बुलंदी के दस्तावेज़ के तौर पर उन्होंने सहेजे हुए थे…
फिर एक दौर आया अभी 10-15 बरस पहले का वक़्त, जब यही डॉक्टर साहब भूलने के रोग के शिकार हो गये। वो शख़्स जो अपनी शायरी से जुड़ी एक-एक कतरन को बतौर याद संभाले था, अपने होने का सबूत माने था, अपने ही शे’र, अपने ही मिसरे भूल बैठा। क़ुदरत क्या सिर्फ़ मज़ाक़ करती है? क्या उसके पास वाक़ई कोई इंसाफ़ नाम की शय है भी?

ये सवाल तब फिर उठ खड़े हुए, जब एक हादसा 11 जून 2026 को हुआ। हिंदी कवि के रूप में सम्मान पा रहीं मेरी मां, आशा सक्सेना जी मंदिर में दीया जलाते हुए आग की चपेट में आ गयीं। बरसो-बरस दीये जलाती रहीं, मंदिर जाती रहीं और मंदिर में ही, एक दीये ने ही उन्हें… 27 दिन अस्पताल में ‘आशा’ की तरह जूझती रहीं लेकिन 08 जुलाई 2026 की सुबह उनकी सांसें बुझ गयीं। वो हमारे भीतर हमेशा गूंजती रहेंगी, धड़कती रहेंगी पर इन 27 दिनों में दिल पर क्या कुछ न गुज़रा…
सब साध मंत्र जाप कहीं जी को खल न जाये
एक उम्र आँख में रहा आंसू निकल न जाये
उसने दिये जलाने में एक उम्र फूँक दी
आख़िर में उसको गहरा अंधेरा निगल न जाये…
ये शेर मैंने 22 जून को कहे, जब वह वेंटिलेटर, आइसीयू जैसे मुश्किल दौर से गुज़र रही थीं। और आख़िरकार इन शे’रों का अंजाम क्या हुआ?
सब साध मंत्र जाप मेरे जी को खल गया
एक उम्र आँख में रहा आंसू निकल गया
उसने दिये जलाने में एक उम्र फूँक दी
आख़िर में उसको गहरा अंधेरा निगल गया
बिस्तर पे एक ओर है साँसों का ज़ोर-शोर
करवट बदल गयी कि ये विश्वास छल गया
तूफ़ान झेल जाने की क़ायल रही है नाव
इस बार मॉनसून में काग़ज़ ये गल गया
तड़पाये अब ज़रा भी न तकलीफ़ तुमको और
नन्ही सी एक चाह से ये दिल दहल गया
पत्थर के देवताओं से क्या कीजिए सवाल
पूजा के एक दीप से मंदिर ही जल गया
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पूजा के एक दीप से ही मंदिर जल गया
आह
अल्लाह उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे
बहुत बढ़िया आलेख है। संस्मरण लिखने की यह शैली ही बहुत खा़स है। तटस्थ भाव से डाॅ बशीर बद्र की शायरी की सराहना आलोचना,समीक्षा और खूबसूरती सभी कुछ सहज रूप से बयां हुई है। पूरे संस्मरण के उपसंहार में जिस तरह से आपने आशा जी को याद किया है वह दिल को छूने वाला है।
शुक्रिया अशोक जी
उस्ताद ए मोहतरम डॉक्टर बशीर बद्र साहब का जहां ज़िक्र हो जी करता है ये सिलसिला ख़त्म ही न हो और में सुनता जाऊं , भावेश “दिलशाद” साहब आप की उनसे मुलाक़ाते उनसे बातों का जो ख़ज़ाना आप की यादों में बसा था आपने उसे काग़ज़ पर उतर कर एक क़ीमती दस्तावेज़ बना दिया , में आप आपका इसके लिए शुक्रगुजार हूं,
आप की वालिदा मजीद का अपने भगवान को खुश करने की कोशिश में जो हादसा हुआ यह भगवान ही जाने मगर उनकी तकलीफों के साथ जाना दिल को गहराइयों तक दुख से भर गया , ईश्वर उन्हें मोक्ष और आप सब को सब्र अता करे , आमीन
शुक्रिया जनाब
शानदार संस्मरण है
waah bahut khoob
आज पहली बार लिंक ओपन कर आपके ब्लॉग को पढा , और मन सच में द्रवित हो गया। माँ को दर्द में देख पाना सच में उनके बच्चों के लिए बहुत कष्टदायी होता है। यह पीड़ा आपके लेखनी के माध्यम से मैंने भी महसूस की।
माँ की पुण्यात्मा को महादेव शांति प्रदान करें। और पूरे परिवार को इस असीम दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करें।
शुक्रिया जी
पूजा के एक दीप से मंदिर ही जल गया।
नियति को इतना भी कठोर नहीं होना था, पर क्या ही कहें जो नही होना होता, हो जाता है। ये लफ़्ज़ तो दर्द की एक झलक भर हैं। माँ की मधुर यादें इस दर्द से झुलसकर कितनी तकलीफ़ देंगी हम समझ सकते हैं। उनकी आत्मा को शांति मिले।
हां एक लंबी ख़ामोशी का दौर है इसके आगे, न जाने कहाँ तक…
▪️ मित्र जैसे गुरु, ऐसे नाज़ुक रिश्ते की नज़ाकत और गर्माहट के बीच बीते खास पलों के वर्णन ने यादों को चित्रमय बना दिया है। बातचीत की शैली ने खूब रंग जमाया है। संस्मरण इसलिए भी बेहतरीन है कि अच्छाइयों के साथ मानवीय पहलुओं की कमजोरियों को भी ईमानदारी व बड़ी आत्मीयता से दिखाया है।
▪️और अंत में दुख में झुलसे दिल से निकले शेर हैं,इनके पीछे के दर्द को समझकर बहुत दुख होता है —
तड़पाये अब जरा भी न तकलीफ तुमको और,
नन्ही सी एक चाह से ये दिल दहल गया।।
आपसे पढ़ने वाला मिले तो कौन न लिखता रहे..