
- April 28, 2026
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शख़्सियत को जानें अनिता मंडा की कलम से....
ओपी नैयर: अधूरी मगर भरपूर कहानी
लय और ताल के बादशाह जिन्हें ‘रिदम किंग’ भी कहा जाता है, ओ.पी. नैयर के संगीत की पहचान उनका एक ख़ास रचाव ज़रूर रहा, लेकिन उनके संगीत में विविधता ख़ासा चौंकाती रही है। एक ख़ास क़िस्म का चुलबुलापन और सबसे ज़रूरी तत्व कर्णप्रियता। पंजाब की लोक-धुनें, देशी शास्त्रीय संगीत और विदेशी सिम्फ़नियों का मिश्रण जादू बिखेरता है, तो श्रोता झूमने पर मजबूर हो जाते हैं। यह जादू 73 फ़िल्मों में बिखेरा नैयर साहब ने। गानों में एक ख़ास तरह का पंच देना नैयर साहब की अदा बन गयी। उनके दीवाने उनकी इस अदा पर फ़िदा रहे।
पुकारता चला हूँ मैं गली-गली बहार की – मेरे सनम
जाइए आप कहाँ जाएंगे ये नज़र लौट के फिर आएगी – मेरे सनम
आइए मेहरबाँ – हावड़ा ब्रिज
लाखों हैं निगाह में – फिर वही दिल लाया हूँ…
कितने ही ऐसे गीतों की सरिता है, जिनमें श्रोता बहता चला जाता है। ऐसे गीत, जो रूह में उतर जाएं। एक क़िस्म की पाकीज़गी ओ.पी. के संगीत में महसूस होती है। इस संगीत में एक ठंडक है, आँखें मूँदकर सुनते हैं तो आप ख़ुद को पहाड़ों की सैर करता हुआ-सा महसूस करते हैं।
शम्मी कपूर की अदायगी, मोहम्मद रफ़ी साहब की आवाज़ और ओ.पी. नैयर साहब की धुनें… तीनों मिलकर जो करिश्मा रचते हैं, दर्शक व श्रोता आज भी झूमने पर मजबूर हो जाते हैं। ‘कश्मीर की कली’ – 1964 के गाने – ‘इशारों-इशारों में’, ‘है दुनिया उसी की’, ‘दीवाना हुआ बादल’ – इसी तरह का जादू रचते हैं, एक मदहोशी तारी हो जाती है।
नैयर साहब की पैदाइश 16 जनवरी 1926 की लाहौर की थी। लाहौर छोड़ने को याद करते हुए वे एक इंटरव्यू में कहते हैं – ‘मैं नवम्बर के महीने में पाकिस्तान से अमृतसर आया। मेरी लाहौर छोड़ने की कोई तमन्ना नहीं थी। बहुत दुखी था कि जहाँ पैदा हुआ, पढ़ा-लिखा, तालीम पायी, वो मुझे छोड़ना पड़ा।’ बचपन की त्रासदियों को याद करते हुए कहते हैं, ‘बचपन में बहुत तकलीफ़ें देखीं, बीमारियां झेलीं, सख़्त माता-पिता के अनुशासन ने विद्रोही बना दिया।’
संक्षेप में फ़िल्मी सफ़र
बैरिस्टर, इंजीनियर, डॉक्टर वाले परिवार में जन्म हुआ लेकिन नैयर साहब की तबीयत पढ़ाई में कहां थी। एक गायक बाल कलाकार के तौर पर लाहौर ऑल इंडिया रेडियो, लाहौर से ब्रॉडकास्ट किया करते थे। म्यूज़िक टीचर की नौकरी भी की। यहीं से सरोज मोहिनी जी हमसफ़र बनीं। यहीं से बतौर संगीतकार यात्रा का आगाज़ हुआ। ‘प्रीतम आन मिलो’ – गीत; जिसे सरोज जी ने लिखा था, संगीत ओ.पी. जी ने दिया था, सी.एच. आत्मा ने गाया था। पर इससे ओ.पी. को पहचान नहीं मिली। सी.एच. आत्मा को ही प्रसिद्धि मिली। ओ.पी. फ़िल्मों में तक़दीर आज़माने मुंबई आये थे लेकिन स्क्रीन टेस्ट से उन्हें यह अंदाज़ हो गया कि भले ही वो आकर्षक दिखते हैं लेकिन एक अभिनेता वाली बात नहीं है। उन्होंने फ़ैसला करने में को देरी नहीं की कि उन्हें संगीतकार ही बनना है। कनीज़ (1949) फ़िल्म में बैकग्राउंड म्यूज़िक उन्होंने दिया पर इससे भी कोई ख़ास बात नहीं बनी।
1952 में आसमान फ़िल्म से उनके लिए दरवाज़े खुलने लगे। पर पहचान मिली गुरुदत्त साहब की फ़िल्मों से। ‘आर-पार’, ‘बाज़ी’, ‘मिस्टर एन्ड मिसेज-55’, ‘सी.आई.डी.’ जैसी फ़िल्मों से नैयर साहब का जादू सर चढ़कर बोलने लगा। ‘आसमान’ में गीता दत्त से गाने गवाये। गीता दत्त के ज़रिये ही गुरुदत्त से मिलना हुआ। और शुरूआत हुई गुरुदत्त-ओ.पी. नैयर की जोड़ी की।

बीबीसी संवाददाता रेहान फ़ज़ल लिखते हैं:- “नैयर को नज़दीक से जानने वाले और इस समय दुबई में रह रहे सिराज ख़ाँ बताते हैं, ‘गीता दत्त ने ओ.पी. की ये कहते हुए अपने मंगेतर गुरुदत्त से सिफ़ारिश की थी कि ये संगीतकार एक दिन बहुत ऊपर जाएगा। इसके बाद की घटनाएं इतिहास हैं। गुरुदत्त अक्सर अपनी निजी बातें भी मुझसे साझा किया करते थे”।
उनकी पत्नी गीता दत्त और उनकी प्रेमिका वहीदा रहमान दोनों ने उन्हें आख़िरी में छोड़ दिया था और वो अपने आख़िरी दिनों में काफ़ी परेशान थे। उनकी मौत पर अपने स्वभाव के अनुसार ओ.पी. नैयर ने गीता दत्त और वहीदा रहमान को उनके शव के सामने ही खरी-खोटी सुनायी थी। ओ.पी. नैयर से जब भी मेरी बात होती थी, गुरुदत्त का ज़िक्र हर थोड़ी देर बाद आ जाया करता था।”
ख़ास धुनों का एक दौर
गुरुदत्त की फ़िल्मों के लिए नैयर ने एक से बढ़कर एक गाने रचे। ‘बाबूजी धीरे चलना…’, ‘कभी आर कभी पार लागा तीर-ए-नज़र…’, ‘ये लो जी मैं हारी पिया…’, ‘जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी…’, ‘ठंडी हवा काली घटा…’, ‘उधर तुम हसीं हो…’ हर तरफ़ नैयर साहब के संगीत ने ही धूम मचा रखी थी।
गीता दत्त, शमशाद बेगम, आशा भोंसले और रफ़ी साहब ने नैय्यर के गानों को अमर करने में कोई कसर न छोड़ी। आशा जी की वेरिएशन भरी आवाज़ की मिठास को नैयर के संगीत ने कई रंग दिये। 1958 से 1972 तक 14 वर्ष में आशा जी के मेंटॉर और संगीतकार रहे नैयर ने उनके करियर को नयी ऊंचाई दी। नैयर के संगीत में और भी कई ख़ास बातें थीं, शकील खान लिखते हैं:
“मेरी दुनिया लुट रही थी और मैं ख़ामोश था, टुकड़े-टुकड़े दिल के चुनता किसको इतना होश था… यह फ़िल्म मिस्टर एण्ड मिसेज़-55 का एक सैड सांग है, इसे क़व्वाली के रूप में पेश किया गया है। गीत के बोल और धुनें एक-दूसरे से बिल्कुल विपरीत हैं। तालियों की थाप के बीच में क़व्वाली की धमक वाला संगीत है, तो दूसरी तरफ़ गीत के बोल दिल के टुकड़े होने की गवाही दे रहे हैं। ऐसा विरोधाभासी संगीत हर कोई नहीं रच सकता।”
शकील यह भी लिखते हैं:
“हावड़ा ब्रिज के एक गाने को भी याद किया जा सकता है। वो भी ‘नज़र’ की तरह नशीला गीत था ‘आइए मेहरबां, बैठिए जानेजां’ इस गीत का तो फ़िल्मांकन भी कमाल का था। अशोक कुमार, मधुबाला और केएन सिंह पर फ़िल्माये गये इस गीत में मधुबाला सिर्फ़ एक जगह खड़े होकर गीत गाती हैं और अपने चेहरे के हाव-भाव भर से मदहोश कर देती हैं, इसमें मधुबाला के चेहरे के भावों को जगाने में संगीत बड़ी भूमिका निभाता है।”
भारतीय फ़िल्मी संगीत को जो मस्ती, शोख़ी, चंचलता ओ पी से मिली उसने फ़िल्मी संगीत का मिज़ाज़ ही बदल दिया। ‘उड़ें जब जब जुल्फ़ें तेरी- के बांके दिलीप की छवि हो या ‘पुकारता चला हूँ’ के मचलते शम्मी, ‘आइये मेहरबाँ’ की मधुबाला इन सबकी अदाओं में शोख़ी भरने का काम किया ओ पी के सुरों ने। ‘कजरा मुहब्बत वाला’ पर आज भी हर शादी ब्याह में लगते हैं। ‘एक परदेसी मेरा दिल ले गया’ की मिठास से दिल धड़कते। ‘कभी आर कभी पार’ ‘यह देश है वीर जवानों का’ दिलों में जोश भर देता है। ‘तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला’ की दार्शनिकता ओ.पी. के सुरों ने अमर कर दी।
प्रयोग और विविधताएं
ओ पी अपने संगीत में तरह-तरह के प्रयोग करते थे। घोड़ों की टापों, तालियों की थापों के साथ पियानो, सारंगी, घुंघरू, सितार आदि की अलबेली संगत उनके यहां थी। ‘यूँ तो हमने लाख हसीं देखे हैं’, ‘मांग के साथ तुम्हारा’ जैसे कितने ही गीत याद कीजिए तो एकदम से याद आएगा कि तांगे के चलने से आने वाली आवाज़ की रिदम जैसा संगीत उनका एक ख़ास पैटर्न बन गया था। यह इतने गानों में सुनायी दिया कि श्रोताओं ने उनके गीतों को एकदम से पहचानना शुरू कर दिया।
जिस समय ओ.पी. भारतीय सिनेमा संगीत जगत में आये; शंकर-जयकिशन का संगीत उस समय लोकप्रिय था। जब ओ.पी. का संगीत लोगों के दिलों पर छाने लगा तो इसका सीधा असर शंकर-जयकिशन पर पड़ा। असल में ओ.पी. ने कहीं से संगीत की विधिवत शिक्षा नहीं ली थी। वे वाद्य-यन्त्रों के साथ ही ध्वनियों के लिए अनेक तरीक़े इस्तेमाल करते थे। ख़ैर उनके स्टाइल पर तंज़ करते हुए शंकर-जयकिशन ने ‘लव-मैरिज'(1959) फ़िल्म में एक गाना दिया, ‘टीन कनस्तर पीट-पीटकर गला फाड़ चिल्लाना’…
शंकर-जयकिशन की इस हरकत को ओ.पी. ने चुनौती की तरह स्वीकार किया। 1960 में ‘कल्पना’ फ़िल्म में मोहम्मद रफ़ी और मन्ना डे से ‘राग-ललित’ में एक गीत उन्होंने गवाया, ‘तू है मेरा प्रेम देवता’… ओ.पी. ने साबित कर दिया कि भले ही उन्होंने संगीत की विधिवत शिक्षा न ली हो, संगीत की उनकी समझ में कहीं कोई कमी नहीं है।
नैयर के ‘अहम’ क़िस्से
फ़िल्मी संगीत में ख़ास पहचान रखने वाले ओमकार प्रसाद मदनगोपाल नैयर के क़िस्से भी बहुत फ़िल्मी और ख़ास हैं। 1952 से 1958 के कम अरसे में ही वे कामयाबी व प्रसिद्धि की दहलीज़ छू गये। लिहाज़ा एक क़िस्म का अक्खड़पन, ज़िद और ईगो भी उनके स्वभाव में आ गया। इस वजह से उनकी अनबन अपने समय के कलाकारों के साथ होती रही।
एक बार तो वे अपने प्रिय गायक रफ़ी से मात्र इस बात पर नाराज़ हो गये कि समय के पाबन्द ओ.पी. के पास रिकॉर्डिंग के लिए रफ़ी साहब एक घण्टे देर से पहुँचे। देरी का कारण था शंकर-जयकिशन के यहाँ रिकॉर्डिंग में समय ज़्यादा लग जाना। जैसे ही ओ.पी. को वजह पता लगी, उनका मूड ऑफ़ हो गया। रफ़ी साहब से चिढ़कर बोले- ‘अब उनके लिए ही गाना’।
ओ.पी. रफ़ी की जगह महेंद्र कपूर से गवाने लगे। यह सिलसिला कोई तीन साल चला। कहते हैं कि एक दिन रफ़ी साहब ओ.पी. के घर चले गये और इस तरह रफ़ी साहब की सादगी पर ओ.पी. पिघल गये। दोनों गले मिल रोये। नाराज़गी ख़त्म होने के बाद रफ़ी ने नैयर के लिए पहला गाना गाया था- ‘ज़माने की आंखों ने देखा है यारों..’ (एक बार मुस्कुरा दो)।
लता से दूरी की चर्चित कहानी
उन्होंने ज़िन्दगी को अपने उसूलों पर जिया। उनकी पहली फ़िल्म आसमान में एक गीत लता जी के गाने की बात थी, पर जब लता जी को पता चला कि उनका गाया गीत मुख्य अभिनेत्री पर नहीं सह-अभिनेत्री पर फ़िल्माया जाएगा तो उन्होंने गाने से मना कर दिया। नैयर साहब को जब पता चला तो उन्हें बहुत बुरा लगा। लता जी उस समय तक स्थापित हो चुकी थीं। किसी भी संगीतकार के लिए उनसे गवाना सफलता की गारंटी मानी जाती थी, लेकिन ओ.पी. ने ताज़िन्दगी लता जी से नहीं गवाया। हालांकि वे कहते रहे कि जिस तरह का उनका संगीत है, उस पर लता जी की आवाज़ सूट नहीं होती।
मध्यप्रदेश सरकार ने लता मंगेशकर पुरस्कार देने के लिए जब ओ.पी. नैयर का नाम चुना तो ओ.पी. ने यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि जिनसे उन्होंने एक गीत भी नहीं गवाया; उनके नाम का पुरस्कार वे कैसे लें। कहा कि शमशाद बेगम के नाम का होता तो ज़रूर ले लेता। उस समय ओ.पी. साहब आर्थिक तंगी से गुज़र रहे थे। लेकिन उन्होंने अपने उसूलों से समझौता नहीं किया।
और आशा से नज़दीकी की दास्तान
ओ.पी. नैयर ने आशा की आवाज़ की विविधता को भरपूर तराशा। उनकी नज़दीकियाँ फ़िल्मी गलियारों की सुर्खियाँ हुआ करती थीं। 1958 से 1972 के बीच के 14 वर्ष तक उनका साथ रहा। नैयर साहब व्यक्तिगत जीवन को व्यवसायिक जीवन से अलग नहीं रख सके। उस समय तक समाज इतना आधुनिक नहीं हुआ था कि दो लोगों का स्वतंत्र साथ स्वीकार कर पाता। पर आशा और ओ.पी. को इसकी कोई परवाह नहीं थी। आलम यह था कि ओ.पी. के आठ कम्पोज़्ड गानों में से सात आशा के लिए होते। ये ख़बरें ओ.पी. के परिवार तक भी पहुँचीं। ज़ाहिर है आग लगेगी तो रिश्ते भी झुलसेंगे। चार बच्चों सहित पत्नी से रिश्तों खटास आ गयी।
नैयर साहब ने एक पत्रकार से कहा था, “ये तो सुना था कि लंव इज़ ब्लाइंड, लेकिन मेरे मामले में लव ब्लाइंड के अलावा डेफ़ यानी बहरा भी था क्योंकि आशा की आवाज़ के अलावा मैं और कोई आवाज़ सुन नहीं पाता था।” इसी वजह से उन्होंने शमशाद बेगम और गीता दत्त से किनाराकशी अख़ित्यार कर ली थी।
जिन गीता दत्त ने नैयर को गुरुदत्त के सामने प्रमोट किया था, उनसे ही वो कन्नी काटने लगे। मशहूर संगीत इतिहासकार राजू भारतन अपनी किताब ‘अ जर्नी डाउन मेमोरी लेन’ में लिखते हैं, “ओ.पी. नैयर की आशा भोसले के प्रति आसक्ति इस हद तक थी कि एक बार उन्होंने बिना कोई शब्द कहे गीता दत्त का फ़ोन रख दिया था। गीता दत्त ने सिर्फ़ यह पूछने के लिए फ़ोन किया था कि मैंने ऐसी क्या ख़ता की है कि अब आप मुझे गाने के लिए नहीं बुलाते?”
चमकती, थिरकती दुनिया की अंदरूनी तस्वीरें बहुत धुंधली होती हैं। आशा ने कभी अपने को सँवारने का क्रेडिट ओ.पी. को नहीं दिया। आने वाला समय एस.डी. बर्मन नाम के सितारे का था। आशा जी की मसरूफ़ियत ने ओ.पी. को और भी तनहा कर दिया। 1972 में आशा जी से रिश्तों में भी तल्ख़ियां आ गयीं। आशा और नैयर ने एक छत के नीचे कभी क़दम नहीं रखा, लेकिन इससे पहले उन्होंने ‘प्राण जाये पर वचन न जाये’ फ़िल्म के लिए एक गाना रिकॉर्ड किया, जिसे 1973 का फ़िल्म पुरस्कार मिला। आशा उस समारोह में नहीं गयीं। ओ.पी. ने उनकी तरफ़ से ट्रॉफ़ी ली। घर लौटते समय उन्होंने वो ट्रॉफ़ी चलती कार से सड़क पर फेंक दी।
सिराज ख़ां याद करते हैं, “नैयर साहब अपनी कार से लौट रहे थे। उनकी कार में गीतकार एस.एच. बिहारी बैठे थे। सड़क पर उस समय सन्नाटा था। अचानक नैयर साहब ने कार का शीशा नीचा किया और वो ट्रॉफ़ी फेंक दी जो एक खंभे से टकरायी। आख़िरी आवाज़ जो उन्होंने सुनी, जैसे कोई चीज़ चूरचूर हो जाती है। उन्होंने बगल में बैठे हुए बिहारी साहब से कहा कि ये जो आपने ट्रॉफ़ी टूटने की आवाज़ सुनी, इसके साथ ही आशा इज़ आउट ऑफ़ माई लाइफ़… फ़ॉर एवर…”
आख़िरी वक़्त के दौरान
70 से 80 के बीच उन्होंने कोई यादगार संगीत नहीं बनाया। जितनी बेसब्री से क़ामयाबी उन तक आयी थी, उतनी ही जल्दी गुमनामी के मंज़र भी आ गये। जब ओ.पी. को परिवार की याद आयी, परिवार ने उनको अपनाया नहीं। घर-जायदाद के झगड़े कोर्ट-कचहरी तक पहुंच गये।
एक रोज़ उन्हें अहसास हुआ कि अपनी पत्नी और चार बच्चों के साथ उन्होंने बहुत ज़्यादती की है। उनमें अब वो अदब, मुहब्बत नहीं, बहुत कड़वाहट आ गयी है। तब वे 1979 में सब कुछ छोड़कर अपनी क़िस्मत आज़माने निकल गये।
1994 में ज़िद फ़िल्म उनकी आख़िरी फ़िल्म थी। संगीत प्रोग्राम ‘सारेगामा’ में भी वे जज की भूमिका में आये। जिनके घर नैयर साहब 12 वर्षों तक पेइंग गेस्ट के तौर पर आकर रहे, उस नखवा रानी को मुंहबोली बेटी माना। 28 जनवरी 2007 को 81 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गये, तब रानी ने याद किया, “वो बहुत स्टाइलिश थे। उनके कुर्ते हमेशा कलफ़ लगे होते थे। उनकी लुंगी हमेशा सिल्क की होती थी, जिसे वो कला निकेतन से ख़रीदते थे। सफ़ेद रंग उनका प्रिय था…
दोपहर को वो बीयर पिया करते थे। शराब वो हमेशा ब्लैक लेबल पिया करते थे लेकिन कभी भी दो पेग से ज़्यादा नहीं। उन्हें अनुशासन बहुत पसंद था। जब भी हम घर से बाहर निकलते थे और हमें देर हो जाती थी तो वो हमें डांट दिया करते थे। वो अंग्रेज़ी फ़िल्में देखना पसंद करते थे। कभी-कभी वो अपने कमरे में हारमोनियम बजाया करते थे। उन्होंने फ़िल्म जगत से अपने को पूरी तरह काट लिया था। सिर्फ़ सुरैया और शमशाद बेगम आख़िर तक उनके साथ संपर्क में थीं।”
अधूरी दास्तान के और कुछ नोट्स
नैयर साहब की ज़िंदगी हो या संगीत, उसकी हर दास्तान शायद कभी पूरी नहीं हो पाएगी। बहुत-सी बातें कर लेने के बाद भी जाने कितनी ही छूट जाएंगी। उनकी स्पष्टवादिता, उनकी समझ और उनका अहम… हर नुक़्ता अपने आप में पूरी की पूरी किताब की मांग करता है। फिर भी कुछ ज़रूरी और यादों को दोहराया जाये तो यह कैसे भूला जा सकता है कि पचास-साठ के दशक में जब एक लाख के बजट में फ़िल्म बन जाया करती थी, नैयर साहब की फ़ीस ही एक लाख रुपया हुआ करती थी।
बड़े फ़ख़्र से याद करते थे कि मुजरिम फ़िल्म के पोस्टर पर अभिनेता-अभिनेत्री की फ़ोटो न होकर हारमोनियम लिए बैठे ओ.पी. नैयर की तस्वीर थी। ऐसा पहली बार था कि किसी संगीतकार को यह जगह मिली थी।
यही नहीं, पचास के दशक में कुछ समय ऑल इंडिया रेडियो ने नैयर के गानों को वेस्टर्न और अति आधुनिक कहते हुए प्रतिबंधित कर दिया था। रेडियो सीलोन पर ओ.पी. के गाने इतने लोकप्रिय हुए कि सारे रिकॉर्ड टूट गये।
सी.आई.डी. और फागुन फ़िल्मफ़ेयर के लिए संगीत के लिए नामांकित हुई। बी.आर. चोपड़ा की फ़िल्म ‘नया दौर’ को भी नैयर के संगीत लिए याद किया जाता रहेगा। 1958 में सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक के लिए फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार “नया दौर” के लिए उन्हें दिया गया था।

अनिता मंडा
साहित्य और कलाप्रेमी। ख़ुद को फ़ुल टाइम पाठक और पार्टटाइम लेखक मानती हैं। विविध विषयों की किताबों और कंटेंट में दिलचस्पी। गाहे-गाहे लेखन जिन विधाओं में करती हैं उनमें कविता, ग़ज़ल, लघुकथा आदि प्रमुख हैं। कुछ समवेत संकलनों में रचनाएं प्रकाशित।
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