
- April 30, 2026
- आब-ओ-हवा
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अरुण अर्णव खरे की कलम से....
हर अंक पिछले से बेहतर, शाबाश आब-ओ-हवा
आब-ओ-हवा: साहित्य, कला, शांति और सिनेमा का सतत पुल… दो वर्ष का समय किसी भी वैचारिक पत्रिका के लिए अपनी जड़ें जमाने और पहचान बनाने का महत्वपूर्ण काल होता है। आब-ओ-हवा ने इस अवधि में न केवल जड़ें मज़बूत कीं, बल्कि निरंतर उन्नति का परिचय भी दिया। हर नया अंक पिछले से बेहतर रहा और पत्रिका अपने संकल्प पर अटल रही – उच्चस्तरीय, गंभीर और रचनात्मक सामग्री से पाठकों को समृद्ध करने का संकल्प।
इस दो वर्षीय सफ़र में आब-ओ-हवा ने गंभीर विमर्श और रचनात्मकता के नये प्रतिमान स्थापित किये हैं। साहित्य, कला, शांति और सिनेमा के बीच एक सुंदर और सतत पुल का काम कर रही यह पत्रिका भाषा की सीमाओं को पार करते हुए परिवेश और संस्कृति को जोड़ने का प्रयास कर रही है। इसका नाम ही अत्यंत प्रतीकात्मक है- “आब-ओ-हवा” अर्थात् जल और हवा, जो न केवल जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ हैं, बल्कि सांस्कृतिक और भावनात्मक वातावरण की धुरी भी।
आब-ओ-हवा की सबसे बड़ी ताक़त उसकी विविधता है। ग़ज़ल, व्यंग्य, निबंध, कविता, अनुवाद, पुस्तक चर्चा, सिनेमा समीक्षा तथा सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर गहन लेख – हर अंक में ये विधाएँ समृद्धि के साथ उपस्थित रहती हैं। हाल के अंकों में फ़िलिस्तीन के महान कवि नजवान दरविश की कविताओं का अनुवाद, लद्दाख की आवाज़ और सोनम वांगचुक के आंदोलन पर चिंतन, युद्ध एवं मीडिया की भूमिका पर गंभीर निबंध तथा मीना कुमारी की शायरी जैसी साहित्यिक विरासत को याद करना, ये सब इसके विविध स्वरूप को दर्शाते हैं।
व्यंग्य परंपरा को जीवंत रखने वाले लेख भी नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे हैं। पत्रिका शांति की वकालत को विशेष महत्व देती है। अंक-48 में ‘युद्ध बनाम शांति’ विषयक सामग्री, सोशल मीडिया के युद्ध-कवरेज पर कार्टून और फ़िलिस्तीन से जुड़ी रचनाएँ इस दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से उजागर करती हैं।
समकालीन मुद्दों पर संवेदनशील टिप्पणी चाहे HPV वैक्सीन पर स्वास्थ्य चर्चा हो, डिप्लोमेसी पर व्यंग्य हो, या ‘रंग दे बसंती’ जैसी फ़िल्मों के माध्यम से लोकतंत्र का विश्लेषण, पत्रिका के संपादकीय नज़रिये को निरंतर मुखर करती रही है।
उर्दू अदब, विश्व साहित्य और भारतीय लोक परंपराओं का सुंदर मिश्रण आब-ओ-हवा को बहुभाषीय तथा बहुसांस्कृतिक बनाता है।
दो वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर यह उचित होगा कि आगामी अंकों में कुछ और सुधारों पर भी विचार किया जाये। डिजिटल पत्रिका होने के नाते इसकी विज़ुअल अपील को और निखारा जा सकता है- बेहतर डिज़ाइन, आकर्षक इन्फ़ोग्राफ़िक्स, तथा ऑडियो-वीडियो सामग्री का समावेश युवा पाठकों को अधिक आकर्षित कर सकता है।
वर्ष में कुछ विशेषांक निकालने का विचार भी बहुत उपयोगी होगा- पूर्णतः व्यंग्य विशेषांक, महिला लेखन विशेषांक, पर्यावरण-साहित्य विशेषांक, या सिनेमा विशेषांक। इससे पत्रिका और अधिक जीवंत एवं लक्षित हो सकेगी। साथ ही, पुराने अंकों के आर्काइव को बेहतर ढंग से व्यवस्थित करना और खोज को आसान बनाना पाठक संख्या बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगा।
दो वर्ष पूर्ण होने पर आब-ओ-हवा को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ। हिंदी वेब-साहित्य की दुनिया में यह एक सकारात्मक और सार्थक पहल साबित हुई है। आशा है कि आने वाले वर्षों में यह और अधिक परिपक्व, गहरी और व्यापक होती हुई, अधिक से अधिक पाठकों तक पहुँचेगी तथा साहित्यिक-सांस्कृतिक संवाद को और मज़बूत बनाएगी।
दो वर्ष की यह यात्रा मात्र एक शुभारंभ है। आगे का सफ़र और भी रोचक, सार्थक और प्रभावशाली होने की पूरी संभावना है।

अरुण अर्णव खरे
अभियांत्रिकीय क्षेत्र में वरिष्ठ पद से सेवानिवृत्त। कथा एवं व्यंग्य साहित्य में चर्चित हस्ताक्षर। बीस से अधिक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त। अपने माता-पिता की स्मृति में 'शांति-गया' साहित्यिक सम्मान समारोह आयोजित करते हैं। दो उपन्यास, पांच कथा संग्रह, चार व्यंग्य संग्रह और दो काव्य संग्रह के साथ ही अनेक समवेत संकलनों में शामिल तथा देश भर में पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन। खेलों से संबंधित लेखन में विशेष रुचि, इसकी भी नौ पुस्तकें आपके नाम। दो विश्व हिंदी सम्मेलनों में शिरकत के साथ ही मॉरिशस में 'हिंदी की सांस्कृतिक विरासत' विषय पर व्याख्यान भी।
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