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पाक्षिक ब्लॉग विवेक मेहता की कलम से....

नामचीन साहित्यकारों की चुटकियां-5

           पिछली कड़ियों में हिंदी साहित्य जगत के स्वनामधन्य लेखकों/कलमकारों के बीच के चुटकुलों/कटाक्ष/हास्य लहरियों को यहां प्रस्तुत किया गया, जिसे पाठकों ने पसंद किया। रस-परिवर्तन के लिहाज़ से हिंदी पट्टी से बाहर के लेखकों के भी ऐसे प्रसंग पेश किये जा चुके हैं। इस बार पढ़िए फिर हिंदी पट्टी के चर्चित नामों से जुड़ी कुछ रंग-बिरंगी यादें। विशुद्ध हास्य-व्यंग्य से गुदगुदाने का काम यह प्रस्तुति कर रही है, ऐसी आशा है। अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत करवाते रहिए …

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और प्रभु ने सुन ली

जैनेंद्र जी ने एक बार प्रभु से प्रार्थना की, “हे प्रभु, यह साहित्यिक परिचित मेरी पढ़ने की सारी पुस्तकें मांग-मांग कर ले जाते हैं और वापस नहीं करते। किसी प्रकार इन दुष्टों से मेरी पुस्तकें मुझे दिलवा दें!”

उन्हें देखकर आश्चर्य हुआ कि सामने मेज़ पर धड़-धड़ करती वे सारी पुस्तकें आ गिरीं, जिन्हें लोग उनसे कभी मांग कर ले गये थे।

जैनेंद्र जी गदगद हो गये। प्रभु ने सुन ली। भाव-विभोर होकर बोले, “हे प्रभु, मैं भी किसी की पुस्तक अपने पास नहीं रखना चाहता। यदि मेरे पास किसी की पुस्तक हो तो वह उसे वापस कर दें।”

फिर चमत्कार हुआ। मेज़ पर अभी आकर गिरीं पुस्तकें तो ग़ायब हो हो गयीं, अलमारी में रखी सारी पुस्तकें भी चली गयीं और जैनेंद्र जी ने आश्चर्य से देखा कि घर में उनके प्रकाशनों के अलावा एक पुस्तक नहीं रही।

प्रभु ने उनकी सुन ली!

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होपलेस

विदेश से आयी एक छात्रा ने डॉ. लक्ष्मी नारायण लाल से दिल्ली में कथा-साहित्य पर कुछ प्रश्न अंग्रेज़ी में किये। एक प्रश्न था- निर्मल वर्मा की कहानियों के बारे में आपके क्या विचार हैं?

डॉ. लाल कहना चाहते थे- वे निराशा की कहानियां है, वे पाठक को निराश करती हैं, वे मुझे भी निराश करती है। परन्तु छात्रा की सुविधा के लिए डॉ. लाल ने अंग्रेज़ी में जवाब दिया, “दे आर होपलेस स्टोरीज़, दे मेक दी रीडर होपलेस, दे मेक मी आलसो होपलेस।”

छात्रा आश्चर्य से उन्हें देखने लगी।

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श्रोताओं की संख्या

कलकत्ता कथाकार सम्मेलन से लौटने के बाद दिल्ली के कॉफ़ी-हाउस में कमलेश्वर और डॉ. लक्ष्मी नारायण लाल बैठे चर्चा कर रहे थे। दिल्ली के कुछ अन्य कथाकार भी थे। एक ने पूछा, “सम्मेलन में सामान्यतः श्रोताओं की उपस्थिति कितनी रहती थी?”

“यही कोई एक-डेढ़ हजार।”-कमलेश्वर ने कहा।

“तुम झूठ बोलते हो।”- डॉ. लाल ने टोका, “उपस्थिति दो सौ-ढाई सौ के लगभग ही रहती रही।”

“भई जब मैं भाषण देता था तब डेढ़-दो हज़ार रहती थी और जब डॉ. लाल भाषण देते थे, दो-ढाई सौ हो जाती थी।”- कमलेश्वर ने बात साफ़ की।

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नर या मादा?

‘ज्ञानोदय’ का सम्पादन कर चुके, मालवा क्षेत्र के ख्यात कथाकार रमेश बक्षी की कहानी ‘कमरे में कैक्टस’ ‘धर्मयुग’ में पढ़ने के बाद ‘सारिका’ के सम्पादक कमलेश्वर ने बक्षी को पत्र लिखा- “कमरे के लिए एक कैक्टस हमें भी भेजो!”

बक्षी ने उत्तर दिया “नर या मादा? मादा कैक्टस चाहिए तो। लक्ष्मी नारायण लाल से पत्र-व्यवहार करो।”

(लाल ने ‘मादा कैक्टस’ नाटक लिखा था।)

विवेक मेहता, vivek mehta

विवेक मेहता

पॉलिटेक्निक के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के विभागाध्यक्ष पद से सेवा-निवृत्त। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी से प्रसारित भी। कुछ समाचार-पत्रों के कॉलम किस्से बदरंग कोरोना के संग, 'वेताल कथाएँ', 'बेमतलब की चर्चित रहे। संपर्क: 94272 67470

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