
- April 30, 2026
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निबंध विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....
बिहार की अविस्मरणीय साहित्य-यात्रा
प्रवासी गिरमिटिया मज़दूर जब बिहार से कैरेबियन, फ़िजी, मॉरीशस, सूरीनाम, ट्रिनिडाड जैसे दूरस्थ देशों में गन्ने के खेतों में ले जाये गये, तब वे केवल श्रम शक्ति नहीं थे। वे अपने साथ गाँव की बोली, लोकगीत, गाथाएँ और सबसे बढ़कर रामचरितमानस का गूँजता पाठ भी ले गये। वे अनजाने ही मानस साहित्य तथा हिंदी के वैश्विक प्रचारक बन गये। जहाज़ों पर, छावनियों में, वहां खेतों के बीच उनकी झोंपड़ियों के बीच जब भी उन्हें अपमान और थकान असह्य होती, तुलसीकृत रामकथा के दोहे, चौपाइयाँ उनके लिए संबल बन जातीं, उनकी स्मृति ही उनका निजी साहित्यिक संसार बनती।
जहाज़ी ‘जाहज़ी–बहिन–भाई’ की जो सांस्कृतिक एकता उन बस्तियों में बनती गयी, उसमें भोजपुरी, अवधी, मगही, मैथिली के शब्दों के साथ मानस पाठ की अनुगूंज हमेशा मौजूद रही, जिससे हिंदी का एक विशिष्ट प्रवासी रूप आकार लेता गया। इस प्रकार भारतीयता की जो लौ गिरमिटिया बस्तियों में टिमटिमाती रही, उसकी दीप्ति में हिंदी का वैश्विक विस्तार संभव हुआ। इन समुदायों की भाषा, चेतना के मूल में बिहार की बोली–बानी और मानस–पाठ की यही परंपरा आज भी गहराई से बसी हुई है। रामचरितमानस इस प्रक्रिया से केवल काशी या अयोध्या की नहीं, गिरमिटिया इतिहास के द्वारा एक विश्वव्यापी साहित्यिक, सांस्कृतिक ग्रंथ के रूप में प्रतिष्ठित हुआ और इस गौरव के मूल में बिहार की भूमिका निर्विवाद रूप से केंद्रीय रही है।
बिहार की साहित्यिक यात्रा को समझने के लिए नालंदा–विक्रमशिला के ज्ञान–स्तंभों से लेकर आज के डिजिटल मंचों तक फैले समय को एक सूत्र में पिरोकर देखना होगा। यह भूमि गंगा के जल से जितनी सिंचित है, उतनी ही विचारों से भीतरी रूप से तृप्त और परिपक्व है। यहाँ संघर्ष, विद्रोह, करुणा और आध्यात्मिकता एक साथ बहते रहे हैं। मिथिला के मधुर पदों से लेकर भोजपुर के फगुआ, मगध के लोकगीत, अंग–प्रदेश के झूमर और पटना–भागलपुर के आधुनिक कथा काव्य तक, हर मोड़ पर कोई न कोई विशिष्ट रचनाकार इस मिट्टी की आवाज़ बनकर उभरता रहा है। इसी कारण बिहार का साहित्य केवल क्षेत्रीयता का दस्तावेज़ नहीं, भारतीयता की बहुवर्णी, बहुभाषी अभिव्यक्ति बनकर सामने आता है।
नालंदा को केवल विश्वविद्यालय कहना उसके गौरव का संकुचन होगा। वह ज्ञान की एक विस्तृत वैश्विक कार्यशाला थी, जहाँ पाठ्य, पाठक और पद्धति तीनों का निरंतर विकास हुआ। यहाँ बौद्ध दर्शन, व्याकरण, आलंकार, चिकित्सा, नाट्य–शास्त्र और काव्य का उच्च अध्ययन होता था, पुस्तकालय–व्यवस्था और पांडुलिपि–संग्रह ने ज्ञान को व्यवस्थित, आलोचनात्मक और अंतरराष्ट्रीय स्वरूप दिया। दूर–दूर के अंचलों से आये भिक्षु और आचार्य अपनी–अपनी भाषाओं में व्याख्या और अनुवाद की परंपरा को आगे बढ़ाते, जिससे भिन्न भाषिक समुदायों के बीच साहित्यिक वैचारिक संवाद संभव होता था।

बख़्तियार खिलजी के आक्रमण में जब यह केंद्र जला, तो ज्ञान सम्पदा का अकथ्य विनाश हुआ, परंतु नालंदा की बौद्धिक परंपरा बिहार के अनेक मठों, विहारों और गुरुकुलों के माध्यम से वहां की संस्कृति में घुल–मिलकर आज भी जीवित है। यही परंपरा आगे चलकर लोकभाषाओं के साहित्यिक विकास के लिए अव्यक्त आधार बनी, जिसमें तर्क, विमर्श और वाद संस्कृति एक अंतर्निहित ऊर्जा के रूप में विद्यमान रही।
बिहार की लोक चेतना
मिथिला की ओर देखें तो यह अंचल अपनी विशिष्ट साहित्यिक गरिमा के लिए विख्यात है। यहाँ के शिरोमणि कवि विद्यापति को मैथिली का प्राण कहा जाता है, जिन्होंने प्रेम, भक्ति और शृंगार को ऐसी मार्मिक अभिव्यक्ति दी कि उनके पद आज भी लोक स्वर में उसी ताज़गी से गूँजते हैं। “मैथिल कोकिल” विद्यापति की कविता में संस्कृत–प्रज्ञा और लोक सरलता का अद्भुत संगम मिलता है, जहाँ शिव–भक्ति, राधा–कृष्ण की प्रेम–लीला और दाम्पत्य–जीवन की सूक्ष्म संवेदनाएँ एक साथ उपस्थित हैं।
आगे चलकर हरिमोहन झा, राजकमल चौधरी, रमानाथ झा, उदय नारायण सिंह और उषा किरण ख़ान जैसे रचनाकारों ने मैथिली को आधुनिक कथा–काव्य की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया। उषा किरण ख़ान के उपन्यासों और कहानियों में मिथिला के गाँव, स्त्री–अनुभव, जातीय संरचना और बदलते समय की हलचल जीवंत रूप में दर्ज है, जिससे मैथिली केवल लोकगीतों की भाषा न रहकर समकालीन यथार्थ की संवेदनशील व्याख्या का माध्यम बनती है।
मगही, अंगिका और बज्जिका जैसी भाषिक धाराएँ भी बिहार के साहित्यिक परिदृश्य की अनिवार्य कड़ियाँ हैं। मगही के लोकगीतों, सुभाषितों और कहावतों में किसानों की व्यावहारिक बुद्धि, मौसम की समझ और सामाजिक अनुभव का निचोड़ मिलता है। अंगिका क्षेत्र के सोहर, झूमर और फगुआ गीतों में अंग–प्रदेश की विशिष्ट सांस्कृतिक आत्मा दिखती है। हाल के दशकों में इन भाषाओं में कविता, लघुकथा, उपन्यास और नाटक के माध्यम से एक नयी लिखित परंपरा विकसित हो रही है, जिसमें एक ओर लोक अस्मिता का आग्रह है, दूसरी ओर आधुनिक प्रश्नों के प्रति सजगता भी दृष्टव्य है। बज्जिका क्षेत्र में उभरते कवि और कथाकार अपनी बोली को घर–परिवार की बातचीत से आगे बढ़ाकर रचनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बना रहे हैं। इससे बिहार की भाषिक बहुलता को साहित्यिक रूप और अधिक व्यापकता मिल रही है।
भोजपुरी साहित्य में लोक–संगीत, नाटक और काव्य तीनों धाराएँ साथ–साथ विकसित होती दिखती हैं। भिखारी ठाकुर का नाम यहाँ सर्वप्रथम स्मरण में आता है, जिन्हें भोजपुरी का शेक्सपियर कहा जाता है। उनकी ‘बिदेसिया’, ‘गबरघिचोर’, ‘कृशन–सूदामा’ जैसी नाट्य–कृतियों और गीतों ने प्रवास, दांपत्य–द्वंद्व, जातिगत अन्याय और स्त्री–पीड़ा को मंच पर इस गहराई से उतारा कि वे खेतिहर मज़दूर से लेकर प्रवासी कुली तक सबके प्रतिनिधि कवि बन गये। हीरा डोम जैसे दलित कवि ने ‘अछूत की शिकायत’ जैसी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक असमानता पर तीखा प्रहार किया, जबकि विवेकी राय, सतीश्वर सहाय वर्मा, पांडेय कपिल और अन्य रचनाकारों ने बैसाखी, खेत–खलिहान, हाट–बाज़ार और गाँव की सूक्ष्म बारीकियों को संवेदनशील भाषा में अंकित कर भोजपुरी को गंभीर साहित्यिक क्षमता वाली भाषा सिद्ध किया। इस धारा ने भोजपुरी को केवल मंचीय मनोरंजन से ऊपर उठाकर लोक–इतिहास और जन–चेतना की भाषा बनाया।
इसी सामाजिक–राजनीतिक पृष्ठभूमि में बिहार की धरती ने बीसवीं सदी की सबसे बड़ी नैतिक–राजनीतिक कथा ‘चम्पारण सत्याग्रह’ को भी जन्म दिया। नील की खेती से त्रस्त किसानों की व्यथा जब चम्पारण के खेतों से उठकर राष्ट्रीय चिंता बनी, तब बैरिस्टर गांधी पहली बार इस भूमि पर आये और जन–शक्ति के बल पर अन्याय के विरुद्ध अहिंसक प्रतिरोध का प्रयोग किया। चम्पारण सत्याग्रह गांधी के लिए प्रयोग–भूमि था, जिसने उन्हें बैरिस्टर गांधी से आगे बढ़ाकर ‘महात्मा’ के रूप में गढ़ा और पूरी दुनिया को यह विश्वास दिलाया कि सत्य और अहिंसा भी इतिहास बदल सकते हैं। उनके इस सत्याग्रह आंदोलन ने न केवल भारतीय राजनीति, बल्कि साहित्य को भी गहरे स्तर पर प्रभावित किया। किसानों के जीवन, उनके शोषण, उनके साहस और उनकी नीरव पीड़ा पर अनेक कहानियाँ, कविताएँ और संस्मरण लिखे गये, जिनमें बिहार की मिट्टी की गंध और न्याय का आकुल स्वर साफ़ सुनायी देता है। इस तरह चम्पारण ने राजनीतिक चेतना के साथ–साथ साहित्यिक संवेदना को भी नयी दिशा दी।
फ़िल्मों से बदलती छवि, एक संकट
इसी परिप्रेक्ष्य में आज की भोजपुरी फ़िल्मों और अलबम–गीतों की प्रवृत्तियों पर समालोचनात्मक दृष्टि अनिवार्य हो जाती है। पिछले कुछ दशकों से बड़े पैमाने पर निर्मित भोजपुरी गीत संगीत और सिनेमा में जिस तरह की अश्लीलता, भौंडे देह प्रदर्शन और स्त्री विरोधी भाव–भंगिमा परोसी जा रही है, वह भोजपुरी की इस समृद्ध लोक साहित्यिक परंपरा के मूल स्वभाव से टकराती है। दोहरे अर्थ वाले बोल, शारीरिक अंगों पर फूहड़ टिप्पणियाँ, शराब, जुए और हिंसा को मर्दानगी के नाम पर महिमामंडित करना, प्रेम और संबंधों को केवल भोग वृत्ति में सीमित कर देना, ये सब न केवल समाज और संस्कृति को चोट पहुँचाते हैं, बल्कि भाषा तथा साहित्य की सार्वजनिक छवि को भी नुकसान पहुँचाते हैं।
मनोरंजन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर जब स्त्री को मात्र वस्तु में बदल दिया जाता है, तो इसके दूरगामी सामाजिक परिणाम सामने आते हैं; संस्कारों की जगह भोगवादी दृष्टि और मज़दूर, किसान की जगह अपराधी केंद्र में आ जाते हैं। नयी पीढ़ी दिग्भ्रमित होती है। आज स्व–संपादित रील या टिकटॉक में बिहार की अपरिपक्व युवतियां, जो कुछ भी अश्लील प्रदर्शित कर सकती हैं, निर्लज्ज होकर करने को अपना सम्मान समझने की भूल कर रही हैं।
इस स्थिति में लेखक, बुद्धिजीवी, संगीतकार और जागरूक श्रोता, दर्शकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। ज़रूरी है कि समाज मनोरंजन और साहित्य, संस्कृति के बीच अंतर स्पष्ट करे, फूहड़ता और अश्लीलता प्रधान उत्पादों के बहिष्कार के साथ-साथ शालीन, संवेदनशील और अर्थपूर्ण रचनात्मक प्रयासों को सक्रिय समर्थन दे। सेंसर व्यवस्था, नीति निर्माण और समाज शिक्षा के स्तर पर संतुलित हस्तक्षेप हो, ताकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे, परंतु स्त्री की अपमानजनक, समाज विरोधी और हिंसा प्रेरक सामग्री पर स्पष्ट नियंत्रण हो। इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि भोजपुरी की साहित्यिक और लोक धारा से जुड़े नये संगीतकार, कवि और फ़िल्मकार आगे आएँ, जो भाषा की अस्मिता और गरिमा को केन्द्र में रखते हुए आधुनिक तकनीक और माध्यमों का स्वस्थ उपयोग करें। इसके लिए शिक्षा जगत को सामने आकर रचनात्मक जन आंदोलन चलाना पड़ेगा।
महत्वपूर्ण साहित्यिक हस्ताक्षर
यह भुलाया नहीं जा सकता कि हिंदी साहित्य में बिहार का योगदान जितना व्यापक है, उतना ही गहन भी है। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ को राष्ट्रकवि का सम्मान यूँ ही नहीं मिला। ‘रश्मिरथी’, ‘परशुराम की प्रतीक्षा’, ‘उर्वशी’, ‘हुंकार’, ‘द्वंद्वगीत’ जैसे काव्यग्रंथों ने वीर रस, शृंगार, राष्ट्रीय चेतना और मानवीय करुणा को एक साथ साधा है। दिनकर की कविता में इतिहास की दृष्टि और नैतिक साहस है। वे कुरुक्षेत्र के माध्यम से युद्ध/शांति का प्रश्न उठाते हैं, किसान और श्रमिक के पक्ष में स्वर बुलंद करते हैं, तो सत्ता के अन्याय पर भी निर्भीक प्रहार करते हैं। उनकी गद्य कृतियाँ ‘संस्कृति के चार अध्याय’, ‘चिंतन के क्षण’, ‘क्या लेखन आसान है’ आदि भारतीय संस्कृति, लेखकीय दायित्व और आधुनिकता परंपरा के द्वंद्व पर गंभीर साहित्य विमर्श प्रस्तुत करती हैं।
इसी कड़ी में नागार्जुन यानी वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है, जिन्होंने मैथिली और हिंदी दोनों में असाधारण रचनाएँ कीं। ‘पत्रहीन नग्न गाछ’, ‘यात्री के नोट्स’, ‘अकाल और उसके बाद’ जैसी कविता की पुस्तकें और ‘बलचनमा’, ‘रात भर’ जैसे उपन्यास नागार्जुन को जनकवि के रूप में स्थापित करते हैं। उनकी भाषा सहज, व्यंग्य प्रवण और लोक संस्कार से समृद्ध है। वे खेत-खलिहान, रेल प्लेटफॉर्म, जनसभाओं और गाँव की गलियों तक फैले जीवन को अपनी रचनाओं में सजीव शाब्दिक चित्र बना कर खींच लाते हैं।
फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ ने ‘मैला आँचल’, ‘परती परिकथा’, ‘जुलूस’, ‘दीर्घायुध’, ‘ठुमरी’ जैसी कृतियों से हिंदी उपन्यास और कहानी में आंचलिकता की नयी धारा स्थापित की, जिसमें उत्तर पूर्वी बिहार के पूर्णिया कतरनिया अंचल का पूरा सामाजिक भूगोल जीवंत रूप में उपस्थित है। रेणु के पात्र, उनकी बोली, उनका लोक संगीत और राजनीतिक जागरण, सब मिलकर आधुनिक हिंदी को क्षेत्रीय धरातल से जोड़ते हैं और साहित्य में केंद्र परिधि की दूरी कम करते हैं।
लोकप्रिय गद्य के क्षेत्र में देवकीनंदन खत्री का नाम अविस्मरणीय है, जिन्होंने ‘चंद्रकांता’ और ‘चंद्रकांता संतति’ के माध्यम से हिंदी पाठकों को तिलिस्म और ऐयारी की दुनिया से परिचित कराया। इन उपन्यासों ने न केवल मनोरंजन दिया, बल्कि हिंदी गद्य के लिए व्यापक पाठक वर्ग तैयार किया, जो आगे चलकर गंभीर साहित्य की ओर भी उन्मुख हुआ। शिवपूजन सहाय, रामवृक्ष बेनीपुरी, घुनघुन प्रसाद, जैसे अनेक साहित्यकारों ने निबंध, संस्मरण, कहानी और पत्रकारिता के क्षेत्रों में उल्लेखनीय रचनाएँ दीं, जो स्वतंत्रता संग्राम, किसान आंदोलन और समाज सुधार से घनिष्ठ रूप से जुड़ी थीं। उधर उर्दू में शाद आज़ीमाबादी, मुख़्तार गोंडवी जैसे शायरों ने ग़ज़ल, नज़्म और मरसिया के माध्यम से बिहार की उर्दू परंपरा को गहराई दी, जिससे हिंदी उर्दू का साझा सांस्कृतिक परिसर समृद्ध हुआ।
अंग्रेजी भाषा में लेखन करने वाले बिहार मूल के रचनाकारों की उपस्थिति भी अब स्पष्ट रूप से दिखायी दे रही है। मोतिहारी का जॉर्ज ऑरवेल से जुड़ा होना एक ऐतिहासिक प्रसंग है, पर समकालीन दौर में अब्दुल्ला ख़ान जैसे लेखक ‘पटना ब्लूज़’ और ‘ए मैन फ्रॉम मोतिहारी’ जैसे उपन्यासों के माध्यम से बिहार की मुस्लिम बस्तियों, सामाजिक तनाव और व्यक्तिगत संघर्ष को अंग्रेज़ी माध्यम से वैश्विक पाठक तक पहुँचा रहे हैं। कवि राजनयिक अभय के बहुभाषिक काव्य और अनुवाद, नालंदा–क्षेत्र की स्मृतियों और वैश्विक अनुभवों का अनूठा मेल हैं, जो आधुनिक बिहार की एक विश्व-मित्र छवि भी रचते हैं।
बिहार एक जीवित अनुभव
अब प्रश्न यह है कि बिहार की भूमि साहित्यिक दृष्टि से इतनी उर्वर क्यों रही। एक बड़ा कारण यह है कि यहाँ संघर्ष और अवसर दोनों साथ-साथ उपस्थित रहे। शिक्षा और पिछड़ापन, सत्ता और हाशियाकरण, प्रवास और जड़ें, इन सबके तनाव ने रचनाकारों को गहरी मानवीय संवेदना तथा अंतर्दृष्टि दी। गंगा, कोसी, गंडक, सोन जैसी नदियों का विशाल मैदान, बार-बार आने वाली बाढ़ें, सूखे, पलायन और ग़रीबी… ये सारे अनुभव माटी की तरह भाषा में भी गूँथे गये, जिससे कविता, कथा और गीत में करुणा और प्रतिरोध दोनों समान रूप से मुखर हुए।

दूसरा कारण यह कि यहाँ की भाषाएँ अभी भी जीवन से सीधी जुड़ी हैं। उनमें कृत्रिमता कम और अनुभव की गंध अधिक है, इसलिए लेखक जब भी कलम उठाता है, उसके सामने जीवित पात्र और वास्तविक स्थितियाँ होती हैं। तीसरा कारण यह कि इतिहास की स्मृति यहाँ बहुत प्रबल है। बुद्ध, महावीर, अशोक, चंद्रगुप्त, चम्पारण के सत्याग्रही किसानों से लेकर जयप्रकाश नारायण तक अनेक विचार-पुरुषों की विरासत ने साहित्य को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि परिवर्तन के औज़ार के रूप में देखने की निरंतर अनवरत दृष्टि दी है।
आज के डिजिटल, ग्लोबल समय में बिहार के साहित्य के सामने चुनौती और संभावना दोनों बराबर खड़ी हैं। चुनौती यह कि बाज़ार, राजनीति और उपभोक्तावाद के दबाव में साहित्य को या तो केवल मनोरंजन, या केवल ‘ट्रेंड’ की वस्तु बना देने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। ऐसे में गंभीर, प्रयोगधर्मी और समाज सचेत लेखन के लिए स्थान सिमटता दिखता है। किंतु दूसरी ओर इंटरनेट, सोशल मीडिया, ब्लॉग, पॉडकास्ट, ऑनलाइन पत्रिकाएँ और ई-बुक के रूप में अनगिनत नये अनछुए अवसर खुले हैं, जहाँ बिहार के युवा रचनाकार अपनी बोली-बानी में लिखकर सीधे पाठकों तक पहुँच रहे हैं। दुनिया भर में फैले प्रवासी बिहारी समुदाय इन मंचों पर अपनी जड़ों की ओर लौटने की आकांक्षा के साथ जुड़ते हैं, जिससे नये पाठक, श्रोता और सह-सर्जक तैयार हो रहे हैं।
यदि बिहार की विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों, पुस्तकालयों और साहित्यिक संस्थाओं द्वारा क्षेत्रीय भाषाओं के डिजिटलीकरण, ऑडियो-बुक, वेब-पत्रिका, ऑनलाइन व्याख्यान-मालाओं और साहित्यिक महोत्सवों की योजनाएँ सुविचारित ढंग से चलायी जाएँ, तो स्थानीय और वैश्विक के बीच की दूरी बहुत कम हो सकती है। नालंदा साहित्य उत्सव जैसे आयोजन प्राचीन विद्वत्ता परंपरा को वर्तमान विमर्श से जोड़ते हुए बहुभाषिक, बहुविषयी संवाद के मंच बन सकते हैं।
वाल्मीकि, तुलसी, कबीर, विद्यापति, दिनकर, नागार्जुन, रेणु से लेकर आज के उभरते कवि-कथाकारों तक की रचनाओं को नये माध्यमों पर सुलभ, आकर्षक और संवाद-उन्मुख रूप में प्रस्तुत किया जाये तो युवा पीढ़ी के लिए साहित्य ‘पुरानी किताब’ नहीं, जीवित अनुभव बन सकता है।
अंततः, यह कहा जा सकता है कि गिरमिटिया जहाज़ों पर गूँजती चौपाइयों से लेकर आज के पॉडकास्ट और ई-बुक तक की यात्रा में बिहार ने हिंदी और भारतीय साहित्य को निरंतर विस्तार, ऊर्जा और दिशा दी है। यहाँ की मिट्टी में संघर्ष है, स्मृति है, आशा है, विस्तार है। यही त्रिवेणी इसकी रचनात्मक शक्ति का स्रोत है। यदि हम अश्लीलता, सतहीपन और बाज़ार निर्धारित रुचि से ऊपर उठकर इस साहित्यिक विरासत को समझने और आगे बढ़ाने का प्रयास करें, तो बिहार न केवल अतीत की महिमा का प्रदेश है, बल्कि भविष्य के साहित्यिक नवोन्मेष की एक सशक्त प्रयोग भूमि भी बन सकेगा।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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