किश्वर नाहीद, बुरी औरत की कथा, kishwar naheed, buri aurat ki katha
पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आज़म की कलम से....

किश्वर नाहीद की बुरी औरत की कथा

         “बुरी औरत की कथा” किश्वर नाहीद लिखित ख़ुद-नविश्त सवानिह उमरी (आपबीती) है जो 1997 में लिखी गयी और 2008 में मंज़र-ए-आम पर आयी। किताब उन्होंने अपने दोनों बेटों के नाम समर्पित की है। इस का दीवाचा यानी भूमिका भी ख़ुद किशवर नाहीद ने लिखी है जिसका शीर्षक है: “अपने पढ़ने वालों के नाम”।

ये किताब आपबीती शक्ल में है, जिसमें 14 अबवाब/खण्ड हैं : पहली सीढ़ी, पहला क़दम, पहला सजदा, पहला सनम, पहला जलवा, पहली लग़्ज़िश, मह-लक़ा की कहानी, क़िस्सा मीरा की दासी का, यशोधरा का जन्म, बे-ताज ज़रीं, बे नाक़ूस लैला, हंटर वाली, तौक़ दर गुलू सना, हव्वा और इब्न-ए-आदम।

किताब के अंत में विभिन्न शीर्षकों के तहत छायाचित्र हैं जैसे- चौदहवें साल से पचासवें साल तक, सफ़र-दर-सफ़र, परतव-ए-ख़ुर्शीद, दास्तान-ए-हमसफ़री, गवाही।

इससे ये ज़ाहिर होता है किताब में 50 वर्षीय जीवन का लेखा-जोखा है। नाहीद ने अपनी आपबीती में औरत की आवाज़ को एक नयी बुलंदी अता की है। अपनी कहानी के ज़रिये वो निसाई तहरीक यानी स्त्री विमर्श को जन्म देती हैं। वो आम मर्दाना समझ को बदलने की कोशिश करती हुई नज़र आती हैं। औरतों की ज़िंदगी के सभी पहलुओं पर उन्होंने खुलकर लिखा है। हालाँकि किसी भी अध्याय में अतिविस्तार और सूक्ष्मता का सहारा नहीं लेतीं, केवल निशानदेही कर देती हैं ताकि पाठक स्वयं सोच सकें।

ये दरअसल वह कहानी है, जिसमें समाजी बुराइयों और रवायात के ख़िलाफ़ अवाज़ बुलंद की गयी है। फ़िर्क़ावाराना फ़सादात (सांप्रदायिक दंगों) के कारणों और इसके परिदृश्य को पेश किया गया है। औरतों पर होने वाली ज़्यादतियों का वर्णन है और ये सब बातें बहुत ही बे-बाक अंदाज़ में कही गयी हैं। जिससे उनकी आवाज़ अब तक पहले कभी न सुनी गयी आवाज़ लग रही है। भाषागत तजुर्बे भी किये हैं। औरतों के लिए तालीम (शिक्षा) की बेहद आवश्यकता पर-ज़ोर दिया है। अंदाज़ तहरीर (लेखन शैली) में जगह-जगह वाकपटुता और तंज़-ओ-मिज़ाह (हास्य-व्यंग्य) से काम लिया गया है। जैसी उन्होंने ज़िंदगी जी, वैसा ही लिखा है। वो ख़ुद को एक आज़ाद रूह की तरह कल्पना करती हैं इसलिए बहुत बेबाकी से उन्होंने लेखन कार्य किया है।

किश्वर नाहीद, बुरी औरत की कथा, kishwar naheed, buri aurat ki katha

किश्वर नाहीद का दो टूक कहना है कि औरत को पूरा हक़ है कि वह अपनी ज़िंदगी के फ़ैसले ख़ुद ले। चाहे इस फ़ैसले से समाज ख़ुश हो या न हो, चाहे वो समाज के अनुरूप हों या न हों। इसी बहाने उन्होंने समाजी बुराइयों और दक़यानूसी रवायात (परंपराओं) को भी बयान किया है। उदाहरणार्थ जहेज़ (दहेज), अल्पायु में शादी, ख़वातीन (महिलाओं) के साथ ज़्यादतियां, समाज के अख़लाक़ी मयारों (शिष्टाचार के मापदंडों) पर तंज़ (व्यंग) करती हैं। फ़िर्कावाराना फ़सादात के सिलसिले में उनका कहना है:

“एक ज़माना था, जब हम सब एक साथ रहते थे मगर मज़हबी तास्सुब (धार्मिक कट्टरता) ने सब बिगाड़ दिया। न सिर्फ़ हिंदू, मुस्लिमों में बल्कि मुस्लिम क़ौम में भी मुख़्तलिफ़ फ़िर्क़ों (विभिन्न संप्रदायों) ने एक-दूसरे को मिटाने की जैसे क़सम खायी हो। ये फ़साद मैन-मेड हैं। हम सबने बनाया है और हम सब उसको ख़त्म कर सकते हैं।”

उनकी लेखन शैली सादा है। बहुत मुश्किल अल्फ़ाज़ इस्तिमाल नहीं हुए हैं, आसान अल्फ़ाज़ में गहरी बातें की गयी हैं। इसलिए कि सादगी और सच्चाई अस्ली मंतव्य है, जिससे सभी मुतास्सिर (प्रभावित) होते हैं। उनका अभिप्राय औरतों की अज़ादी या औरतों पर होने वाले मज़ालिम (अत्याचारों) पर नुक़्ताचीनी है। बार-बार वो औरतों के साथ होने वाले समाजी और अख़लाक़ी सुलूक (तथाकथित शिष्टाचार) को आड़े हाथों लेती हैं।

उनका मानना है जब भी औरत मुआशरे (समाज) में बराबरी और अपने हुक़ूक़ (अधिकारों) की बात करती है तो उसे “बुरी औरत” का नाम दे दिया जाता है।

इन सब प्रसंगों की वजह से “बुरी औरत की कथा” उर्दू अदब की एक शाहकार किताब बन गयी है, जिसमें न सिर्फ़ बर्र-ए-सग़ीर (भारतीय उपमहाद्वीप) की औरतों की हालत का तजज़िया (विश्लेषण) है बल्कि आलमी सतह (वैश्विक स्तर) पर औरतों से मुवाज़ना (तुलना) भी किया गया है और एक तरह से इस किताब में औरतों की दिफ़ा (प्रतिरक्षा) में तहरीक (आंदोलन) की शम्मा रोशन की गयी है। समाज में तब्दीली का ऐलान किया गया है।

इस किताब से चंद उद्धरण) पेश हैं, वह किताब के बारे में लिखती हैं:

“मेरी ख़ुद आगाही (आत्म जागरूकता) और ख़ुद-शनासी (आत्म ज्ञान) के लिए आईना सद इशकाल (सैकड़ों दुविधा का निवारण दर्पण) साबित हुई।”

“ये कहानी एक फ़र्द (व्यक्ति) की नहीं इस सारे मुआशरे (समाज) की है जहां बड़ी-बड़ी बातें भुला दी जाती हैं और छोटी छोटी कमीनगियाँ (नीचता) याद रखी जाती हैं।”

“बूढ़ी गंगा के किनारे कैंप भरा हुआ था और औरतें ही औरतें। क्या मैं उन्हें औरतें कहूं? मुश्किल से तेरह-पंद्रह साल की पतली-पतली लड़कियां, जिनकी अभी छातियां भी सांस लेने नहीं पायी थीं, मगर उनके पेट छठे और सातवें महीने की गवाही दे रहे थे। उनके घरवाले कहाँ थे? वो तो रात के अंधेरे में साज़िशी और ग़द्दार क़रार दिये गये थे। उनकी नस्लें ख़राब करने के लिए उनके साथ हरामकारी (व्यभिचार) की गये थी। वो बे-अमाँ, बे-जगह बूढ़ी गंगा की गोद में सूखे होंठ और सूखी आँखें लिये सर झुकाये बैठी थीं।’

“एक ऐसा दौर भी था, जब हिंदू और मुस्लमानों के दरमयान कोई तास्सुब (धर्मांधता) न था। हम सब लड़कियां बालियां इकट्ठे झूले झूलतीं, छतों के मुंडेरों से आपस में बातें करतीं, इकट्ठे स्कूल जाती थीं। दीवाली, दसहरा, होली हो या कूँडे सब मिलकर मनाते थे।”

“मैंने अपनी ज़िंदगी में बहुत कुछ सहा, लेकिन हार नहीं मानी। मैंने हमेशा अपने हुक़ूक़ (अधिकारों) के लिए एक जंग लड़ी और मैं दूसरी औरतों को भी यही करने की तरग़ीब (प्रेरणा) देती हूँ।”

“हर वो औरत जो ख़ानदान में आगही और हक़ हासिल करने के लिए पहला क़दम उठाती है उसे बुरी औरत ही क़रार दिया जाता है। इस पहले क़दम से ही तरक़्क़ी और वुसअत नज़री (विशाल दृष्टिकोण) का रास्ता खुलता है।”

एक नज़र: किश्वर नाहीद

किश्वर नाहीद की पैदाइश 3 फरवरी 1940 में बुलंदशहर, हिन्दोस्तान में हुई। ख़ानदान बहुत परंपरागत था। वो शुरू से ही पर्दे में रखी गयीं, फिर भी उन्होंने शिक्षा जारी रखी और एमए तक तालीम हासिल की। उनकी शादी, जिसमें उनकी रज़ामंदी भी शामिल थी, यूसुफ़ कामरान से हुई लेकिन वैवाहिक ज़िंदगी ख़ुशगवार नहीं बन सकी। बहरहाल दो बेटे हुए।

तालीम के बाद मुख़्तलिफ़ महकमों (विभागों) में अपनी सेवाएं देती रहीं। लंबे समय तक डायरेक्टर जनरल उर्दू साइन्स बोर्ड, लाहौर में ख़िदमत अंजाम दी। 1990 के बाद रोज़नामा (दैनिक) “जंग” के लिए कॉलम लिखने लगीं। वो पाकिस्तान नैशनल कौंसल ऑफ़ आर्ट की डायरेक्टर जनरल भी रहीं।

उनकी मशहूर शेअरी तसनीफ़ात (कृतियों) में लब-ए-गोया, बेनाम मुसाफ़त, गलियाँ धूप दरवाज़े, स्याह हाशिये में गुलाबी रंग, फ़ितना सामानी दिल, अलामतों के दरमयान वग़ैरा कोई दो दर्जन किताबें हैं और कोई एक दर्जन किताबों की उन्होंने तालीफ़ (संकलन) भी की है।

नस्री किताबों (गद्यात्मक पुस्तकों) में औरत ख़ाब और ख़ाक के दरमयान, बुरी औरत की कथा, शानासाइयाँ रुस्वाइयाँ, बाक़ी माँदा ख़ाब.. वग़ैरा हैं। उन्होंने “माह-ए-नौ” रिसाले की इदारत (पत्रिका का संपादन) भी की।

बहुत से इनआम और एज़ाज़ात से नवाज़ी गयीं। जिनमें लब-ए-गोया के लिए अदम जी अदबी ऐवार्ड, यूनेस्को से अदब-बराए-इतफ़ाल ऐवार्ड, कोलंबिया यूनीवर्सिटी से बेहतरीन मुतर्जिम (अनुवादक) का ऐवार्ड, साउथ अफ़्रीक़ा से मंडेला ऐवार्ड और पाकिस्तान से सबसे बड़ा सितार-ए-इम्तियाज़ ऐवार्ड हासिल हुए।

अपनी बाग़ियाना शायरी (विद्रोह) और हुक़ूक़ निसवां (महिला अधिकार) के लिए जद्द-ओ-जहद (संघर्ष) करने वाली ये बेबाक और बेमिसाल ख़ातून इस्लामाबाद, पाकिस्तान में रहती हैं।

azam

डॉक्टर मो. आज़म

बीयूएमएस में गोल्ड मे​डलिस्ट, एम.ए. (उर्दू) के बाद से ही शासकीय सेवा में। चिकित्सकीय विभाग में सेवा के साथ ही अदबी सफ़र भी लगातार जारी रहा। ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास व चिकित्सकी पद्धतियों पर किताबों के साथ ही ग़ज़ल के छन्द शास्त्र पर महत्पपूर्ण किताबें और रेख्ता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ज़ल विधा का शिक्षण। दो किताबों का संपादन भी। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित, पुरस्कृत। आकाशवाणी, दूरदर्शन से अनेक बार प्रसारित और अनेक मुशायरों व साहित्य मंचों पर शिरकत।

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