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विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....

महान विरासत और बंगाल इन दिनों

           बंगाल में ही जन्मे स्वामी विवेकानंद ने ‘शिकागो व्याख्यान’ के ज़रिये विश्व को भारतीय दर्शन से जोड़ा था, देश को एक सुर में बांधने वाले राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत दोनों ही इसी धरती पर जन्मे, आज उसी बंगाल में वैचारिक असहिष्णुता का बढ़ना चिंताजनक है। बंगाल का ‘आत्मविश्वास’ कब और क्यों राजनीतिक भय में परिवर्तित हुआ? और उससे निकल वही बौद्धिक, वैचारिक समृद्धि के रास्ते क्या हैं? शांति से चुनाव के बाद भी हत्याओं का सिलसिला बेहद चिंताकारक है।

‘जन-गण-मन’ के रचयिता ने जिस उन्मुक्त आकाश और भयमुक्त मस्तिष्क की कल्पना की थी, वह आज संकीर्ण राजनीतिक ध्रुवीकरण की भेंट चढ़ चुका है।

आज़ाद हिंद फ़ौज का अनुशासन और सर्वधर्म समभाव बंगाल की पहचान थी। वर्तमान की ‘अपराध केंद्रित सत्ता वाली राजनीति’ नेताजी के उन उच्च आदर्शों के सर्वथा विपरीत है।

साहित्य का नोबेल पुरस्कार, भारत के लिए पहले नोबेल के रूप में इसी धरती से आया। और अब यह राज्य अमर्यादित भाषा, आपत्तिजनक शब्दों और आचारों के लिए सुर्ख़ियों में आता है, तो पूरी विरासत शर्मसार होती है।

7 मई को रबींद्रनाथ टैगोर की जयंती आयी और लगभग पूरे बंगाल से इसी तरह के समाचार दिन भर स्क्रीन पर हावी रहे कि कहां-कहां किस प्रकार की हिंसा होती रही। पूरा राज्य अपने गौरव को भुलाकर एक गर्त की ओर जाता हुआ अधिक दिखा।

विज्ञान में नोबेल दिलाने वाली यह धरती तार्किकता का केंद्र थी, किंतु आज यहाँ तर्क का स्थान कुतर्क और हिंसा ने ले लिया है। चुनाव और सत्ता संघर्ष के दौरान होने वाली वीभत्स घटनाएं यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या यह वही ‘भद्रलोक’ समाज है?

देश का मस्तिष्क कहा जाता था बंगाल को, प्रगतिशील सोच और विचार में सबसे आगे रहा यह सूबा, अंग्रेज़ी राज में विकास की कितनी ही धाराएं यहीं से फूटीं और अंग्रेज़ी राज के ख़िलाफ़ बिगुल भी लेकिन अब इसकी प्रगतिशीलता प्रश्नचिह्नों में क़ैद होकर रह गयी है।

‘ममता रिजीम’ पर लगने वाले 50 साल पीछे धकेलने के आरोप केवल आर्थिक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण की ओर इशारा करते हैं।

बंगाल का संकट केवल एक राज्य का नहीं है, यह पिछले समय में पूरे देश की सोच में ‘असहमति के प्रति बढ़ती हिंसा’ का प्रतिबिम्ब है। वह राज्य जिसने नोबेल विजेता और वैश्विक विचारक दिये, वह राज्य जो आज अपराध, सिंडिकेट राज और घटिया राजनीति के लिए चर्चा में है, देखकर मन व्यथित होता है।

बंगाल को किसी नये राजनीतिक वाद की नहीं, बल्कि अपने ही ‘स्वर्णिम अतीत’ को वर्तमान में उतारने की आवश्यकता है। बंगाल को फिर से संवाद, कला, फ़िल्म और फुटबॉल की प्रगतिवादी सोच समझ से बनाना होगा।

प्राथमिकता ‘संतुलित विकास और सुनिश्चित सुरक्षा’ होनी चाहिए, न कि ‘विनाश और प्रतिशोध’। यदि बंगाल की ‘आब-ओ-हवा’ में फिर से वही चेतना और बौद्धिक गहराई लानी है, तो उसे अपनी ‘सांस्कृतिक और वैज्ञानिक मेधा’ को पहचानना होगा। कहा गया है, “बंगाल ने आज़ादी के आंदोलन को नेतृत्व और दिशा दी थी, कलकत्ता में सबसे पहले बिजली जगमगायी थी, यहां की माटी में वह ताक़त है, जिस पर भारत गर्व कर सकता है।” शर्त बस यही कि बंगाली मानुष अपने अतीत, अपने साहित्य, अपने महापुरुषों की आवाज़ों को न भूले।

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

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