साहित्यकारों की चुटकियां, jokes of writers, firaq, bedi
पाक्षिक ब्लॉग विवेक मेहता की कलम से....

रंग बिरंगी: नामचीन साहित्यकारों की चुटकियां-8

            पिछली कड़ियों में हिंदी साहित्य जगत के स्वनामधन्य लेखकों/कलमकारों के बीच के चुटकुलों/कटाक्ष/हास्य लहरियों को यहां प्रस्तुत किया गया, जिसे पाठकों ने पसंद किया। रस-परिवर्तन के लिहाज़ से हिंदी पट्टी से बाहर के लेखकों के भी ऐसे प्रसंग पेश किये जा चुके हैं। इस बार पढ़िए फिर हिंदी पट्टी के चर्चित नामों से जुड़ी कुछ रंग-बिरंगी यादें। विशुद्ध हास्य-व्यंग्य से गुदगुदाने का काम यह प्रस्तुति कर रही है, ऐसी आशा है। अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत करवाते रहिए …

साहित्यकारों की चुटकियां, jokes of writers, firaq, bedi

शंका

एक फ़िल्म-निर्माता ने अपने फाईनेंसर से बड़े गर्व से कहा, “मैं अपनी फ़िल्म के लिए उर्दू लेखक राजिंदर सिंह बेदी की कहानी ले रहा हूं।” उनकी पटकथा/कहानियों पर बनी फ़िल्में-गर्म कोट, दस्तक, मधुमती, सत्यकाम कई अवॉर्ड जीत चुकी थीं।

फाईनेंसर ने उत्तर दिया, “हां, वह तो बड़े मशहूर लेखक हैं।” फिर कुछ सोचकर बोला, “लेकिन ध्यान रखना वह कहीं अवॉर्ड वाली कहानी न लिख दें।”

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पेंशन-याफ़्ता

फ़िराक गोरखपुरी किसी मुशायरे में दिल्ली गये हुए थे। होटल के एक कमरे में फ़िराक के साथ उर्दू के एक दूसरे ख़ूबसूरत शायर भी ठहरे हुए थे। होटल के रजिस्टर में नाम लिखकर ख़ूबसूरत शायर ने फ़िराक से पूछा, “पेशा क्या लिख दूं?”

फ़िराक ने सादगी से कहा, “माशूक़ लिख दो”, ख़ूबसूरत शायर ने कहा, “इस उम्र में?” फ़िराक ने फिर सादगी से कहा, “आगे ब्रेकेट में पेंशन-याफ़्ता भी लिख देना।”

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तो फिर समस्या क्या है!

“किताबी बातें ज़िंदगी का सच नहीं बन सकती, विमल दा! यह ज़माना सिर्फ़ बेईमानी और मक्कारी का है। और सुखी भी वही लोग हैं…” हालात से परेशान किसी परिचित ने ख्यात बंगाली लेखक विमल मित्र से कहा।

उसे समझाने के बजाय विमल दा ने छूटते ही कहा, “तो मुश्किल कहां है? चलो, तुम भी झट-पट एकाध बेईमानी कर डालो और हो लो सुखी…”

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सिगरेट तो ठीक..

सिंधी साहित्य मंडल, बंबई में उर्दू के प्रसिद्ध कहानीकार राजिंदर सिंह बेदी ने ‘विश्व-कहानी’ पर बोलने के पश्चात् मोहन ‘कल्पना’ को कहा, “अब एक सिगरेट निकालो।”

मोहन ने सिगरेट का पैकेट उनकी ओर बढ़ाते हुए कहा, “आप सिगरेट पीते हैं, यह बात मैं आप के घर वालों को बताऊंगा।”

बेदी ने तुरंत कहा, “तो वे आपको यह भी बता देंगे कि मैं गांजा भी पीता हूं!”

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सिर्फ़ आंखें दिखाकर…

सुहेल अज़ीमाबादी का परिचय कराते हुए अलीगढ़ विश्व-विद्यालय के उर्दू विभाग के एक जलसे में काज़ी सत्तार ने कहा, “सुहेल अज़ीमाबादी साहब ने प्रेमचंद की आंखें देखी हैं।”

प्रसिद्ध आलोचक ख़ुरशीदुल इस्लाम साहब ने टुकड़ा लगाया, “ग़नीमत है कि प्रेमचंद आंख ही दिखलाकर रह गये, वरना तो उन्हें मार बैठना चाहिए था!”

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विवेक मेहता, vivek mehta

विवेक मेहता

पॉलिटेक्निक के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के विभागाध्यक्ष पद से सेवा-निवृत्त। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी से प्रसारित भी। कुछ समाचार-पत्रों के कॉलम किस्से बदरंग कोरोना के संग, 'वेताल कथाएँ, 'बेमतलब की चर्चित रहे। संपर्क: 94272 67470

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