premchand, प्रेमचंद
विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....

मुंशी प्रेमचन्द के नाम में 'मुंशी' कहां से आया?

             इस साहित्यिक जिज्ञासा का इतिहास रोचक है। प्रश्न उठता है कि प्रेमचन्द के नाम के आगे ‘मुंशी’ क्यों लगाया जाता है? क्या यह उनका वास्तविक नाम था? कोई सरकारी पदवी थी?क्या यह पारिवारिक उपनाम था? या फिर समाज द्वारा दिया गया सम्मान?

रोचक तथ्य यह है कि इन प्रश्नों का कोई एक सरल उत्तर नहीं है। ‘मुंशी’ शब्द का प्रेमचन्द के नाम से जुड़ना इतिहास, परम्परा और लोक-स्वीकृति, तीनों का ही सम्मिलित परिणाम है।

प्रेमचन्द का वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। साहित्य-साधना के प्रारम्भिक दौर में वे ‘नवाब राय’ नाम से लिखते थे। सन् 1908 में उनकी देशभक्ति से प्रेरित कहानी-संग्रह ‘सोज़-ए-वतन’ ब्रिटिश सरकार द्वारा ज़ब्त कर लिया गया। इसके बाद उन्होंने नया साहित्यिक नाम अपनाया, ‘प्रेमचन्द’। यही नाम आगे चलकर हिन्दी और उर्दू कथा-साहित्य में उनका नाम बन गया।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि उनके हस्ताक्षरों, पत्रों और अनेक मूल प्रकाशनों में केवल ‘प्रेमचन्द’ ही मिलता है। उन्होंने स्वयं अपने नाम के साथ ‘मुंशी’ का प्रयोग नहीं किया।

फ़ारसी-उर्दू परम्परा में ‘मुंशी’ किसी विद्वान, लेखक, शिक्षक, लिपिक, दफ़्तरी अधिकारी या भाषा-विशारद के लिए प्रयुक्त सम्मानसूचक शब्द था। उस समय यह केवल नौकरी का पदनाम नहीं था, बल्कि शिक्षा, विद्वत्ता और भाषाज्ञान का भी परिचायक था।

धीरे-धीरे उत्तर भारत में यह संबोधन उन लोगों के लिए भी प्रतिष्ठित हो गया जो लेखन-पठन और बौद्धिक कार्यों से जुड़े थे। इसी सामाजिक परम्परा में प्रेमचन्द भी आदरपूर्वक ‘मुंशी प्रेमचन्द’ कहलाने लगे।

एक क़िस्सा और भी है…

प्रेमचंद के नाम में ‘मुंशी’ संबोधन के विषय में एक रोचक कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है जब प्रेमचन्द पत्रिका ‘हंस’ का संपादन कर रहे थे, तब किसी प्रसंग में उनका नाम साहित्यकार कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के साथ संयुक्त रूप से प्रकाशित हुआ। कहीं ‘मुंशी-प्रेमचन्द’ जैसा उल्लेख छपा और धीरे-धीरे पाठकों ने ‘मुंशी’ को प्रेमचन्द के नाम का स्थायी अंग मान लिया।

यह कथा आकर्षक अवश्य है, किन्तु इसके समर्थन में ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर विद्वानों की राय है कि प्रेमचन्द के नाम के साथ ‘मुंशी’ किसी औपचारिक उपाधि के रूप में नहीं जुड़ा था। यह उस समय की सामाजिक-सांस्कृतिक परम्परा के अनुसार दिया गया सम्मानसूचक संबोधन था। जैसे किसी विद्वान को ‘पंडित’, किसी संत को ‘स्वामी’ या किसी शिक्षक को आदरपूर्वक ‘मास्टर साहब’ कहा जाता है, उसी प्रकार प्रेमचन्द के लिए ‘मुंशी’ का प्रयोग स्वाभाविक बन गया।

समय के साथ यह संबोधन इतना लोकप्रिय हुआ कि नई पीढ़ियों ने ‘मुंशी’ को उनके नाम का अभिन्न हिस्सा ही मान लिया। वास्तव में प्रेमचन्द की प्रतिष्ठा किसी उपाधि की मोहताज नहीं है। गोदान, गबन, निर्मला, रंगभूमि, कर्मभूमि, सेवासदन, कफ़न, पूस की रात, ईदगाह और नमक का दरोग़ा जैसी अमर रचनाएँ उन्हें विश्व-साहित्य के श्रेष्ठ कथाकारों की पंक्ति में स्थापित करती हैं। उनकी सबसे बड़ी पहचान उनकी लेखनी है। उन्होंने भारतीय समाज के किसान, मज़दूर, स्त्री, दलित, निम्न-मध्यवर्ग और शोषित मनुष्य को जिस यथार्थ और करुणा के साथ साहित्य में स्थान दिया, वही उनकी वास्तविक उपाधि है।

प्रेमचन्द के नाम के साथ जुड़ा ‘मुंशी’ न तो उनका जन्मजात उपनाम था, न कोई सरकारी सम्मान और न ही स्वयं उनके द्वारा अपनाया गया साहित्यिक नाम। यह समाज द्वारा उनकी विद्वत्ता, अध्यापन, भाषा-कौशल और साहित्यिक अवदान के प्रति व्यक्त सम्मान का संबोधन था। शायद यही कारण है कि आज जब हम ‘मुंशी प्रेमचन्द’ कहते हैं, तो हमारे मन में किसी पद या उपाधि का नहीं, बल्कि उस लेखक का स्मरण होता है जिसने भारतीय समाज की आत्मा को शब्द दिये।

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

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