
- July 31, 2026
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31 जुलाई प्रेमचंद जयंती पर ज़ाहिद ख़ान की कलम से....
प्रेमचंद, सज्जाद ज़हीर और प्रगतिशील आंदोलन
तरक़्क़ी-पसंद अदीबों का पहला ग्रुप साल 1935 में सज्जाद ज़हीर, डॉ. मुल्कराज आनंद, डॉ. ज्योति घोष, प्रमोद सेनगुप्त और डॉ. मुहम्मद दीन ‘तासीर’ ने लंदन में क़ायम किया था। मालूम हो कि लंदन में ही प्रगतिशील लेखक संघ के घोषणा-पत्र का मसौदा तैयार हुआ। बाद में ग्रुप ने इस मसौदे को साइक्लोस्टाइल करके हिन्दुस्तान के अपने दोस्तों मसलन डॉ. मुहम्मद अशरफ़, महमूदुज़्ज़फ़र, डॉ. रशीद जहाँ, प्रोफे़सर हीरेन मुखर्जी, डॉ. युसूफ़ हुसैन ख़ाँ और हत्थी सिंह आदि के नाम भेज दिया। ताकि वे उसे वहां के अदीबों को दिखाएं और इस पर उनकी राय लें।
कुछ अरसे बाद सज्जाद ज़हीर जब हिन्दुस्तान लौटे, तो उन्होंने प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन को कार्यरूप देने के लिए तमाम भारतीय भाषाओं के प्रमुख लेखकों मसलन कन्हैयालाल मुंशी, अहमद अली, फ़िराक़ गोरखपुरी, डॉ.सैयद ऐजाज़ हुसैन, पं.अमरनाथ झा, डॉ. ताराचंद से प्रगतिशील लेखक संघ के प्रस्तावित घोषणा-पत्र पर विचार-विनिमय शुरू किया। प्रेमचंद से सज्जाद ज़हीर की पहली मुलाक़ात कब और कैसे हुई, इसका ज़िक्र उन्होंने अपनी किताब ‘रौशनाई’ में तफ़सील से किया है। साल 1935 के दिसम्बर महीने में इलाहाबाद के अंदर हिन्दुस्तानी एकेडमी का एक सम्मेलन आयाजित हुआ। जिसमें उर्दू और हिन्दी के साहित्यकार इकट्ठे हुए। प्रेमचंद से उनकी पहली मुलाक़ात यहीं हुई।
इस मुलाक़ात के बाद तय हुआ कि मौलवी अब्दुल हक़, जोश मलीहाबादी और प्रेमचंद के साथ एक बैठक और हो और उसमें उनसे प्रगतिशील लेखक संघ के प्रस्तावित उद्देश्यों और घोषणा-पत्र पर सलाह-मशविरा किया जाये। यह बैठक सज्जाद ज़हीर के घर पर हुई। जहाँ प्रेमचंद ने घोषणा-पत्र पर अपनी रज़ामंदी जताते हुए इस पर ख़ुशी-ख़ुशी अपने दस्तख़त कर दिये। इसके बाद प्रगतिशील लेखक संघ के स्वरूप और मसौदे का प्रकाशन कराया गया और उसे देश के बड़े शहरों के प्रसिद्ध साहित्यकारों को भेज दिया गया, ताकि वे इस संगठन से जुड़ें।

इस कवायद के बाद यह सोच बनी कि अब प्रगतिशील लेखकों की एक अखिल भारतीय कॉन्फ्रेंस हो, जिसमें इस सोच के साहित्यकार इकट्ठे हों और केन्द्रीय संगठन का बाक़ायदा निर्माण हो सके। कॉन्फ्रेंस लखनऊ में हो और इसकी अध्यक्षता प्रेमचंद से करने की दरख़्वास्त की जाये। प्रेमचंद उस वक़्त बनारस में रहते थे। सज्जाद ज़हीर संगठन के निर्माण और दूसरे मसलों पर उनसे लगातार ख़तो-किताबत करते रहते थे।
प्रगतिशील साहित्य आंदोलन में प्रेमचंद की दिलचस्पी भी बढ़ रही थी। लेकिन उनकी बहुत-सी व्यस्तताएं थीं। उस वक़्त आलम यह था कि देश के किसी भी हिस्से में हिन्दी या उर्दू की कोई भी अदबी कॉन्फ्रेंस या जलसा हो, प्रेमचंद से ही सब अध्यक्षता कराते थे। प्रेमचंद भी अपने विनम्र स्वभाव की वजह से इसके लिए मना नहीं करते थे। सज्जाद ज़हीर की ज़िद और बार-बार इसरार के बाद प्रेमचंद प्रगतिशील लेखक संघ के पहले राष्ट्रीय अधिवेशन की अध्यक्षता इस शर्त पर करने के लिए राज़ी हो गये कि वे इसमें अपना लिखित वक्तव्य देंगे। और वे किसी मसले पर बहस चाहते हैं, तो इसका इशारा कर दें। ताकि वे बातें भी वक्तव्य में जोड़ दी जाएं।
प्रेमचंद सज्जाद ज़हीर के घर ही ठहरे। लखनऊ के मशहूर ‘रिफ़ाह-ए-आम’ क्लब में 9 अप्रैल, 1936 को प्रगतिशील लेखक संघ का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन शुरू हुआ। स्वागत वक्तव्य के बाद मुंशी प्रेमचंद सर्वसम्मति से कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष चुने गये। प्रेमचंद ने अपने लम्बे अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रगतिशील लेखक संघ की ज़रूरत और उद्देश्यों पर रौशनी डालते हुए कहा…
‘हम चाहते हैं कि साहित्य केन्द्रों में हमारी परिषदें स्थापित हों और वहाँ साहित्य की प्रवृतियों पर नियमपूर्वक चर्चा हो, निबंध पढ़े जाएं, बहस हो, आलोचना-प्रत्यालोचना हो। तभी वह वातावरण बनेगा। तभी साहित्य में नये युग का आविर्भाव होगा।’
उन्होंने अपने इस शानदार वक्तव्य का समापन इन यादगार शब्दों से किया…
‘हमारी कसौटी पर वह साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिन्तन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो, जो हम में गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाये नहीं क्योंकि अब और ज़्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।’
प्रेमचंद को इस वक्तव्य को पढ़ने में कोई चालीस-पैंतालीस मिनट के आस-पास लगे। उनके इस वक्तव्य पर सज्जाद ज़हीर, तो जैसे बिल्कुल फ़िदा थे। प्रेमचंद के वक्तव्य के बारे में उनका यहाँ तक दावा था, ‘प्रगतिशील साहित्य आंदोलन की अपेक्षा और उद्देश्यों के सम्बन्ध में शायद इससे बेहतर चीज़ अभी तक नहीं लिखी गयी है।’
सज्जाद ज़हीर ने इस वक्तव्य की अहमियत जताते हुए आगे लिखा है, ‘इसका महत्व इसलिए और बढ़ जाता है, क्योंकि यह हमारी भाषा के एक महान यथार्थवादी कथाकार की संवेदनामय अभिव्यक्ति है।’
अधिवेशन 9 और 10 अप्रैल यानी दो दिन हुआ, जिसमें प्रगतिशील लेखक संघ का घोषणा-पत्र पेश किया गया और यह सर्वसम्मति से पारित हुआ। संगठन का एक संविधान भी स्वीकृत हुआ। इसका मसौदा डॉ. अब्दुल अलीम, महमूदुज़्ज़फ़र और सज्जाद ज़हीर ने मिलकर तैयार किया था। इस तरह बाक़ायदा लेखकों के एक अखिल भारतीय संगठन ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की स्थापना की गयी। सज्जाद ज़हीर को इसका पहला महासचिव चुन लिया गया। प्रेमचंद एक बार प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े, तो उसी के ही होकर रह गये।
लेखकों के इस महत्वाकांक्षी संगठन के विचार और उद्देश्यों को लोगों तक पहुँचाने की उन्होंने गम्भीरता से कोशिशें शुरू कीं। अपनी किताब ‘रौशनाई’ में सज्जाद ज़हीर लिखते हैं, ‘लखनऊ कॉन्फ्रेंस के बाद मुंशी प्रेमचंद की आंदोलन में बहुत ज़्यादा दिलचस्पी बढ़ गयी थी। और वे अब सही मायनों में इसके मार्गदर्शक और निर्माता बन गये थे।’ सज्जाद ज़हीर का तो यहाँ तक कहना है…
‘वे अपनी हिन्दी पत्रिका ‘हंस’ को इस नये आंदोलन का मुख-पत्र बनाना चाहते थे। उनकी यह इच्छा थी कि हमारा एक केन्द्रीय पत्र अंग्रेज़ी में बाक़ायदा प्रकाशित हो और देश की दूसरी भाषाओं में या तो नयी प्रगतिशील पत्रिकाएं प्रकाशित हों या जो मौजूदा पत्रिकाएं हैं, उन्हीं को नया रंग दिया जाये। वे संगठन के घोषणा-पत्र तथा लखनऊ कॉन्फ्रेंस की व्यथा-कथा का ज़्यादा से ज़्यादा प्रचार-प्रसार चाहते थे।….वे चाहते थे कि देश के हर भाषाई क्षेत्र में संगठन की शाखाएं खुलें और ख़ुद उन्होंने इसका बीड़ा उठाया था कि अलग-अलग जगहों पर जाकर अपने व्यवहार और प्रभाव से नयी इकाइयाँ क़ायम कराएंगे। वे चाहते थे संगठन की व्यवस्था के लिए कुछ पूर्णकालिक कार्यकर्ता हों।’
संगठन में प्रेमचंद का रोल
प्रेमचंद का साहित्यिक क़द उस वक़्त बहुत बड़ा था। अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भारत साहित्य परिषद् और देश की अनेक संस्थाओं से उनका सम्बन्ध था। गाँधी जी के हिन्दुस्तानी आंदोलन से भी वे जुड़े हुए थे। प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ने के बाद प्रेमचंद ने इन संस्थाओं से अपना सम्बन्ध तो नहीं छोड़ा, लेकिन अपनी प्राथमिकता प्रलेसं की विचारधारा को लोगों तक पहुँचाने की बना ली। इस दौरान प्रेमचंद जिस साहित्यिक सभा या आयोजन में शामिल हुए, उन्होंने वहाँ अपना प्रगतिशील दृष्टिकोण ही प्रस्तुत किया।
प्रेमचंद ने अपनी साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ के जुलाई, 1936 अंक में लखनऊ राष्ट्रीय अधिवेशन में दिये अध्यक्षीय भाषण का तो हिन्दी में अुनवाद प्रकाशित किया ही, साथ ही बनारस, पटना, नागपुर आदि देश के साहित्य और संस्कृति से जुड़े प्रमुख शहरों में अपने दोस्तों, हिन्दी और उर्दू के साहित्यकारों को प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन से भी जोड़ा। वो कांग्रेस या ‘हिन्दी साहित्य परिषद्’ के जलसों में जाते, तो इस आंदोलन के उद्देश्यों का बाक़ायदा प्रचार करते।
लेखन में ऐसे बदले तेवर
प्रेमचंद उस वक़्त न सिर्फ सांगठनिक दृष्टि से बेहद सक्रिय थे, बल्कि उनके लेखन में भी अब बदलाव दिखायी देने लगा था। साल 1936 वह साल है, जिसमें ‘गोदान’ जैसा एपिक उपन्यास, ‘कफ़न’ जैसी कालजयी कहानी और दिल को झिंझोड़ देने वाला निबंध ‘महाजनी सभ्यता’ उनकी धारदार क़लम से निकला। साहित्यिक लेखन के अलावा प्रेमचंद ‘हंस’ पत्रिका के सम्पादकीय और अपने आलेखों में भी प्रगतिशील विचारों को आगे बढ़ा रहे थे। उन्होंने अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य प्रगतिशील और जनवादी विचारों को अधिक से अधिक देशवासियों तक पहुँचाना बना लिया था। लेकिन अफ़सोस, प्रगतिशील लेखक संघ गठन के सिर्फ़ छह महीने बाद ही महज़ छप्पन साल की उम्र में 8 अक्टूबर, 1936 को प्रेमचंद ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। यदि उन्हें और ज़िंदगी मिलती, तो प्रगतिशील लेखक संघ को निश्चित तौर पर उनकी व्यापक दृष्टि और विचारों का फ़ायदा पहुँचता। सच बात तो यह है कि प्रगतिशील लेखक संघ का आज जो हमें स्वरूप दिखायी देता है, उसमें प्रेमचंद की रहनुमाई का भी बड़ा हाथ है।
प्रेमचंद की असमय मौत का सबसे ज़्यादा ग़म और अफ़सोस सज्जाद ज़हीर को हुआ, जिसका इज़हार उन्होंने बड़े ही ग़मगीन लफ़्ज़ों में ‘रौशनाई’ में किया है। प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन में प्रेमचंद के बेमिसाल योगदान को याद करते हुए वे लिखते हैं…
‘यह दुःख और भी बढ़ जाता है, जब यह एहसास हो कि मरने वाले को अभी मरना न था, अभी उसकी जिजीविषा ने जवाब न दिया था। बल्कि एक क्रूर और कृतघ्न समाज ने अपनी उपेक्षा से एक मूल्यवान हीरे को मौत के हाथों कौड़ियों के मोल बेच दिया। दुनिया के सबसे बड़े राष्ट्र का एक महान साहित्यकार, दस करोड़ हिन्दी और उर्दू बोलने वालों का सबसे बड़ा कथाकार, ज़रूरी नहीं कि इस तरह और इन हालात में यहाँ से उठ जाये जैसा कि प्रेमचंद। वे बूढ़े न थे। अभी तो उनकी जवानी ख़त्म हुई थी। और प्रौढ़ावस्था की शुरूआत थी। उनका आर्ट सौंदर्य, चिन्तन और प्रभावमयता की नयी बुलंदियों पर पहुँच रहा था। उसमें सक्रियता और विकास बराबर जारी था। अपने समाज की चेतना, अपने राष्ट्र के आम मेहनतकशों, ईमानदार लोगों के प्रति उनका लगाव और उनके लिए, सीने का दर्द बढ़ रहा था…ऐसे में वे यकायक दामन झाड़कर उठ खड़े हुए और हमें छोड़कर चले गये। शायद इसलिए कि एक अच्छे शिक्षक और मार्गदर्शक की तरह हमें सख़्ती से यह सबक़ सिखाएँ कि दुनिया का हर जीवित और सच्चाई पर टिका हुआ आंदोलन किसी एक व्यक्ति का इतना आश्रित नहीं होता कि उसके बिना वह चल ही न सके। प्रेमचंद उठ गये लेकिन हमारे कथा-साहित्य के उपवन में यथार्थ चित्रण और मानव-मैत्री के जो नाज़ुक पौधे उन्होंने लगाये थे, आज वे फल-फूल रहे हैं। प्रगतिशील साहित्य का आंदोलन, जिसकी उन्होंने शुरूआती और मुश्किल दिनों में रहनुमाई की थी, आज देश का सबसे बड़ा और सबसे महत्त्वपूर्ण साहित्यिक आंदोलन है।’

जाहिद ख़ान
इक्कीसवीं सदी के पहले दशक से लेखन की शुरुआत। देश के अहम अख़बार और समाचार एवं साहित्य की तमाम मशहूर मैगज़ीनों में समसामयिक विषयों, हिंदी-उर्दू साहित्य, कला, सिनेमा एवं संगीत की बेमिसाल शख़्सियतों पर हज़ार से ज़्यादा लेख, रिपोर्ट, निबंध,आलोचना और समीक्षा आदि प्रकाशित। यह सिलसिला मुसलसल जारी है। अभी तलक अलग-अलग मौज़ूअ पर पन्द्रह किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक के हमसफ़र’ के लिए उन्हें ‘मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन’ का प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘वागीश्वरी पुरस्कार’ मिला है। यही नहीं इस किताब का मराठी और उर्दू ज़बान में अनुवाद भी हुआ है।
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