shiv kumar shiv, शिव कुमार शिव स्मृति सम्मान
शिव कुमार शिव स्मृति सम्मान और शिव कुमार शिव की ‘प्रतिनिधि कहानियां’ का लोकार्पण

कथाकार प्रज्ञा और सविता पाठक सम्मानित

            समकालीन चर्चित कथाकार प्रज्ञा को 2025 में प्रकाशित उनके कहानी संग्रह ‘काठ के पुतले’ व सविता पाठक को उनके उपन्यास “कौन देस उतरने का” के लिए ‘शिव कुमार शिव स्मृति सम्मान-26” प्रदान किया गया। इस अवसर पर राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित शिव कुमार शिव जी की “प्रतिनिधि कहानियाँ” का लोकार्पण भी किया गया।

इंडिया इंटेरनेश्नल सेंटर, दिल्ली में 30 अगस्त को क़िस्सा पत्रिका परिवार द्वारा वरिष्ठ साहित्यकार, आलोचक, और संस्कृतिकर्मी शिव कुमार शिव की स्मृति में एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य साहित्यकार के अनुपम योगदान का स्मरण करना और मानवीय मूल्यों, जनचेतना एवं लोक के प्रश्नों से जूझती कलम को सम्मानित कर प्रोत्साहित करना था।

कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार ममता कालिया ने की। वरिष्ठ साहित्यकार, विचारक, चिंतक पुरुषोत्तम अग्रवाल कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे। ग्रामीण संवेदना के चितेरे वरिष्ठ साहित्यकार महेश कटारे एवं वरिष्ठ साहित्यकार-संपादक लीलाधर मांडलोई प्रमुख वक्ता थे।

shiv kumar shiv, शिव कुमार शिव स्मृति सम्मान

वृत्तचित्र की स्क्रीनिंग

कार्यक्रम का प्रारंभ शिव कुमार शिव के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित डॉक्युमेंट्री से हुआ। इसमें उनके अपनी मिट्टी भागलपुर के प्रति प्रेम, मानवीय मूल्यों के प्रति ज़िद, और साहित्यिक चेतना के प्रति जुझारूपन के दिग्दर्शन ही नहीं हुए बल्कि उनके पारिवारिक मूल्यों का भी बारीकी से रेखांकन हुआ। यह एक ऐसा क्षण था, जब पूरा सभागार भावुक हो गया। तत्पश्चात अतिथियों को मंच पर बुलाकर कार्यक्रम का विधिवत आरंभ किया गया।

किस्सा पत्रिका की प्रबंध संपादक मीनाक्षी सिंघानिया ने कार्यक्रम की अध्यक्ष ममता कालिया का व आनंद सिंघानिया ने मुख्य अतिथि पुरुषोत्तम अग्रवाल का दुशाला व गुलदस्ते से स्वागत किया। मुख्य वक्ताओं को स्वागत सक्षम भारद्वाज, आनंद सिंघानिया ने किया।

मीनाक्षी ने स्वागत भाषण से अतिथियों का स्वागत किया और किस्सा पत्रिका की संपादक अनामिका शिव जी के पिता को लिखे गये पत्र का पाठ भी किया। इस भावुक पत्र की शुरूआत अनामिका जी ने ‘पा’ सम्बोधन के साथ की। वे अपने पिता को ‘पा’ कहकर ही संबोधित करती थीं। इस पत्र ने पिता-पुत्री के स्नेह को ही प्रदर्शित नहीं किया बल्कि यह भी सिद्ध किया कि समता, समानता की नींव से रचे गये घरों की बेटियाँ विरासतें संभालती हैं और बहुएं बहनों की तरह हाथ मिलाकर साथ चलती हैं।

पुस्तक लोकार्पण एवं चर्चा

कार्यक्रम का अगला भाग राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित शिव कुमार शिव जी की “प्रतिनिधि कहानियाँ” पुस्तक के लोकार्पण के नाम रहा। ममता कालिया, पुरुषोत्तम अग्रवाल, महेश कटारे, लीलाधार मंडलोई, कथाकार प्रज्ञा, सविता पाठक एवं राजकमल प्रकाशन समूह के आमोद माहेश्वरी व अशोक माहेश्वरी ने भारी करतल ध्वनि के मध्य पुस्तक को पाठकों को समर्पित किया।

वरिष्ठ साहित्यकार महेश कटारे ने शिव कुमार शिव जी की कहानियों पर विस्तार से अपनी बात रखी। उनके वक्तव्य में मित्रवत स्नेह, संवेदनाओं की सुवास और साहित्याकाश के साथ-साथ निजी जीवन में उपजे ख़ालीपन का दर्द भी स्पष्ट रूप से दिख रहा था। उन्होंने शिव की क़िस्सागोई की प्रशंसा करते हुए कहा, वे अपनी कहानियों के पात्र कल्पना से नहीं उठाते थे उनकी कहानियों के पात्र रोज़मर्रा के जीवन से टकराने वाले लोग हैं। उनकी कहानियों में प्रेम और देह ज़रूरी बिन्दु हैं, लेकिन वे कलात्मकता के साथ आते थे न कि किसी फूहड़पन या अश्लीलता के साथ। सहज भाषा में लिखी गयी उनकी कहानियों के बारे में अपनी बात रखते हुए उन्होंने आगे कहा कि शिव कुमार शिव की कहानियों में मौन चीत्कार, उदासियों और हाहाकार की एक भीषण दुनिया बसी होती है। पढ़ने के पश्चात पाठक सहज नहीं रह पाता है। सामाजिक असमानताओं के प्रश्नों को पाठकों के मन में बो देना ही उनकी कहानियों की जीत है।

पुरस्कृत कथाकारों कि कहानियों पर अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा दोनों ही कथाकारों की कहानियाँ दिल्ली की उन बस्तियों से होकर गुज़रती हैं जिन्हें विकास की चमक से चुँधियाई आँखें अक्सर देख नहीं पाती हैं। सविता पाठक के उपन्यास “कौन देस उतरने का” पर अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा ये देश के गाँवों से रोज़ी-रोटी की तलाश में शहर आये लोगों की मार्मिक कथा है, उनकी जो अपने ही देश में विस्थापित हैं। इनका जीवन समाजिक व्यवस्था और राज्य व्यवस्था का मारा हुआ जीवन है। इनकी एक ही जाति है ‘ग़रीबी’। महिलाओं पर तो पितृसत्ता का दोगुना बोझ है। लोक भाषा और लोक रंग में रंगी कथा सोचने पर विवश कर देती है।

कथाकार प्रज्ञा की कहानियों पर अपना मन्तव्य रखते हुए उन्होंने कहा कि वे उनकी कथाएँ पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ते रहे हैं। ‘मन्नत टेलर’ का ज़िक्र करते हुए प्रज्ञा की कहानियों में समाज के दमित, शोषित वर्ग के लिए शाइस्तगी से एक गंभीर आवाज़ उठती है। वे समाज के अंधेरे कोनों को दिखाती ही नहीं बल्कि परिवर्तन की एक किरण भी थमाती हैं। बेचैन परिस्थितियों से संघर्ष करते उनके पात्र आशा की मशाल थामे रखते हैं।

सम्मान एवं वक्तव्य

महेश कटारे जी के वक्तव्य के बाद मंचासीन अतिथियों द्वारा क्रमशः सविता पाठक व प्रज्ञा को सम्मानित किया गया। उनके प्रशस्ति पत्र का मंच से पाठ कर सम्मान स्वरूप उन्हें दुशाला, प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिह्न व 51,000 रुपये की राशि प्रदान की गयी। सभागार को संबोधित अपने वक्तव्य में कथाकार प्रज्ञा ने शिव कुमार शिव की स्मृतियों को नमन करते हुए किस्सा पत्रिका परिवार के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि आज के समय में हम अनेक दुनियाओं में जी रहे हैं। एक दुनिया आभासी है, एक वास्तविक, एक जो हम पर थोपी जा रही है और एक जो हम बनाना चाहते हैं। मेरा लेखक अपनी रचनात्मक संवेदना से व्यवस्था द्वारा काठ के पुतले बनाये जाने का पुरज़ोर विरोध करता हुआ प्रगतिशील परंपरा के साथ खड़ा होता है और अन्याय अपमान अनीति के प्रतिकार का विकल्प चुनता है।

सविता ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए शिव कुमार शिव की कहानियों की चर्चा की। उनकी सहज भाषा और किस्सागोई की प्रशंसा करते हुए उन्होंने उनकी यथार्थ चित्र उकेरने की कला को सीखने योग्य बताया। अपने उपन्यास के बाबत उन्होंने कहा कि उपन्यास के नाम में देश की जगह देस चुनना ही कथा के लोक से जुड़े होने की गवाही है। वह लोक, जो उस ग्राम्य जीवन की छटपटाहट है, जो अपनी माटी से दूर शहर में आकार संवेदना की बूंदें तलाशती है।

लीलाधर मंडलोई ने दोनों कथाकारों की पुस्तकों की विवेचना करते हुए कहा कि जनचेतना की आवाज़ हैं ये पुस्तकें। कथाकार प्रज्ञा की कहानी ‘काठ के पुतले’ पर बात रखते हुए उन्होंने कोयले की खानों में श्रमिकों के लगातार खड़े रहने के दर्द पर लिखी अपनी कविता का भी ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि अन्याय के ख़िलाफ़ प्रतिरोध की शुरूआत ही साहित्य की नींव है।

“…पर ये स्त्री विमर्श नहीं”

मुख्य अतिथि पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपने वक्तव्य में कहा इन दोनों किताबों में स्त्री पात्र तो हैं पर ये स्त्री विमर्श नहीं रचती हैं। सविता पाठक का यह पहला उपन्यास है और इसको सम्मान मिलने का अर्थ है कि अभी भी गंभीर काम को चीन्हने वाले संपादक हैं। जब तक ऐसा है साहित्य और सरोकार की आवाज़ सुरक्षित है। उन्होंने किस्सा पत्रिका परिवार की भी सराहना की, जो अपनी धरोहरों को सहेज रहा है।

कार्यक्रम की अध्यक्ष ममता कालिया ने अपने संक्षिप्त वक्तव्य में दोनों कथाकारों की कहानियों पर प्रकाश डालते हुए उन्हें यूं ही अधेरों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने को प्रेरित किया। उनके वक्तव्य के बाद मीनाक्षी ने धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम की समाप्ति की घोषणा की।

कार्यक्रम का संचालन कथाकार वंदना बाजपेयी ने किया। कार्यक्रम में हरियश राय, अनामिका, वंदना राग, गीताश्री, राकेश कुमार, सिनीवाली, योगिता यादव, सुमन केशरी, कल्पना मनोरमा सहित अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकार उपस्थित थे।

-प्रेस विज्ञप्ति

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