
गूंज बाक़ी… हमारी इस शृंखला में इस बार मित्रता दिवस का विशेष संदर्भ, किसी किताब के पन्ने नहीं बल्कि यादों के वरक़। हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध साहित्यकारों के दोस्ताना रिश्तों के क़िस्से…
प्रसिद्ध कवियों/लेखकों की दोस्ती के किस्से
इस विषय में शायद सबसे चर्चित निराला और महादेवी का मैत्री-प्रसंग है, जो एकदम-से याद आ सकता है। फ़ैज़ भी बड़े यारबाश शायर रहे, मजाज़ या सरदार के साथ उनके दोस्ताना संबंधों की कितनी ही बातें हैं… बहरहाल, यहां ऐसे कुछ क़िस्से जो बड़े मशहूर रहे हैं और कुछ-एक ऐसे भी जो कमसुने रह गये। इन बहुत-से क़िस्सों की ख़ास बात यह है कि मतभेद होते हुए भी दोस्ती को कैसे जिया जाता है…
मंटो और इस्मत
यह उर्दू साहित्य की सबसे चर्चित मित्रताओं में है। सआदत हसन मंटो और इस्मत चुग़ताई दोनों प्रगतिशील लेखक आंदोलन से जुड़े थे। दोनों पर अश्लीलता के मुक़द्दमे चले, मंटो पर कई बार और इस्मत पर “लिहाफ़” की वजह से। इस साझा अनुभव ने उनके बीच गहरा अपनापन पैदा किया। दोनों एक-दूसरे की रचनाओं के सबसे कठोर लेकिन ईमानदार आलोचक भी रहे।
इस्मत ने अपने संस्मरण “मेरा दोस्त मेरा दुश्मन” में लिखा है कि मंटो से उनकी मुलाकातें अक्सर बहस से शुरू होतीं और हँसी पर खत्म होतीं। मंटो ने भी “On Ismat Chughtai” शीर्षक लेख में इस्मत की लेखकीय ईमानदारी की खुलकर प्रशंसा की।
दिलचस्प प्रसंग: दोनों के विरुद्ध जब लाहौर में मुक़द्दमा चला तो वे अदालत की कार्यवाही को भी एक तरह के साहित्यिक रोमांच की तरह लेते थे। कहा जाता है कि अदालत से निकलकर दोनों घंटों चाय और बहस में समय बिताते थे।

फ़िराक़ और जोश
फ़िराक़ गोरखपुरी और जोश मलीहाबादी दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी, हालांकि बहसें भी खूब होती थीं। कहा जाता है किसी मुशायरे में एक-दूसरे पर तंज़ कसने के बाद भी शाम को साथ बैठकर घंटों गपशप करते थे। दोनों एक-दूसरे की प्रतिभा का सम्मान करते थे, भले ही साहित्यिक मतभेद बने रहे। ऐसे प्रसंग कई संस्मरणों में दर्ज हैं।
सुभद्रा और महादेवी
क्रॉस्थवेट गर्ल्स स्कूल, प्रयाग की यह मित्रता हिंदी साहित्य की सबसे भावुक मित्रताओं में गिनी जाती है। सुभद्रा कुमारी चौहान और महादेवी वर्मा दोनों साथ पढ़ती थीं, साथ कविताएँ लिखती थीं और एक-दूसरे को अपनी नयी रचनाएँ सबसे पहले सुनाती थीं। महादेवी ने लिखा कि सुभद्रा का सहज स्नेह और निर्भीक व्यक्तित्व उन्हें हमेशा प्रेरित करता रहा। बाद में उन्होंने “पथ के साथी” में सुभद्रा पर अत्यंत मार्मिक संस्मरण लिखा।
दुष्यंत और भारती
प्रसिद्ध कवि दुष्यंत कुमार और प्रसिद्ध लेखक व संपादक धर्मवीर भारती के बीच दोस्ती इतनी प्रगाढ़ रही कि दुष्यंत को दुष्यंत बनाने का श्रेय तक कुछ जानकार भारती को देते हैं। दोस्ती में चुहलबाज़ी और गिले शिकवे भी चलते रहते थे। एक बार लेखकों को मिलने वाले कम मानदेय को लेकर शिकायती लहजे में दुष्यंत ने एक ग़ज़ल लिख भेजी। कुछ यूं:
पत्थर नहीं हैं आप तो पसीजिए हुज़ूर
संपादकी का हक़ तो अदा कीजिए हुज़ूर
अब ज़िंदगी के साथ ज़माना बदल गया
पारिश्रमिक भी थोड़ा बदल दीजिए हुज़ूर
कल मयक़दे में चेक दिखाया था आपका
वे हंस के बोले इससे ज़हर पीजिए हुज़ूर
शायर को सौ रुपये तो मिलें जब ग़ज़ल छपे
हम ज़िन्दा रहें ऐसी जुगत कीजिए हुज़ूर
लो हक़ की बात की तो उखड़ने लगे हैं आप
शी! होंठ सिल के बैठ गये, लीजिए हुजूर
ख़त मिलते ही धर्मवीर भारती ने जैसे को तैसा वाले अंदाज़ में जवाब लिख भेजा:
जब आपका ग़ज़ल में हमें ख़त मिला हुज़ूर
पढ़ते ही यक-ब-यक ये कलेजा हिला हुज़ूर
ये ‘धर्मयुग’ हमारा नहीं सबका पत्र है
हम घर के आदमी हैं हमीं से गिला हुज़ूर
भोपाल इतना महंगा शहर तो नहीं कोई
महंगाई का बांधते हैं हवा में किला हुज़ूर
पारिश्रमिक का क्या है बढ़ा देंगे एक दिन
पर तर्क आपका है बहुत पिलपिला हुज़ूर
शायर को भूख ने ही किया है यहाँ अज़ीम
हम तो जमा रहे थे यही सिलसिला हुज़ूर
बताते हैं बाद में इन दोनों ख़तों को या कहिए शिकायती व जवाबी ग़ज़ल को धर्मयुग में प्रकाशित भी किया गया था। कई जगह यह क़िस्सा पढ़ने को मिल जाता है।
सार्त्र और कामू
दोनों दार्शनिक और राजनीतिक दृष्टिकोण में बेहद समान थे, अस्तित्ववादी और मार्क्सवादी होने के साथ-साथ दोनों ही आकर्षक बहुप्रेमी प्रेमी भी थे। एक मतभेद ने उनकी दोस्ती में खटास पैदा कर दी क्योंकि सार्त्र कट्टरपंथी स्वतंत्रता में विश्वास रखते थे और इसलिए साम्यवाद के साथ होने वाली हत्याओं को उचित मानते थे। वहीं, कामू क्रांतिकारी हिंसा से घृणा करते थे और किसी आदर्श के नाम पर हत्या को प्रोत्साहित नहीं करते थे।
उनके निजी जीवन में भी तब समस्याएँ आईं जब सार्त्र की दीर्घकालिक प्रेमिका और बौद्धिक नारीवादी सिमोन डी बोवॉयर ने कैमस को डेट पर जाने का प्रस्ताव दिया। समस्या सिमोन के प्रस्ताव देने में नहीं, बल्कि कैमस द्वारा उनके प्रस्ताव को ठुकराने में थी।
कैमस की मृत्यु हो गयी और कई वर्षों बाद जब सार्त्र ने उन्हें याद किया तो उन्होंने कहा, “शायद वह मेरे आख़िरी दोस्त थे।”
टॉल्किन और लुईस
द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स और द क्रॉनिकल्स ऑफ नार्निया के रचनाकार जे.आर.आर. टॉल्किन और सी.एस. लुईस न केवल ऑक्सफोर्ड में सहकर्मी थे, बल्कि गहरे दोस्त भी थे, जो अपने साहित्यिक समूह “इंकलिंग्स” में नियमित रूप से मिलते थे। आस्था, पौराणिक कथाओं और कहानी कहने पर उनकी बहसों ने उनकी काल्पनिक दुनियाओं को गहराई से प्रभावित किया।
चेस्टरटन और शॉ
जी.के. चेस्टरटन और जॉर्ज बर्नार्ड शॉ राजनीतिक, सामाजिक और दार्शनिक रूप से एक-दूसरे के घोर विरोधी थे, लेकिन एक मज़बूत और जीवंत मित्रता बनाये रखी, और साथ ही एक-दूसरे पर तीखे साहित्यिक हमले भी करते रहे। वैसे, शॉ और चेस्टरटन दोनों ने एक ऐसी वेस्टर्न फ़िल्म में थोड़े समय के लिए काउबॉय की भूमिका भी निभायी थी, जो दुर्भाग्यवश रिलीज़ नहीं हुई।
ज़ाहिर है यहां कई क़िस्से छूट गये हैं, आपको कौन-से याद आते हैं? ज़रूर बताइए, हमें इंतज़ार रहेगा…
(डिस्क्लेमर: यहां दिये गये प्रसंग इंटरनेट एवं प्रचलित माध्यमों से मिली जानकारी के अनुसार)

कृष्ण चंद्र बेदी और उपेंद्र नाथ अश्क की दोस्ती के किस्से बेदी, मेरा हमदम मेरा दोस्त में पढ़े जा सकते हैं।