कमलेश भट्ट कमल, kamlesh bhatt kamal
पाक्षिक ब्लॉग ज्ञानप्रकाश पांडेय की कलम से....

कमलेश भट्ट कमल: नाम बड़ा और दर्शन?

            हिंदी ग़ज़ल में अब तक जितनी भी लीपापोती हुई है, उसमें से एक मुद्दा हमेशा ही एड़ी उठा-उठा कर अपनी ओर ध्यान आकर्षित करता रहा है— यह मुद्दा हिंदी ग़ज़ल की समीक्षा का है। मुख्यधारा के लोगों ने हमेशा ही हिन्दी ग़ज़ल का न्योता काटने का प्रयास किया है।हिन्दी ग़ज़ल की औकात मुख्यधारा की दृष्टि में उढ़री बहुरिया से अधिक कभी न थी। साहित्यिक वर्ग को प्रायः हर समय हिंदी ग़ज़ल की उपेक्षा करते ही पाया है। हाँ, दुष्यंत कुमार किसी अपवाद की तरह आरंभ से अंत तक स्वीकृति प्राप्त करते रहे। समय के साथ यह कठोरता कुछ कम अवश्य हुई और अनेक छोटे-बड़े समीक्षक सामने आये, जैसे अनिरुद्ध सिन्हा, ज़ियाउर्रहमान जाफ़री, सुल्तान अहमद, नचिकेता तथा कमलेश भट्ट कमल। इन सबके आने से हिंदी ग़ज़ल को कुछ आधार अवश्य मिला, किंतु वह गंभीर और सुविचारित आलोचनात्मक वातावरण अभी तक पूर्णतः विकसित नहीं हो सका, जिसकी आवश्यकता है।

इसका एक कारण यह भी रहा कि कुछ अपवादों को छोड़कर अनेक लोग ग़ज़ल-आलोचना के विकास से अधिक अपने व्यक्तिगत विस्तार में रुचि लेते दिखायी दिये। फिर भी जो कुछ उपलब्ध है, उसे नकारा नहीं जा सकता। संतोष की बात यह है कि हिंदी ग़ज़ल-आलोचना धीरे-धीरे ही सही, पर आगे बढ़ रही है और अधिक परिपक्वता की दिशा में अग्रसर है। इस छोटे से टिप्पणी-प्रधान लेख में, मैं कमलेश भट्ट कमल की ग़ज़लों के कुछ बिंदुओं की ओर संकेत करने का प्रयास करूँगा। यहाँ ग़ज़ल-आलोचना का उल्लेख इसलिए भी आवश्यक है कि कमल साहब स्वयं को एक समीक्षक के रूप में भी प्रस्तुत करते हैं; अतः उनसे ग़ज़ल की बारीकियों के प्रति सजगता और सावधानी की अपेक्षा स्वाभाविक है। ख़ैर…

कमलेश भट्ट कमल साहब हिंदी के सम्मानित शायरों में गिने जाते हैं। लोग उन्हें इस रूप में मानें या न मानें, वे स्वयं अपने व्यक्तित्व और लेखन के प्रति पर्याप्त विश्वास और उम्मीद रखते हैं। उनका रचना-संसार कई दिशाओं में फैला दिखायी देता है, मानो निरंतर फैलता हुआ कोई तंबू हो। हर फटे में गोड़ डाला है भले ही कोई ख़ास सफलता न मिली हो। अपने समर्थकों की दृष्टि में वे सफल भी हो सकते हैं। हिंदी साहित्य की अनेक विधाओं में उनके जोड़-घटाव देखे जा सकते हैं, मगर सिक्के के प्रायः दोनों पहलू ही निराश करते हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि उनके लेखन का प्रत्येक पक्ष कृष्ण पक्ष से शुरू होकर कृष्ण पक्ष में ही समाप्त हो जाता है।

हिंदी ग़ज़ल में सक्रिय अनेक रचनाकारों के यहां बड़ी संख्या में शेर और ग़ज़ल कहने का शौक़ या चलन देखा जाता है, जबकि उनकी मूल्यवत्ता पर सवालिया निशान लगा रहता है। अब तक हमने कमलेश भट्ट कमल की ग़ज़लों की बहुत प्रशंसा सुन रखी थी। सुना कि उन्होंने अनेक साहित्यिक विधाओं में हाथ आज़माया, चाहे प्रत्येक क्षेत्र में समान सफलता प्राप्त न हुई हो। पढ़ने और समझने की इच्छा बनी, किंतु वहाँ आश्चर्यजनक निराशा ही हाथ लगी।

कमलेश भट्ट कमल, kamlesh bhatt kamal

अब उनकी ग़ज़लों की ओर चलें। कमलेश जी ने शिल्प-पक्ष के निर्वाह का पूरा प्रयास किया है, पर जैसा कि हिंदी के अनेक ग़ज़लकारों में देखने को मिलता है, भट्ट साहब भी कहीं-न-कहीं उसी उलझन में फँसते दिखायी देते हैं। अंततः प्रश्न यह उठता है कि हिंदी ग़ज़लकारों को यह बात स्पष्ट रूप से क्यों नहीं बतायी जाती कि…

“ले सांस भी आहिस्ता कि नाज़ुक है बहुत काम
आफ़ाक़ के इस कारगह-ए-शीशागरी का”
-मीर तक़ी ‘मीर’

इस शेर को लिखने के पीछे भी एक वज्ह है। अभी हाल ही में भट्ट साहब की एक किताब आयी, जो उर्दू रचनाकारों पर आधारित थी। अब इस तरह की किताबें, वे किताबों की संख्या बढ़ाने के लिए लिखते हैं या उन्होंने उर्दू के रचनाकारों को पढ़ा भी है, यह बात इस लेख में आगे चलकर साफ़ हो जाएगी, उनके शेरों तथा उनके ग़ज़लों के स्तर के निर्धारित करेंगे कि उन्होंने उर्दू के क्लासिकल रचनाकारों को कितना पढ़ा है। चलिए कुछ उदाहरण देखते हैं:

अगर दावा है तो दावा दिखायी क्यों नहीं देता
वो अच्छा है तो फिर अच्छा दिखायी क्यों नहीं देता

इस शेर के दूसरे मिसरे में ‘तो’ के बाद ‘फिर’ एक साथ अच्छे नहीं लग रहे। जहाँ तक मैं जानता हूँ व्याकरणिक तौर पर भी यह ग़लत है, क्योंकि ‘तो’ और ‘फिर’ ये दोनों एक अव्यय हैं। दो अव्यय एक साथ, एक के बाद एक प्रयोग में नहीं लाये जाते। दूसरी बात यह की दोनों मिसरे दो अलग-अलग स्टेटमेंट बन कर रह गये, कोई शेर यहां नहीं बन पाया है। एक और बानगी देखें:

ये पल-पल झींकना या कोसना पूरी व्यवस्था को
ये ग़ुस्सा ही है तो ग़ुस्सा दिखाई क्यों नहीं देता

सबसे पहले तो मैं ये बता दूँ कि शिल्प के स्तर पर यह शेर गच्चा खाता-सा दिख रहा है। इस शेर के दूसरे मिसरे में आये ‘ही’ और ‘है’ की टकराहट मानो सारे नियमों को ठसेर रहे हों। इन सोपानों के सहारे शिखर तक पहुंचना तो दूर, पहला क़दम भी ब-मुश्किल बढ़ाया जा सकता है। ख़ैर, इसी सिलसिले में वह आगे लिखते हैं:

खदानें कोयले की हैं हमारे पास भी बेशक
खदानों में बड़ा हीरा दिखायी क्यों नहीं देता

इस शेर का भी दूसरा मिसरा हुड़दंग करता-सा दिखायी दे रहा है। मुझे समझ में नहीं आ रहा कि ‘हीरा’ पदबंध के आगे ‘बड़ा’ विशेषण लगाने की क्या ज़रूरत आ पड़ी थी। ‘हीरा’ ही अपने आप में पर्याप्त था। ‘बड़ा’ पदबंध यहाँ आकार को इंगित कर रहा है। आकार अर्थ में हमने कभी भी किसी को यह कहते नहीं सुना कि मेरा बेटा बड़ा हीरा है, बल्कि यह कहते प्रायः सुना गया है कि मेरा बेटा खरा सोना है या मेरा बेटा हीरा है। मेरा बेटा हीरा है यह बात जम रही है। कहने का आशय यह है कि ‘बड़ा’ पदबंद या विशेषण इस मिसरे में मुहावरे का चीरहरण करता-सा दिखायी दे रहा है। एक बात और कि भट्ट साहब को यदि यह पता है कि

न पद या क़द की ऊंचाई मुझे ऊंचाइयां देगी
मेरे शेरों की गहराई मुझे ऊंचाइयां देगी

यदि ऐसा है, तो वे इस प्रकार के अपरिपक्व शेर क्यों लिख रहे हैं? उन्हें अपने शेरों में अधिक गहराई, परिपक्वता और कलात्मक ऊँचाई लाने का प्रयास करना चाहिए। किंतु उपदेशात्मक वक्तव्यों से शेर रचने की जो प्रवृत्ति कुछ तथाकथित हिंदी ग़ज़लकारों में दिखायी देती है, उससे वे स्वयं को कैसे अलग कर पाएँगे?

अब एक और शेर देखते हैं। विरोधाभास उपस्थित करने के प्रयास में भट्ट साहब ने इस शेर के साथ जो असंगत व्यवहार किया है, उसे मैं क्या कहूँ! आप स्वयं देख लीजिए:

कभी फिसला था मैं कितना संभलकर अब खड़ा हूं जो
वो राहों की जमी काई मुझे ऊंचाइयां देगी

नमन हर एक ऊँचाई को होना चाहिए लेकिन
वो ऊँचा होकर भी ऊँचा दिखाई क्यों नहीं देता

इन दो शेर का मूल वज़्न है:

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
ISSS. ISSS. ISSS. ISSS

इस लिहाज़ से देखने पर पहले शेर के पहले मिसरे में ‘जो’ शब्द भर्ती का लगता है यानी सिर्फ़ बहर बराबर करने के लिए भर दिया गया है। दूसरे शेर का दूसरा मिसरा बहर से ख़ारिज दिखायी देता है। थोड़ा और आगे बढ़ते हैं–

चले रुक-रुक के कोई तो भी मंज़िल पास आती है
मगर यह मुल्क कुछ चलता दिखायी क्यों नहीं देता

इस शेर के पहले मिसरे में ‘के’ और ‘कोई’ के समीपवर्ती प्रयोग से तनाफ़ुर-दोष उत्पन्न हो गया है। दूसरे मिसरे में प्रयुक्त ‘कुछ’ शब्द अतिरिक्त पद-दोष का आभास देता है। इस शब्द का शेर के भाव या अर्थ-विस्तार में कोई विशेष योगदान नहीं है; ऐसा प्रतीत होता है कि इसे केवल बहर निभाने के उद्देश्य से जोड़ दिया गया है।

इस पहली ही ग़ज़ल में इतनी त्रुटियाँ सामने आ चुकी हैं। ऐसा लगता है कमल साहब जिस काल्पनिक शिखर तक पहुँचना चाहते थे और वहाँ तक पहुँचने के लिए जिस सोपान का निर्माण किया था, वह अनेक स्थानों से दरक चुका है; परिणामस्वरूप उसके भरभराकर गिर पड़ने की आशंका स्पष्ट दिखायी देती है। अतिरिक्त पद-दोष का एक और उदाहरण:

हमने सब दुनियादारी सीखी है अनुभव से
दुनियादारी से हमको यह अनुभव हासिल है

इस शेर के पहले मिसरे में ‘सब दुनियादारी’ विशेष रूप से खटकता है। ‘दुनियादारी’ स्वयं ऐसा पदबंध है, जिसमें समग्रता अथवा व्यापकता का भाव पहले ही निहित रहता है; अतः उसके पूर्व ‘सब’ लगाने की कोई विशेष आवश्यकता प्रतीत नहीं होती।

एक अन्य बात भी ध्यान आकर्षित करती है। कमल साहब ने पूरी दुनियादारी या उनके शब्दों में कहें तो सब दुनियादारी से केवल एक ही अनुभव प्राप्त किया है। यदि आशय अनेक अनुभवों का होता, तो ‘यह’ के स्थान पर उसका बहुवचन ‘ये’ प्रयुक्त होता तथा पूरक क्रिया ‘है’ के स्थान पर ‘हैं’ का प्रयोग अपेक्षित था। किंतु प्रतीत होता है कि क़ाफ़िया साधने के आग्रह में इस स्वाभाविक व्याकरणिक संगति की उपेक्षा कर दी गयी है।

इसके अतिरिक्त, इस शेर में पहले दुनियादारी से अनुभव सीखा गया है, फिर अनुभव से दुनियादारी। अर्थात् अधिक कलात्मकता और चमत्कार उपस्थित करने के प्रयास में कथ्य उलझकर असंगत हो गया है। अब एक और शेर देखिए—

प्रेम पुजारी होने का उनका भी दावा है
जिनको राधा हासिल है ना माधव हासिल है

मुझे इस बात से कोई विशेष सरोकार नहीं कि प्रेम-पुजारी बनने का दावा किसे करना चाहिए। यदि कमल साहब को राधा और माधव प्राप्त हैं, तो प्रेमी वे ही कहलाएँ; मुझे तो केवल इतना कहना है कि दोनों मिसरों में पूरक क्रिया ‘है’ के प्रयोग के कारण इस शेर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ अर्थात रदीफ़-दोष उत्पन्न हो गया है। दूसरे मिसरे में ‘ना’ का प्रयोग भी अशुद्ध प्रतीत होता है। ग़ज़ल की परंपरा में वहाँ ‘न’ का प्रयोग अधिक उपयुक्त माना जाता है।

एक और बात उल्लेखनीय है। दूसरे मिसरे में लिखा गया है: ‘राधा हासिल है ना माधव हासिल है’। यहाँ ‘है’ के एकवचन प्रयोग के कारण आदरणीय नामों के साथ अपेक्षित सम्मानसूचक व्याकरणिक संगति नहीं बन पाती। यह लगभग वही स्थिति प्रतीत होती है, जैसी ज्ञानप्रकाश विवेक के उस प्रयोग में दिखती है, “जिस तरह सीता को जनक रखता था।”

रदीफ़-दोष का एक और उदाहरण देखिए:

पौध लगायी मन से फिर बरसों तक सींचा है
तब जाकर कुछ चिड़ियों का यह कलरव हासिल है

इस शेर में भी ‘है’ की वजह से तक़ाबुले-रदीफ़ है। यह भी देखें:

फिर भी किसको मिल पाया है
ईश्वर खोजा पत्थर पत्थर

यह दोष मुझे विशेष रूप से खटकता है। मेरा मानना है कि कमल जी जैसे वरिष्ठ और प्रतिष्ठित रचनाकार को इतना भाषिक ज्ञान अवश्य होना चाहिए कि समुच्चयबोधक अव्यय से सामान्यतः वाक्य का आरंभ नहीं किया जाता। ‘फिर भी’ एक समुच्चयबोधक अव्यय है, जिसका प्रयोग दो वाक्यों अथवा विचारों को जोड़ने के लिए किया जाता है, न कि वाक्य की शुरूआत के लिए। एक और देखिए:

फिर तुम ही उद्धार करो हे
बोलो गंगा शंकर-शंकर

यह शेर भी मानो पगहा की तरह बर कर प्रस्तुत कर दिया गया है। इसमें शेर की अपेक्षित प्रभावशीलता और नफ़ासत दिखायी नहीं देती; उलटे केवल म्याऊँ-म्याऊँ जैसी निर्बल ध्वनि सुनायी पड़ती है। इसके अतिरिक्त, इस शेर में प्रयुक्त वाक्य का शब्दक्रम भी स्वाभाविक नहीं है। शब्दों का विन्यास असंगत और असहज प्रतीत होता है।

शेर की शुरूआत ‘फिर’ जैसे पदबंध/अव्यय से की गयी है, जो अपने आप में प्रश्न उपस्थित करती है। यदि इसे क्षणभर के लिए नज़रअंदाज़ भी कर दें, तब भी यह जिज्ञासा बनी रहती है कि जब शेर ‘फिर’ से आरंभ हो रहा है, तो अवश्य ही इसके पूर्व कोई प्रसंग या कथन रहा होगा, जिसके प्रत्युत्तर में यह वाक्य आया है। उस पूर्ववर्ती संदर्भ के अभाव में यह पंक्ति केवल एक साधारण कथन बनकर रह जाती है; उसमें शेरियत का आवश्यक सौंदर्य नहीं उभर पाता।

कुल मिलाकर कहें तो कह सकते हैं कि ‘कमल’ साहब के ये शेर ‘न दुलही न दैजा’ वाली स्थिति में आ गये हैं। कहने का आशय कि न तो शेर का मज़मून ही बहुत उम्दा है और न ही अंदाज़े-बयाँ और शिल्प ही कोई कमाल दिखा पा रहे हैं। इसी तरह की व्याकरणिक ख़ामी वाला एक शेर हसरत मोहानी साहब का है, जो अपने कहन, सलासत, तग़ज़्ज़ुल और गुदाज़ की वजह से समान ख़ामी होते हुए भी उर्दू ग़ज़ल की धरोहर बन गया है। देखें:

फिर भी है तुमको मसीहाई का दावा देखो
मुझको देखो मिरे मरने की तमन्ना देखो

कहा जा सकता है कि आप के पास कुछ-न-कुछ तो होना ही चाहिए। भट्ट साहब के बारे में जितना सुना था, वैसा कुछ नज़र नहीं आया। कभी-कभी तो ऐसा लगता है जैसे खोदा पहाड़, निकली चुहिया।

ऐसा लगता है मानो ग़ज़लों की संख्या बढ़ाने के लिए पंक्तियों को जबरन ठूँस-ठूँसकर गढ़ दिया गया हो। अब इसी ग़ज़ल का अंतिम शेर देखिए:

दिल बेचारा छोटा-सा
चिंताएँ हैं गट्ठर-गट्ठर

इस शेर में प्रयुक्त ‘चिंताएँ’ शब्द भाववाचक संज्ञा ‘चिंता’ का बहुवचन रूप है। इसके साथ ‘गट्ठर-गट्ठर’ जैसा परिमाणवाची शब्द स्वाभाविक और उपयुक्त प्रतीत नहीं होता। सामान्यतः हम यह कहते-सुनते हैं कि उसे कई चिंताओं ने घेर रखा है। यहाँ ‘कई’ संख्यावाची शब्द है, जो प्रयोग की दृष्टि से संगत है; किंतु यह नहीं कहा जाता कि उसे एक गट्ठर या मन भर चिंताओं ने घेर लिया है।

अर्थात् शब्द की प्रकृति, उसकी श्रेणी और संदर्भानुकूल प्रयोग पर भी सजग दृष्टि रखना आवश्यक है। कमल जी हमारे आदरणीय शायर हैं। उनके स्नेह से मैं भी निरंतर अभिषिक्त होता रहा हूँ, फिर भी निष्पक्ष भाव से कहना पड़ता है कि शब्द-प्रयोग संबंधी जितनी अशुद्धियाँ मुझे कमल जी की रचनाओं में दिखायी देती हैं, उतनी ज्ञान प्रकाश विवेक जी के अतिरिक्त अन्यत्र विरल ही मिलती हैं। कमल जी के कुछ और शेर देखिए:

क़त्ल करके रख दिये रिश्ते सभी संबंध भी सारे
स्वार्थ में डूबा अगर तो आदमी ने कुछ नहीं देखा

इस एक ही शेर में अनेक प्रकार के दोष देखे जा सकते हैं। मेरा एक प्रश्न है, क्या ‘रिश्ते’ और ‘संबंध’ अलग-अलग अर्थ देते हैं? यदि नहीं, तो दो समानार्थी शब्दों का एक साथ प्रयोग करने की क्या आवश्यकता थी? क्या रिश्तों का क़त्ल करने से संबंधों का कत्ल नहीं होगा?

दूसरी त्रुटि यह है कि दूसरे मिसरे में ‘अगर’ और ‘तो’ का एक साथ प्रयोग अनुचित प्रतीत होता है, क्योंकि दो योजकों का इस प्रकार संयुक्त प्रयोग सामान्यतः उचित नहीं माना जाता।
आइए, और देखते हैं:

हाथ की उलझी लकीरों में उलझकर रह गया केवल
भाग्य में क्या कुछ लिखा था ज्योतिषी ने कुछ नहीं देखा

इस शेर के पहले मिसरे में ‘केवल’ का क्या प्रयोजन है, यह तो कमल जी ही बता सकते हैं। जहाँ तक मेरी समझ है, यहाँ ‘केवल’ शब्द की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है क्योंकि उसके बिना भी ‘केवल’ का भाव इस वाक्य में निहित है। अब ऊबड़-खाबड़ वाक्य-विन्यास का एक और उदाहरण:

कितनी बर्बादी के मंज़र अपने पीछे छोड़ जाएगी
हो गयी इक बार तो फिर दुश्मनी ने कुछ नहीं देखा

उसको अपनी धुन थी तो केवल समंदर तक पहुँचाने की
अपनी धुन में सामने क्या है नदी ने कुछ नहीं देखा

पहले शेर के दूसरे मिसरे में तथा दूसरे शेर के पहले मिसरे में शब्द-क्रम दोष स्पष्ट है। पहले शेर के दूसरे मिसरे में ‘तो’ और ‘फिर’, तथा दूसरे शेर के पहले मिसरे में ‘तो’ और ‘केवल’ ऐसे प्रतीत होते हैं मानो मुँह चिढ़ाकर कह रहे हों- हम तो ऐसे ही रहेंगे, आप क्या कर लेंगे? ख़ैर, अब अराजकता का ढिंढोरा पीटता एक और शेर:

पेट भरकर रोटियाँ कपड़े बदन को, सर की ख़ातिर छत
हैं तमाम ऐसे कि जिनकी ज़िंदगी ने कुछ नहीं देखा

कमल जी से मैं एक बात पूछना चाहूँगा कि क्या छत से केवल सिर ही ढंका जा सकता है? मुझे प्रतीत होता है कि यहाँ किसी वस्तु को अलग से वर्गीकृत करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। बात स्वयं ही स्पष्ट थी कि छत किसलिए है, कपड़ा किसलिए है और रोटी किसलिए है। अतः यह शेर भी कुछ ज़बरदस्ती का प्रतीत होता है। आइए, एक और शेर देखते हैं:

जिन भी कानों तक गयी आवाज़ जादू कर दिया उसने
कौन अपना या पराया बांसुरी ने कुछ नहीं देखा

इस शेर को पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी ने मुँह में कंकड़ भर दिये हों। पहला ही मिसरा इतना कंकरीला है कि दूसरा मिसरा भी बेस्वाद हो गया है। पहले मिसरे में ‘जिन’ के बाद ‘भी’ तथा अंत में ‘उसने’ का प्रयोग खटकता है। अब ये देखिए:

जिसने अपने घर से बंधन तोड़ लिया है
उसकी ख़ातिर दुनिया में घरबार कई हैं

इस शेर में प्रयुक्त मुहावरा ‘बंधन तोड़ना’ कुछ खटकता है। ‘घर से रिश्ता तोड़ना’ या ‘घर से संबंध तोड़ना’ जैसी अभिव्यक्तियाँ तो प्रचलित हैं, किन्तु ‘घर से बंधन तोड़ना’ मुहावरे की दृष्टि से सहज और उपयुक्त नहीं लगता। अतः यह बात विशेष जँचती नहीं है।
अब कुछ और शेर देखते हैं। इस शेर पर कुछ भी कह पाना मेरे जैसे अदना क़द के व्यक्ति के लिए अत्यंत कठिन कार्य होगा, इसलिए इसका अर्थ आप लोग भट्ट साहब से ही पूछिएगा।

हाँ, मुझे तो केवल इस बात की चिंता है कि बालू की इन सीढ़ियों पर चढ़कर हमारी भावी पीढ़ी भला किसी शिखर तक पहुँच भी पाएगी या नहीं। देखिए:

ज़िंदगी बस ज़िंदगी के रोज़ ही आने थे लेकिन
ख़ुदकुशी के आये संदेश युवाओं की तरफ़ से

आइए, एक और शेर देखते हैं, जिसका शब्द-विन्यास आपका स्वाद बुरी तरह बिगाड़ सकता है; किन्तु शेर बड़े शायर का है, इसलिए उसे देखना तो पड़ेगा ही।

पीढ़ियों के वास्ते ख़ुद सारा अमृत रख लिया है
विश्व हमें उपहार है अब देवताओं की तरफ़ से

संभवतः कमल साहब यह कहना चाहते हैं कि नेताओं ने अपनी अनेक पीढ़ियों के लिए धन एकत्र कर लिया है, जबकि हमारे हाथ केवल झुनझुना ही लगा है। यह बात मैं इसलिए समझ सका क्योंकि हिंदी का सामान्य रचनाकार प्रायः इसी सीमा तक सोच पाता है। किन्तु इसके बावजूद मेरा प्रश्न यह है कि जिस मज़मून को भट्ट साहब कहना चाहते हैं, क्या वे उसे प्रभावपूर्ण ढंग से कह पाये हैं? क्या ऐसे शेर में मन लगाकर अर्थ खोजने की इच्छा होती है?

यह सब अत्यंत बचकाना प्रतीत होता है। ग़ज़ल की मासूमियत और शायरी का गुदाज़ मानो सिर पकड़कर बैठ गये हों। एक विवादास्पद शेर देखिए:

कोई समझेगा कैसे आग की तासीर है उसमें
दिखाएगा नहीं बारूद यदि चिंगारियां अपनी

इस शेर का क्या अर्थ ग्रहण किया जाना चाहिए? क्या यह कि शक्तिशाली लोगों को सदैव अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते रहना चाहिए, ताकि कमज़ोरों पर उनकी धाक बनी रहे? मुझे तो ऐसा विचार अमानवीय प्रतीत होता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि भट्ट साहब अपने समस्त अधीनस्थ अधिकारियों पर सदैव रोब जमाये रखते थे, और वही प्रवृत्ति उनकी शायरी में भी उतर आयी?

आइए, अब इस शेर में भट्ट साहब की शेरियत और समझदारी, दोनों की पोल खुलती हुई प्रतीत होती है। शेर प्रस्तुत है:

किसी के तन पर हों दो-चार तो शायद छुपा भी ले
कहां ले जाएगा ज़ेब्रा छुपाकर धारियाँ अपनी

इस शेर पर कुछ भी कहने से पहले पाठक को निश्चित ही इस बात पर आश्चर्य होगा कि भट्ट साहब इसे भी शेर मानते हैं। ख़ैर, किया भी क्या जा सकता है? भट्ट साहब की अपनी कुछ मजबूरियाँ रही होंगी और मेरी मजबूरी यह कि इस पर भी कुछ कहना पड़ रहा है।

संभवतः भट्ट साहब ने यह शेर इस उत्साह में लिखा होगा कि वे दुनिया को बता सकें कि उन्होंने ज़ेब्रा पर भी शेर कह दिया है। किन्तु ज़ेब्रा पर शेर कहकर उन्होंने कोई कमाल नहीं किया, बल्कि स्वयं को ही हास्यास्पद बना लिया है। ज़ेब्रा के शरीर पर बनी धारियाँ किसी भी प्रकार से इस बात का संकेत नहीं देतीं कि वे उसके कुकर्मों का प्रतीक हैं। ये धारियाँ तो ज़ेब्रा की सुंदरता को और अधिक पर बढ़ा देती हैं। इन्हें छुपाने की क्या ज़रूरत है?

स्पष्टतः इस शेर में वे धारियाँ कोई सार्थक प्रतीक उपस्थित नहीं कर पातीं। कहना न होगा कि भट्ट साहब ने यहाँ शेर कहकर केवल अपनी भद्द पिटवायी है।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि कमलेश भट्ट कमल हिंदी ग़ज़ल के चर्चित और सक्रिय हस्ताक्षर अवश्य हैं, किंतु किसी रचनाकार की प्रतिष्ठा अत्म प्रचार से ऊपर नहीं उठती। प्रस्तुत विवेचन से स्पष्ट होता है कि उनकी अनेक ग़ज़लों में भाषिक असावधानी, शिल्पगत शिथिलता, कुरूप शब्द-विन्यास, अनावश्यक पद-प्रयोग, कथ्यगत अस्पष्टता तथा शेरियत की अपेक्षित गहराई का अभाव बार-बार दृष्टिगत होता है। कई स्थानों पर क़ाफ़िया, रदीफ़, मुहावरे और व्याकरण के निर्वाह में भी ढिलाई दिखायी देती है, जिससे शेर का प्रभाव क्षीण हो जाता है।

ग़ज़ल अत्यंत अनुशासित और सूक्ष्म विधा है, जहाँ दो पंक्तियों में अर्थ, सौंदर्य, व्यंजना और प्रभाव का संतुलित समन्वय अपेक्षित होता है। जब रचनाकार केवल कथन, उपदेश, चमत्कार या शब्द-सजावट तक सीमित रह जाता है, तब शेर अपनी कलात्मक तथा भावात्मक ऊँचाई प्राप्त नहीं कर पाता। इस दृष्टि से कमल साहब की अधिकाश रचनाएँ अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरतीं।

मेरी आलोचना का उद्देश्य किसी रचनाकार का अवमूल्यन नहीं, बल्कि साहित्यिक मानकों की रक्षा और रचना-दृष्टि को अधिक परिष्कृत बनाना है। कमलेश भट्ट कमल जैसे प्रतिष्ठित रचनाकारों से अपेक्षा स्वाभाविक रूप से अधिक होती है कि वे हिंदी ग़ज़ल को केवल संख्या नहीं, गुणवत्ता दें; केवल उपस्थिति नहीं, ऊँचाई दें; केवल कथन नहीं, कालजयी शेर दें। हिंदी ग़ज़ल का भविष्य प्रशंसा से नहीं, कठोर साधना, कठोर आत्मसमीक्षा और उत्कृष्ट सृजन से निर्मित होगा।

ज्ञानप्रकाश पांडेय, gyan prakash pandey

ज्ञानप्रकाश पांडेय

1979 में जन्मे, पेशे से शिक्षक ज्ञानप्रकाश को हिन्दी और उर्दू की शायरी में समकालीन तेवरों के लिए जाना जाता है। अमिय-कलश (काव्यसंग्रह), सर्द मौसम की ख़लिश (ग़ज़ल संग्रह), आसमानों को खल रहा हूँ (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित हैं। कुछ एक प्रतिष्ठित संस्थाओं से नवाज़े जा चुके हैं।

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