नोमान शौक़, nomaan shouq, poetistic
एक ख़ास तेवर के शायर के रूप में शिनाख़्त बना चुके नोमान शौक़ जब शायरी पर बातचीत करते हैं तो इस दुनिया को समझने के रास्ते भी खुलते हैं, ख़ासकर नयी नस्ल के लिए। ग़ज़लों और नज़्मों व कविताओं के कुछ संग्रह उनके नाम हैं और वह लगातार मुशायरों, साहित्यिक मंचों और सोशल मीडिया पर दख़्ल बनाये हुए हैं। पोएटिस्टिक और नवीस आर्ट्स के तहत गुरुग्राम में पिछले दिनों आयोजित अदबी व मौसीक़ी कार्यक्रम ‘इश्क़-जुलाहे’ में “शौक़ से मिलिए” सत्र में नयी नस्ल की शा'इरी, सोशल मीडिया के दौर में अदब की बदलती सूरत और उर्दू ज़बान के भविष्य आदि के बारे में दिलचस्प बातचीत हुई। आब-ओ-हवा के तमाम पाठकों के लिए नोमान शौक़ से युवा फ़नकार रजनीश्वर चौहान ‘रजनीश’ की उसी बातचीत के अंश...

अच्छे और बड़े शायर में बड़ा फ़र्क है: नोमान शौक़

नोमान शौक़, nomaan shouq, poetistic

नोमान शौक़: जहाँ तक अपने बारे में कुछ बताने का तअल्लुक़ है, तो इसमें बहुत कुछ बताने को नहीं है। एक छोटा-सा शहर है पटना के क़रीब… आरा। वहाँ पैदा हुआ। मेरे ख़ानदान में, मेरे घर में कोई शा’इर कभी नहीं था। मैं इत्तिफ़ाक़ से शा’इर बना हूँ और ये मुझे अच्छा भी लगता है कि मैं इत्तिफ़ाक़ से बना क्योंकि मंसूबे के साथ जो बहुत सारी चीज़ें होती हैं, उनमें ज़्यादातर नाकाम हो जाती हैं। बग़ैर मंसूबों के अगर आप कुछ शुरू करते हैं और आपको लगता है कि आप इसी काम के लिए बने हैं। तब मैं 14-15 साल का हूँगा जब मैं शा’इरों में फँस गया था एक बार, जिसके बा’द मुझे शा’इरी शुरू करनी पड़ी।

मैं बुनियादी तौर पर साहित्य का तालिब-ए-इल्म था। मैंने अंग्रेज़ी में ऑनर्स और मास्टर्स किया। उर्दू मेरी मादरी ज़बान है। भोजपुरी और अंगिका मेरी इलाक़ाई ज़बानें हैं, जिन्हें मैं वैसे ही बोल लेता हूँ जैसे दूसरे लोग शायद बोल पाते हैं। और उर्दू-हिंदी दोनों ज़बानें मेरे लिए वैसी ही हैं जैसे मेरी दो आँखें हैं। आप पूछिए किससे आप ज़्यादा देखते हैं? कौन-सी अच्छी लगती है? तो मैं शायद बता न पाऊँ क्योंकि दोनों मेरे लिए वैसी ही हैं।

मैं सोचता भी, महसूस भी करता हूँ तो कई बार किसी ख़ास ज़बान की तरफ़ होता हूँ… कई बार किसी ख़ास ज़बान की तरफ़। तो ये बहुत इरादतन नहीं होता।

लेकिन मैंने हिंदी और उर्दू दोनों ज़बानों में लिखा। हिंदी में कविताओं का संग्रह जो था, वो ज्ञानपीठ ने छापा था, तक़रीबन पंद्रह साल पहले उसके दो एडिशन आये। उसके बाद अब तीसरे एडिशन की तैयारी है। उर्दू में मेरी चार किताबें आ चुकी हैं। और जो टूटी-फूटी शा’इरी आती है, वो लोगों तक पहुँचाता रहता हूँ। उससे एक सुकून मिलता है कि कहीं मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो अपनी ज़िंदगी गुज़ारते हैं, अपनी जैसी ही दो-चार ज़िंदगियाँ बढ़ाते हैं, उसके बा’द इस दुनिया से चले जाते हैं। मुझे कुछ दिन और जीना था, इसलिए मैंने शा’इरी को अपना रास्ता बनाया।

रजनीश: बहुत उम्दा, सर। अब हम सवाल-जवाब का सेशन शुरू करते हैं। ज़ाहिर है मेरे सवाल शा’इरी से जुड़े होंगे। पहला सवाल है कि क्या शा’इरी महज़ जज़्बात का इज़हार है या एक ज़िम्मेदारी भी है?

शौक़: देखिए, सबसे पहले तो मैं इस सेशन को सवाल-जवाब का नहीं कहूँगा, इसे बातचीत कहते हैं।

जहाँ तक शा’इरी का तअल्लुक़ है, तो ये सिर्फ़… आपने जो दो पहलू उसमें जोड़े हैं कि उसका कोई मक़सद भी है या वैसे ही है… इंसान दुनिया में आता है, तो वो दुनिया में अपने जैसे लोगों के साथ रहता है। उसकी दुनिया बाक़ी तमाम लोगों की दुनिया होती है। तो ऐसा नहीं है कि वो सोचकर किसी एजेंडे के तहत शा’इरी कर रहा है कि मुझे दुनिया में ये बदलाव लाना है, ये इंक़लाब बरपा करना है। वो बुनियादी तौर पर जो महसूस कर रहा है, उसे ईमानदारी से अपने लफ़्ज़ों में ढालना होता है शा’इर को। और उसमें शा’इर को किसी तरह की मक्कारी नहीं करनी चाहिए। मक्कारी से मेरी मुराद ये कि आप बहुत सारे लोगों की शा’इरी पढ़ते होंगे और आपको अंदाज़ा होगा कि ज़्यादातर लोग अपने बारे में अपनी शा’इरी में बड़ी अच्छी राय रखते हैं क्योंकि वो पूरा सच नहीं बोल सकते…

हमेशा महबूब ही बेवफ़ा होता है। वो बेवफ़ा नहीं होते। हमेशा जो कुछ ग़लत होता है, वो दुनिया करती है। वो सब कुछ अच्छा करते हैं। तो ये एक तरह की बेईमानी है। तो मुझे लगता है अगर शा’इर में ईमानदारी भी हो, तो अपने आप उसका मक़सद भी पूरा हो जाता है। अगर वो किसी चीज़ को शिद्दत से महसूस कर रहा है और उसका इज़हार कर रहा है, चाहे वो इश्क़ ही क्यों न हो, चाहे वो दुनिया की तकलीफ़ों को देखकर…

“लौट जाती है उधर को भी नज़र, क्या कीजिए…”

फ़ैज़ की तरह… वो कुछ भी लिखता है, तो वो इस दुनिया में है, तो कहीं न कहीं से वो चीज़ें असरअंदाज़ होती हैं उस पर। कई बार उसे ख़ुद नहीं मालूम होता कि उसके दिल में दुनिया का इतना ज़्यादा दर्द है। लेकिन जब वो लिख रहा होता है और जब उसे पढ़ा जा रहा होता है, तो दूसरे महसूस करते हैं इस शख़्स ने कैसे एक इंसान के… एक दूसरे इंसान के दुख को भी महसूस किया है। अपना दुख तो उसका है ही। उसके लिए तो उसका हक़ है उस पर, और वो उसको बयान भी करता है।

रजनीश: आपको लगता है आज की जो शा’इरी है, उसमें मौज़ूआत या थीम्स बदल रही हैं?

शौक़: दरअसल मैं बहुत पुरउम्मीद भी हूँ आज की शा’इरी के हवाले से और बहुत मायूस भी हूँ। ये दोनों चीज़ें एक साथ इसलिए हैं कि पहले ही कहा जाता था कि शा’इर बहुत ज़्यादा हैं। हर किसी को देखिए, हर तीसरा आदमी शे’र कहने वाला होता है। ये उस ज़माने की बात है जब सोशल मीडिया नहीं था। आपको शे’र कहने के तरीक़े नहीं मालूम थे। आपको शा’इरी की एक किताब पढ़ने के लिए लाइब्रेरी में दस बार चक्कर लगाने होते थे। तब आपको वो किताब मिल पाती थी। और आज चीज़ें आपकी टिप्स पर हैं। आप एक बार स्क्रीन ऑन करते हैं और सारी चीज़ें आपको एक जगह मिल जाती हैं। उसमें ये है कि आप अपनी क्रिएटिविटी को पहचानते हुए कैसे उसको बर्रूए-कार ला रहे हैं, कैसे वो आपके अंदर से शा’इरी को निकाल रही है।

आप शा’इरी करते नहीं हैं। कोई चीज़ होती है जो आपके अंदर से शा’इरी को बाहर लाती है। आज का मसअला ये है कि ज़्यादातर लोग फ़ैशन के तहत शा’इरी कर रहे हैं। जो मायूसी होती है वो मुझे ये देखकर होती है कि आप किसी चीज़ को महसूस नहीं कर रहे हैं। आप किसी चीज़ पर ग़ौर नहीं कर रहे हैं। आपके पास विज़न नहीं है। आपके पास उस चीज़ की समझ नहीं है। लेकिन आपने ये लफ़्ज़ कहीं पढ़ लिये हैं। आप उन्हें इस्तेमाल कर रहे हैं। आपको लगता है शे’र कहने से आप सेलिब्रिटी हो जाते हैं। आपकी रील वायरल हो जाती है। तो आप ये करने लगते हैं।

तो मायूसी ये देखकर होती है। लेकिन उम्मीद क्या देखकर बंधती है… वो ये चीज़ है कि इतने सारे लोग जो शा’इरी के मैदान में क़दम रख रहे हैं, उनमें ज़्यादातर लोग ऐसे हैं जिनका बैकग्राउंड शा’इरी का नहीं है। वो आईटी के लोग हैं। वो दूसरी फ़ील्ड के हैं। अलग-अलग कामों में मसरूफ़ हैं। किसी का बिज़नेस है, किसी का कुछ और काम है। लेकिन वो शा’इरी के पीछे जा रहा है। उसे तलाश है कहाँ से शा’इरी मिल सकती है मुझे। और वो उस पर जब कोशिश करता है तो एक आदमी अगर बिल्कुल नयी दुनिया से शा’इरी की दुनिया में क़दम रखता है, तो उसके साथ उसके नये तजरिबे, उसकी नयी ज़िंदगी, उसके नये दोस्त, उसका नया माहौल, सब कुछ उस शा’इरी में आता है, जो शा’इरी में पहले से मौजूद नहीं था। इसलिए मैं इस शा’इरी की बहुत क़द्र करता हूँ।

ख़ासतौर से मैं हमेशा कहता हूँ जो लोग उर्दू के बैकग्राउंड से नहीं आ रहे हैं, मुझे सबसे ज़्यादा ख़ुशी उन लोगों को देखकर होती है क्योंकि उनके साथ कोई बैगेज नहीं है, रिवायत का कि ये है, ये तो मीर ने ऐसे कहा है… इसे मुसहफ़ी ने यूँ किया है… उसे इसने ये किया है। तो वो बहुत ही आज़ादाना तौर पर अपनी तख़्लीक़ करते हैं।

इसमें बस एक अंदेशा ये होता है कि जब लोगों को किसी एक शख़्स को पढ़कर लगता है हम भी ऐसी शा’इरी कर सकते हैं और वो शा’इरी करने लगते हैं, तो जब तक वो इम्मैच्योर हैं, तब तक तो वो शा’इरी उनको मदद करती है, लेकिन जब वो थोड़ा ग्रो-अप कर जाते हैं, थोड़ा मैच्योर हो जाते हैं तो वो शा’इरी उनके रास्ते की दीवार बन जाती है। चाहे आप कितने भी अच्छे शा’इर को अपना आइडियल क्यों न बनाएं, वो आपका रास्ता रोककर खड़ा हो जाता है।

आप पढ़िए, पसंद कीजिए। कोई बुराई नहीं है। हर अच्छे शा’इर को, हर ज़बान के शा’इर को बल्कि मैं कहता हूँ कि पढ़िए। आप अंग्रेज़ी वालों को भी पढ़िए, हिंदी को भी पढ़िए, लैटिन और जो ट्रांसलेशन आ रहे हैं, आप उनको भी पढ़िए। लेकिन अगर आपने सिर्फ़ इसलिए कि हम इस तरह की शा’इरी करेंगे… जैसे आजकल मैं देखता हूँ कि ज़्यादातर नये लोग एक ही तरह की शा’इरी कर रहे हैं। उनका डिक्शन एक-सा है। उनके मौज़ूआत एक-से हैं।

रजनीश: आपके नज़दीक एक कामयाब शा’इर की सबसे बड़ी पहचान क्या है?

शौक़: कामयाब भी अपने आप में बड़ा वेग टर्म है। जैसे अगर हम एक बहुत आसान तरीक़ा अपनाएँ तो कह सकते हैं कि शा’इर, अच्छा शा’इर और बड़ा शा’इर है। शा’इर तीनों हैं। अब तो प्रोज़-पोएट्री भी होती है। अगर आपको मीटर या छंद का ज्ञान नहीं है तो भी आप शा’इरी कर सकते हैं। और जब हम शा’इरी करते हैं तो हमारे पास जो चीज़ें होती हैं, हम उसे अपने तौर पर लिखते हैं और ये बड़ी सब्जेक्टिव चीज़ होती है कि मुझे किसकी शा’इरी और कैसी शा’इरी पसंद आ रही है, कैसी नहीं आ रही है। ये हर शख़्स का अलग-अलग मे’यार होता है।

लेकिन… ग़ज़ल बड़ी ज़ालिम सिन्फ़ है। इस विधा के साथ एक जो अच्छी बात है, वो भी यही है और बुरी बात भी यही है कि अगर किसी ने बीस-पच्चीस-पचास ग़ज़लें कही हैं, तो उसके यहाँ दस शे’र काम के निकल आएँगे। वो शा’इर तो है लेकिन हर शख़्स अच्छा शा’इर नहीं है, उनमें से। बस वो… इसलिए कि आपको रदीफ़, क़ाफ़िये, आहंग, मीटर, छंद सब मिल जा रहा है तो अच्छे शे’र निकल आ रहे हैं कि आपने उस पाबंदी के साथ शे’र कहना सीख लिया है। …ये मैंने एक आम शा’इर की बात की।

अब एक अच्छा शा’इर वो होता है जो अच्छे शे’र आदतन कहता है। आदतन इसलिए कह रहा हूँ मैं कि अगर उसका क्वांटम ऑफ़ वर्क देख लें आप, उसने कितना लिखा है और उसमें अगर अच्छे शे’र की तादाद ज़्यादा है। हर शे’र किसी ग़ज़ल का, किसी शा’इर का अच्छा नहीं होता। कुछ शे’र अच्छे होते हैं। दस शे’र में अगर दो शे’र भी मुझे लगता है कि याद रखने लायक़ हों तो वो शा’इर अच्छा शा’इर होता है मेरे नज़दीक।

और जो बड़ा शा’इर होता है उसका एक विज़न होता है। वर्ल्ड व्यू होता है। वो दुनिया को कैसे देख रहा है। वो अपनी चीज़ों को, अपने जज़्बात को कितना समझ रहा है और जो दुनिया उसके इर्द-गिर्द है, उसको कितना समझ रहा है। उससे अंदाज़ा होता है ये शा’इर कितना बड़ा है। ऐसा नहीं है कि एक ही मौज़ू पर शे’र उसके अच्छे होंगे। उसके यहाँ अगर आप पढ़ें तो आपको पचासों मौज़ूआत पर बहुत उम्दा नुमाइंदा शे’र उसके मिल जाएँगे। जिसको आप पढ़ते हुए महसूस करेंगे कि एक शख़्स इतने अलग-अलग रंगों में, अलग-अलग ढंग से इतने अच्छे शे’र कैसे कह सकता है। तो ये क्वालिटी बहुत कम शा’इरों में होती है। इसीलिए कोई शा’इर बड़ा या अज़ीम होता है क्योंकि उसके सामने पूरी दुनिया खुली हुई होती है।

इतना ही नहीं कि वो कंटेंट के लेवल पे दूसरों से ज़्यादा रिच होता है, बल्कि आप अगर देखें, वो ग़ज़ल का शा’इर है मिसाल के तौर पर, तो वो अलग-अलग बहरों में भी बहुत कुछ कहेगा। कुछ शा’इर ये करते हैं कि एक बह्र उनकी तबीयत से मेल खाती है, तो उनकी ज़्यादातर ग़ज़लें उसी बह्र पर मिलेंगी। ये भी एक तरह की बंदिश है, जो शा’इर अपने ऊपर लादता है। बड़ा शा’इर उन बंदिशों को तोड़ता है। वो एक्सपेरिमेंट करता है अपने साथ भी… वो नयी ज़मीनें अपनी निकालेगा। आजकल आप देखेंगे कि बहुत सारे अश’आर बहुत अच्छे बड़े-बड़े शा’इरों के ऐसे मिलेंगे जो दूसरे शा’इरों की ज़मीन में कहे हुए हैं, जो लोगों को पता नहीं है कि इनसे पहले दस लोगों ने ये शे’र कह दिया है।

तो ये जो बड़ा शा’इर होता है, अगर उसे शे’र कहते हुए लगता है इस तरह का शे’र किसी और ने कह दिया है तो फ़ौरन अपने अच्छे शे’र को भी हटा देता है। मैंने ऐसे शा’इरों को भी देखा है। अगर कोई ज़मीन बहुत पामाल है तो लगता है यार, इस रदीफ़-क़ाफ़िया में बहुत लोगों ने बहुत से शे’र कह रखे हैं, तो मैं इसमें अब क्या करूँगा? इसमें मेरा क्या काम है? अच्छा, वो ये भी एतराफ़ करता है अपने दिल से कि जिन लोगों ने मुझसे अच्छा कह दिया है इस ज़मीन में, मैं उनसे बेहतर नहीं। वो अपनी लिमिटेशन्स भी जान रहा है। वो अपने बारे में किसी ख़ुशफ़हमी में भी नहीं है। तो वो नयी ज़मीनें निकालता है, अपना नया ढंग निकालता है। और कई बार तो आप देखेंगे कि वो अलग-अलग शे’र अलग-अलग स्टाइल में कहेगा। आपको इतनी वैरायटी और इतने डायमेंशन्स हर शा’इर में नहीं मिलेंगे, अच्छे शा’इर में भी नहीं मिलेंगे।

मैंने इसीलिए क्लासिफ़ाई किया है कि अच्छा शा’इर एक ख़ास मौज़ू में, एक ख़ास बह्र में, एक ख़ास वज़्न में अपनी बातें कहेगा। लेकिन जो बड़ा शा’इर होगा वो हमेशा उससे आगे निकलता रहेगा।

रजनीश: आज के डिजिटल दौर में जो शा’इरी हो रही है, आपको लगता है उसके फ़न में या उसके असर में कोई तब्दीली आ रही है?

शौक़: एक तब्दीली तो आ रही है। फ़न में भी आ रही है। कुछ लोग, जैसे शुरू में जब हमारी रसाई नहीं थी, इन चीज़ों तक, तो लोग कच्चे-पक्के शे’र कहते थे। कई बार उन्हें पता भी नहीं होता था, जब तक कोई और उन्हें गाइड न करे। अब मैंने देखा है कि लोग वेबसाइट्स और इंटरनेट के ज़रिये बहुत सारी जो बेसिक चीज़ें हैं, वो ख़ुद सीख लेते हैं। कई बार अगर वो किसी से सीधे टच में न हों, किसी से इस्लाह न ले रहे हों, तब भी वो अच्छे शे’र कह लेते हैं। लेकिन ये ध्यान रखना चाहिए शे’र कह लेने भर से काम नहीं पूरा हो जाता…

होता ये है कि आपने शे’र कह दिया। आपके हिसाब से शे’र बिल्कुल कम्प्लीट है। लेकिन कई बार होता है कि सिर्फ़ एक लफ़्ज़ इधर से उधर कर देने से आपका शे’र आसमान पे पहुँच जाता है। वो आपको नहीं पता होता है कि ऐसे कैसे हो सकता है? जब हम सब शे’र कहते हैं तो हम एक ट्रान्स में होते हैं। अपनी चीज़ें अगर उस वक़्त पढ़ें तो लगेगा कि मैंने तो बिल्कुल मास्टरपीस… इससे बेहतर तो मैंने आज तक कहा ही नहीं था। लेकिन आप जब वक़्त गुज़र जाने दें और उसके बाद दोबारा पढ़ें, तो आपको लगेगा कि अच्छा, ये शे’र तो ऐसे भी हो सकता था। मैंने ऐसे क्यों नहीं कहा। तो जो आपका रहनुमा, दोस्त, उस्ताद… जो कह लें, वो होता है, वो आपको बताता है कि ये आपने जो शे’र कहा, वो कहाँ पहुँच रहा है और आप इसमें ये तब्दीली करें तो इसके बाद ये शे’र कहाँ पहुँचेगा।

आपके सवाल का दूसरा पहलू ये है कि आजकल सोशल मीडिया की वजह से ये हुआ कि हर शख़्स रील बनाने के लिए शे’र कह रहा है। उसमें दिक़्क़त ये आ रही है कि इतना ट्रैश आ रहा है कि अगर आपको कोई रिफ़ाइन करके चीज़ें देने वाला नहीं है, तो आप हर शा’इरी को अच्छी शा’इरी समझ लेंगे। उससे आपके गुमराह होने के अंदेशे बढ़ जाते हैं। फिर आपको लगता है अगर इस पर एक लाख व्यूज़ हैं और इस पर दस हज़ार कमेंट्स हैं, तो इससे अच्छा शे’र क्या हो सकता है? ये पहली गुमरही की तरफ़ पहला रास्ता है आपका। जहाँ आप इस ट्रैप में फँसे, तो फिर आप शे’र तो कहते रहेंगे लेकिन माफ़ कीजिएगा, बस वो वायरल होकर रील ही रह जाएगी। उससे आगे कुछ नहीं होगा।

रजनीश: अक्सर कहा जाता है आवाम और ख़वास की जो शा’इरी है, दोनों अलग-अलग होती हैं। आप इससे इत्तेफ़ाक़ रखते हैं?

शौक़: वो शा’इरी को देखने वाले का नज़रिया है। जो लिख रहा होता है, अपने लेवल पे लिख रहा होता है। और अगर जान-बूझकर कोई अवाम के लिए लिखता है, तो वो अपने साथ भी चीट कर रहा है और अवाम के साथ भी। और जितने भी अच्छे शा’इर होते हैं, वो इस प्रेशर में कभी नहीं आते कि आप क्या सुनना चाह रहे हैं। बल्कि वो चाहते हैं कि वो जिस लेवल पर शे’र कह रहे हैं, उससे आपके लेवल को ऊपर उठने का मौक़ा मिले।

रजनीश: सर एक जो शा’इर होता है… उसकी क़ाबिलियत कैसे आँकी जाती है? क्या सिर्फ़ किताब के बेसिस पर या इसके लिए कई और पैमाने भी हैं?

शौक़: शा’इरी के लिए न किताब कोई पैमाना है, न कोई और चीज़ पैमाना है। पैमाना ये है कि आप एक शे’र को सुन रहे हैं। एक-एक चीज़, मैं बार-बार इसकी वज़ाहत करूँगा कि जैसे शा’इरों के अलग-अलग लेवल्स होते हैं, उसी तरह श्रोताओं के भी होते हैं।

दरअसल कई बहुत अच्छे शा’इर हैं, जिन्होंने किताबें नहीं छपवाईं, लेकिन वो बहुत अच्छे शा’इर हैं। क्योंकि शा’इरी बुनियादी तौर पर सुनने-सुनाने की कला रही है। पहले से इसको इस तरह की विधा के रूप में देखा जाता रहा है। किताब तो उसके बाद प्रिज़र्व करने के लिए आयी है।

पहले ज़माना महफ़िलों का था। बहुत महफ़िलें होती थीं और जितने रईस, राजे-महाराजे, नवाब थे, वो भी आते थे और जो शे’र की अच्छी समझ रखते थे, वो आते थे। तो वो उनके लेवल से शा’इरी होती थी और उसके बाद वो किताब भी छपती थी। लेकिन आज के ज़माने का, जिसके हवाले से आप बात कर रहे हैं, उसका एक मसअला ये है कि बहुत-से लोग ऐसे हैं, जो बहुत पॉपुलर शा’इर हैं, लेकिन किताब नहीं छपवाते। उसके पीछे एक बड़ा सबब ये होता है कि उनके यहाँ बहुत सारे शे’र ऐसे होते हैं, जो कहीं और से कॉन्टेंट, स्टाइल, डिक्शन… वो कहीं और से बॉरो किया हुआ होता है। तो किताब छपवाने का मतलब ये है कि वो ख़ुद ही सबूत पेश कर रहे हैं कि हमने ये ये चीज़ें यहाँ से ली हैं, क्योंकि उसके बा’द उन पर बंदिश हो सकती है। तो वो किताब छपवाने से डरते हैं।

किताब के छपने और न छपने से बड़े और छोटे शा’इर होने का कोई तअल्लुक़ नहीं है। इसका तअल्लुक़ आपके कॉन्फ़िडेंस लेवल से है। बहुत-से लोग बहुत अच्छे शा’इर हैं, मैंने देखा, लेकिन मुशा’इरों में बहुत ख़राब सुनाते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने आप को मुशा’इरों के लिए नहीं तैयार किया है। इसका मतलब ये नहीं कि वो बुरे शा’इर हैं। जैसे आज नये-नये बच्चे, जिनको बहुत ज़्यादा शा’इरी के बारे में भले ही मालूमात न हो, लेकिन जब परफ़ॉर्म कर रहे होते हैं, रील बना रहे होते हैं, तो बड़े कॉन्फ़िडेंस के साथ करते हैं। स्टेज पर भी बहुत कॉन्फिड़ेंस होता है, बला का… बल्कि कई बार तो ओवर कॉन्फ़िडेंस भी।

रजनीश: ये जो मुशा’इरों में शा’इर शा’इरी पढ़ता है… ख़ासकर आज के दौर की अगर हम बात करते हैं तो उसमें आपको लगता है वो सिर्फ़ एक परफ़ॉर्मिंग आर्ट बनता जा रहा है?

शौक़: बिल्कुल ये परफ़ॉर्मिंग आर्ट बनता जा रहा है। उसका सबब सोशल मीडिया है। जब हर चीज़ के लिए वीडियो बनाया जाएगा। हर चीज़ वायरल कराने की कोशिश की जाएगी। तो ऑब्वियसली परफ़ॉर्मेंस वायरल हो सकती है। शा’इरी नहीं वायरल होती। ठीक है? शा’इरी वायरल होने के लिए जब ग़ालिब के ज़माने में कुछ नहीं था। मीर के ज़माने में कुछ नहीं था। आज भी हमें उनके शे’र याद हैं। उनके लिए तो किसी ने रील नहीं बनायी।

रजनीश: इख़्तिताम से पहले, आप कोई मशवरा देना चाहते हैं नौजवानों को, या फिर नये शा’इरों को आप कुछ कहना चाहते हैं?

शौक़: देखिए, नये शा’इरों को मैं यही कहना चाहूँगा कि आप पढ़ें हर शा’इर को। आप किसी शा’इर का स्टीरियोटाइप न बनें। मेरा पहला मशवरा ये है, जो मैं ज़्यादातर अभी उसके बारे में गुफ़्तगू कर चुका हूँ। अब लोग देखते हैं इस वक़्त किसके रील्स ज़्यादा वायरल हो रहे हैं। किसकी शा’इरी ज़्यादा शेयर की जा रही है। लोगों को लगता है ये तो बड़ा आसान रास्ता है। जैसे मैंने भी जब शा’इरी शुरू की थी, वो ज़माना बशीर बद्र का ज़माना था। एक ग़ज़ल मैंने भी उनके रंग में कही थी। लेकिन… लेकिन मुझे लगा कि यार, ये तो फिर मेरी आदत ख़राब हो जाएगी कि मैं इसी तरह के शे’र कहने लगूँगा, तो मेरी अपनी इंडिविजुअलिटी कहाँ रहेगी? और ये शे’र तो बशीर बद्र जिस तरह से कह गये, अब उनकी कॉपी करके मैं क्या बनूँगा?

तो हमेशा ये याद रखिए कि आप जब सीख रहे हैं, एक-आध-दो ग़ज़लें कह लेना, कुछ शे’र कह लेना ठीक है। लेकिन किसी को आप इतना पसंद मत कीजिए कि उसे देवता बना दीजिए। मेरा यही कहना है। बस इतना मशवरा है नये लोगों के लिए। चाहे वो कोई भी बड़ा शा’इर हो, कोई शा’इर आपसे बड़ा नहीं है। जब आप लिखने बैठते हैं, आप सबसे बड़े शा’इर होते हैं। किसी को इमिटेट मत कीजिए।

रजनीश्वर चौहान 'रजनीश', rajnishwar chauhan rajnish

रजनीश्वर चौहान 'रजनीश'

B.Com, M.Com और भारतीय शास्त्रीय संगीत में विशारद की तालीम हासिल की। शुरूआती दिनों से ही पेंटिंग, संगीत और रंगमंच में दिलचस्पी। 2018 से फ़िल्म के मैदान में अदाकार, राइटर, स्क्रीनराइटर और डायरेक्टर के तौर पर काम। शा'इरी की तरफ़ रुझान 2012 से और 2017 से बाक़ायदा शे'र कहने का सिलसिला। अदब, संगीत, रंगमंच और फ़िल्म - इन सबसे सीखने और समझ को बेहतर बनाने का सफ़र जारी।

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