pati patni, lekhak, chai, couple, home, tea, man woman sketch
ललित निबंध जय प्रकाश मानस की कलम से....

गाली, गोली और गृहस्थी

           इन दिनों देश के चौकोर बक्सों में बुद्धिजीवी ‘गाली’ और ‘गोली’ के महाशास्त्र पर भारी-भरकम ज्ञान बघार रहे हैं।

​किचन से निकलकर पत्नी ने मुझे देखा और आँख के कोने से एक रसीली मुस्कान फेंकी—मानो याद दिला रही हो कि काग़ज़ घसीटने के नाते इस देश का ‘बुद्धिजीवी’ तो मैं भी हूँ!

​यूँ तो मेरी औकात न गाली जितनी कड़वी है, न गोली जितनी वज़नी, मेरी हैसियत तो बस चाय के कुल्हड़ से उठती भाप-भर है।

​पर साहब, पुरुष-हठ भी अजब शय है— पत्नी की उस मीठी चुटकी ने मेरे भीतर के सोये हुए चिंतक को उकसा दिया।

​फिर क्या था, बिना गहराई नापे मैं भी ज्ञान के इस उफनते नाले में बेधड़क कूद पड़ा।

​साँस रोककर रीढ़ सीधी की और अपनी छरहरी छाती को गज़-भर फुलाकर, एक युगदृष्टा की मुद्रा में यूँ शुरू हुआ…

गाली ज़ुबान का भटकाव है और गोली बंदूक की ज़ल्दबाज़ी, पर दोनों का निशाना अक्सर निहत्था आदमी ही होता है। देश में जब गाली और गोली का बहस-शास्त्र चलता है, तब गृहस्थी चुपचाप चूल्हे में लकड़ियाँ सुलगाकर जीवन को बचाये रखती है।

​बुद्धिजीवी वह है, जो चौराहे की गाली को सेमिनार में लाकर ‘विमर्श’ बना दे और घर लौटकर चाय ठंडी होने पर पत्नी पर खीझ जाये। औकात न होना भी एक तरह की आज़ादी है; जो गोली नहीं चला सकता और गाली नहीं दे सकता, वही तो इस देश में सच बोलने की औकात रखता है। पत्नी का छेड़ना असल में पति को बुद्धिजीवी मानना नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे उस सीधे-सादे आदमी को जगाना है, जो शब्दों के बवंडर से दूर रहता है। गाली जब राजनीति की भाषा बन जाये, तो गोली का चलना महज़ एक तकनीकी औपचारिकता रह जाता है।

​गृहस्थी दरअसल इस धरती पर अहिंसा की सबसे पुरानी और टिकाऊ प्रयोगशाला है, जहाँ रोज़ गालियाँ पचती हैं और गोलियों की गुंजाइश ख़त्म होती है।

​जो ख़बरें टीवी पर चीखती हैं, वे गृहस्थी के शांत दरवाज़े पर आकर वैसी ही बेमानी हो जाती हैं, जैसे पतझड़ के पत्ते पर लिखा कोई गंभीर घोषणापत्र।
•••

छाती फुलाकर मैंने ये एक ही साँस में कह तो दिया, पर छाती फुलाने की भी एक सीमा होती है। जैसे ही साँस बाहर निकली, छाती अपनी पुरानी और मामूली जगह पर आ गयी।

पत्नी ने मुझे देखा। उसकी आँखों में एक हँसी थी, जो वैसी ही थी जैसी किसी पुरानी अलमारी को खोलते समय उससे निकलने वाली हल्क़ी-सी धूप की महक होती है। उसने चाय का कुल्हड़ मेज़ पर रखा और कहा, “चाय ठंडी हो रही है, अपनी क्रांति थोड़ी देर रोक लीजिए।”

pati patni, lekhak, chai, couple, home, tea, man woman sketch

हमारे समय में क्रांति अक्सर चाय के ठंडे होने का इंतज़ार करती है।

टीवी पर कोई सज्जन चिल्ला रहे थे। उनके गले की नसें ऐसे फूल गयी थीं जैसे सुतली बम का धागा छिल गया हो।

वे ‘गाली’ के समाजशास्त्र और ‘गोली’ के लोकतंत्र पर भाषण दे रहे थे। मैं सोचने लगा कि जो शब्द सड़क पर किसी का सिर फोड़ सकता है, वह टीवी के भीतर आकर ‘विमर्श’ कैसे बन जाता है? और जो गोली किसी देह में छेद करती है, वह बहस में इतनी गोल-मटोल कैसे हो जाती है कि कोई भी उसे अपनी जेब में रखकर घूम सकता है?

हमारे गाँव वाले घर के पीछे एक छोटा-सा अमरूद का पेड़ है। उस पर कभी-कभी एक तोता आकर बैठता है। तोते के पास कोई भाषा नहीं होती, पर उसके पास एक अमरूद होता है जिसे वह कुतरता है। मनुष्य के पास बहुत सारी भाषा है, पर अमरूद कम पड़ गये हैं। शायद इसीलिए जब शब्द ख़त्म होते हैं, तो गाली शुरू होती है, और जब गाली की भी साँस फूलने लगती है, तो गोली अपनी ज़ेब से बाहर निकल आती है।

राजनीति की टेबल पर ये तीनों चीज़ें एक साथ सजी रहती हैं। एक पक्ष कहता है: “आपने हमें गाली दी।” दूसरा पक्ष पलटकर तर्क देता है: “पर आपने तो गोली चलायी थी!”

गाली और गोली का यह पक्ष-विपक्ष ऐसा है, जैसे दो लोग एक-दूसरे को आईना दिखाकर पूछ रहे हों कि ‘बताओ, इसमें से ज़्यादा बदसूरत कौन है?’ सत्ता को गाली में अपनी आलोचना दिखती है और विपक्ष को गोली में सत्ता का अहंकार। पर इस रस्साकशी के बीच में जो रस्सी है, वह गृहस्थी है। दोनों तरफ़ से खिंचती हुई, बेचारी, पतली होती हुई रस्सी।

तभी मुझे कबीर याद आये। कबीर के पास कोई बंदूक़ नहीं थी, पर उनके शब्द सीधे वहाँ लगते थे, जहाँ गोली भी नहीं पहुँच सकती। कबीर ने कहा था:

गाली ही ते उपजै, कलह कस्त औ मीच
हारि चले सो साधु है, लागी रहै सो नीच

कबीर की साखी बहुत सादी है। वे कहते हैं गाली से ही कलह, दुख और मृत्यु पैदा होती है। जो हारकर आगे बढ़ गया, वही साधु है; और जो अड़ा रहा, वही नीच है। पर आजकल ‘हारकर आगे बढ़ जाने’ को बुज़दिली कहा जाता है। आज की राजनीति और बुद्धिजीविता हारना नहीं जानती। वह हर बहस को एक युद्ध बना देना चाहती है, जहाँ केवल दो ही रास्ते बचते हैं— या तो तुम मेरी तरह गाली दो, या मेरी गोली का इंतज़ार करो।

तुलसीदास जी महाराज ने इस गृहस्थी और वचन के विवेक को अलग तरह से देखा। उन्होंने लिखा:

तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुंओर
वशीकरण इक मंत्र है तजि दे बचन कठोर

तुलसी जब कठोर वचन त्यागने की बात करते हैं, तो वे असल में उस बंदूक़ की नली को मोड़ रहे होते हैं, जो हमारी ज़ुबान के पीछे छिपी रहती है।

लेकिन दुनिया केवल हमारे यहाँ ही ऐसी नहीं है। विश्व की रोचक परंपराओं को देखें, तो समझ आता है कि मनुष्य ने हिंसा और भाषा को साधने के कैसे-कैसे अनोखे रास्ते खोजे थे।
•••

दक्षिणी अफ्रीका के कुछ क़बीलों में जब कोई व्यक्ति कोई अपराध करता है या बुरा व्यवहार करता है, तो उसे सज़ा देने के लिए गोली नहीं चलायी जाती, न ही उसे जेल में ठूँसा जाता है। क़बीले के सभी लोग—बच्चे, बूढ़े, स्त्री-पुरुष—उस व्यक्ति को बीच में खड़ा कर देते हैं। फिर दो-तीन दिनों तक बारी-बारी से आकर उसकी अच्छाइयों का बखान करते हैं। वे याद दिलाते हैं कि उसने बचपन में कितना अच्छा काम किया था, वह कितना दयालु रहा है। इसे वे ‘अबुंतू’ का भाव कहते हैं। उनका मानना है कि कोई भी मनुष्य बुरा पैदा नहीं होता; जब वह भटक जाता है, तो उसे प्रेम और याद दिलाकर वापस मनुष्य बनाया जाता है।

अगर आज के हमारे टीवी चैनलों और संसद में यह परंपरा लागू कर दी जाये, तो सोचिए क्या होगा? जो नेता गाली देने आएँगे, उन्हें सब बैठकर उनकी पुरानी अच्छाइयाँ सुनाने लगेंगे। नेता जी शर्म से पानी-पानी होकर सीधे अपने घर चले जाएँगे और चाय पीने लगेंगे।

इसी तरह एस्किमो (इनुइट) लोगों में जब दो व्यक्तियों के बीच कोई भयानक झगड़ा या दुश्मनी हो जाती है, तो वे एक-दूसरे को मारने के लिए भाला या बंदूक़ नहीं उठाते। वे क़बीले के सामने एक ‘गायन प्रतियोगिता’ करते हैं। वे कविता और गीत बनाकर एक-दूसरे पर व्यंग्य करते हैं। जो सबसे हँसाने वाला, समझदार और बढ़िया व्यंग्य रचता है और जो बिना ग़ुस्सा हुए अपनी बात कह देता है, क़बीला उसे विजेता चुन लेता है। झगड़ा वहीं ख़त्म हो जाता है।

हमारे यहाँ भी अगर ‘गोली’ की जगह ‘गीत’ आ जाएँ, तो कितनी जगह ख़ाली हो जाएगी। अस्पताल कम लगेंगे, जेलें छोटी पड़ जाएँगी और कविता की किताबें आँगनों में सूख रही धूप की तरह बिखर जाएँगी।

गृहस्थी में भी एक तरह का ‘गायन युद्ध’ ही चलता रहता है।

मेरी पत्नी जब मुझसे नाराज़ होती है, तो वह गाली नहीं देती। वह बर्तनों को थोड़ा ज़्यादा ज़ोर से पटकाती है। पतीली का तवे से टकराना ही उसकी भाषा है। वह उस क्षण की ‘गोली’ है, जो धातु से निकलकर हवा में तैरती है और मुझे चुपचाप यह बता देती है कि दाल में नमक कम था या मेरी बातों में वज़न।

गृहस्थी का अपना एक राजनीति-शास्त्र है। यहाँ कोई भी पक्ष हमेशा के लिए सत्ता में नहीं रहता। सुबह अगर पति का अध्यादेश चलता है, तो शाम होते-होते पत्नी का संविधान लागू हो जाता है। और सबसे बड़ी बात यह है कि इस गृहस्थी को चलाने के लिए किसी सेना या पुलिस की ज़रूरत नहीं पड़ती। इसे चलाती है—आशंकाओं के बीच बची हुई थोड़ी-सी परवाह।

प्रगतिशीलता कोई बहुत बड़ी किताबी चीज़ नहीं है।

प्रगतिशीलता यह है कि जब पूरी दुनिया आपको चीखने के लिए उकसा रही हो, तब आप अपनी आवाज़ को थोड़ा धीमा कर लें। जब सब लोग पत्थर ढूँढ रहे हों, तब आप अपने हाथ में एक छोटा-सा दियासलाई का डिब्बा और दीया थाम लें।

गाली असल में हमारी भाषा की कंगाली है। जब मनुष्य के पास विचार ख़त्म हो जाते हैं, जब उसके पास सुंदर शब्द नहीं बचते, जब वह सामने वाले की बात को काटने में असमर्थ हो जाता है, तब वह गाली का सहारा लेता है।

गाली किसी व्यक्ति का उत्तर नहीं है, वह उसकी वैचारिक हार की स्वीकारोक्ति है।

और गोली?

गोली तो मनुष्य के होने का ही सबसे बड़ा अपमान है। जब लोहा मनुष्य के विचार से भारी हो जाये, जब बारूद किसी माँ की गोद से ज़्यादा क़ीमती हो जाये, तब समझ लेना चाहिए कि हम बहुत पीछे छूट गये हैं। हम गुफाओं से बाहर तो आ गये हैं, पर गुफा का अँधेरा अभी भी हमारी जेबों में जमा है।

पत्नी ने देखा कि मैं काफ़ी देर से शांत बैठा हुआ काग़ज़ पर कुछ घसीट रहा हूँ।

उसने आकर पूछा, “क्या लिख रहे हैं? क्या देश की समस्या का हल निकल गया?”

मैंने हँसकर काग़ज़ उसकी तरफ बढ़ा दिया। कागज़ पर लिखा था:

“गाली और गोली से देश नहीं बचता। देश बचता है उस गंध से जो शाम को तड़के के बाद रसोई से निकलकर बाहर गली तक जाती है और किसी भूखे बच्चे को बताती है कि घर अभी ज़िंदा है।”

पत्नी ने काग़ज़ पढ़ा। उसके चेहरे पर से वह हँसी गायब थी। उसने धीरे से कहा, “चाय ठंडी हो गयी है, मैं दूसरी बना लाती हूँ।”

वह रसोई की तरफ़ चली गयी। रसोई से चूल्हा जलाने की ‘टक-टक’ आवाज़ आयी। वह टक-टक की आवाज़ दुनिया की किसी भी गोली की आवाज़ से ज़्यादा सुंदर और जीवन से भरी हुई थी। मुझे लगा कि गृहस्थी ही वह इकलती जगह है, जहाँ पहुँचकर हर बड़ी बहस छोटी हो जाती है और जीवन अपने बहुत मामूली, पर सबसे सच्चे रूप में चमकने लगता है।

जयप्रकाश मानस, jaiprakash maanas

जयप्रकाश मानस

छत्तीसगढ़ शासन में वरिष्ठ अधिकारी जयप्रकाश मानस की कविताओं, निबंधों की दर्जन भर से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। आपने आधा दर्जन से अधिक साहित्यिक पुस्तकों का संपादन किया है और आपकी कविताओं का अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। यही नहीं, पाठ्यक्रमों में भी आपकी रचनाएं शामिल हैं और अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से आपको और आपकी पुस्तकों को नवाज़ा जा चुका है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!