इंद्रधनुष, शकील जमाली, shakeel jamali, urdu ghazals

इंद्रधनुष-10: शकील जमाली

ग़ज़ल ने पिछली कुछ दहाइयों से जो नया लहजा, नया रंग इख़्तियार किया है, जिसे विद्वान जदीद शाइरी भी कहते हैं, उसने अपना एक ख़ानदान बना लिया है। इसी ख़ानदान की रोशनी फैलाने वालों में एक अहम नाम शकील जमाली का है। 1958 में बिजनौर में जन्मे और पोस्टग्रैजुएशन तक शिक्षित शकील जमाली की ग़ज़लों के चार और नज़्मों का एक संग्रह आ चुका है। दिल्ली उर्दू अकादमी से नवाज़े जा चुके हैं। टीवी के लिए शायरों व अदीबों के फ़न और शख़्सियत पर आधारित 70 से ज़्यादा दस्तावेज़ी एपिसोड का कारनामा आपके नाम दर्ज है। हमारे ख़ास सिलसिले ‘इंद्रधनुष’ में एक और बेहतरीन शायर को जानें – आब-ओ-हवा के तमाम पाठकों की ख़िदमत में ग़ज़ाला तबस्सुम की पेशकश…

इंद्रधनुष, शकील जमाली, shakeel jamali, urdu ghazals

शकील जमाली की 7 ग़ज़लें

उदासी के ज़रा पीछे उजाला लग रहा था
मुझे तो वो मोहब्बत करने वाला लग रहा था

जो मुझसे भी गये-गुज़रे थे मेरे काम आये
जहाँ मुमकिन थी कुछ उम्मीद ताला लग रहा था

मेरे अन्दर भी थोड़ी ख़ुदपसंदी आ गयी थी
तुम्हारा रंग भी इस बार काला लग रहा था

पलटकर देखने की मुझमें हिम्मत ही नहीं थी
मेरे माज़ी के सरमाये पे जाला लग रहा था

कहीं नक़ली सहाफ़ी सनसनी फैला रहे थे
कहीं बेजान ख़बरों पर मसाला लग रहा था

बताने को ग़ज़ल ताज़ा बतायी जा रही थी
मगर मज़मून पिछले साल वाला लग रहा था

——-*——-

ये जो ख़ुश होने का दावा करते हैं
दिन में चार दफ़ा समझौता करते हैं

या तो हमको चोट ज़ियादा लगती है
या फिर हम अह्सास ज़ियादा करते हैं

तू दो दिन की ग़मख़्वारी से ऊब गया
इन पेड़ों को देख जो साया करते हैं

अच्छे-अच्छे दरवेशों को देख लिया
ठेस लगे तो सब वावैला करते हैं

वो भी सोच-समझकर हामी भरता है
हम भी मौक़ा देख के वादा करते हैं

लफ़्ज़ को चेहरा ऊपर वाला देता है
हम तो ख़ाली काग़ज़ काला करते हैं

तुझको पूरा हक़ है धोका देने का
तुझ पर सारे लोग भरोसा करते हैं

जिन लोगों को मैं तनख़्वाहें देता हूं
काम वो ज़ालिम और किसी का करते हैं

नाम के आगे-पीछे साहब लगता है
और बर्ताव ग़ुलामों जैसा करते हैं

——-*——-

हमारे ही यक़ीं का मसअला नईं
कई रौशन ज़मीरों का पता नईं

शबे-वादा किसी क़ीमत पे आ नईं
मोहब्बत कर मगर बे-क़ायदा नईं

कई हमले हुए हैं ज़िंदगी के
मगर अह्सास ज़िंदा है मरा नईं

बिछड़ जाने में सबका फ़ायदा है
कि अब रिश्तों के अंदर कुछ बचा नईं

ये दुनिया जिनके पीछे भागती है
मैं ऐसी शोहरतों पर थूकता नईं

मैं थोड़ी देर पहले हँस रहा था
मुझे इस ग़म का अंदाज़ा हुआ नईं

ये घर कितनी मुसीबत से बना है
हमारे शाहज़ादे को पता नईं

——-*——-

आसानी का मतलब ही दुश्वारी होता है
मैं वो पत्थर चुनता हूँ जो भारी होता है

एक ग़रज़ हर रिश्ते की तक़दीर में लिक्खी है
हर इन्सान ज़रा-सा कारोबारी होता है

मालिक अपनी रहमत के दरवाज़े खोले रख
रिश्तों पर अफ़्लास ज़रा-सा भारी होता है

पानी सर से ऊँचा हो जाने पर खुलते हैं
यारों का घटियापन भी मैयारी होता है

वो भूखे-नंगे लोगों को क्या दे सकते हैं
जिनके तन पर कपड़ा भी सरकारी होता है

तेरे चाहने वालों को ये भी मालूम नहीं
तारे गिनना शौक़ नहीं बीमारी होता है

——-*——-

कोई बहाना कोई कहानी नहीं चलेगी
मोहब्बतों में ग़लत-बयानी नहीं चलेगी

मुनाफ़िक़ों पर वफ़ा का तमग़ा नहीं सजेगा
ख़राब कपड़े पे कामदानी नहीं चलेगी

नयी मोहब्बत नये उसूलों के साथ होगी
दिमाग़ पर दिल की हुक्मरानी नहीं चलेगी

मुझे गवारा हैं शोर करते हुए परिन्दे
मगर ख़मोशी की बदज़ुबानी नहीं चलेगी

हमें ये दुनिया ख़राब समझे ये उसकी मर्ज़ी
मगर सुबूतों से छेड़ख़ानी नहीं चलेगी

ये शहर रिश्तों की अज़मतों को नहीं समझता
यहाँ ज़रा-सी भी ख़ुश-गुमानी नहीं चलेगी

बड़ों के नक़्शे-क़दम पे बच्चे न चल सकेंगे
पुरानी पटरी पे राजधानी नहीं चलेगी

वो महफ़िलें जो बग़ैर उजरत की ख़िदमतें हैं
तो क्या वहाँ भी ग़ज़ल पुरानी नहीं चलेगी

मुशायरे में मुशायरे का लिहाज़ रखना
यहाँ अकेली ज़बानदानी नहीं चलेगी

बहुत ज़ियादा भी मुतमईन मत दिखायी देना
बिछड़ते लम्हों में शादमानी नहीं चलेगी

——-*——-

उसने हर तस्वीर को आधा काला रक्खा है
मैंने जिस लड़की का नाम उजाला रक्खा है

वहीं जहाँ तुम अपनी कोहनी रक्खे बैठी थीं
कुर्सी के उस हत्थे पर दोशाला रक्खा है

जिस पर तेरे होंठों ने इक फूल खिलाया था
सिंक में अब तक बिना धुला वो प्याला रक्खा है

अब तो सब बिछड़े लोगों को वही मिलाएगा
जिसने दिल सीने में चाहने वाला रक्खा है

ये तो हम मजबूरन हँसते-गाते रहते हैं
वर्ना दिल पर दुख का एक हिमाला रक्खा है

उसकी आँख के आँसू ने हैरत में डाल दिया
किसने इस पत्थर में रूई का गाला रक्खा है

रूठने वाले वक़्त मिले तो आकर देख ज़रा
अलमारी में धूल छतों में जाला रक्खा है

चाहे जितनी कड़वाहट आ जाये रिश्तों में
हमने अपना तर्ज़ मोहब्बत वाला रक्खा है

वो भी नतमस्तक हैं उसकी ज़ुल्म कहानी में
जो किरदार बग़ावत करने वाला रक्खा है

——-*——-

रिश्तों की दलदल से कैसे निकलेंगे
हर साज़िश के पीछे अपने निकलेंगे

चाँद-सितारे गोद में आकर बैठ गये
सोचा ये था पहली बस से निकलेंगे

सब उम्मीदों के पीछे मायूसी है
तोड़ो ये बादाम भी कड़वे निकलेंगे

अपने ख़ून से इतनी तो उम्मीदें हैं
अपने बच्चे भीड़ से आगे निकलेंगे

हर कोने से तेरी ख़ुशबू आएगी
हर संदूक़ में तेरे कपड़े निकलेंगे

जाने कब ये दौड़ थमेगी साँसों की
जाने कब पैरों से जूते निकलेंगे

2 comments on “इंद्रधनुष-10 : शकील जमाली

  1. जाने कब ये दौड़ थमेगी साँसों की

    बहुत खूब..इन सात लफ़्ज़ों में इतनी बड़ी ज़िन्दगी की और दुनिया की भागदौड़,तमाम तरह की मशक्कतों
    की थकावट महसूस हुई।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!