
- May 4, 2026
- आब-ओ-हवा
- 2
अंजली देशपांडे चौहान की कलम से....
मृत्युंजय.. कठिन समय में आत्मबल का नाम
ज़िंदगी में जैसे कई नाम, कई चेहरे, कई रिश्ते दिल के क़रीब होते हैं, वैसे ही कुछ किताबें भी दिल के बेहद क़रीब होती हैं! शायद सबके लिए यह बात सच न होती हो, फिर भी अध्ययन से ताल्लुक़ रखने वालों के लिए तो ऐसा होता ही होगा। मैं अपने दिल के क़रीब किताब की बात करूँ तो ‘मृत्यंजय’, यही नाम सबसे पहले ज़ेह्न में आता है।
मराठी के प्रख्यात लेखक शिवाजी सावंत द्वारा मराठी में लिखा एक प्रसिद्ध उपन्यास है ‘मृत्युंजय’। सभी जानते हैं कई भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है। इस साहित्यिक कृति की पृष्ठभूमि महाभारत है। मुख्य रूप से यह प्रसिद्ध उपन्यास महाभारत के महान योद्धा कर्ण के जीवन पर केंद्रित है।
मृत्युंजय पुस्तक की भाषा अत्यंत काव्यात्मक, समृद्ध और प्रभावशाली है। सबसे बड़ी विशेषता मुझे यह लगती है कि इसमें लेखक ने कथ्य के साथ शिल्प को भी महत्व दिया है। प्रतीकों का सुंदर संयोजन जहां-तहां ध्यान रोक लेता है। इसमें कर्ण के चरित्र को अलग-अलग पात्रों के अलग-अलग रिश्तों के माध्यम से यानी विभिन्न दृष्टिकोणों से प्रस्तुत किया गया है। जैसे पत्नी वृषाली, भाई शोण, मित्र दुर्योधन, द्वारिकाधीश कृष्ण, माता कुन्ती आदि कर्ण के चरित्र के प्रति क्या दृष्टि रखते हैं, इसे यह उपन्यास जिस गंभीरता से प्रस्तुत करता है, वह आपके जीवन में सूत्र बनाती जाती है।
कर्ण के मन के विचारों की जटिलता और मानसिक द्वंद्व उभरकर आता है। सम्मान, अपमान, मित्रता, धर्म.. यी सब गहराई से, सूक्ष्मता से सामने आता है। पाठक चरित्र के साथ जुड़ाव अनुभव करता है। मृत्युंजय में लेखन का कलात्मक पक्ष इसे एक साहित्यिक गरिमा प्रदान करने में महत्वपूर्ण हो जाता है। फिर भी, उपन्यास में कर्ण की पीड़ा, उसके दुख, संघर्ष, उसके अपमान, उसकी दानवीरता, पराक्रम, उसकी मित्रता, आत्मसम्मान आदि भाव और विचार संपदा ही ही केंद्र में है और उपन्यास इससे भटकता पल भर भी नहीं।

यह उपन्यास मैंने कॉलेज के दिनों में पहली बार मराठी में पढ़ा था। उस उम्र में इसे पढ़कर मैं गहरे तक प्रभावित हुई थी। उसके बाद और उसके पहले भी अन्य कई पुस्तकें पढ़ीं, लेकिन यह मेरी स्मृतियों में हमेशा रहा। मेरे दिल के क़रीब।
समय के साथ जब जीवन के यथार्थ और कठिन परिस्थितियों से सामना हुआ, फिर वो चाहे रिश्तेदारों का विरोध सहकर अंतर्जातीय प्रेमविवाह हो या पति की गंभीर बीमारी हो, जिससे वो बाद में वो उबर पाये.. या फिर बिज़नेस में लॉस हो, संयुक्त परिवार में अपने अस्तित्व, आत्मसम्मान की लड़ाई हो या परिवार में असमय बड़ी ननद का ट्रेन में सफ़र करते हार्टफेल हो, बड़ी दीदी के सुंदर युवा बेटे का अचानक निधन हो.. इन सब आघातों को सहते जीवन में धैर्य बनाये रखना मुश्किल था और सबसे ज़्यादा पति की बीमारी के क्षणों में मन विचलित। प्रतिदिन कई घंटे हॉस्पिटल में गुज़ारना शारीरिक और मानसिक रूप से थकाने वाला था।
अत्यंत भावुक और संवेदनशील होना भी भारी पड़ने के क्षणों में स्वयं की परेशानियां तो थीं ही, साथ ही दूसरों के दुखों से, कष्टों से द्रवित होते हुए दूसरों की मदद करते रहने का भाव और स्वभाव भी नहीं छोड़ पा रही थी। फिर एक बार मृत्युंजय उपन्यास पढ़ा, इस बार हिंदी अनुवाद।
कर्ण ने इतने दुखों, कष्टों, संघर्षों को सहते हुए अपनी अच्छाई, अपनी दानवीरता नहीं छोड़ी, यह बात बहुत प्रेरणा देती रही। ऐसा लगता मृत्युंजय न होती, तो शायद मैं भी ख़त्म हो चुकी होती। इस पुस्तक ने मुझे आत्मबल प्रदान किया और कर्ण के चरित्र से मुझे संघर्षों में भी हार न मानने की प्रेरणा मिली। यही जीवन है जीने की कला है और सच यह है कि एक किताब इतनी सशक्त हो सकती है कि मुझ जैसे किसी को इतनी शक्ति दे सकती है।
अब जबकि ‘शुक्रिया किताब’ सिलसिले के लिए आब-ओ-हवा के लिए मैं यह नोट लिख रही हूं, तब यह भी याद आ रहा है कि मैंने इसकी कई प्रतियाँ ख़रीदकर मित्रों, रिश्तेदारों को भेंट में भी दी हैं। ज़िन्दगी के इस मोड़ पर मैं जिन किताबों को शुक्रिया कहना चाहती हूँ, निश्चित ही ‘मृत्युंजय’ सर्वप्रथम नाम है।

अंजली देशपांडे चौहान
मूलत: मराठी लेखक और कवि, हिंदी में भी लेखन और अनुवाद के ज़रिये आवाजाही। एक काव्य संग्रह और एक लघुकथा संग्रह के अलावा कई साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में मराठी और हिंदी में कहानी, आलेख, कविताएँ प्रकाशित! गायन एवं सुगम संगीत कलाकार के तौर पर भी सक्रियता।
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मेरे लिए भी ये पुस्तक जीवन दायिनी सिद्ध हुई । सुकून भरी सौगात और कर्ण मेरा अपना ।
बहुत सुंदर लिखा आपने । बधाई ।
मेरे इतने करीब है पुस्तक ये तब भी इस पर नही लिख पाई बस अपने आपको फिलहाल लायक नही समझा ।
पुनः बधाई
बहुत अच्छी पुस्तक है। बहुत सारी स्मृति नई कर दी आपने। अच्छा लिखा। अंजली देशपांडे जी बहुत बधाई।