सरबजीत कौर सोहल, sarabjit kaur sohal, punjabi writer
सरबजीत कौर सोहल पंजाबी साहित्य की प्रतिष्ठित, बहुप्रकाशित और पुरस्कृत लेखक एवं पंजाब साहित्य अकादमी की पूर्व अध्यक्ष हैं। आब-ओ-हवा के लिए सोहल की पंजाबी कहानी का हिंदी अनुवाद डॉ. अमरजीत कौंके की कलम से...

पंजाबी कहानी हिंदी में: मुझे बंदा पसंद है

             मन की इसी उधेड़-बुन ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा। कुछ अजीब-से एहसास मन-मस्तिष्क पर छाये रहते हैं। मन शंकाओं से घिरा ही रहता है। न जाने कब इस साफ़ आसमान में घने बादल उमड़ पड़ें और फिर बारिश हो जाये..। मन में भटकाव, हर वक़्त तल्ख़-सी लगी ही रहती।

मन बदलाव तो आते-जाते रहते हैं… इस उम्र में… ये वक़्त भी गुज़र जाएगा।

मेरी डॉक्टर मुझे बहुत कुछ समझाती है। अचानक ही पसीना छूटने जैसा लगता है। बस निढाल-सा रहना जैसे अब गिरे कि अब गिरे… चक्कर आने को होगा, जैसे…

किसी महीने माहवारी आती ही नहीं और कई बार रक्त वाहिकाएं ही बह निकलती हैं… हार्मोन्स का संतुलन बिगड़ जाता है, इस उम्र में…

भला मुझे बताएं अभी मेरी उम्र को क्या हुआ। अब तक फ़र्ज़ निभाते-निभाते उम्र बीत गयी… अभी तो जीना शुरू करना है… भगवान की दया से बच्चे भी अब उड़ान भर चुके हैं। चिंताओं के कितने ही अम्बार मेरे सामने लगे थे।

यूं ही तो नहीं कहते कि शादियाँ स्वर्ग में निश्चित होती हैं, निभाते-निभाते अक्सर नर्क का रुख़ कर लेती हैं।

अभी दो साल हुए थे शादी को… अच्छे गुज़र गये थे, वो त्योहारों जैसे दिन… प्यार पूरे शबाब पर था… आपस में घुले-मिले, खोये-खोये, कमीपेशियां तो कहीं भी नहीं थीं। वे ऐसे उड़ते थे जैसे पहाड़ों पर बादल, आवारा बादल, और वह भी मानसून के दौरान के..। आगे-पीछे एक वर्ष के अंतराल पर दोनों बच्चे पैदा हो गये। हनीमून पर पूर्ण विराम… घर की ज़रूरतें पूरी करते, बच्चों का पालन-पोषण करते-करते शरीर की उपेक्षा में कमर का कमरा बन गया। लेकिन परिवार के प्रति मेरी आस्था में कोई कमी नहीं आयी थी। एक अच्छी माँ, एक अच्छी पत्नी, एक अच्छी बहू, एक अच्छी ननद, एक अच्छी मेज़बान बनने में सुधीर की प्रेमिका कहीं खो गयी थी।

चलो, चल, सुधीर के प्रमोशन के लिए होने वाली पार्टियों का इंतज़ाम करते-करते मेरे अंदर की औरत भी अब बदहवास हो गयी थी। भला कोई कितना कर सकता है किसी के लिए?

भले ही आप इस परिवार के लिए मर भी जाएं, यह ख़ुश कभी नहीं होगा। मम्मी जी के टीवी सीरियल, पापा जी के पकौड़े, बच्चों का स्कूल और सुधीर का मेरी तरफ़ से बिल्कुल लापरवाह होते जाना।

जितना मैं उसे पुराने दिनों की याद दिलाने की कोशिश करती, उतना ही वह मशीनी होता जा रहा था। वह बातें ही और करने लग पड़ा था। मुझमें दिलचस्पी ही नहीं रही थी जैसे..।

मेरे प्रति इतनी उदासीनता…कभी-कभी तो मुझे ऐसा लगता कि जैसे बाहर कहीं कोई और सहेली न बना ली हो।

फिर मुझे ख़ुद पर ही ग़ुस्सा आने लगता, यह वही आदमी है, जिससे शादी करने के लिए मैं सबसे लड़ी और अब शादी के बाद उसके साथ ही लड़ रही हूं!

इससे पहले कि ये बेवफ़ा हो जाये, मैं ही क्यों न बेवफ़ा हो जाऊं? तंग आ गयी हूँ मैं इस रोज़ाना की किट-किट, किड़-किड़, चिड़-चिड़ से…

भला ऐसे भी कोई करता है, मेरे अंदर की संस्कारी मां की सिखायी हुई औरत सख़्ती से मेरे ही ख़िलाफ़ उठ खड़ी होती… मुझे कोसती..। फिर पापा, परायी बेटी का प्यार, मां की मुश्किलें, सब कुछ मेरे रास्ते में आ खड़े होते। मैं ख़ुद से ही हारा हुई महसूस करती। और मुझे किसने हराना था… मेरी आस्था ही मेरे विचारों के आड़े आ खड़ी होती।

ये वही आस्था थी, जो आदमी को पत्थर से हीरा बना देती है और औरत को बेकार औरत… कामकाज वाली, जो घर के किसी भी कोने में मिल जाएगी… सफ़ाई करती, मेहमानों की देखभाल करती, बच्चों की परवरिश करती, सास-ससुर, ननदों की आवभगत को समर्पित…

चलो, वह जाने! दुनियादारी है, कोई बात नहीं… लेकिन जबसे सुधीर लापरवाह हो गये तो ये सारी ज़िम्मेदारियां मुझे बोझ लगने लगीं… कभी-कभी लगता है मैं वो सदी हूं जो बिना मतलब ही गुज़र जानी है, बिना जिये, जीने की उम्मीद में…

मैं बहुत कोशिश कर रही थी कि सुधीर को अपने क़रीब लाऊं, पर नहीं, उसकी तो जैसे मिट्टी का ख़मीर ही बदल गया हो।

“अच्छा सुधीर, अगर मैं यहाँ नहीं हूँगी तो तुम्हें मेरी क्या बात याद आएगी?” एक दिन मैंने ऐसे ही पूछ लिया।

“तुम्हारे आलू वाले परौंठे”, उसका तुरंत जवाब सुनकर मैं तो एकदम नीचे धँस गयी।

“नहीं नहीं, मेरे बारे में बताओ न…तुम्हें मेरी क्या चीज़ अच्छी लगती है?” मैंने फिर आशा का दामन पकड़ते हुए कहा।

तेरा चुपचाप काम करते रहना, माता-पिता का ख़्याल रखना।

वह फ़ोन की ओर देखते हुए बात करता रहा।

लेकिन सुधीर, ये तुम्हारी ज़रूरतें हुईं न… मैं उसे क्या समझाना चाह रही थी।

रुआँसी-सी हुई मैं उसके पास से उठ गयी थी… और साथ ही मेरा मन भी उठ गया था। सुधीर से और कोई उम्मीद करना बेकार था। प्रेम तो इस जीवन में से जैसे पंख लगाकर उड़ गया था।

उस दिन शारदा भी तो यही कह रही थी कि शादी एक “सामाजिक घोटाला” है। इस गोरखधंधे में फंसाकर पुरुष महिला का पूरी तरह से शोषण करता है।

शारदा मेरे बचपन की सखी थी। उसे याद करते ही वो छोटी-छोटी बातें, खेल, गुड्डे-गुड़िया, साथ में पढ़ने जाना, घंटों कमरे में रहना… सब कुछ चलचित्र की तरह मेरी आंखों के सामने आ गया।

तब हम छठी-सातवीं में पढ़ती होंगी। हमारे घर पड़ोस में थे। स्कूल भी एक ही था। सेक्शन अलग-अलग। सुबह एक साथ स्कूल जातीं, आधे समय की छुट्टी के दौरान एक साथ रोटी खातीं और फिर घर आकर स्कूल का काम ख़त्म करके गुड्डे-गुड़ियों के साथ खेलतीं।

गुड्डा और गुड़िया शारदा की मां ने ही बनाकर दिये थे। शारदा की मां ब्लाउज़ और पेटीकोट पहने पूरे दिन पैर से चलने वाली मशीन पर लोगों के कपड़े सिलती रहती। बची हुई कतरनों से वो हमें गुड़िया के कपड़े बना देते।

हम शारदा के घर ही पीछे वाले कमरे में गुड़ियों से खेलतीं रहतीं। यह कमरा वैसे भी सामान से भरा रहता था। एक ओर बिस्तरों वाली पेटी, पेटी के ऊपर बक्सा और अन्य प्रयोजनों के लिए उपयोग किये जाने वाले बिस्तर।

बस थोड़ी-सी जगह ही बचती थी, कमरे में… हम वहीं छोटी-सी दरी पर बैठकर खेलतीं…

कितनी भोली थीं तब… शारदा ने गुड़िया को नये कपड़े पहनाकर सजाना, सुरख़ी-बिंदी लगानी, कानों में कांटे, माथे पर टीका, गले में माला डालनी और फिर लाल सुर्ख़ चुनरी से घूँघट निकालकर गुड़िया को दुल्हन की तरह सजाना।

दूसरी ओर, मैंने गुड्डा संभाल लेना। उसे पैंट और शर्ट पहनाना, मोतियों की लड़ियाँ पिरोकर सेहरा भी लगाना… इस तरह हमारा गुड्डा शादी के लिए तैयार।

शारदा ने गुड़िया पकड़ना और मैंने गुड़िया को… दोनों को चक्र घुमाने, कि लावां फेरे करवा रहे थे, फिर शारदा ने ऊँ-ऊँ करके रोना, गुड़िया को ससुराल भेजना…

फिर, ‘फिर गुड्डे-गुड़िया ने वही करना जो फ़िल्मों में दिखाया जाता है। जूतों के डिब्बों से बने घर में बिस्तर पर गुड्डे-गुड़िया को सुलाना…

पता नहीं कब और कहां से ये सब सीख लिया था हमने… कई बार शारदा के भाई ने धड़ाम-से कमरे में आ घुसना। दरवाज़े को ज़ोर-से हाथ मारकर खोलना और हमारी गुड़िया को उलट-पलट देना, घर को पैर मारकर तोड़ देना, गुड्डे-गुड़िया के सारे कपड़े बिखेर देना।

अब समझ आ रहा है कि बचपन के ये खेल आज के घर-परिवार का आधार बन गये हैं।

हमने ख़ूब चिल्लाना, आंटी से शिकायत करना और उसे डांट डलवाकर ख़ुश होना।

तब तो हमारी बातें कभी ख़त्म नहीं होतीं थीं। किन्न-मिन्न, किन्न-मिन्न… पता नहीं कहां से इतनी बातें आतीं थीं।

गुड्डे-गुड़िया का विवाह करते, सोचतीं कि हमारी माँ और पिताजी भी ऐसा ही करते होंगे। लेकिन फिर हमने मुकर जाना… नहीं, नहीं… हमारे मम्मी-पापा बहुत अच्छे हैं, वो ऐसा गंदा काम नहीं करते। इस तरह हमने अपनी मम्मी-पापा को अच्छा दिखाने की पूरी कोशिश करनी।

उस समय लड़कियों के इर्द-गिर्द बुने गये सामाजिक ताने-बाने में लड़का-लड़की के प्यार, शारीरिक संबंधों को बेहद गंदे काम के तौर पर दिखाया जाता था।

अब अपनी इसी सोच पर मैं हँसे बिना नहीं रह सकी। शारदा के साथ बिताये पलों की मधुर स्मृति मन को गुदगुदा रही थी।

जबसे शारदा के साथ दोबारा मिलना-जुलना क़ायम हुआ वो पुराना सब कुछ, वो अतीत फिर याद आने लगा है।

पता नहीं किस बारे में बातें करतीं थीं, तबसे हम साल दर साल बड़ी होती गयीं लेकिन अभी भी हमारा बहुत सारा समय एक साथ ही बीतता।

शारदा को मासिक धर्म आ गया… कई दिनों तक हम इस बारे में कानाफूसी करती रहीं… क्या मुझे भी मासिक धर्म आएगा…? बेचैनी में समय गुज़रता। शारदा की माँ ने उसको ब्रा भी ला दी। वह अचानक बड़ी हो गयी हो जैसे…

गुड़िया-गुड्डे की जगह अब हमारी बातें बदल गयी थीं। स्कूल आते-जाते हम अंताक्षरी खेलतीं, गानों का सिलसिला कभी रुकने नहीं देतीं, हिंदी गाने ख़त्म होते तो पंजाबी छेड़ लेतीं। हमारे गाने कितने दिनों तक ख़त्म न होते। कई गाने तो पूरे के पूरे ही गाने लग जातीं।

लेकिन ये सब हम दोनों के बीच ही रहता। वैसे स्कूल आते-जाते अब लड़कों के इरादे भी पहचाने लगीं थीं।

ऐसे ही एक-दूसरे को छेड़तीं… तुम उससे बात कर लो, देखो वह तुम्हें कैसे देख रहा है… बस बातें करने में व्यस्त रहतीं।

छाती के उभारों को बार-बार ओढ़नी से ढँकतीं, पता नहीं शर्म के कारण या फिर किसी अजीब मानसिक स्थिति के कारण, कंधे आगे की ओर झुकाकर चलने की आदत हो गयी थी, मुझे।

मानो बड़ा होना कोई गुनाह हो…और फिर जब मुझे मासिक धर्म आया तो शारदा ने ही मुझे सारी सावधानियां बतायीं।

हमारे बीच कितनी समानताएं थीं… कोई गुड़िया नहीं थीं, लेकिन कमरा अभी भी वही था हमारा…

अंगों के विकास ने हम दोनों की मानसिक क्षमता को अजीब तरीक़े से सोचने पर मजबूर कर दिया था। एक-दूसरे के बगल में बैठकर, हम एक-दूसरे का हाथ पकड़ लेतीं, एक-दूसरे को ज़ोर से भींचकर गले लगा लेतीं… और फिर अधिक से अधिक चिपकतीं ताकि हमारे अंग एक-दूसरे को छू सकें और एक अजीब-सा स्वाद आता। पता नहीं क्या था यह। लेकिन एक-दूसरे का साथ रहना बहुत अच्छा लगता है। नज़दीकियां बढ़तीं तो दरवाज़ा खुलने का ध्यान भी रखना पड़ता था। पता नहीं शारदा का भाई कब हड़कंप मचा दे। पढ़ाई भी जारी रही और हमारी नज़दीकियां भी… ख़ुमारी का-सा आलम…

तभी शारदा की शादी हो गयी। ब्याह कर वह कनाडा चली गयी। पति अच्छा न मिला, एक बेटी हो गयी… और फिर पता चला कि उसने पति से तलाक़ ले लिया। एक ख़ूबसूरत महिला ने कड़ी मेहनत की और अपने पैरों पर खड़ी हो गयी। वह अपनी बेटी के साथ ही ख़ुश थी। दोबारा शादी नहीं की।

इस तरह अपनी-अपनी गृहस्थी में डूबते-तैरते एक लंबे अंतराल के बाद अब हम मिल गये, वह भी फ़ेसबुक के ज़रिये। फ्रेंड रिक्वेस्ट उसने स्वीकार कर ली थी। फ़ोन नंबर शेयर कर लंबी बातचीत हुई। कितनी ही नयी और कितनी ही पुरानी बातें स्मृतियों में हस्ताक्षर करतीं चली गयीं।

मैं उदास थी। कुछ तो इन शारीरिक परिवर्तनों के कारण चिड़चिड़ापन हावी रहता और कुछ सुधीर के व्यवहार के कारण। मेरे प्रति उसकी उदासीनता और भी दुखद होती जा रही थी। इन दोनों मुद्दों पर लड़ते-लड़ते मुझे उदासी, निराशा, स्तब्धता घेरे रहती।

ये सब बच्चों से कैसे साझा करूं… बेटी कुछ समझ लेती लेकिन वो भी अपनी मेडिकल की पढ़ाई में व्यस्त रहती है। और बेटे का तो कहना ही क्या! उसे अपने दोस्तों और पार्टियों से फ़ुरसत नहीं थी। दादा-दादी का लाड़ला पोता…किसी की क्या मजाल कि उसको कुछ कह सके। पूरा सिर चढ़ाया हुआ था उनका।

उनकी वो ही जानें। सुधीर मुझसे दूर और दूर होता जा रहा था। कभी-कभी तो मुझे ऐसा लगता है जैसे मुझमें अब वह पहले वाली बात नहीं रही। वज़न भी बढ़ गया था और ऊपर से यह रजोनिवृत्ति, मूड में बदलाव, पैरों में गरमाहट… मैं एक अजीब मानसिक स्थिति में अकेली, बिल्कुल अकेली… ख़ुद लड़ रही… डॉक्टर तो इसे प्राकृतिक घटना बताकर कैल्शियम और विटामिन लेना अनिवार्य बोलकर, बातों-बातों से पूरी तसल्ली करवा देते।

“जिस तन लागे सो तन जाने, कौन जाने पीड़ पराई”, मेरी मुश्किलें तो मुझे ही झेलनी थीं। कभी-कभी तो दिल करता कि सब कुछ छोड़-छाड़कर कहीं दूर चली जाऊँ। अब इस घर को भी मेरी ज़रूरत नहीं रही। वैसे मैं रोज़मर्रा के काम करती रहती। अगर दिल न करता तो चुपचाप अपने कमरे में सोयी रहती। अब तो जैसे मैं भी घर के प्रति लापरवाह होने लग पड़ी थी।

घर, बच्चे, परिवार सब भावनाओं से जुड़े होते हैं… लेकिन दूसरी ओर घर एक ऐसी दलदल की तरह होता है, जो न तो इंसान को जीने देता है और न ही मरने… बस धँसे रहो, न जियो, न मरो, हवा में उल्टे लटके… गिरे कि गिरे। कहीं सांस लेने के लिए खिड़की तो होनी चाहिए… तभी मेरी उम्र की अधिकांश महिलाएं अवसाद का शिकार हो जाती हैं।

कभी-कभी मैं सोचती, मेरी ऐसी सोच बिल्कुल निराधार है। ये सब तो ऐसे ही मेरे दिल का आविष्कार है। सब कुछ तो वैसे का वैसा ही है। लेकिन फिर यह शून्यता जैसा क्या हुआ, भला?

जब कभी ज़्यादा ही बेचैन होती तो मैं ख़रीदारी करने चल पड़ती। अपनी सारी झुंझलाहट पैसों को अनाप-शनाप ख़र्च करने में बर्बाद करके निकाल लेती।

घर को दालों, सब्जियों, फलों से भर देती। दोनों फ़्रिज लबालब भर जाते। और नहीं तो वह किसी नर्सरी से पौधे ले आती और माली का इंतज़ार किये बिना ही पौधे लगाना शुरू कर देती।

मम्मी जी कुछ कहते तो मैं उनको भी यह कहते हुए चुप करा देती, “कोई बात नहीं बीजी बसते घरों में चीज़ों की ज़रूरत बनी ही रहती है। यहां तो लोग लोगों का इस्तेमाल कर जाते हैं, यह तो फिर चीज़ें हैं, इस्तेमाल हो ही जानी हैं।”

बीजी ने सुधीर को घेर लिया, “कहे, तू घर को समय नहीं देता।”

सुधीर के कान पर जूं तक न रेंगती। पता नहीं वह क्यों मुझे फ़ॉर ग्रांटेड लेने लग पड़ा था।

चलो छोड़ो! मैं ही क्यों परवाह करूं दफ़ा करो, नहीं तो न सही… मुझे कोई ज़्यादा ज़रूरत है? सोचते हुए मैं लापरवाह होने की लाख कोशिश करती लेकिन फिर कहीं न कहीं मन में टीस उठ जाती।

यह घर, शादी की यह प्यारी जेल, एक महिला के सपनों को घुन की तरह खा जाती है। इसका पता तब ही चलता है, जब खोखली औरत धड़ाम-से गिर जाती है।

अब तो ऐसा लग रहा था, मानो इस घर में मेरा कोई अस्तित्व ही न हो। धन-संपदा और सुख-सुविधाओं के साथ-साथ घर के काम-काज के लिए नौकरों के आ जाने से मैं बेकार हो गयी थी।

पूरे दिन अपने कमरे में बैठकर नेटफ्लिक्स और वेब सीरीज़ देखना और थककर सो जाना। रक्तचाप भी कुछ बढ़ने लगा था।

हालत यह हो गयी थी कि किसी से बात करने का भी मन नहीं था करता। मन को कोई बात भाती न हो जैसे। कोई चाव, कोई किक… नहीं थी कहीं, कोई…

डॉक्टर के मुताबिक़ मैं डिप्रेशन का शिकार हो गयी थी। उन्होंने मुझे लगातार दवाइयां लेने की सलाह दी थी।

पता था मुझे कि ख़ुद का ख़्याल रखना मेरी ही ज़िम्मेदारी है… लेकिन मैं क्या करती… मेरी ख़ुदी ही मेरे ख़िलाफ़ खड़ी हो जाती।

जब से शारदा से संपर्क स्थापित हुआ… तो कुछ अच्छा-सा लग रहा था।

उस दिन मैंने सुधीर को फ़रमान ही दे दिया था। हमने कनाडा जाना है… मुझे कुछ नहीं पता… जाना है तो बस जाना ही है। मेरा और सुधीर का वीज़ा लगकर आ गया और आख़िरी मौक़े पर उसने मना कर दिया, वही काम का बहाना।

लेकिन मैंने तो जाने की ठानी थी और मेरी ज़िद पूरी भी हो गयी।

शारदा मुझे एयरपोर्ट पर ही लेने आयी हुई थी। वैसी की वैसी। बल्कि पहले से ज़्यादा निखरी हुई और स्वस्थ नज़र आ रही थी। हां, बाल ज़रूर छोटे करवाये हुए थे। एक बार तो मेरी पहचान भी धोखा खा गयी थी… लेकिन नहीं उसके आलिंगन की गरमाहट और ऊम्हां करके मिलना… यह वही शारदा थी… मेरी बचपन की दोस्त और मेरी दोस्त से भी आगे बहुत कुछ…

इतने सालों बाद मिले दोस्तों की बातें कम थोड़ी ही होतीं हैं, पति से अलग होना, परदेस में अकेले निर्वाह करना, बेटी का पालन-पोषण करना, यह काम कोई जिगर वाली महिला ही कर सकती थी। जैसे-जैसे वह अपने बारे में बता रही थी, वैसे-वैसे मैं उसके हौसले और हिम्मत की तारीफ़ कर रही थी।

बल्कि मुश्किलों ने उसे और मज़बूत बना दिया था। दो-दो, तीन-तीन नौकरियाँ करके वह अब अच्छी तरह से सेटल हो गयी थी। बेटी भी दूसरे शहर की यूनिवर्सिटी में पढ़ रही थी। माँ-बेटी की अपनी ही दुनिया थी, बस… इन दोनों ने इसमें किसी और के लिए कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी थी…

अब मुझे पता चला कि जब हम किसी से बहुत दिनों बाद मिलते हैं और बहुत-सी बातें होती हैं तो हमें समझ नहीं आता कि बातचीत कहां से शुरू करें… पहले कौन-सी और बाद में कौन-सी… और फिर ऐसी मनोस्थिति में जैसे कोई बातचीत ही नहीं होती, बल्कि मौन छा जाता है।

घर जाते समय पारंपरिक बातें चलती रहीं। शारदा के आने के बाद उसका भाई भी कनाडा आ गया और कभी-कभार इधर-चक्कर लगा जाता… अपने परिवार में मग्न…

हालात के थपेड़ों ने शारदा को कठोर बना दिया था, शायद…. वह अलसायी और गर्म शारदा न जाने कहाँ चली गयी? एक बार तो लगा कि मैंने कोई ग़लती तो नहीं कर ली।

बेटी का फ़ोन ज़रूर आया था। उसी ने ही मेरे राज़ी-ख़ुशी पहुंचने की ख़बर सुधीर व अन्य लोगों को दी थी।

सामान कमरे में रखने के बाद शारदा चाय बनाने के लिए रसोई में चली गयी। मैंने अपने कपड़े उतारे और नहाने के लिए बाथरूम में चली गयी। घर अगर बहुत बड़ा नहीं तो बहुत छोटा भी नहीं। सुख-सुविधा का सब कुछ था वहाँ… मैं नहाकर आयी तो शारदा ने एक बार फिर बाहों में भर लिया।

आहा! यह हुई ना बात, अब मुझे मेरी पुरानी वाली सहेली मिली है, नहीं तो मुझे ऐसा लगे जा रहा था, जैसे मैं कहीं और आ गयी होऊं।

चाय पीते हुए हम एक ही सोफ़े पर बैठ गयीं। सफ़र की थकान के कारण मैंने सोफ़े पर पालथी मार ली और अपना सिर उसके कंधे पर रख लिया।

कितनी शांति थी, बिना बोले सब कुछ घुलता-मिलता जा रहा था। अगल-बगल बैठे दोनों के शरीर बिना बोले ही सब कुछ महसूस कर रहे थे। सरकते-सरकते मेरा सिर उसकी गोद में जा पड़ा… शारदा बड़े प्यार से मेरे बालों में अपना हाथ फिरा रही थी। न जाने हम कितनी देर इसी अवस्था में बैठी रहीं।

अपनी-अपनी जगह कितना कुछ सहा था हमने… मैं तो चलो फिर भी सुधीर और बच्चों की मोहमाया में प्यार ढूंढती रही थी लेकिन शारदा ने तो जैसे दिल के सारे दरवाज़े बंद कर लिये थे। किसी भी आदमी के लिए कोई झरोखा नहीं रखा… बिल्कुल… बिलकुल भी गुंजाइश नहीं… किसी के लिए।

आँखें बंद किये, पता नहीं मैं क्या का क्या सोचे जा रही थी। अचानक न जाने क्या मन में आया, उसने झुककर मेरा माथा चूम लिया। शायद ये उस पुरानी सहेली के होने का असर ही था।

बातें करते हम किचन के पास वाली डाइनिंग टेबल पर बैठ गयीं।

“वाइन तो लोगी न” उसने इतने प्यार से कहा कि मैंने मना नहीं किया।

“हां बिल्कुल… क्यों नहीं, मैं जिस ज़िंदगी से आयी हूं वह पूरी तरह से बोरियत है… एक नीरस जिंदगी… एक अस्तित्वहीन अस्तित्व के लिए, हाशिये पर धकेली हुई…” यह कहते-कहते मेरी आंखें भर आयीं।

“चीयर्स, मैं जीना चाहती हूं…ख़ुद को महसूस करना चाहती हूं, कि मैं हूं भी कि या नहीं।” मैं कहे बिना नहीं रह सकी।

धीरे-धीरे घूंट-घूंट करके हमने वाइन पीना शुरू किया, ऐसा लगा जैसे दिमाग़ से मनों बोझ उतर गया हो। घर, परिवार, बच्चे सब जैसे मुझसे जुदा हो गये हों… ऐसा लग रहा था मानो मैं अपनी ही ‘मैं’ से मिलने आयी होऊं।

शराब के सरूर में सब अच्छा-अच्छा लग रहा था। शारदा ने पुराने हिंदी गाने लगा दिये थे। गाने सुनते-सुनते हम एक-एक ग्लास वाइन और पी गयीं।

शरीर हल्का, फूल जैसा लग रहा था। और झिझक सारी ग़ायब हो गयी थी। शरीरों से ऊपर उठने के बाद हम वही छोटी लड़कियाँ बन गयी थीं। तबसे अब तक के जीवन के बीच के वर्ष… कहीं उड़न छू हो गये थे।

थोड़ा खाने के बाद हम उठ गयीं। शारदा ने बड़ी अदा से हाथ बढ़ाते हुए मुझसे डांस करने के लिए पूछा.. कि मुझे उस पर बेहद प्यार आ गया। हम एक-दूसरे का हाथ पकड़े धीरे-धीरे डांस करने लगीं, जैसे कोई प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे के प्यार में खोये हुए…

शारदा मेरे क़रीब आ गयी, एक बार फिर उसने मुझे कसकर गले लगा लिया, इस आलिंगन की गर्माहट ने उसे बचपन के एहसास से भर दिया था। पता नहीं उसे क्या हुआ, उसने आगे बढ़कर मेरे होंठों को चूम लिया।

मैं ठुटंबर गयी थी लेकिन वो जाने! पुरानी सहेलियाँ हैं… सालों बाद मिली हैं… हो जाता है कभी-कभार… प्यार के इसी मूड में ही हम सोने चली गयीं।

“तुम्हें अभी नहीं सोने देना मैंने। अभी बहुत सारी बातें करनी हैं…” उस ने मोह से भरपूर आवाज़ में कहा।

“मेरी सोना मोना, मैं अब यहाँ ही हूँ, तुम्हारे साथ, जितने दिनों के लिए चाहो रख लेना… खुली छुट्टी है।” मैंने उसके गाल थपथपाते हुए कहा।

बातों का सिलसिला ऐसा शुरू हुआ कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। छोटी से छोटी बात भी याद थी, उसे…

अगले दिन और उसके अगले दिन… हम उठतीं, खातीं और गाड़ी लेकर घूमने चल पड़तीं। अंताक्षरी खेल ली। वो सारे फ़ालतू लड़के, जो मोड़ पर खड़े होकर हमें घूरते रहते थे… उन्हें भी याद कर लिया था।

पता नहीं ये कैसी समानता थी? मैं कुछ सोच ही रही होती, और वो कह देती थी। मानसिक वेवलैंथ का समन्वय था, शायद…

शारदा ने तो काम से भी छुटियां ले रखीं थीं। इस सप्ताहांत पर तो उसकी बेटी ने भी नहीं आना था। इतनी आज़ादी, इतनी निजता खाने-पीने, उठने-बैठने, पहनने-उतारने, आने-जाने की… मैंने कभी ऐसी ज़िंदगी की कल्पना भी नहीं की थी।

धीरे-धीरे मेरा स्वयं मुझे मेरे होने का एहसास करा रहा था। कितनी नज़दीकियाँ थीं, हम दोनों में, तब भी और अब भी… एक-दूसरे के मन और शरीर की सारी बातें, राज़ हमारी पकड़ में आ जाते थे।

हम जो हालात के कारण जीना भूल गयी थीं, अब हवा के झोंकों के साथ उड़ने लगीं। फूलों की तरह महकने लगीं… जिस्मों के साथ ख़ुद को जानने और मानने का ख़ूबसूरत अहसास आत्माओं पर छाया ही रहता। ऐसा लगता है मानो हमारे सिवा इस दुनिया में कोई भी नहीं रहता।

एक ही बिस्तर पर, एक ही कम्बल, साथ जुड़-जुड़ सोते हुए, कब शरीर हरकत में आ जाता, अपने आपको पता भी न चलता। सब कुछ अचेत, सोते हुए में हो जाता। दूसरे को सुख का एहसास करवा हम खुश होतीं। ये बिल्कुल अलग एहसास, सुधीर से तो बिल्कुल अलग… सुधीर ने सदैव स्वयं को पहल दी थी। लैंगिकता से ऊपर उठकर, जिस्मों से भी अलग… अस्तित्व का एहसास, आत्माओं की तरलता, पारे की तरह बहते जिस्म, अज्ञात-सा कुछ घटित होना…

अपराध-बोध तो नहीं था, शांति थी, वैराग्यमय स्थिति… वह जुड़ाव जो हमारे बीच था, वह क्षण, वह भावना… सुधीर के साथ ऐसी भावना कभी नहीं आयी थी। सुधीर को ख़ुश करने की चाहत में मैं ख़ुद नाख़ुश रह जाती थी।

कमाल है ना, शारदा के साथ इस तरह के प्रगाढ़ रिश्ते के कारण मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मैंने अभी ही अपना कौमार्य खोया हो।

मेरी आत्मिक हमसफ़र शारदा, और जिस्मानी हमसफ़र सुधीर… क्या अंतर था दोनों के स्पर्श में..! देह सुख भी था, मन की तृप्ति भी, बोझ रहित… आपसी रिश्ता… नफ़ा-नुक़सान से मुक्त, दायित्वों और ज़रूरतों से भी मुक्त… एहसास के सबसे सूक्ष्म क्षण… जैसे कोई समाधि, भक्ति… भावनाओं की तीव्रता, अंदर तक धँस जाने की प्रगाढ़ ख़्वाहिश… कुछ तो था अनोखा, शारदा में…

इतने सालों में सुधीर के साथ यह एहसास क्यों नहीं हुआ? मैं अपने आप से पूछती।

कहने को, देखने को, मेरी पूर्णता, सम्पूर्ण, सजी-धजी गृहस्थी… पर कमी थी, कोई…

यह कैसा प्यार था, जिसमें औरत-मर्द का अस्तित्व ही नकारात्मक हो गया था। सभी ख़ामियों सहित… एक-दूसरे के प्रति मोहब्त, स्नेह… बिना शर्त प्यार…

“तुम बिल्कुल भी डिमांडिंग नहीं हो, पानी की तरह तरल रूप-सी बहने वाली, कोई तनाव नहीं है।” शारदा मुझसे कह रही थी।

“तुमसे पहले भी मेरी ज़िंदगी में एक-दो लड़कियाँ आयी थीं, पर बहुत ज़्यादा निभी नहीं। याद है जब हम गुड़ियों से खेलते थे और गुड्डे-गुड़िया की शादी करते-करते… हम ही गुड्डा गुड़िया बन जाती थीं। मुझे लगता है, उस उम्र में शारीरिक बदलाव, हार्मोन का उन्माद, समाज का डर, हमें लड़कों से दूर रहना ही सिखाता रहा। शायद इसीलिए हम एक-दूसरे के प्रति आकर्षण महसूस करतीं थीं।” मैं शारदा को ढंग से समझा रही थी।

“लेकिन देख शारदा, मेरे तो दो बच्चे हैं, सुधीर है…भला, मैं तुम्हारे साथ कैसे सहज महसूस कर रही हूं? मैं समलैंगिक नहीं हो सकती? मैं शादीशुदा हूं। फिर हमारा यह संबंध कैसे बना?” कहीं हम भावुक मूर्ख तो नहीं, इमोशनल फूल्ज़, यूं ही अपनी वासना को तार्किक रूप से सही ठहराने वाले!” मैंने अपना पक्ष रखते हुए कहा।

“लेकिन यह भी सच है कि मेरा घर मेरे लिए प्रेशर कुकर बन गया है। सीटियों पर सीटियाँ बजाने के बावजूद उन्हें मेरी हालत का एहसास नहीं था। अगर यह कुछ देर और ऐसे ही रहता, तो मैं अपने ही दबाव से फट जाती। इस ब्रेक की तो मुझे सख़्त ज़रूरत थी।” मैंने बात ख़त्म करते हुए कहा।

“ओये-होये! मेरी सहेली अब कैटरपिलर से बटरफ़्लाय बन गयी है, वापस कोकून में कैसे जाओगी?” शारदा मुझे चिढ़ाती है।

“तुम नहीं समझ सकतीं प्रिये… मेरा पूरा जीवन दूसरों के लिए दूसरों की देखभाल करते, दूसरों का अनुसरण करने में बीता है। इसमें मैं तो कहीं भी शामिल नहीं रही। पिता के जाने के बाद मेरी मां कहीं दुखी न हो, यही ध्यान रहता। माँ के डर से सुधीर के भी पीछे-पीछे चलती रही… कहीं यह मुझे छोड़ न जाये…

अब बस, बहुत हो गया, बहुत हो गया, मुझे किसी के पीछे नहीं साथ चलना है। दूसरों के डर से नहीं, अपने परायेपन से भी नहीं, बल्कि मुझे अपने लिए कुछ करना है…” जैसे मैं ख़ुद अपने आप से ही बोले जा रही थी।

“इसीलिए तो मैं अलग हो गयी थी। निक्की अभी दो साल की भी नहीं हुई थी। बच्चे का ख़्याल रखना, घर का ख़्याल रखना और हर रात पति का बलात्कार सहना। मुझे वह कभी भी अच्छा नहीं लगा था। साथ ही, इस देश में बहुत सारे पुरुष और महिलाएं अलग हो जाते हैं। यह कोई भारत थोड़े है कि लोग बातें करेंगे। लड़की का तलाक़ हो गया, ज़रूर लड़की में ही नुक़्स होगा, वग़ैरह-वग़ैरह।”

शारदा बड़ी बेपरवाही से बता रही थी।

“लेकिन मेरे लिए यह संभव नहीं है, मेरे दो बच्चे हैं… सुधीर है, चाहे कैसा भी है, है तो पति ही।” मेरी आन्तरिक परम्परा आवाज़ दे रही थी।

मन के अंदर का विरोध फिर सिर उठाता है और ‘ना भई’ का जाप कर चिल्लाने लगता है। अभी उस दिन भी टीवी पर समाचार सुनते समय मैंने एक मुद्दे पर अपनी राय देनी चाही तो सुधीर एकदम से बोल पड़ा, “पहले रोटियां जलाना बंद कर, फिर देश के बारे में सोचना”।

“भला मैं कोई मूर्ख हूँ… रोटी पकाने वाली, घर संभालने वाली, अवैतनिक नौकरानी। बहुत ग़ुस्सा आया था मुझे, लेकिन फिर भी मैंने ग़ुस्से को पी जाना ही उचित समझा।”

“अगर सुधीर साथ हो तो सब कुछ अटक-सा जाता, गतिहीन, बेस्वाद ज़िंदगी… न नमक, न मीठा, और न ही कोई किक… लेकिन, जब तुम होती हो तो, तो सब कुछ बहने लगता है। कुछ कहना भी नहीं पड़ता… जैसे हम हैं, निःसंकोची, बेपरवाही के साथ विचरते हुए…

लेकिन फिर कहीं न कहीं मुझे यह सब परेशान करने लगता। अपना आप दोषी लगने लगता। गृहस्थी की फुलकारी का एक-एक धागा मैंने बड़े चाव से पिरोया था, अब कौन-सा धागा उधेड़ूं…? सब तहस-नहस ही न हो जाये।” मैंने शारदा के सामने अपनी चिंता व्यक्त की।

“कोई बात नहीं, तुम्हारी उलझनें भी सुलझ जाएंगी। अगर तुम चाहो तो यहाँ मेरे साथ हमेशा रह जाओ, कोई नाराज़गी नहीं, कोई नफ़रत नहीं, कोई माँग नहीं, सब कुछ सहजता से…” शारदा ने ज़ोर देकर कहा।

“हुम, मैं भी जाना तो नहीं चाहती, तुम्हारे साथ मुझे अपने आप का एहसास हुआ… हमारे रिश्ते की सहजता ने मुझे जीवित होने का एहसास कराया। फिर से जीने की चाहत दी है। मेरे लिए यही सबसे संतुष्टिदायक बात है। ऐसे समय बच्चों को निमोशी दिलानी… बहुत साहस चाहिए।” मैंने फिर से अपना पक्ष स्पष्ट किया।

“ठीक है, जैसी तुम्हारी इच्छा… बस खुश रहो, यहाँ हो या वहाँ, इस घर के दरवाज़े तुम्हारे लिए हमेशा खुले रहेंगे।” शारदा ने उदास होकर कहा।

एक महीना कब बीत गया, पता ही नहीं चला। अलग होते वक़्त हम दोनों उदास थीं।

वापस पहुँची तो घर का चेहरा ही अलग-अलग-सा था। सुधीर बड़े उत्साह से मिले। बच्चे भी तरसे हुए थे। यह मेरे लिए एक राहत की बात थी।

शारदा के साथ बिताये पल मेरा अनमोल ख़ज़ाना थे। मैं जब चाहूं उसके पास जा सकती थी। शारदा मेरी ऑक्सीज़न विंडो थी।

सरबजीत कौर सोहल, sarabjit kaur sohal, punjabi writer

शारदा का फ़ोन आता है, मैं उसको बताती हूँ, “रात को मैं सुधीर के साथ सोयी थी। और पता है…. पहली बार मेरे में मैं मौजूद थी।”

मैं सोच रही थी… या ख़ुद को सांत्वना दे रही थी… हाँ, सचमुच ही… मुझे बंदा पसंद है..।

अमरजीत कौंके, amarjeet kaunke

डॉ. अमरजीत कौंके

पंजाबी और हिंदी दोनों भाषाओं में निरंतर लेखन। अनुवादों के साथ ही पंजाबी भाषा में साहित्यिक पत्रिका 'प्रतिमान' के संपादक के रूप में भी चर्चित। भाषा विभाग, पंजाब और साहित्य अकादमी, दिल्ली से पुरस्कृत रचनाकार/अनुवादक। संपर्क: 98142 31698

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