
- July 20, 2026
- आब-ओ-हवा
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पुस्तक चर्चा ज़ाहिद ख़ान की कलम से....
अवतार कौल: यह क़ाबिल डायरेक्टर याद है आपको?
हिन्दी सिनेमा में जब भी समानान्तर सिनेमा की बात होती है, तो कुछ फ़िल्म डायरेक्टरों का अहमियत से ज़िक्र होता है और बाक़ी को बिसरा दिया जाता है। जबकि कुछ डायरेक्टर और ऐसे हैं, जो सिर्फ़ एक फ़िल्म से फ़िल्मी दुनिया में अपनी अविस्मरणीय छाप छोड़ गये। आज भी उन्हें उनकी ऐसी ऑल टाइम क्लासिक फ़िल्मों से जाना जाता है। इनमें पहला नाम, अवतार कौल और दूसरा रवीन्द्र धर्मराज है।
‘चक्र’ फ़िल्म के निर्देशक रवीन्द्र धर्मराज को महज़ 33 साल की उम्र मिली। और उनकी बद-क़िस्मती देखिए, जिस साल 1981 में उनकी फ़िल्म रिलीज हुई, उसी साल उनकी मौत हो गयी। यानी फ़िल्म की कामयाबी देखने से पहले ही वे इस दुनिया से रुख़्सत हो गये।
ठीक यही कहानी इससे पहले अवतार कौल के साथ घटित हुई थी। साल था 1974। जिस साल उनकी फ़िल्म ’27 डाउन’ को दो राष्ट्रीय पुरस्कारों— सर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार और सर्वश्रेष्ठ फ़ोटोग्राफ़ी के पुरस्कार से सम्मानित किये जाने का एलान हुआ, ठीक उसी दिन अपनी महिला दोस्त को समंदर में डूबने से बचाने के चक्कर में उनकी बेवक़्त मौत हो गयी। अवतार कौल की उस वक़्त उम्र जानें, तो महज़ 35 साल थी। यह होनहार डायरेक्टर, जो काफ़ी जद्दोजहद कर इस मुक़ाम तक पहुंचा था, अपनी कामयाबी नहीं देख पाया।

अवतार कौल की ज़िंदगी देखें, तो उनकी इब्तिदाई ज़िंदगी बेहद तकलीफ़देह रही। अवतार के पिता अक्सर उनके साथ बद-सुलूकी करते थे और उन्हें बचपन में ही घर से निकाल दिया था। बचपन में अवतार ने एक चाय की दुकान और होटल पर भी काम किया। संघर्षों के बाद विदेश मंत्रालय में उन्हें एक छोटी-सी नौकरी मिल गयी और उनका तबादला अमेरिका में हो गया। न्यूयॉर्क में नौकरी के दौरान उन्होंने वहां फ़िल्म निर्माण सीखा। भारत लौटने पर कौल ने मर्चेंट आइवरी प्रोडक्शन्स की ‘बॉम्बे टॉकी’ में असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम किया। और दो साल बाद अपनी पहली फ़िल्म ’27 डाउन’ शुरू की।
बहरहाल, ’27 डाउन’ जब रिलीज़ हुई, तो इसको न सिर्फ़ दर्शकों का बेशुमार प्यार मिला, बल्कि लीक से हटकर बनी इस आर्ट फ़िल्म की सराहना फ़िल्म क्रिटिक्स और एक्सपर्ट्स ने भी दिल से की। ख़ास तौर से फ़िल्म के निर्देशन, फ़ोटोग्राफ़ी और राखी की अदाकारी को ख़ूब तारीफ़ मिली। फ़िल्म को अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में भी सराहना और अवॉर्ड हासिल हुए, जिनमें ख़ास तौर पर ‘लोकार्नो फ़िल्म फेस्टिवल’ और जर्मनी का ‘आईएफ़एफ़एमएच’ क़ाबिले—ग़ौर है। इतनी सारी उपलब्धियाँ हासिल करने के बावजूद ’27 डाउन’ और अवतार कौल दोनों को एक लंबे दौर तक गुमनामी का सामना करना पड़ा।
समानान्तर सिनेमा आंदोलन में उनको वह मुक़ाम हासिल नहीं हुआ, जिसके वह वास्तविक हक़दार थे। यही सब वजह हैं कि अवतार कौल के भांजे विनोद कौल ने उनके ऊपर एक शोधपरक किताब ‘अवतार कौल द (इन) कम्प्लीट स्टोरी’ लिखी, जो अवतार कौल के संघर्षमय जीवन और उनके फ़िल्मी सफ़र, ख़ास तौर पर ’27 डाउन’ पर तफ़सील से नज़र डालती है। विनोद कौल, ‘राज्यसभा टीवी’ के कार्यकारी निदेशक पद पर रहे हैं।
‘अवतार कौल द (इन) कम्प्लीट स्टोरी’ तक़रीबन 280 पेज की है और दो हिस्सों में बॅंटी हुई है। किताब के पहले और अहम हिस्से में अवतार कौल की ज़िंदगानी के सफ़र को दस्तावेज़, मौखिक इतिहास, अभिलेखों और नायाब तस्वीरों के मार्फ़त पेश किया गया है। 14 गहन शोधपरक अध्याय अवतार कौल के बचपन, नौजवानी, शिक्षा, संघर्षों और उनकी अमेरिकी पत्नी ऐन कौल की कहानी को तटस्थता और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करते हैं।
वहीं किताब का दूसरा हिस्सा अवतार कौल को एक शख़्सियत और एक डायरेक्टर के तौर पर समझने की कोशिश है, जिसे उनके साथ काम करने वाले साथियों, क्रू मेम्बरों, जर्नलिस्ट, विद्वानों और फ़िल्म क्रिटिक्स के तजुर्बों और ख़यालात से बुना गया है। मसलन सिनेमेटोग्राफर ए.के.बीर, साउंड रिकॉर्डिस्ट अरुणोदय शर्मा, एफ़टीआईआई फ़ैकल्टी पंकज सक्सेना, स्टूडेंट अर्पित गोयल, राइटर-जर्नलिस्ट अविजित घोष और फ़िल्म क्रिटिक्स ए.के.अरुण, जय अर्जुन सिंह के ख़यालात के मार्फ़त अलग-अलग नज़रिये पेश किये गये हैं।
किताब उस दौर के भारत के सिनेमाई परिवेश, गवर्नमेंट पॉलिसी और उन हालात पर भी रोशनी डालती है, जिनके दरमियान अवतार कौल ने अपनी फ़िल्म बनाने का हौसला किया। यही वजह है कि यह महज़ एक जीवनीपरक किताब नहीं, बल्कि उस समय के सिनेमा, समाज और रचनात्मक संघर्षों का भी एक दिलचस्प दस्तावेज़ है।
अवतार कौल के ननिहाल, उनकी पैदाइश, परवरिश, तालीम और तरबीयत की अक्कासी अध्याय ‘Gash Bab and Taat’s Unbound Affection’ में विनोद कौल ने इस तरह की है कि 1940 के दशक के श्रीनगर, कश्मीरी पंडित परिवारों की जीवनशैली, परंपराएँ और घरेलू परिवेश पाठक के मन में मानो एक सिनेमा की तरह साकार हो उठते हैं। ‘27 Down on the Track’ अध्याय, फ़िल्म की टीम के सिलेक्शन की पूरी प्रक्रिया को सामने लाता है। यह अवतार कौल की सिनेमा की गहरी समझ, दूरदृष्टि और क़ाबिलियत को पहचानने की अद्भुत क्षमता को उजागर करता है।
कुछ चुनिंदा मेम्बर मसलन आर्ट डायरेक्टर बंसी चंद्रगुप्त को छोड़ दें, तो तक़रीबन पूरी टीम नयी थी; कई लोगों के लिए तो यह पहली फ़िल्म ही थी। बाद के सालों में यही लोग इंडियन फ़िल्म इंडस्ट्री के प्रतिष्ठित और सम्मानित नामों में गिने जाने लगे। इनमें बॉंसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया, साधु मेहर, रेखा सबनिस, ओम शिवपुरी, नरेन्द्र सिंह और एम.के.रैना जैसे नाम शामिल हैं।
फ़िल्म निर्माण के समय सबसे चर्चित फ़िल्म की हीरोइन राखी थीं, जो यह जानते हुए भी कि यह अवतार कौल की पहली फ़िल्म है और ’27 डाउन’ में उन्हें बिना ग्लैमर के पेश किया जाएगा, फ़िल्म को करने के लिए राज़ी हो गयीं। पूरी फ़िल्म में राखी बिना मेकअप के एक ही सूती साड़ी में नज़र आती हैं। फ़िल्म में उन पर कोई गीत नहीं फ़िल्माया गया। पर्दे पर वे जहां-जहां नज़र आयी हैं, उनका अभिनय काफ़ी संयत नज़र आता है। डायरेक्टर अवतार कौल ने उन्हें बड़े ही ख़ूबसूरती से कैमरे में कैप्चर किया है। बाद में राखी का यह फ़ैसला सच साबित हुआ। स्क्रीन पर उनके शानदार प्रेज़ेंस और रोल की ख़ूब तारीफ़ हुई।
’20th July 1974′ अध्याय अवतार कौल की ज़िंदगी के दो बेहद मुख़ालिफ़ और फ़ैसलाकुन लम्हों— उनकी रचनात्मक उपलब्धियों और उनकी बेवक़्त मौत को एक साथ छूता है। एक ओर जहाँ यह उनके राष्ट्रीय पुरस्कार और सिनेमा में मिली मान्यता जैसे गौरवपूर्ण पलों को रेखांकित करता है, दूसरी ओर उनकी अचानक और अफ़सोसनाक मौत के ब्यौरे को भी सामने लाता है। अवतार कौल अपनी ज़िंदगी में ’27 डाउन’ के उस कम्प्लीट इफ़ेक्ट को नहीं देख पाये, जो समय के साथ सामने आया। न ही उन्हें वह व्यापक पहचान मिल सकी, जो एक लंबे रचनात्मक ज़िंदगी से हासिल हो सकती थी।
’27 Down on the Track’ और ’27 Down Through My Eyes’ जैसे अध्यायों में विनोद कौल ने फ़िल्म के निर्माण की पूरी प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन किया है। इसमें नयी कहानी और अकहानी के सशक्त हस्ताक्षर रमेश बक्षी के चर्चित उपन्यास ‘अठारह सूरज के पौधे’ का पटकथा में रूपांतरण से लेकर चलती ट्रेन में राखी जैसी स्थापित अभिनेत्री के साथ आम यात्रियों के बीच शूटिंग करने के अनुभवों को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है। शूटिंग के दौरान पूरी यूनिट को पुलिस द्वारा लॉकअप में डाल दिया जाना और सेना द्वारा क्रू को कॉर्डन-ऑफ़ किये जाने जैसे वाक़िआत का भी दिलचस्प और तथ्यात्मक विवरण दिया गया है।
इन प्रसंगों को नायाब ब्लैक एंड व्हाइट और रंगीन तस्वीरों, एडिट स्क्रिप्ट्स और स्क्रिप्ट की कॉपियों के मार्फ़त प्रमाणिक तौर पर सामने रखा गया है। फ़िल्म ’27 Down’ के उस मशहूर टॉप-एंगल शॉट -जिसमें बॉम्बे वीटी पर लोकल ट्रेनों के रुकने के साथ ख़ाली प्लेटफ़ॉर्म कुछ ही पलों में भीड़ से भर जाता है- की योजना, तकनीकी तैयारी और निष्पादन पर विस्तार से चर्चा की गयी है। साथ ही इस सीन को लेकर मुख़्तलिफ़ फ़िल्म समीक्षकों और विश्लेषकों के दृष्टिकोण तथा उसके सिनेमाई महत्व को भी किताब में शामिल किया गया है। बाद में, यही सीन डायरेक्टर डैनी बॉयल की मोस्ट पॉपुलर और सुपरहिट फ़िल्म ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ के आख़िरी सीन में भी ज्यों का त्यों फ़िल्माया गया।
इस सीन के अलावा सिनेमेटोग्राफ़र ए.के.बीर ने पूरी फ़िल्म में कमाल का कैमरा वर्क किया है। मसलन उन्होंने 1966 की फ़िल्म ‘दि बैटल ऑफ़ अल्जीयर्स’ से प्रेरणा लेकर सत्तर फ़ीसद फ़ोटोग्राफ़ी हाथ के कैमरे से की। ताकि ट्रेन में भीड़ भरे माहौल को सही तरह से कैप्चर कर सकें। डायरेक्टर अवतार कौल ने छाया और प्रकाश का सही संतुलन बनाने के लिए फ़िल्म ब्लैक एंड व्हाइट में बनायी। फ़िल्म को प्रमाणिक बनाने के लिए उन्होंने ज़्यादातर शूटिंग वास्तविक लोकेशन यानी ट्रेन, रेलवे प्लेटफ़ॉर्म, स्टीम यार्ड, रेलवे परिसर के बाहरी इलाक़ों और रेलवे क्वार्टर में की।
यही नहीं, उन्होंने बनारस के घाट और गलियों में भी फ़िल्म के अहम सीन फ़िल्माये। फ़िल्म का टाइटल ’27 डाउन’, बॉम्बे-वाराणसी एक्सप्रेस पर रखा गया। एक तरह से देखें, तो यह फ़िल्म पूरी तरह से प्रयोगधर्मी थी। जिसमें अवतार कौल ने नये-नये प्रयोग किये।
किताब में फ़िल्म ’27 Down’ के सब्जेक्ट, उसके सिनेमाई ट्रीटमेंट और किरदारों के माध्यम से सामाजिक दबावों के बीच फ़ैसला न ले पाने की दार्शनिक स्थिति का भी विश्लेषण किया गया है। ख़ास तौर पर पुरानी और नयी पीढ़ी का वैचारिक द्वंद्व, जो आज भी किसी न किसी रूप में जारी रहता है। फ़िल्म के अहम किरदार संजय (एम.के. रैना) और शालिनी (राखी) का जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों में अनिर्णय की स्थिति में रहना ही ’27 Down’ का केन्द्रीय विषय है।
लेखक विनोद कौल का मानना है कि अवतार कौल की फ़िल्म ’27 Down’ मुख्यतः दो पटरियों पर चलती है— पहली उसकी कथा और दूसरी उसका छायांकन। इन दोनों पक्षों के प्रमुख सूत्रधार क्रमशः कथाकार रमेश बक्षी और छायाकार ए.के.बीर रहे हैं। इन्हीं दोनों रचनात्मक सहयोगियों के साथ अवतार कौल के पेशेवर और व्यक्तिगत संबंधों को आधार बनाते हुए किताब में दो पृथक अध्याय— ‘Awtar and Bir’s Duo : Creation of the Over-the-Shoulder Shot’ और ‘A Shared Vision of Awtar and Bakshi’ शामिल किये गये हैं।
फ़िल्म के निर्माण से लेकर उसके फ़िल्मांकन तक की पूरी यात्रा में ये दोनों लंबे समय तक अवतार कौल के साथ जुड़े रहे तथा इस रचनात्मक सफ़र और उससे जुड़े विविध अनुभवों के सहभागी बने। दरअसल, इन अध्यायों के मार्फ़त लेखक विनोद कौल, अवतार कौल को सिर्फ़ एक डायरेक्टर के तौर पर ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील, विचारशील और मानवीय व्यक्तित्व के रूप में भी सामने लाने में कामयाब रहे हैं। और यही उनकी किताब का मक़सद है। एक क़ाबिल डायरेक्टर को उसका वास्तविक हक़ मिले, जो वक़्त की गर्द में कहीं दब-सा गया है। और उसे जाने-अनजाने बिसराने की कोशिश भी होती रहती है।

जाहिद ख़ान
इक्कीसवीं सदी के पहले दशक से लेखन की शुरुआत। देश के अहम अख़बार और समाचार एवं साहित्य की तमाम मशहूर मैगज़ीनों में समसामयिक विषयों, हिंदी-उर्दू साहित्य, कला, सिनेमा एवं संगीत की बेमिसाल शख़्सियतों पर हज़ार से ज़्यादा लेख, रिपोर्ट, निबंध,आलोचना और समीक्षा आदि प्रकाशित। यह सिलसिला मुसलसल जारी है। अभी तलक अलग-अलग मौज़ूअ पर पन्द्रह किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक के हमसफ़र’ के लिए उन्हें ‘मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन’ का प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘वागीश्वरी पुरस्कार’ मिला है। यही नहीं इस किताब का मराठी और उर्दू ज़बान में अनुवाद भी हुआ है।
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हिंदी सिनेमा के इतिहास में इतनी खूबसूरत महत्वपूर्ण फिल्में जोड़ने वालों का परिचय देने वाला लेख बहुत सराहनीय है।