
- May 8, 2026
- आब-ओ-हवा
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बियॉण्ड द रिव्यू आकांक्षा की कलम से....
अस्सी के बहाने चिंतन के रास्ते
हर बीस मिनट में बलात्कार देश में कहीं न कहीं होने का एक डेटा है। स्क्रीन पर बार-बार यानी हर बीस मिनट में लिखा आ जाता है ‘बीस मिनट’। फिर ‘अस्सी’ में एक सीन है, जब वकील गिनवा रही है कि आज कितने, कहां-कहां और किस उम्र की महिलाओं या लड़कियों के साथ रेप हुए। देखकर लगा कि यह नंबर एक जेंडर का तो है कि कितनी लड़कियाँ या औरतें… लेकिन जो एक और डेटा है वो ये कि कितने सारे लड़के/आदमी हर बीस मिनट में इस विकार के साथ घूम रहे हैं कि मौक़ा मिलते ही वो रेप करेंगे! और लड़की/औरत तो अधिकतर एक बार में एक ही है, पर आदमी? वो समूह में भी हैं। यानी जितने रेप, उतनी औरतें लेकिन उससे कहीं ज़्यादा आदमी।
यह डेटा तो है कि हर दिन 80 महिलाएं बलात्कार की शिकार यानी 100 से भी ज़्यादा आदमी हर दिन दोषी। लेकिन ऐसी मंशा रखते हुए घूम रहे आदमियों की संख्या क्या हम जान पाएंगे?
जब इतने सारे आदमी ये सोच या चाह रहे हैं तो क्या बचे आदमियों को ये बात इतनी परेशान करती है कि इतने रेप केस होते हैं? आसपास के समाज में देखूं तो शायद हाँ! पर इतनी मतलब कितनी! इसका कोई मापन नहीं हो सकता। एक फ़र्क जो सोच पा रही हूँ, वो यह कि उनके लिए ये आउट-ऑफ़-बॉडी अनुभव है। Literally!

शरीर को उसकी मर्ज़ी के बिना छूए जाने का अनुभव शायद औरतों को ज़्यादा होगा। (जानती हूँ बाल यौन शोषण मामलों में लड़कों को भी अनुभव करना पड़ता है)। लेकिन वह एक उम्र तक। लड़कियों को यह अनुभव अलग-अलग उम्र में अलग-अलग, लगभग हर जगह करना होता है या ऐसे अप्रिय अनुभवों से बचने का अनुभव तो झेलना ही पड़ता है।
तो ऐसे में आदमी ऐसी सूचनाओं, ऐसी घटनाओं या ऐसी फ़िल्मों से मानसिक, बौद्धिक तौर पर प्रभावित होता है? औरत पर ये ख़बरें, ये कहानियाँ शारीरिक और भावनात्मक तौर पर भी असर करती हैं। हमारे अन्दर जो हलचल, जो ग़ुस्सा, जो डर, जो खीझ, जो लाचारी, जो आतुरता, जो हड़बड़ी आती है, वो ऐसे शारीरिक अनुभवों और भावनाओं की वजह से भी आती होगी। ज़ाहिर है हम मानसिक और बौद्धिक तौर पर तो लड़ ही रहे हैं, पर बाक़ी असर हमें अधिक गहराई में भी परेशान करते रहते हैं।
अब हम शिक्षा, स्वास्थ्य और आय योजना में सामाजिक-भावनात्मक लर्निंग (SEL) की बात कर रहे हैं। इसको हम लड़के-लड़की नहीं बल्कि हर एक के लिए उपयुक्त मानते हैं। साथ ही अब की पीढ़ी ज़्यादा उजागर और स्पष्ट बोलने वाली मानी जाती है। आज हम स्टीरियोटाइप तोड़ने की बात ज़्यादा खुलकर करते हैं और ऐसा माहौल अपनाने के लिए – जिसमें लड़कों को भी खुलकर ज़ाहिर करने के लिए सेफ़ समाज मिल सके, उनके रोने को या लड़की का साथ देने को कमज़ोरी न माना जाये, मर्दानगी के नये मायनों की चर्चा होती है। यह भी कि आत्म-विश्वास, अपनी पहचान और उसको अपनाना, सम्मान देना और लेना – जैसे काफ़ी पहलुओं पर चर्चा जारी है। ये तमाम संवाद धैर्य और ठहराव की मांग कर रहे हैं या फिर धीमी गति ही इनकी शर्त है।
इसके उलट सच यह भी है कि बदलाव की गति ही लगातार तेज़ होती जा रही है। “इंस्टेंट” का दौर जारी है – जिसमें तुरंत खाना और रेटिंग, अपलोड और लाइक, पहली बार मिले और सीधे लव या फिर झटपट न्याय जैसे कितने ही फ़िनॉमिना चर्चा में आ रहे हैं। ऐसे में स्पष्ट रूप से हम दो बिल्कुल उलट सिरों वाले समाज हैं। और यह हमारी समझ व व्यक्तित्व का हिस्सा है।
शिक्षा में विषयों के अलावा कितना कुछ और सीख जाते हैं, सीखना होता है। स्कूल की अलग दुविधा है। स्कूल, समाज, पालक, संस्थाएं… सब अपने-अपने स्तर पर कोई न कोई गुण या कौशल दे रहे हैं लेकिन ये सारी इकाइयां मिलकर क्या कोई एक लर्निंग पर काम कर पा रही हैं? या फिर एक नागरिक तमाम विरोधाभासों से ही बन रहा है? सब अपनी अलग-अलग होड़ में हैं! ऐसे में प्रभाव यही है कि बच्चा भी देखते-देखते होड़ ही सीख रहा होगा, होड़ का ही हिस्सा बनकर जीवन के निर्णय ले रहा है।
ऐसे में यह उम्मीद की जा सकती है कि रेप के आंकड़े कम हो जाएंगे? पर हो तो उलट रहा है – यह डेटा बढ़ता जा रहा है। ‘अस्सी’ में जो बलात्कार पीड़ित है, वह स्कूल में बतौर शिक्षक अपनी नौकरी पर दोबारा जाना चाहती है, तब उसे प्राचार्या से जो पता चलता है, वह दुखद आश्चर्य है। जिन बच्चों को वह बरसों से पढ़ा रही है, वही उसके साथ हुए अपराध को चटख़ारे लेकर मीम्स बना रहे हैं। यहां यह विचार है कि इतने बड़े और महेंगे स्कूल, इतने अच्छे रिज़ल्ट के बावजूद हम समाज क्या बना रहे हैं? हमारा विज़न क्या है, प्लैन क्या है?
‘अस्सी’ फ़िल्म नहीं बल्कि बलात्कार के मुद्दे पर अलग-अलग छोरों से लगातार चलने वाला एक विमर्श है। फ़िल्म एक केस की सुनवाई पर केंद्रित है लेकिन कई मामलों पर डिबेट करती है। जिस पर फ़िल्म केंद्रित है, उस केस की सुनवाई पर किसी क़िस्म के अदालती फ़ैसले पर फ़िल्म ख़त्म नहीं होती। बल्कि फ़िल्म का आख़िरी अदालती दृश्य यह है कि महिला जज स्कूली बच्चों से कहती है, ‘किड्स डू वेल, डू बेटर दैन अस’।
इस फ़िल्म का एक और मुख्य उद्देश्य यह भी साफ़ तौर पर दिखता है कि यह बदले की भावना या फिर ग़ुस्से को ही निष्कर्ष समझने के पक्ष में नहीं है। न्याय के पक्ष में है। या ऐसे कहें कि न्याय क्या है, कैसे होगा, इसका उत्तर किसी के पास नहीं है बस यह फ़िल्म न्याय की खोज की तरफ़दारी है।
एक सीन में वकील कहती है, हममें भी इतना ग़ुस्सा है कि आधी दुनिया जला दें। पर तुम तो बिगाड़ने में लगे हो, किसी को तो समझदार बनना होगा! किसी को तो बचाने के लिए भी काम करना होगा! Pause. Think. Re-think…
फ़िल्म : अस्सी
निर्देशक : अनुभव सिन्हा
लेखक : अनुभव सिन्हा एवं गौरव सोलंकी
कलाकार : तापसी पन्नू, कनि कुसरुती, ज़ीशान अय्यूब, रेवती, मनोज पाहवा, कुमुद मिश्रा, सत्यजीत शर्मा

आकांक्षा त्यागी
अपने करियर में पहले क़रीब 10 वर्ष पत्रकार रहीं आकांक्षा पिछले क़रीब 15 वर्षों से शिक्षा में नवाचार के क्षेत्र में सक्रिय हैं। शोधकर्ता और ट्रेनर के रूप में वह राष्ट्रीय स्तर तक के प्रोजेक्ट लीड कर चुकी हैं। वर्तमान में एलएलएफ़ के साथ बच्चों की शिक्षा से जुड़े विषयों पर अपनी सेवाएं दे रही हैं। साहित्य, कला और सिनेमा में गहरी रुचि रखती हैं और गाहे ब गाहे सरोकार से जुड़े विषयों पर लेखन में भी।
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