
- August 11, 2026
- आब-ओ-हवा
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एक अच्छी कहानी कई परतों पर एक साथ चल रही होती है। दिशा, निष्कर्ष, अंत.. पहले से कहानी में कुछ तय नहीं होता, बस प्रवाह निश्चित होता है। इन दिनों 'विकास' रोज़मर्रा की ख़बरों में है लेकिन क्या यह कहानी उसी विकास की है? या फिर उस विकास की, जिसे हम-आप रोज़ अपने आस-पास देखकर भी नहीं देख पाते!
शशि खरे की कहानी: विकास
आख़िर विकास है क्या? कब जाकर विकास पूरा होगा? पिछले सौ वर्षों में इन्सान ने जितनी तरक़्क़ी की है वह, पिछले दस हज़ार सालों की तरक़्क़ी पर भारी है।
किन्तु विकास तो अभी भी नहीं हुआ है! अभी भी पूरी दुनिया विकास की ही बातें करती है… लोग अपना और परिवार का विकास चाहते हैं, व्यापारी व्यापार के विकास की चिंता करते हैं समाज और नेता लोग देश के विकास की बातें करते हैं… अरे हाँ मैं भी तो विकास की बातें करना चाहती हूँ।
हमें बाणसागर कॉलोनी से पुराने बाज़ार तक जाना था। सहेली तारा सिन्हा को कुछ ज़रूरत का और मन बहलाने को कुछ फालतू का सामान ख़रीदना था, जिसे कहते हैं शॉपिंग।
एक बिलकुल नया चमकता हुआ रिक्शा जैसे हमारी ही प्रतीक्षा कर रहा था, सामने आकर खड़ा हो गया, बिना तय किये हुए हम दोनों उसमें बैठ गये… जी भरकर घूमने के बाद शाम को उसी रिक्शे से वापिस घर आ गये।
अब मैंने उसे ध्यान से देखा, जो हमारा रिक्शेवाला था, किशोरवय लड़का था। पोषण की कमी बदन पर भारी असर डाले हुए थी पर दिमाग़ पर दुधारी असर दिख रहा था फ़िल्मों का। शर्ट झूल रही थी तीन बटन खुले, टाइट जीन्स। व्यावहारिक था वह लड़का, हमारे हाथों से सामान लेकर घर के अन्दर रख आया। जाते हुए बोला यहीं पास में मेरा घर है… वो देखिए… वो जो आठ-दस कच्चे मकान बने हैं, उनमें हरा वाला हमारा है। आइएगा..
हैं? क्यों? बहुत हैरानी से मैंने कहा। मुश्किल से अठारह साल का लम्बा-सा लड़का था।
बहुत लापरवाही से रिक्शे की तरफ जाते हुए बोला – क्यों माने क्या? अरे आप लोगों को जब कहीं जाना हो तो बुला लीजिए। वो घर है न.. वहाँ आकर चिल्लाइएगा- विकास…
-क्या कहा, क्या कहा? चिल्लाना? विकास?
-यस सर, यस मैडम…
उसने तनकर सैल्यूट किया, अबाउट टर्न बोलकर मुड़ा और कोई गाना गाते हुए चला गया। हम दोनों हैरान हुए, फिर हँस पड़े… पागल है।
साल भर में विकास हम लोगों से बहुत हिल-मिल गया था। हमारी शॉपिंग में मीन-मेख निकालना, रिक्शा चलाते हुए हमारी बातों के बीच अपनी विशेषज्ञ राय रखना उसका अधिकार हो गया था। इन्हीं सबके बीच वह अपने सपने भी देख लेता था और बहुत ख़ुश होकर वर्णन करता था कि उसे क्या चाहिए, वह कैसे बड़ा आदमी बनेगा, फिर ख़ुद ही अपनी बात काट कर कहता- नहीं, नहीं मुझे मोटा सेठ नहीं बनना है, मैं तो हीरो बनूँगा।
जब वह गदगद होकर अपने सपनों के बारे में बोलता रहता था तो मुझे वह एक ऐसे बच्चे जैसा लगता था, जो अपने पिता की अँगुली थामे बहुत उल्लास से मेले में खेल-खिलौने देख रहा हो।
सामान अंदर पहुँचाते हुए वह अपनी बातूनी आदत के चलते घर भर से हिल-मिल गया था।बैठकर ख़ूब बातें करता था।
तारा की माँ को थोड़ा समय लगा लेकिन वे भी उसे पसंद करने लगीं। जब भी आता उसे चाय पिलाती और खाने का कुछ अच्छा व्यंजन बाँधकर दे देती थीं, घर ले जाने। वह यहाँ कभी नहीं खाता था। कहता था घर में और लोग हैं, उनके साथ बाँटकर खाना अच्छा लगता है।
…हमें कहीं जाना हो या नहीं, वह रोज़ ही रिक्शा लेकर निकलने से पहले पूछ लेता था। तारा और मैंने उसे बहुत समझाया कि सरकारी स्कूल में एडमिशन ले लो। पढ़ाई कर लो। इस पढ़ाई में तुम्हारा भविष्य छुपा है। पढ़ोगे तो अच्छा बोलना, उठना-बैठना सब सीखोगे।
वह उदास होकर, कभी-कभी हँसकर कहता, अब तो अब्बाजान भी पछताते हैं, उन्होंने मदरसे में भेजा था, फिर एक बार मौलवी साहब से झंझट हो गयी तो वहाँ से भी निकाल लिया। सोचते थे लड़का तो हर क़ीमत पर कमाऊ पूत ही होता है पढ़े या न पढ़े। बच्चा था मुझे कहाँ कुछ समझ थी।
उसकी आंँखों में निराशा के बादल हमसे भी देखे नहीं जाते थे। …तुम हँसते ही अच्छे लगते हो। चलो अब पढ़ लो। हम लोग तुम्हें पढ़ाएँगे।
कोशिश तो की थी हम दोनों ने लेकिन वह दिन भर रिक्शा चलाता, रात में थककर सो जाता था।
सुबह-सुबह कुछ दिन पढ़ाई चलती रही। होशियार था, प्रायवेट पाँचवी की परीक्षा पास कर ही ली। जब रिज़ल्ट लेकर आया तो शरमा रहा था और हम दोनों इस तरह उछल पड़े, जैसे हमने पाँचवी पास कर ली हो।
रमज़ान के महीने में आया। हुलिया बदला हुआ… सफ़ेद गोल टोपी, इत्र से गमकता हुआ सफ़ेद कुरता-पजामा, साथ में तीन-चार भाई-बहन भी थे। सभी प्रसन्न दिख रहे थे। उसके भाइयों ने हम दोनों को देखकर ईद मुबारक कहा, फिर शरमाकर भाग गये। जाते-जाते बोले- सरफ़राज भाई जल्दी आना।
तारा की माँ को हैरान देखकर विकास बोला…क्या हुआ? जी मेरा नाम सरफ़राज अली ही है। एक फ़िल्म में हीरो का नाम विकास था, मुझे बहुत पसंद था, रोज़ देखने जाता था उसकी नक़ल करता, वैसे ही बाल बनाता, उसके डायलॉग बोलता रहता, उसके गाने गाता रहता था, तबसे सब मुझे विकास कहने लगे और मुझे बहुत ख़ुशी मिलती थी।
फिर हमेशा की तरह उसने हाथ हिला-हिलाकर भाषण देना शुरू कर दिया- नाम में क्या रखा है, क्या रखा है जाति या धर्म में। अरे मैं बड़ा हो रहा हूँ, जीने के सपने देखता हूँ। अपनी उम्र के लड़कों को बाइक पर घूमते देखता हूँ, कालेज जाते देखता हूँ तो टीस उठती है… काश मैं भी उनमें से एक होता, फिर चाहे मेरा नाम कुछ भी होता।
अब्बा ने मदरसे में ही थोड़ा पढ़ाया है। अब्बा से अब काम नहीं होता। मैंने तो उन्हें हमेशा बीमार और बूढ़ा ही पाया है। ऊपर से तीन भाई-बहन हैं। मन तो मेरा भी बहुत उड़ानें भरता है… सोचता हूँ बस एक पक्का मकान और इतनी कमाई कि सब भरपेट खा सकें।
मै बम्बई जाऊँगा, देखो अच्छा लगता हूँ न शाहरुख़ ख़ान से ज़्यादा। अच्छा गा लेता हूँ। छोटे रोल तो मिल ही जाएंगे। पर ये मेरे भाई-बहन और अम्मी-अब्बू… इनको किसके भरोसे छोड़ दूँ..?
और अब तो मैंने पाँचवी पास कर ली है, देखिए अम्मा जी अबकी बार आठवीं कर लूँगा फिर दसवीं पास हो जाऊँगा।
…दीदी बहुत अच्छे से पढ़ाती हैं।
उसका भाषण किसी नेता से कम नहीं होता है, यह सोचकर तारा ने उसे रोका, उठाया-चलो, चलो मिठाई तो ख़रीद लाएँ। मेरी तरफ़ इशारा कर बोली, ये देखो बीना कबसे आयी हुई है अब उसे भी घर जाना है।
घर वापस आये तो सरफ़राज अंदर नहीं आया। मिठाई के डिब्बे जो हमने उसे ख़रीदकर दिये थे, भाई-बहन के लिए, लेकर जाने की हुलास थी।
तारा और मेरा घर अगल-बगल ही है। जब तक स्कूल जाते थे, गेट खोलकर आने-जाने के बदले हम दोनों बाउंड्री वॉल कूदकर एक-दूसरे के घर आते थे.. समय बदला कॉलेज के साथ साड़ी पहनना शुरू किया तो दीवारें फाँदना भी बंद कर दिया।
लेकिन इतिहास और राजनीति शास्त्र के अध्ययन से इतनी समझ आ रही थी कि कुछ दीवारों को फांदना ज़रूरी होता है।
मैंने भी घर जाने के लिए क़दम बढ़ाये तो तारा की मम्मी ने मुझे घुड़कते हुए कहा- ऐ तू बैठ यहाँ।
मैं आराम से सोफ़े पर लेट गयी।
– कहिए?
-ये विकास विकास नहीं है? मुझे आज पता चला।
तारा पहले ही हँसते हुए बोलने लगी- आज तक किसी को ठीक से पता नहीं विकास क्या चीज़ है।
मम्मी ने फिर मेरी तरफ़ देखकर कहा, तुम बताओ।
– हम दोनों ने उसका फ़ॉर्म भरवाया, हमें तो बहुत समय से मालूम है।
– मुझे क्यों नहीं बताया?
ऐसी कोई विशेष बात तो नहीं है। नहीं ध्यान रहा हम लोगों को। क्या फ़र्क पड़ता है। हर किसी की ज़िंदगी में रस्साकशी-सी चलती है। हमारे साहबज़ादे… मैंने तारा के भाई की तरफ अंगुली उठायी… नौकरी पाने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं, आरक्षण को कोस रहे हैं। सभी धर्म वालों की बिल्कुल एक जैसी दिक्कतें हैं। एक जैसी ज़रूरतें हैं और एक जैसे सपने हैं… एक नौकरी, मकान, शादी-ब्याह फिर चैन से दिन बिताना, धर्म से क्या फ़र्क पड़ता है..!
तारा की मम्मी तुम्हारी बात एकदम सही है, धर्म कुछ भी हो आदमी का स्वभाव, आदतें, ज़रूरतें सब एक समान होती हैं।
पर रहन-सहन में फ़र्क तो होता है। अगर सारे मुसलमान अपने देश चले गये होते तो अपने जैसे लोगों में ज़्यादा सुखी रहते।
तारा जल्दी ग़ुस्सा हो जाती है। चिढ़कर बोली, क्या मतलब अपने देश?
…ये यहीं पैदा हुए हैं जैसे हम। जाने कितनी पीढ़ियों से यही इनकी जन्मभूमि है, यही देश है। मम्मी आश्चर्य से बोलीं, लेकिन नेता लोग तो बोलते हैं, बाहर से आये हैं?
– उस ज़माने में बस, रेल, हवाई जहाज़ इस क़दर तो नहीं था कि लाखों लोग भर-भर कर आ जाते।
और इतिहास यही सिखाता है कि दुनिया के इंसान एक ही हैं। जो जहां पैदा हुआ है उसे उसकी जड़ों से मत उखाड़ो। किसी को विदेशी कहना सबसे क्रूर चोट होती है।
और मम्मी! सुनो हमारे भी तो झगड़े हैं आर्य और द्रविड़ के। कुछ इतिहासकार कहते हैं आर्य विदेशी हैं, यहाँ के मूल निवासी नहीं हैं।
बालगंगाधर तिलक ने भी माना कि आर्य उत्तरी ध्रुव से आये हैं, तो चलें हम भी पोटली बांधकर उत्तरी ध्रुव? …नहीं ना? इसीलिए हमें आज की ज़रूरतों, आज की समस्याओं के बारे में सोचना चाहिए। हमारे शहर में पानी की दिक़्क़त है, बिजली की कटौती बहुत अखरती है, महंगाई कष्ट देती है, बीमारियों का इलाज महंँगा है, रोज़गार नहीं है, ये समस्याएँ, बिना भेदभाव किये सभी को एक जैसा सता रही हैं।
– मैं तो केवल जानकारी ले रही थी। मम्मी घबरा गयीं। वे तारा का भावुक दिल जानती थीं, वह ख़ूब चिल्लाएगी, यहाँ से वहाँ लगातार चलती रहेगी और सामान पटकेगी।
मैंने तारा को हाथ पकड़कर बिठा लिया।
तारा मैं सोचती हूंँ, हमारे जैसे लाखों लोग हुए हैं पहले भी, आज भी जो दिल से चाहते हैं कि दुनिया में जो जहांँ है, अपने घर में अमन-चैन से रहे।
लेकिन पत्थर दिल राजनीति करने वाले न केवल हमारे यहांँ बल्कि पूरे संसार में नस्ल, धर्म के नाम पर उजाड़ रहे हैं। लाखों लोग घर छोड़ शरणार्थी बनकर भटकते हैं।
कब इंसान को सचमुच स्वतंत्रता मिलेगी! इस धरती पर अपनी ज़िंदगी चैन से जीने की…. कभी सत्ता, कभी सरकार, कभी देश, कभी राष्ट्र के नाम पर लोगों को उनकी जड़ों से उखाड़ फेंका जाता है। ऐसा लगता है कि धरती पर कहीं कोई भी स्वतंत्र नहीं है।
…फिर बहुत समय तक विकास अपने घर अब्बू की बीमारी बहन की शादी में व्यस्त रहने के कारण नहीं आया।
इतने ख़ुशमिज़ाज और मेहनती लड़के के जीवन में ज़रा-भी खुशी नहीं है ये सोचकर मुझे बड़ी मायूसी होती थी। तारा भी दुखी होती थी लेकिन जीवन धारा के प्रबल प्रवाह में बहते जाने वाले हम दोनों बड़े कमज़ोर चिंतक थे, लाचार से।
एक बार उसके रिक्शे में कॉलेज जाते हुए हमने चर्चा छेड़ी..
– सरफ़राज़ दिन निकलते जा रहे हैं। तुम किसी तरह दसवीं कर भी लो तो कुछ काम तो सीखना पड़ेगा। रिक्शा तो तुम्हारा सारा ख़ून चूस लेता है। हम लोग भी बहुत पैसे वाले नहीं कि तुम्हारी बड़ी मोटी सी मदद कर सकें। दिनो-दिन तुम बीमार रहते हो।
विकास ने बारी-बारी से हम दोनों को देखा और फिर ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा- उदास होने की ज़रूरत नहीं है। मैं तो हर हाल में ख़ुश रहता हूँ और सपने देखना बन्द नहीं करता। हम ग़रीब हैं तो क्या हुआ! ..एक रिक्शा तो है, एक घर तो है। दुनिया में लाखों हैं हमसे भी अधिक ग़रीब और फटेहाल। हमारा घर है, परिवार है जबकि हज़ारों बच्चे अनाथ हैं इसीलिए मैं मस्त रहता हूँ। पैसे इकट्ठे कर लूँ फिर आटो ख़रीदूँगा, फिर टैक्सी चलाऊंगा फिर ट्रक और बस खरीदूँगा…
कॉलेज की बिल्डिंग के सामने हमें उतारकर उसने दूसरी सवारी ले ली।
ख़ुशियाँ, टीस, संतोष और क्लेश ..समय रूपी नदी की बाढ़ में सब आते हैं और बहाव में सब चले जाते हैं।
मैं शादी के बाद मेजर पति के साथ असाम चली गयी थी। वे मोर्चे पर रहते तो मेरे लिए बुज़ुर्ग सास-ससुर को अकेले छोड़कर कहीं जाना संभव नहीं था इसलिए तारा ही कभी मुझसे मिलने आ जाती थी।
पंद्रह सालों बाद फिर उसी शहर में सहेली तारा के घर आने का अवसर मिला। शहर बहुत बदल गया था पर रिक्शे अभी भी चलते थे। उसी कॉलोनी में तारा ने ख़ुद का मकान बनवाया था। मैं उसके साथ चारों तरफ़ घूम-घूमकर देख रही थी ..पुराने, छोटे मकान, अब भी अच्छी हालत में थे। तारा अंदर रसोई में चाय बना रही थी।
किसी ने आवाज़ लगायी तो मैं बाहर आयी। छोटे-से बग़ीचे के पास खड़ा कोई पौधों के सूखे पत्ते तोड़ रहा था, मैंने समझा माली है।
तारा चाय लेकर आती हुई बोलने लगी- हमारे घर की सारी ज़िम्मेदारी सँभाल रखी है इसने। आँखों में लाइलाज बीमारी हो गयी है, कम दिखता है पर…. अरे तुमने पहचाना नहीं? ये वही विकास है। बहुत मेहनत के कारण बीमार रहने लगा था। धुँधला दिखता है, तो आटो चलाना बन्द कर दिया है। भाई-बहनों को ठीक-ठाक पढ़ा-लिखाकर सबकी ज़िन्दगी सँवार दी है। बहन की अच्छी शादी की है। दो भाई ख़ूब कमाते हैं दूसरे शहर में हैं। ये बस यहीं अपनी अम्मी को लेकर रहता है। इसने शादी भी नहीं की है।
बड़ी आपा… उसने पीछे से आवाज़ लगायी और सामने आकर खड़ा हो गया… चेहरा सूखकर रौनक़ खो चुका था। आँखों की वह चमक ग़ायब थी, उसके बदले झिल्ली-सी कुछ बनी थी।
– आज आपने चाय भी नहीं दी अभी तक, कोई आया है क्या? उसने पूछा।
ऐसा लग रहा था कि वह मुझे देख रहा है पर उसने नहीं देखा। मैं ज़रूर देख रही थी मन के सपनों पर मोतियाबिंद का विकास।

शशि खरे
ज्योतिष ने केतु की संगत दी है, जो बेचैन रहता है किसी रहस्य को खोजने में। उसके साथ-साथ मैं भी। केतु के पास मात्र हृदय है जिसकी धड़कनें चार्ज रखने के लिए लिखना पड़ता है। क्या लिखूँ? केतु ढूँढ़ता है तो कहानियाँ बनती हैं, ललित लेख, कभी कविता और डायरी के पन्ने भरते हैं। सपने लिखती हूँ, कौन जाने कभी दुनिया वैसी ही बन जाये जिसके सपने हम सब देखते हैं। यों एक कहानी संकलन प्रकाशित हुआ है। 'रस सिद्धांत परम्परा' पुस्तक एक संपादित शोधग्रंथ है, 'रस' की खोज में ही। बस इतना ही परिचय- "हिल-हिलकर बींधे बयार से कांटे हर पल/नहीं निशाजल, हैं गुलाब पर आंसू छल-छल/झर जाएंगी पुहुप-पंखुरी, गंध उड़ेगी/अजर अमर रह जाएगा जीवन का दलदल।
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