क्यों प्रासंगिक बनी हुई है ‘हज़ारों ख़्वा​हिशें ऐसी’?

21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से चयन और इन फ़िल्मों का दस्तावेज़ीकरण… पाक्षिक...

साहित्य की आत्मा और सिनेमा का पर्दा

विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से…. साहित्य की आत्मा और सिनेमा का पर्दा              लेखकीय भावना के साथ न्याय या निर्देशक का व्यवसायिक रूपांतरण,...

क्रांति थी पहली कथा-फ़िल्म.. उसी की कहानी

पाक्षिक ब्लॉग चारु शर्मा की कलम से…. क्रांति थी पहली कथा-फ़िल्म.. उसी की कहानी               नमस्कार दोस्तो, हम फिर हाज़िर हैं पिछली कहानी...

कितनी फ़िल्मी है हमारी डिप्लोमैसी!

पाक्षिक ब्लॉग भवेश दिलशाद की कलम से…. कितनी फ़िल्मी है हमारी डिप्लोमैसी!              विदेश नीति, कूटनीतिक संबंधों में हम इस क़दर कमज़ोर हैं कि...

रंग दे बसंती: समाज व लोकतंत्र की ताकत

21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से चयन और इन फ़िल्मों का दस्तावेज़ीकरण… पाक्षिक...

विश्व सिनेमा का इज़रायली नैरैटिव समझें

विश्व सिनेमा का इज़रायली नैरैटिव समझें              अमेरिका, इज़रायल, ईरान, फ़लीस्तीन… यानी संघर्षरत क्षेत्रों के बारे में सोशल मीडिया पर लगातार लेखन और विचार...

ऑस्कर न पा सकी ‘फ़िलीस्तीन-36’ क्या कहती है?

बियॉण्ड द रिव्यू भवेश दिलशाद की कलम से…. ऑस्कर न पा सकी ‘फ़िलीस्तीन-36’ क्या कहती है?             फ़िलीस्तीनी ग्रामीणों को क़ैदी बनाकर जिस बस...

आविष्कारक और सिनेमा का पहला जादूगर

मूक सिनेमा से एल्गोरिदम युग तक आ पहुंचे, सवा सदी से भी पुराने हो चुके सिनेमा को कितना जानते हैं आप? परदे पर न जाने कितनी ही कहानियां आपने...

क्यों ख़ास है ‘हासिल’? और यह न होती तो?

21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो एक टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से ​चयन और इन फ़िल्मों का दस्तावेज़ीकरण…...
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