इक़बाल का तराना बांगे-दरा है गोया

पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आज़म की कलम से…. इक़बाल का तराना बांगे-दरा है गोया         वैसे तो शायर-ए-मशरिक़ (पूर्व का शायर) अल्लामा इक़बाल की बहुत सारी किताबें...

ममतालु अकादमी

‘मान’ सहज व रोचक अंदाज़ में उस परिदृश्य को सामने लाती है, जो इस शती के पूर्वार्द्ध तक के समाज की तस्वीर रहा है। अंत में कहानी के पारंपरिक...

आज अमेरिका और टू किल अ मॉकिंगबर्ड

मासिक ब्लॉग निशांत कौशिक की कलम से…. आज अमेरिका और टू किल अ मॉकिंगबर्ड          टू किल अ मॉकिंगबर्ड, जब हार्पर ली ने 1960 में यह...

कितनी फ़िल्मी है हमारी डिप्लोमैसी!

पाक्षिक ब्लॉग भवेश दिलशाद की कलम से…. कितनी फ़िल्मी है हमारी डिप्लोमैसी!              विदेश नीति, कूटनीतिक संबंधों में हम इस क़दर कमज़ोर हैं कि...

सुल्तान अहमद: ख़ूबियां बनाम ख़ामियां

पाक्षिक ब्लॉग ज्ञानप्रकाश पांडेय की कलम से…. सुल्तान अहमद: ख़ूबियां बनाम ख़ामियां           इस बाज़ारवादी दौर में जब हर व्यक्ति अपनी क़ीमत बढ़ाने में लगा...

नामचीन साहित्यकारों के रोचक कटाक्ष-3

पाक्षिक ब्लॉग विवेक मेहता की कलम से…. नामचीन साहित्यकारों के रोचक कटाक्ष-3             पिछली दो कड़ियों में हिंदी साहित्य जगत के स्वनामधन्य लेखकों/कलमकारों के...

रंग दे बसंती: समाज व लोकतंत्र की ताकत

21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से चयन और इन फ़िल्मों का दस्तावेज़ीकरण… पाक्षिक...
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