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चंद्रेश्वर की कलम से....

हिन्दी की लघु साहित्यिक पत्रिकाओं का भविष्य

             सन् 1965 के बाद और सन् 1970-71 के आसपास की बात है। हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के बीच लघु पत्रिकाओं को साफ़-साफ़ पहचाना जा सकता था। बड़ी व्यावसायिक पत्रिकाओं, सरकारी संस्थानों की पत्रिकाओं और लघु साहित्यिक पत्रिकाओं में अंतर स्पष्ट था- अंतर्वस्तु से लेकर रूपपक्ष यानी कलेवर-काग़ज़ तक में। इस दौर में किसी लघु पत्रिका का संपादक होना प्रायः वामपंथी, प्रगतिवादी और जनवादी होना था। व्यवस्था विरोधी, जनपक्षधर और विपक्ष में होना था। उनकी एक तय दिशा थी। उनका एक लक्ष्य था। इन लघु पत्रिकाओं के संपादकों, लेखकों के मन में क्रांति, विचारधारा और वर्ग-संघर्ष को लेकर कोई संशय, भ्रम या दुविधा की बात नहीं थी। उनके लिए कविता, कहानी या पूरा साहित्य ही सामाजिक बदलाव का एक माध्यम था। हिन्दी कवि शमशेर बहादुर सिंह की यह काव्य पंक्ति कि “वाम वाम दिशा वाम, समय साम्यवादी” मानो इसी दौर के लिए लिखी गयी! तब एक कवि अपनी कविता से पूरे शहर को एक तरफ़ झुकाने का स्वप्न देख सकता था। दुनिया को बदलने का संकल्प मज़बूत था।

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हिन्दी में उस समय लघु पत्रिकाओं के नाम भी ‘वाम’, ‘क्यों’, ‘आवेश’, ‘आवेग’, ‘समारंभ’, ‘उत्तरार्द्ध’, ‘उत्तरगाथा’, ‘पहल’, ‘पुरुष’, ‘आमुख’, ‘अभिव्यक्ति’, ‘अर्थात्’, ‘ज़मीन’, ‘तनाव’, ‘तेवर’, ‘प्रतिबद्ध’, ‘पक्षधर’, ‘ओर’, ‘कंक’, ‘बातचीत’, ‘भंगिमा’, ‘मतांतर’, ‘समझ’, ‘सामयिक’, ‘साम्य’, ‘हिरावल’, ‘वर्तमान’, ‘युग-परिबोध’, ‘सर्वनाम’, ‘परिपत्र’, ‘इबारत’, ‘इसलिए’, ‘वसुधा’, ‘कथा’, ‘प्रचेता’, ‘अवाम मित्र’, ‘सबोधन’ जैसे हुआ करते थे। बाद में सत्तर के अंत और अस्सी के दशक के आरंभ में ‘कलम’, ‘कथन’, ‘नया पथ’, ‘जन संस्कृति’, ‘समकालीन जनमत’, ‘अब’ सरीख़ी पत्रिकाएं उल्लेखनीय रहीं। इनमें ‘कथन’ पुनः सन् 1999 में शुरू होकर 21वीं सदी के आरंभिक बीस-बाईस वर्षों तक निकलती रही है।

इनके नाम से ही इनके तेवर, इनकी मुद्राएं और इनके वैचारिक स्टैंड की जानकारी मिलने लगती थी। इन पत्रिकाओं के आमुख, इनकी विषय सामग्री से ही इनकी पॉलिटिक्स समझ में आने लगती थी। इनके संपादकों, लेखकों से यह सवाल नहीं करना पड़ता था कि ‘बताओ पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?’ हम अगर उस समय के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को भी ध्यान में रखें तो पता चलेगा कि हमारी आज़ादी का भी एक चक्र पूरा हो गया था। हम मोहभंग में पड़े थे- आज़ादी, कांग्रेस और नेहरूवाद को लेकर। कांग्रेस की केन्द्रीयता ख़त्म हो रही थी। प्रांतों में संविद सरकारें बनी थीं। हम चीन से पराजित होने के बाद बार-बार पड़ोसी देश पाकिस्तान से लड़ने को विवश थे।

सन् 1965 से सन् 1975 के बीच का एक दशक का कालखंड काफ़ी उथल-पुथल का था। कम्युनिस्ट पार्टी का बंटवारा, बाद में नक्सलवादी आंदोलन का आक्रामक उभार, जयप्रकाश नारायण का आंदोलन और आपातकाल का लागू होना- इसी ऐतिहासिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के साथ हिन्दी की लघु साहित्यिक पत्रिकाएं एक आक्रामक रुख़ के साथ सामने आ रही थीं। उस दौर की इन लघु साहित्यिक पत्रिकाओं के मिज़ाज को जानने के लिए मिसाल के तौर पर सन् 1971 के दिसंबर में आरा, बिहार से प्रकाशित लघु पत्रिका ‘वाम’ के प्रवेशांक में उसके संपादक डॉ. चंद्रभूषण तिवारी के ‘आरंभ’ शीर्षक संपादकीय का एक महत्वपूर्ण उद्धरण देखा जा सकता है। डॉक्टर तिवारी लिखते हैं-

“वाम के द्वारा नयी रचनाशीलता प्रस्तावित की जा रही है। ऐसा कहना दंभपूर्ण नहीं होगा, लेकिन ऐसा कहते हुए उस पूरे दशक के अनुभव हमारे सामने हैं जिसने इस देश के युवा वर्ग को उसके ऐतिहासिक संदर्भ से अलग कर उसके अनुकूल मानसिकता न बनने देने के लिए हर संभव प्रयत्न किये हैं, बाहरी प्रभावों के बीच उसे स्थित कर लेखन के मोर्चे को असंगठित करने से लेकर लगातार उसे तरल बनाये रखने तक। और ये सारे प्रयत्न नयी रचनाशीलता के नाम पर ही हुए हैं। नयी रचनाशीलता से हमारा अभिप्राय वर्तमान समाज व्यवस्था के ख़िलाफ़ नयी उभरती शक्तियों के संघर्ष को अभिव्यक्त करने वाली फ़िलहाल उन थोड़े से लोगों की रचनाशीलता से है, जो सही आधार बिंदु से व्यक्ति तथा समस्याओं के प्रति गंभीर रुख़ अपनाते हुए लेखन के मोर्चे पर कारगर ढंग से सक्रिय हैं।”

जो भी हो, लघु साहित्यिक पत्रिका की एकमात्र शर्त उसका अव्यावसायिक होना भर नहीं है। उसके चरित्र और स्वरूप को स्पष्ट करते हुए हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार और समयांतर के संपादक पंकज बिष्ट ने अपने एक आलेख ‘लघु पत्रिकाएं: विचार और बाज़ार का द्वंद्व’ में सही लिखा:

“किसी लघु पत्रिका की सफलता इस बात में नहीं है कि वह कितने लंबे समय तक जीवित रहती है या व्यवसायिक रूप से कितनी सफल है, बल्कि इसमें है कि वह अपनी बात कहने में कितनी सफल हुई है। अगर ये पत्रिकाएं मूलतः उस बेचैनी की संवाहक नहीं हैं जो किसी रचना को एक ओर समकालीन सरोकारों से जोड़ती है तथा दूसरी ओर आने वाले समय का अक्स भी दिखलाती है, तो इसके होने के औचित्य पर प्रश्नचिह्न लगाना वाजिब है।”

इधर सन् 1971 और आज की साहित्यिक स्थितियों के बीच काफ़ी अंतर दिखायी देता है। आज की हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता का सामान्यीकरण हुआ है। इनके भीतर लघु साहित्यिक पत्रिकाओं को अलग से रेखांकित करना मुश्किल है। आज राजनीति में वामधारा भी कमज़ोर हो गयी है। साहित्य में भी वाम विचारधारा का प्रभाव कम हुआ है। लेखकों के बीच सरोकार, प्रतिबद्धता, विचारधारा जैसे शब्द अब कम सुनायी देते हैं। इनकी जगह प्रेम और प्रतिरोध ने ले ली है।

नयी पीढ़ी के लिए सोशल मीडिया मुख्य मंच बन चुका है। नयी पीढ़ी डिजिटल साहित्य से अधिक जुड़ रही है। आज का वैश्विक परिदृश्य भी बदल चुका है। पूरी दुनिया में दक्षिणपंथी राजनीति प्रभावी हो चुकी है। आज अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक एवं विस्तारवादी नीतियों ने पूरी दुनिया को एक अंधेरी खाई में ढकेलने का काम किया है। अमेरिकी पूंजीवाद और साम्राज्यवाद की युद्धोन्मादी नीतियों ने पूरी दुनिया को आर्थिक संकट में डाल दिया है। वैश्वीकरण, उदारीकरण, निजीकरण और बाज़ारवाद से जुड़ी नीतियां छलावा साबित हो रही हैं। आम आदमी का जीवन कठिन हुआ है…

बहरहाल, ऐसे में लघु साहित्यिक पत्रिकाएं एक बहुत ही छोटे दायरे में सिमट गयी हैं। उनका संवाद वृहत्तर जन समुदाय से नहीं हो पा रहा है। इधर लेखकों के बीच एक बड़ा अंतर यह आया है कि आज हर विचार, लेखक संगठन, ख़ेमे के लोग हर जगह छप रहे हैं। पहले की लघु साहित्यिक पत्रिकाएं वाम धाराओं के लेखकों का मंच हुआ करती थीं। आज के दौर में व्यावसायिक, ग़ैर-व्यावसायिक जैसे अंतर नहीं रह गये हैं। हर लेखक चाहे वह किसी धारा का हो, दैनिक अख़बारों के साप्ताहिक परिशिष्ट, साप्ताहिक, पाक्षिक एवं मासिक में सब जगह प्रकाशित हो रहा है।

एक तरह से देखा जाये तो हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता में भी खुलापन आ गया है। शत्रु और मित्र एक ही मंच पर दिख रहे हैं। इधर की लघु साहित्यिक पत्रिकाओं के बारे में कहा जा सकता है कि उनमें वैचारिक ज़िद नहीं रह गयी है। वे संकीर्ण वैचारिक दायरे से बाहर निकल गयी हैं। आज अशोक वाजपेयी धर्म निरपेक्ष, जनवादी धारा के लेखकों का नेतृत्व कर रहे हैं। अस्सी के दशक के मध्य में जब वे भारत भवन में साहित्यिक आयोजन करते थे, तो जनवादी लेखक उनसे दूरी बनाते थे। आज वाम लेखक संगठन भी निष्क्रिय और उदासीन दौर में पहुंच गये हैं।

आज वरिष्ठ गद्यकार और आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी किसी दैनिक अख़बार में प्रकाशित होते हैं तो लघु साहित्यिक पत्रिकाओं में भी उनको पढ़ा जा सकता है। अशोक वाजपेयी की कविताएं ‘तद्भव’,’कथन’,’कथा’ में भी छपी हैं। स्मृति शेष ज्ञानरंजन से लेकर अरुण कमल, मदन कश्यप तक हर जगह स्पेस पाते रहे हैं।

नयी पीढ़ी सिर्फ़ लघु साहित्यिक पत्रिकाओं तक सीमित नहीं है। उनके लिए डिजिटल का खुला आकाश है। कई सारे ब्लॉग्स, नेट मैगज़ीन्स हैं। सोशल मीडिया में फ़ेसबुक है, ट्विटर और एक्स है। बल्कि कह सकता हूं कि नयी पीढ़ी के रचनाकार डिजिटल मंच के साथ ज़्यादा सहज दिख रहे हैं। आज साहित्य की दुनिया में सबके आंगन में सबकी उपस्थिति दिखायी दे रही है। अगर निजी ईर्ष्या, वैमनस्य को छोड़ दें तो वैचारिक आधार पर छपने, न छपने की बात दरकिनार हो चली है। अब ऐसी स्थिति कितनी सही या ग़लत है – इसका निर्णय आने वाला समय ही करेगा।

इधर हिन्दी की कुछ चुनिंदा साहित्यिक पत्रिकाओं को ध्यान से पढ़ें, तो उनमें जो ज़्यादातर रचनाएं छपती हैं, उन्हें व्यापक प्रगतिशीलता के दायरे में रखा जा सकता है। विमर्शात्मक और अस्मितामूलक साहित्य को भी इसी का अंग माना जा सकता है। बहरहाल, इधर हिन्दी की जिन साहित्यिक पत्रिकाओं ने अपने महत्व को क़ायम रखा है और जिनके साथ एक पाठक समुदाय भी जुड़ा हुआ है, उनमें ‘वागर्थ’, ‘पाखी’, ‘हंस’, ‘कथाक्रम’, ‘वनमाली’, ‘तद्भव’, ‘कथादेश’, ‘आलोचना’, ‘समयांतर’, ‘बयां’, ‘परिकथा’, ‘क़िस्सा कोताह’, ‘उद्भावना’, ‘नयी धारा’, ‘दोआबा’, ‘बनास जन’, ‘अकार’, ‘पक्षधर’, ‘पूर्वग्रह’, ‘बहुवचन’, ‘देशधारा, ‘प्रेरणा अंशु’, ‘रचना उत्सव’ आदि के नाम लिये जा सकते हैं। इनके अलावा भी ‘अनहद’, ‘प्रयाग पथ’, ‘पतहर’, ‘परिन्दे’, ‘ककसाड़’, ‘सुखनवर’, ‘नया परिदृश्य’, ‘जलवायु पत्रिका’, ‘नवोदित प्रवाह’, ‘व्यंग्य यात्रा’ जैसी पत्रिकाएं हैं। नयी सदी की कुछ साहित्यिक पत्रिकाओं में ‘सदानीरा’, ‘समावर्तन’, ‘सूत्र’, ‘परिचय’, मंतव्य’, ‘सृजन संवाद’, ‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, ‘वरिमा’, ‘बिहान’, ‘रेवांत’ का भी नाम ले सकते हैं। संभव है कुछ नाम छूट भी रहे हो! वैसे ‘सदानीरा’ अब डिजिटल हो गयी है।

इधर पटना से प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिका ‘वाचन’ के दो भारी-भरकम अंकों ने, और देहरादून से प्रकाशित 536 पृष्ठों की साहित्यिक पत्रिका ‘अन्वेषा’ के प्रवेशांक ने भी हिन्दी जगत में प्रगतिशील लेखकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। ऐसे तो हिन्दी में कभी भी किसी लघु साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशित होना उनके संपादकों, लेखकों के संघर्ष, बेचैनी और जिजीविषा का ही द्योतक माना जाता है।

आज हम हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के संदर्भ में विचार करें तो पाएंगे कि हिन्दी और ग़ैर-हिन्दीभाषी क्षेत्रों के छोटे-छोटे शहरों से साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है तो बड़े शहरों से भी। आरा से जहां कभी 1970 के दशक में ‘वाम’, ‘समय’ और अस्सी के दशक के अंत में और बाद में लंबे अरसे तक, हाल तक ‘जनपथ’ जैसी पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ, तो इन दिनों भी ‘देशज’, ‘दस्तक’ जैसी पत्रिकाएं संपादित की जा रही हैं। आज आरा शहर से प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिका ‘देशज’ हो अथवा दिल्ली में ज्ञानपीठ की साहित्यिक पत्रिका मासिक ‘नया ज्ञानोदय’ हो, सबमें प्रकाशित होने वाले लेखक ‘कॉमन’ ही हैं।

यह दौर ‘वाम’ का नहीं है, जिसमें ‘नयी रचनाशीलता प्रस्तावित’ की जा रही थी, व्यवस्था विरोधी। आज स्थितियां ज़्यादा भ्रामक और गड्ड-मड्ड हैं। आज प्रगतिशीलता और जनवाद के नाम पर व्यापक मानवीय सरोकारों वाली रचनाओं को भी स्वीकार किया जा रहा है। आज रचना में क्रांति और विद्रोह का स्वर मंद पड़ गया है। आज रचना में जनतंत्रात्मक विमर्श भी कम ही दिखायी देता है। आज की समकालीन रचनाशीलता में यथार्थ के प्रति आग्रह भी कम हुआ है। शब्दजाल बढ़ा है। भले ही इन रचनाओं में “वर्तमान समाज व्यवस्था के ख़िलाफ़ नयी उभरती शक्तियों के संघर्ष को नयी अभिव्यक्ति” न मिली हो, इनमें कुछ हद तक मानवीय संवेदना की पुकार तो सुनी ही जा सकती है। इस तरह के साहित्य को भी प्रगतिशीलता के एक वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में रखकर देखा जा सकता है।

आज हम एक लघु साहित्यिक पत्रिका निकालते समय ठीक उसी तरह से नहीं सोच सकते हैं जैसे सन् 1970 के दशक में ‘वाम’ के संपादक डॉ. चंद्रभूषण तिवारी सोच रहे थे। यह एक ऐसा दौर है, जब हम स्वाधीनता आंदोलन के समय के अर्जित आधुनिक जीवन मूल्यों को भी संकटग्रस्त देख रहे हैं। आज आधुनिक संस्कृति के बरअक्स सनातन को पुनर्स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। आज ज़रूरत है कि लघु साहित्यिक पत्रिकाओं को वैकल्पिक मीडिया के रूप में स्थापित किया जाये।

लघु साहित्यिक पत्रिकाओं को व्यावसायिक पत्रिकाओं के साथ स्पर्धा में आने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। आज के समय में पंकज बिष्ट के संपादन में प्रकाशित होने वाली साहित्यिक लघु पत्रिका ‘समयांतर’ को एक निकष के रूप में देखा जा सकता है। आज लघु साहित्यिक पत्रिकाओं के सामने सबसे बड़ा संकट पाठकीयता का है। आज बचे-खुचे पाठकों की दिलचस्पी भी सोशल मीडिया में ज़्यादा दिख रही है। साहित्यिक पत्रिकाओं की संख्या के हिसाब से उनके पाठक नहीं बढ़ रहे हैं। संभव है, आने वाले दिनों में हिन्दी में साहित्यिक पत्रकारिता और लघु पत्रिका आंदोलन की दिशा स्पष्ट हो। अभी तो डिजिटलाइज़ेशन का प्रभाव बढ़ता हुआ दिख रहा है। नेट मैगज़ीन्स और ब्लॉग्स ज़्यादा पढ़े जा रहे हैं। नयी पीढ़ी इसी के साथ आगे बढ़ रही है। हिन्दी में अभी कुछ लघु साहित्यिक पत्रिकाएं सिर्फ़ अपने अस्तित्व को बचाये हुए हैं। इनके पाठकों की संख्या में बहुत कमी आयी है।

चंद्रेश्वर, chandreshwar

चंद्रेश्वर

प्रोफ़ेसर पद से सेवानिवृत्ति के बाद स्वतंत्र लेखन। हिन्दी-भोजपुरी की सभी प्रमुख साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, आलेखों और 'हिन्दवी' पर चयनित कविताओं का भी प्रकाशन। तीन हिन्दी और एक भोजपुरी कविता संग्रह प्रकाशित। एक शोधालोचना की पुस्तक 'भारत में जन नाट्य आंदोलन' (1994) और साक्षात्कार की एक पुस्तिका 'इप्टा-आंदोलनः कुछ साक्षात्कार' सहित कथेतर गद्य की किताबें भी आपके नाम। संपर्क- 7355644658।

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