
- May 30, 2026
- आब-ओ-हवा
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"हिंदी पत्रकारिता के 200 बरस: यह उत्सव नहीं चिंता का समय", आब-ओ-हवा के इस विशेष अंक में दो पत्रकारों के बीच 19 साल पहले हुई इस बातचीत को सिर्फ़ याद के लिए नहीं बल्कि प्रासंगिकता के कारण यहां प्रकाशित किया जा रहा है। आप पाएंगे लोकतंत्र और पत्रकारिता संबंधी कुछ मुद्दों पर संक्षेप में सही, सारगर्भित हस्तक्षेप है...
विनोद दुआ का वह इंटरव्यू: पुराना, पर प्रासंगिक
यह बातचीत 2008 की है, जब गणतंत्र छह दशक की यात्रा के समापन काल में था, विनोद दुआ साहब पत्रकारिता के एक स्थापित हस्ताक्षर बन चुके थे और टेलिविज़न मीडिया के शुरूआती दौर के बाद उसके संकटों को भांपा जाने लगा था। विनोद दुआ से भवेश दिलशाद की यह बातचीत दै. भास्कर की वेबसाइट पर उस साल 26 जनवरी के मौक़े पर प्रकाशित हुई थी, जिसकी प्रस्तावना के तौर पर तब ये शब्द लिखे गये थे:
“एक बच्चा गड्ढे में गिर गया है और कैमरा, लाइट वग़ैरह के साथ पूरी यूनिट उस गड्ढे के इर्द-गिर्द जमा होकर लगातार एक तमाशा आपको लाइव दिखा रही है। तयशुदा पैमानों पर क्या इसे ख़बर कहा जाएगा? जी नहीं, एनडीटीवी से जुड़े मशहूर पत्रकार विनोद दुआ इसे ख़बर मानने से इनकार करते हैं। इस साल पद्मश्री से सम्मानित दुआ ने भवेश दिलशाद से ख़ास तौर पर बातचीत की…”

अपूर्ण लोकतंत्र और अपूर्ण मीडिया
भवेश दिलशाद: सबसे पहले तो पद्मश्री के लिए बधाई स्वीकार करें, यह सम्मान कुछ ख़ास क्यों है?
विनोद दुआ: धन्यवाद। देखिए हमारा मानना है कि सरकारें जनता के विश्वास का प्रतीक होती हैं, लोकतंत्र में सरकार हम चुनते हैं, उन्हें सत्ता हम देते हैं। तो ऐसे में सरकार के सभी फ़ैसले जनता के भरोसे और जन-मन के ही प्रतिबिंब होते हैं। यह हमारा अधिकार है कि हम उन फ़ैसलों को स्वीकार करें या अस्वीकार। चूंकि यह सम्मान जनता के विश्वास का प्रतीक है इसलिए मैं इसे इस रूप में महत्वपूर्ण समझता हूं।
दिलशाद: इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता के क्षेत्र में इस साल तीन पद्मश्री प्रदान किये गये हैं, इसका सीधा-सा अर्थ क्या है?
दुआ: मेरी नज़र में यह वाक़ई टेलीविज़न पत्रकारिता का सम्मान है और पहली बार टीवी पत्रकारिता के लिए पद्मश्री दिये गये हैं। इससे पहले मुख्यतः प्रिंट पत्रकारिता के लिए ही ये नागरिक सम्मान दिये जाते रहे हैं।
दिलशाद: तो टीवी पत्रकारिता का मुक़ाम क्या माना जा सकता है?
दुआ: टीवी पत्रकारिता बहुत पुरानी नहीं है, ग़ौर से देखिए तो पिछले पांच-छह सालों में ही न्यूज़ चैनलों का ज़माना आया है। हम तो ब्लैक एंड व्हाइट टीवी के दौर से पत्रकारिता कर रहे हैं लेकिन बरखा और राजदीप इसी युग में उभरे हैं। दोनों ही क़ाबिल पत्रकार हैं। कुल मिलाकर टीवी पत्रकारिता अपना स्थान और प्रभाव साबित कर चुकी है और इसे पहचानने और सम्मान देने की शुरूआत हो चुकी है। अभी कई बेहतरीन पत्रकार कतार में हैं और उन्हें भी ज़रूर इसी तरह सम्मानित किया जाएगा।
दिलशाद: इतने सारे चैनलों से यह साफ़ है कि ख़बर के नाम पर मुनाफ़ा तो है लेकिन क्या कोई मिशन जैसी चीज़ भी बाक़ी है? क्या होनी चाहिए ख़बरनवीसों के पास?
दुआ: पहले तो बात करें ख़बर की। प्रिंस का गड्ढे में गिरना ख़बर है कि लेकिन उसके बाद पूरा तमाशा ख़बर नहीं है, इसे लो कॉस्ट रिएलिटी टेलीविज़न कहना चाहिए। सस्ते में उपलब्ध तमाशे से दर्शकों के साथ बेईमानी है यह। तो इस तरह का मसाला या चुटकुलेबाज़ी दिखाना तो ख़बर के नाम पर छल करना है।
रही बात मिशन की तो, किसी मिशन को लेकर चलना पत्रकार का काम नहीं है। आप एक कार्यकर्ता के तौर पर पत्रकारिता करते हैं तो उससे पत्रकारिता का नुक़सान होता है। अरुण शौरी साहब ने भी पत्रकारिता के नाम पर एक पार्टी को ही आगे बढ़ाने का काम किया। क्या इसे पत्रकारिता कहना चाहिए? मिशन के लिए एनजीओ बेहतर विकल्प हैं या फिर राजनीति।
दिलशाद: भारतीय राजनीति को दिशा देने में मीडिया क्या और कितना रोल अदा करता है?
दुआ: ऐसे तो टीवी न्यूज़ एक उत्पाद है लेकिन अगर संपादकीय या लेखन की दृष्टि से यह विचार है… जो घट रहा है, वह क्यों और कैसे घट रहा है, उसका परिणाम क्या हो सकता है, इन पहलुओं पर जानकारी देने का पर्याय है समाचार। जानकारी ही ताक़त है तो लोगों को जागरूक और सशक्त करना ही मीडिया का राजनीति में रोल कहा जा सकता है।
दिलशाद: गणतंत्र के 58 साल भी हो गये हैं, इस संदर्भ में पत्रकारिता का क्या रोल देखते हैं आप?
दुआ: मेरा मानना है लोकतंत्र एक अपूर्ण प्रक्रिया है लेकिन मैं इस अपूर्ण लोकतंत्र को चुनूंगा अगर दूसरा विकल्प संपूर्ण तानाशाही हो तो।
इसी तरह एक कुचले हुए अधिकारहीन मीडिया के मुक़ाबले मेरी पसंद है अपूर्ण (इम्परफ़ैक्ट) मीडिया। किसी देश के लिए 58 साल बहुत नहीं होते हैं। हमारा गणतंत्र जीवंत है और मीडिया भी। पाकिस्तान की तरह नहीं, जहां मीडिया के हाथ कटे हुए हैं।

दिलशाद: मीडिया में कैरियर बनाने के महत्वाकांक्षी युवाओं के लिए कुछ कहेंगे..
दुआ: बस इतना समझ लीजिए मेहनत बहुत है। नक़ली सत्ता बोध से बचना ज़रूरी है और यह भी ध्यान रखें यहां चोर दरवाज़े नहीं होते। फिर यह पत्रकारिता का उदयकाल है, बहुत अवसर हैं, ईमानदारी से काम करें।

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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