ईरान, सादिक़ हिदायत, अंधा उल्लू, iran, sadegh hedayat, blind owl
मासिक ब्लॉग निशांत कौशिक की कलम से....

ईरान, सादिक़ हिदायत और अंधा उल्लू

          मन फ़क़त बराए साये-अम मी-नवीसम के दर मुक़ाबिल-ए-नूर रूए दीवार अंदाख़्ते मी-शवद। बायद ख़ुदम रा बे आन मोअर्रफ़ी कुनम।
(सादेग हेदाएत, बूफ़-ए-कूर)

मैं सिर्फ़ अपनी उस परछाईं के लिए लिखता हूँ जो दीवार पर गिरती है, मुझे ख़ुद को उससे परिचित कराना है।
(सादिक़ हिदायत, अंधा उल्लू)

सादिक़ हिदायत का उपन्यास The Blind Owl (बूफ़-ए-कूर) ईरान के आधुनिक उपन्यासों का सिरमौर समझा जाता है। यह किताब हिदायत के व्यापक बौद्धिक जीवन से भी गहराई से जुड़ी हुई है। कथाकार होने के अलावा हिदायत अनुवाद में भी सक्रिय थे, मुंबई में कुछ समय उनका रहवास रहा। पहलवी उन्होंने मुंबई में ही सीखी, इस्लाम-पूर्व ईरानी संस्कृति का उनका अध्ययन उनकी साहित्यिक उपस्थिति और अभिरुचि को आकार देता है। यह उपन्यास उस समय लिखा जा रहा था, जब ईरान विश्व साहित्य से अनुवाद के माध्यम से परिचित हो रहा था, ख़ासकर अस्तित्ववादी इसरार वाली आधुनिकता से। हिदायत लगातार ईरान और फ्रांस के बीच रहे, वे अपने उपन्यास के लिए प्रसिद्ध हुए, लेकिन मूलतः वे एक लघु कथा लेखक थे।

बूफ़-ए-कूर, द ब्लाइंड आउल या अंधा उल्लू एक छोटा उपन्यास है। हिंदी में नासिरा शर्मा ने इसका अनुवाद किया, विश्व की कई भाषाओं में इसके अनुवाद हुए हैं। उर्दू में अनुवाद, संभवतः अंग्रेज़ी से, अजमल कमाल ने किया। उपन्यास की शुरूआत इस वाक्य से होती है:

दर ज़िन्दगी ज़ख़्महाई हस्त कि मिस्ले-ख़ोरे-रूह रा आहिस्ते-दर अन्ज़ेवा मी-ख़ोरद ओ मी-तराशद

इस वाक्य का सार यह है कि कुछ ज़ख़्म ऐसे होते हैं जो कोढ़ की तरह रूह को धीरे-धीरे खाते जाते हैं। मूल फ़ारसी वाक्य में पद है “तराशद”, इसकी धातु “तराशीदन” है, जो अंग्रेज़ी के scrape, carve या sculpt के रूप में अनूदित हो सकती है। मेरे पाठ में “तराशीदन” का इस्तेमाल इसी सूझबूझ से किया गया है, जिसमें “तराशने” जैसा बोध भी है और किसी वीभत्स, धीरे-धीरे निगले जाने का संकेत भी। इसी तरह “ख़ोरे” का अर्थ भी स्थिर नहीं है, एक सहज संदर्भ में इसे नासूर, घुन, घाव या कोढ़ कहा जा सकता है, यानी कोई भी वह बीमारी जो धीरे-धीरे शरीर को नष्ट करे।

उपन्यास में कथा सुनाने वाला किरदार एकाकी जीवन जी रहा है, वह क़लमदानों पर चित्र बनाता है और अपनी ही परछाईं से बात करता है, जैसा कि शुरूआत में उद्धृत है। उसका ज़ेह्न एक रहस्यमयी और बेहद ख़ूबसूरत स्त्री की छवि में उलझा हुआ है, जिसे उसने कभी एक सरू के पेड़ के पास एक बूढ़े आदमी को फूल देते हुए देखा था। यह दृश्य उसके लिए एक स्थायी और सम्मोहक छवि बन जाता है, जिसे वह अपने बनाये हुए क़लमदानों पर बार-बार उकेरता रहता है। यह स्पष्ट नहीं है कि यह स्त्री वास्तविक है या स्मृति, स्वप्न या वहम की उपज।

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एक रात वह अपने कमरे की खिड़की से उसी स्त्री को देखता है, जो उसकी चित्रित स्त्री से हूबहू मिलती है। वह बिना कुछ कहे उसके कमरे में आती है, उसके बिस्तर पर लेटती है और रहस्यमय ढंग से मर जाती है। कथाकार उसके शरीर को टुकड़ों में काटकर एक बक्से में रखता है और उसे दफ़नाने ले जाता है, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में वास्तविकता, स्मृति और भ्रम की सीमाएँ लगातार धुंधली बनी रहती हैं।

उपन्यास में आने वाले प्रसंग और कथा का विस्तार खंडित, स्वप्निल और दुरूह है। यहाँ फ़ैंटेसी का ज़ोरदार इस्तेमाल है, जो सादिक़ हिदायत की अन्य कहानियों का मामूल नहीं है। कथा के दूसरे हिस्से में वही स्त्री एक अलग रूप में, उसकी पत्नी के रूप में सामने आती है, लेकिन यहाँ वह पहले वाली रहस्यमयी छवि से बिल्कुल उलट, एक ठोस उपस्थिति बन जाती है। कथाकार उसके प्रति गहरी वितृष्णा और हिंसा से भरा हुआ है।

कथा का स्पेस मानो क़ब्र के भीतर बैठे पात्रों का है और नशे की मादकता से उपजे दृश्यों जैसा एक अजीब, बेतुका लोक है। कथा सुनाने वाला ख़ुद अफ़ीम का आदी है। स्वप्न, पतन, आत्मघाती प्रवृत्तियों और अवसाद का यह लोक ईरानी गद्य में सादिक़ हिदायत से पहले लगभग अनुपस्थित था।

सादिक़ हिदायत का जीवन जितना रहस्यमयी था, अंत उतना ही त्रासद रहा, या यूँ कहें कि उसमें शुरूआत और अंत जैसी स्पष्ट रेखाएँ नहीं थीं जिन्हें जीवन की सफलता और विफलता में आसानी से बाँटा जा सके। वे बेहद रचनाशील और संभावनाशील थे। वे भाषाओं और प्राचीन विषयों के प्रति गहरी रुचि रखते थे, कम उम्र में ही उन्होंने कई किताबें और कहानियाँ लिखीं, अनुवाद और संपादन किया। वे शाकाहार के भी हामी थे। उनकी कहानियों में मानव नियति का बेधड़क त्रासद चित्रण मिलता है। उनके यहाँ आधुनिकता का सबसे अवसादपूर्ण पक्ष मुखर होता है, जिसमें बेघरबारी, अजनबियत, बुढ़ापा और दैहिक तकलीफ़ें हैं। करुणा की भी एक तरह की निरर्थकता दिखती है। यदि कहीं कोई मार्मिकता या संवेदना है, तो वह भी कथा के अंत तक अर्थहीन हो जाती है। उनकी दो अन्य प्रसिद्ध कहानियाँ, सग-ए-वल्गर्द और दावूद-ए-गुज़पुश्त, में भी यही पक्ष सामने आता है। सादिक़ हिदायत के यहाँ नैराश्य की इतनी गहन मौजूदगी उन्हें Emil Cioran के दर्शनलोक का आत्मीय बना देती है।

यह नैराश्य सादिक़ के उपन्यासों और कथाओं का आभूषण नहीं, नमक है। वे अस्मिता, स्मृति और अकेलेपन की नुकीली कगारों तक अपनी कथाओं को ले जाते हैं। आधुनिकता के नये-नये बनते कलेवर को भी सादिक़ हिदायत ने अपने कथालोक में आत्मसात किया। यह देखने के लिए कि ग़ैर-यूरोपीय देशों और साहित्य ने किस तरह आधुनिकता को अपनाया और उसके स्वरूप में बदलाव किये, सादिक़ का साहित्य एक महत्वपूर्ण बानगी है। सादिक़ का समय ईरान के लिए राजनीतिक संक्रमण का दौर भी था। पेरिस और तेहरान के बीच चहलक़दमी करते सादिक़ हिदायत के यहाँ यदि यूरोपीय आधुनिकता के लक्षण हैं, तो फ़ारसी के इस्लाम-पूर्व साहित्य को भी वे उसी बेचैनी से टटोलते हैं, ताकि वैयक्तिक और सामाजिक अस्मिता की धुरी और धारा खोजी जा सके।

ईरान के बारे में यह नुक़्ता अक्सर उछाला जाता है कि वह जिस सभ्यता की मुनादी करता है, वह केवल पारसी या ज़रदुश्ती सभ्यता है, इस्लामी नहीं। यह इतिहास और भाषा का अधूरा और जल्दबाज़ पाठ है। ईरान स्वयं भी इस प्रश्न से कई बार उलझ चुका है और उसके पास इसके उत्तर भी हैं। बदलते समय में अपनी ज़मीन और उसकी नब्ज़ टटोलना कोई काम नहीं है, सभी अस्मिताएँ और समाज इससे टकराते हैं।

सादिक़ हिदायत के यहाँ भी पहचान और अपनी जगह खोजने की बेचैन क़वायद है, जिसे केवल मरणोन्मुखता या बेतुकी उदासी कहकर ठुकराया नहीं जा सकता।

nishant

निशांत कौशिक

1991 में जन्मे निशांत ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली से तुर्की भाषा एवं साहित्य में स्नातक किया है। मुंबई विश्वविद्यालय से फ़ारसी में एडवांस डिप्लोमा किया है और फ़ारसी में ही एम.ए. में अध्ययनरत हैं। तुर्की, उर्दू, अज़रबैजानी, पंजाबी और अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित। पुणे में 2023 से नौकरी एवं रिहाइश।

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