साकीबा सम्मेलन, सम्मान समारोह, साहित्यिक आयोजन
विदिशा में ‘साहित्य की बात’ समूह का एक और सफल वार्षिक आयोजन संपन्न। सम्मान, पुस्तक लोकार्पण, काव्य पाठ जैसे सात सत्रों के नाम रहे साहित्यमय दिन की एक आत्मीयता भरी रपट…

एक दिन एक साथ साहित्य को जिया गया

विदिशा। किसी साहित्यिक आयोजन की सफलता का हिसाब केवल इस बात से नहीं लगाया जा सकता कि उसमें कितने लोग आये, कितनी कविताएँ पढ़ी गयीं और कितनी किताबों का लोकार्पण हुआ। असली सवाल यह है कि आयोजन समाप्त होने के बाद क्या बचा? क्या लोग कुछ लेकर लौटे! किसी कविता की पंक्ति, किसी कहानी का अनुभव, किसी बातचीत की गर्माहट, किसी नये परिचय की शुरूआत या पुराने रिश्ते में आयी कोई नयी चमक?

बीते 20 सितंबर को विदिशा के होटल ताराश्री में ‘साहित्य की बात’ का वार्षिक आयोजन समाप्त हुआ तो मेरे मन में सबसे पहले यही सवाल आया। और उसका उत्तर भी उसी दिन के अनुभवों में कहीं मौजूद था— साहित्य यहाँ केवल मंच पर नहीं था, वह लोगों के बीच था।

सुबह से ही होटल का वातावरण बदलने लगा था। अलग-अलग दिशाओं से आये साहित्यकार धीरे-धीरे एक जगह जमा हो रहे थे। कोई रात की यात्रा करके पहुँचा था, कोई सुबह की ट्रेन से आया था, कोई अपने साथ किताबें लाया था, कोई किसी पुराने मित्र को खोज रहा था। मिलने पर औपचारिक अभिवादन के बाद बातचीत जल्द ही उस सहजता में बदल जाती थी, जिसे केवल पुराने साहित्यिक संबंध पैदा करते हैं।

साकीबा की सबसे बड़ी पूँजी शायद यही आत्मीयता है।

साकीबा सम्मेलन, सम्मान समारोह, साहित्यिक आयोजन

यहाँ आने वाला व्यक्ति केवल ‘प्रतिभागी’ नहीं रह जाता। वह समूह का हिस्सा हो जाता है। उसकी यात्रा की चिंता होती है, उसके ठहरने की व्यवस्था की चिंता होती है, वह समय पर पहुँचा या नहीं— यह भी किसी न किसी को याद रहता है। मंच पर उसका परिचय भले कुछ मिनट का हो, लेकिन मंच से उतरने के बाद उसके साथ संबंध कई वर्षों तक चलते हैं। साहित्यिक संस्थाओं के औपचारिक ढाँचे से अलग साकीबा की अपनी एक घरेलू-सी संरचना बनती दिखायी देती है।

यही कारण है इस आयोजन में मंच और दर्शक के बीच की दूरी बहुत कम थी।

सात सत्रों में 36 रचनाकारों ने अपनी रचनाएँ पढ़ीं। कविता, कहानी, गीत, ग़ज़ल और अन्य विधाओं की रचनाएँ सुनते हुए यह भी महसूस हुआ एक साझा मंच पर आने के बावजूद हर लेखक अपनी अलग दुनिया लेकर आता है।

किसी की कविता में निजी स्मृति थी तो किसी की कविता सामाजिक बेचैनी से टकरा रही थी। किसी कहानी में मनुष्य के भीतर का अकेलापन था, किसी गीत में संबंधों की बची हुई गरमाहट।

इन रचनाओं को सुनना इसलिए भी दिलचस्प था कि यहाँ किसी एक तरह के साहित्य को स्थापित करने की कोशिश नहीं थी। अलग-अलग स्वरों को जगह दी गयी थी। साहित्य में मतभेद और भिन्नता स्वाभाविक हैं, लेकिन साथ बैठकर एक-दूसरे को सुन पाने की क्षमता उससे भी बड़ी चीज़ है। साकीबा का आयोजन इस सुनने की संस्कृति को बचाये रखने की कोशिश जैसा लगा।

और शायद आज के समय में यह छोटी बात नहीं है।

पुस्तक लोकार्पण के क्षणों में आयोजन का एक दूसरा पक्ष सामने आया। ‘नदिया ठिठक गई’, ‘व्यक्तित्व और कृतित्व’, मिथिलेश राय और गोपी नवीन शुक्ल के कविता-संग्रह, मधु सक्सेना के काव्य संग्रह ‘सुनो कनु’ और कविवर शैलेंद्र की स्मृति में मेरे ही द्वारा संपादित ‘फिर भी रहेंगी निशानियां’ सहित अन्य पुस्तकों का लोकार्पण हुआ। किसी किताब का मंच पर खुलना केवल उसका सार्वजनिक परिचय नहीं होता। उसके पीछे लेखक के वर्षों का श्रम, असंख्य संशोधन, असफलताएँ, उम्मीदें और अपने शब्दों पर भरोसा होता है।

इसलिए जब किसी मित्र की किताब सामने आती है, तो बधाई केवल पुस्तक के प्रकाशन की नहीं होती, उस पूरी यात्रा की होती है जिसने उसे पुस्तक तक पहुँचाया है।

पुस्तक ही क्यों पत्र-पत्रिकाएँ भी हैं साहित्य की जीवित धड़कन।

आयोजन का एक महत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक सत्र ‘साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का महत्व’ विषय पर केंद्रित था। सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ कथाकार मुकेश वर्मा ने की। परिचर्चा में दिनेश भट्ट, सुधीर सक्सेना, निरंजन श्रोत्रिय और कुणाल सिंह ने अपने विचार रखे, जबकि संचालन अस्मुरारी नंदन मिश्र ने किया।

चर्चा में साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं को केवल रचनाओं के प्रकाशन का माध्यम न मानकर साहित्यिक संवाद, बहस और नयी रचनाशीलता के निर्माण का महत्वपूर्ण मंच माना गया। इस बात पर विचार हुआ कि पत्रिकाएँ अपने समय के साहित्य को दर्ज करने के साथ-साथ साहित्यिक रुचियों और विमर्शों को भी दिशा देती हैं। किसी नये लेखक के लिए पत्रिका में प्रकाशित होना केवल प्रकाशन नहीं, बल्कि साहित्यिक संसार में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का पहला महत्वपूर्ण पड़ाव भी हो सकता है।

सुधीर सक्सेना और निरंजन श्रोत्रिय जैसे लंबे समय से साहित्यिक पत्रिकाओं से जुड़े रचनाकारों की उपस्थिति ने चर्चा को अपने अनुभवों की ठोस ज़मीन दी, जबकि दिनेश भट्ट ने पत्रिकाओं की भूमिका पर विचार रखे। अध्यक्षीय टिप्पणी में मुकेश वर्मा ने चर्चा को व्यापक संदर्भ दिया।

इस सत्र की ख़ासियत यह थी कि यहाँ पत्रिका को केवल ‘प्रकाशन’ की जगह साहित्यिक संस्कृति का सक्रिय हिस्सा मानकर देखा गया। रचना और पाठक के बीच पुल बनाने, नये लेखकों को अवसर देने और अपने समय की साहित्यिक बहसों को दर्ज करने में पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका पर गंभीर बातचीत हुई।

साकीबा के पूरे आयोजन में यह सत्र इसलिए भी अलग दिखायी देता है कि जहाँ अन्य सत्रों में साहित्य पढ़ा और सुना जा रहा था, वहीं यहाँ साहित्य के निर्माण, प्रसार और उसके सार्वजनिक संवाद पर बातचीत हो रही थी।

साथियों की उपस्थिति इस अर्थ में विशेष रूप से आत्मीय थी। वे केवल अपनी पुस्तक के साथ नहीं आये थे। आयोजन की तैयारी और उसके वातावरण में भी उनकी सक्रिय भागीदारी थी। एक साहित्यिक आयोजन में मंच पर पढ़ने वाले और व्यवस्था में हाथ बँटाने वाले के बीच कोई दीवार न हो, तो कार्यक्रम में एक अलग तरह की जीवंतता पैदा होती है। साथियों की उपस्थिति में यह सहजता दिखायी दी।

मिथिलेश राय, प्रीति राजे, कमला नरवरिया, अंजना मनोज गर्ग, अनुराग भरत, अनुकृति श्रीवास्तव, अजय श्रीवास्तव, अभिषेक, सुदिन श्रीवास्तव, मुकेश शर्मा वशिष्ठ, मदन जरिया, प्रमोद चौहान, प्रज्ञा रावत, अस्मुरारी नंदन मिश्र, वनिता वाजपेयी, हर गोविंद पुरी, आनंद सौरभ उपाध्याय, रश्मि वैभव गर्ग, अभिषेक राजपूत, अर्चना नायडू, लोकेश तिवारी और अनेक साथियों की उपस्थिति ने आयोजन को किसी एक व्यक्ति का कार्यक्रम बनने से बचाये रखा। हर व्यक्ति अपने साथ एक अलग संबंध, एक अलग रचनात्मक अनुभव और एक अलग आवाज़ लेकर आया था।

साकीबा की संरचना में यह सामूहिकता महत्वपूर्ण है।

सम्मान समारोह में यह सामूहिकता एक दूसरे रूप में दिखायी दी।

तीन अलग-अलग क्षेत्रों के तीन रचनाकार —निरंजन श्रोत्रिय, कालूराम राव और कुणाल सिंह—सम्मानित हुए। कविता, चित्रकला और कथा के इन तीन पड़ावों ने आयोजन की साहित्यिक सीमा को भी विस्तृत किया।

निरंजन श्रोत्रिय का सम्मान इसलिए भी अर्थपूर्ण लगा कि उन्होंने सम्मान को अपने तक सीमित न रखकर कवि के सम्मान के रूप में देखा। उन्होंने साकीबा जैसे अनुशासित, सृजनरत और आत्मिक समूहों की आवश्यकता की बात की। इस वक्तव्य में पुरस्कार से अधिक उस सामूहिकता की स्वीकृति थी, जिसके कारण कोई साहित्यिक समूह केवल कार्यक्रम कराने वाली संस्था नहीं रह जाता, बल्कि रचनात्मक सहचर बन जाता है।

कुणाल सिंह का सम्मान एक युवा कथाकार के रचनात्मक संसार को रेखांकित करता है, जबकि कालूराम राव का सम्मान यह याद दिलाता है कि साहित्यिक संवेदना केवल शब्दों में नहीं रहती। चित्र और कथा, कविता और स्मृति—इन सबके बीच एक गहरा सांस्कृतिक रिश्ता है।

आयोजन में मंच संचालन करने वाले साथियों की भूमिका भी उल्लेखनीय रही। सुदिन श्रीवास्तव, डॉ. मौसमी परिहार, डॉ. वनिता वाजपेयी, अस्मुरारी नंदन मिश्र और अन्य साथियों ने अलग-अलग सत्र सँभाले। लेकिन किसी आयोजन की वास्तविक परीक्षा मंच से अधिक मंच के पीछे होती है। समय का ध्यान रखना, अतिथियों की चिंता करना, आने-जाने वालों को सँभालना, भोजन और ठहरने की व्यवस्था देखना— ये वे काम हैं जिनका उल्लेख समाचारों में अक्सर नहीं होता, जबकि कार्यक्रम की आत्मा इन्हीं छोटे-छोटे श्रमों से बनती है।

इस आयोजन में भी अनेक साथी बिना किसी घोषणा के अपना हिस्सा निभाते रहे।

मेरे लिए इस पूरे दिन का सबसे भावुक पक्ष शायद विदा का समय था। सुबह जो लोग उत्साह में मिल रहे थे, शाम को उन्हीं के बीच विदाई की हल्की उदासी थी। कुछ लोग तुरंत अगली यात्रा की ओर निकलने वाले थे, कुछ रात की ट्रेन पकड़ने वाले थे। कुछ से यह जानते हुए विदा लेना पड़ा कि अगली मुलाक़ात शायद महीनों बाद होगी।

लेकिन साहित्यिक मित्रता का सौंदर्य यही है कि दूरी हमेशा दूरी नहीं रहती।

किसी का संदेश आ जाता है। कोई अपनी नयी कविता भेज देता है। किसी की पुस्तक डाक से पहुँच जाती है। कोई अचानक फ़ोन पर कहता है— ‘वह कविता याद है जो आपने उस दिन पढ़ी थी?’ और तब लगता है कि आयोजन ख़त्म नहीं हुआ है। वह अपने वास्तविक रूप में अब शुरू हुआ है।

साकीबा के इस आयोजन को इसी कसौटी पर देखना चाहिए।

यह कोई बहुत बड़ा दावा करने वाला साहित्यिक आयोजन नहीं था। इसकी शक्ति उसके आकार में नहीं, उसकी आत्मीयता में थी। इसमें साहित्य को किसी ऊँचे मंच पर रखकर देखने के बजाय जीवन के बीच रखकर देखने की कोशिश थी। यहाँ लेखक पाठक भी था और श्रोता भी; आयोजक प्रतिभागी भी था और सहभागी भी।

साकीबा सम्मेलन, सम्मान समारोह, साहित्यिक आयोजन

और यही बात मुझे सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण लगती है।

साहित्य अंततः मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने की कला है। यदि कोई आयोजन कुछ घंटों के लिए लोगों को अपनी व्यस्तताओं, दूरियों और निजी सीमाओं से बाहर निकालकर एक-दूसरे के सामने बैठा देता है, उन्हें सुनने की आदत देता है और लौटते समय उनके भीतर कुछ शब्द, कुछ चेहरे और कुछ रिश्ते छोड़ जाता है, तो उसकी सार्थकता किसी आँकड़े में दर्ज नहीं की जा सकती।

20 सितंबर को विदिशा में ऐसा ही कुछ हुआ।

सात सत्र समाप्त हुए। 36 रचनाकारों ने अपनी रचनाएँ पढ़ीं। किताबें लोकार्पित हुईं। तीन सम्मान दिये गये। तस्वीरें खिंचीं। लोग लौट गये… लेकिन होटल तारा श्री का वह सभागार शायद कुछ देर तक उन आवाज़ों को अपने भीतर सँजोये रहा होगा।

और हम भी।

क्योंकि उस दिन साहित्य की बात हुई ही नहीं थी— साहित्य को साथ जिया गया था। विदिशा में यह साहित्यिक आयोजन चर्चा में रहा।

-ब्रज श्रीवास्तव (संयोजक: साकीबा)

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