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हिंदी की ज़मीनें... आमजन को जो टीके लगाये जा रहे हैं, उनकी प्रक्रियाओं से जुड़े मामलों पर एक जनहित याचिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जो रुख़ अपनाया, वह चिंता के दायरे में क्यों दिखता है? हिंदी के पाठकों के लिए एक विज्ञान-दृष्टि-सम्मत चर्चा...​
नियमित ब्लॉग डॉ. आलोक त्रिपाठी की कलम से....

सूचना के अधिकार या सवालों से परे है HPV वैक्सीन?

              किशोरियों के लिए चलाये जा रहे HPV टीकाकरण कार्यक्रम के क्रियान्वयन को लेकर यूनिवर्सल हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन (UHO) की ओर से एक जनहित याचिका दायर की गयी। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका के गुण-दोष पर सुनवाई नहीं की। उल्टे आउट-ऑफ़-द-वे टिप्पणी करते हुए याचिकाकर्ता से याचिका वापस लेने को कहा। अंततः याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी गयी।

याचिका HPV वैक्सीन के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि कार्यक्रम के क्रियान्वयन से जुड़े मुद्दों पर थी। इनमें जानकारीपूर्ण सहमति, टीकाकरण के बाद दुष्प्रभावों की निगरानी और प्रभावित लोगों के लिए क्षतिपूर्ति की व्यवस्था जैसे सवाल शामिल थे। अब एक सामान्य जागरूक नागरिक समझ सकता है कि सूचना का इतना अधिकार तो उसके पास है ही।

सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता से पूछा क्या वह याचिका वापस लेना चाहते हैं! इतना ही नहीं, “हार्श ऑब्ज़र्वेशन्स” की चेतावनी दी। अदालत की ओर से यह भी कहा गया कि मामला लाखों बेटियों के स्वास्थ्य से जुड़ा है और याचिका कार्यक्रम को “पटरी से उतारने” की कोशिश करती है।

इसी दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने WHO का उल्लेख करते हुए कहा कि वह HPV वैक्सीन की सिफ़ारिश करता है तो फिर डॉक्टर ऐसी याचिका क्यों ला रहे हैं।

यहीं से बड़ा सवाल उठता है।

भले ही यह मौखिक टिप्पणियां थीं, लिखित आदेश का हिस्सा नहीं पर जब पीआईएल के मूल मुद्दों पर सुनवाई नहीं हुई, उसके मेरिट्स पर कोई निर्णय नहीं हुआ, तब WHO की सिफ़ारिश का हवाला आवश्यक या प्रासंगिक क्यों था? क्या भारत की स्वास्थ्य नीति मानती है कि WHO की सिफ़ारिश अपने आप में स्वतंत्र भारतीय वैज्ञानिक और न्यायिक समीक्षा का विकल्प है? यदि नहीं, तो ऐसी टिप्पणी को जस्टिफ़ाई कैसे किया जाएगा?

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ज़ाहिर है मौखिक टिप्पणियों को सुप्रीम कोर्ट का औपचारिक नीतिगत निर्णय नहीं माना जा सकता, लेकिन ऐसी टिप्पणी का प्रभाव तो महत्वपूर्ण हो ही सकता है। यदि किसी सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के बारे में जानकारी मांगने वाली याचिका को मेरिट्स पर सुने बिना वापस लेने को कह दिया जाये, साथ में कड़ी टिप्पणियों की चेतावनी दी जाये, तो इसका क्या प्रभाव होगा? भविष्य में इस तरह की याचिकाएं दायर करने वाले मनोवैज्ञानिक दबाव या क़ानूनी प्रक्रियाओं का डर नहीं महसूसेंगे?

WHO और गेट्स फ़ाउंडेशन का गठजोड़

WHO के हवाले को समझना इस मामले में इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बिल एंड मेलिंडा गेट्स फ़ाउंडेशन WHO के प्रमुख वित्तीय योगदानकर्ताओं में से एक है। WHO के 2024-25 अभियान बजट के आंकड़ों में गेट्स फ़ाउंडेशन शीर्ष योगदानकर्ताओं में है; 2025 के आंकड़ों में उसने WHO को लगभग 3210 लाख अमेरिकी डॉलर का योगदान दिया।

ऐसे में, जब अदालत किसी स्वास्थ्य नीति की वैधता या विश्वसनीयता के संदर्भ में WHO की सिफ़ारिश का उल्लेख करती है, तो WHO की फ़ंडिंग स्ट्रक्चर और संभावित संस्थागत प्रभावों पर सवाल उठाना भी अनुचित नहीं माना जा सकता।

इसी संदर्भ में, बिल गेट्स और जेफ़री एप्स्टीन के संबंधों के तथ्यों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता, जो अब सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा है।

गेट्स ने 2026 में अमेरिकी हाउस ओवरसाइट समिति के सामने स्वीकार किया कि उन्होंने एप्स्टीन से 2011 से 2014 के बीच कई बार मुलाक़ात की थी। गेट्स के मुताबिक़ शुरूआती मुलाक़ातों में उनके काम और बाद में संभावित जनहित फ़ंडिंग स्ट्रक्चर्स पर चर्चा हुई थी।

गेट्स फ़ाउंडेशन द्वारा करवायी गयी 2026 की स्वतंत्र समीक्षा में भी लगभग 30 बैठकों का उल्लेख है, जो एप्स्टीन और फ़ाउंडेशन के नेताओं तथा कर्मचारियों के बीच हुईं।

अब मुद्दा यह नहीं है कि गेट्स का एप्स्टीन से संबंध होने मात्र से WHO की कोई वैज्ञानिक सिफ़ारिश ग़लत हो जाती है। मुद्दा यह है कि जब अदालत WHO की सिफ़ारिश को भरोसे के आधार के रूप में सामने रखती है, तो क्या उस संस्था की फ़ंडिंग, संस्थागत सम्बन्धों और स्वतंत्रता पर सवाल पूछना वैध सार्वजनिक प्रश्न नहीं होगा?

नोट करें सबसे महत्वपूर्ण बात

सुप्रीम कोर्ट ने HPV वैक्सीन की सुरक्षा पर कोई अंतिम वैज्ञानिक फ़ैसला नहीं दिया। न ही उसने याचिका में जानकारीपूर्ण सहमति, दुष्प्रभाव, निगरानी या क्षतिपूर्ति के संदर्भ में उठाये गये सवालों की मेरिट्स पर निर्णय दिया। अदालत की मौखिक टिप्पणियां अपने आप में एक अलग सवाल छोड़ गयी:

यदि याचिका को मेरिट पर सुना ही नहीं गया, तो WHO की सिफ़ारिश का हवाला क्यों?

इसके अलावा भी बहुत-से प्रश्न अनुत्तरित रह गये हैं, जिनके उत्तर के बिना लोगों से यह कहना कि WHO ने कहा है तो ठीक ही होगा, लोगों को भयाक्रांत तो कर सकता है लेकिन कोई विश्वास पैदा नहीं कर सकता। इन बिंदुओं पर ग़ौर कीजिए:

  1. 2009-10 के HPV कार्यक्रम के तहत जिन लड़कियों का टीकाकरण हुआ, नाम उजागर किये बिना उनसे संबंधित उपलब्ध संपूर्ण रिकॉर्ड का ख़ुलासा
  2. जिनका टीकाकरण हुआ, उन लड़कियों की कुल संख्या और प्रत्येक डोज़ पूरा करने वाली लड़कियों की संख्या
  3. उपलब्ध सभी फ़ॉलो-अप रिकॉर्ड और फ़ॉलो-अप की अवधि
  4. प्रतिकूल घटनाओं (गंभीर भी), अस्पताल में भर्ती होने और मृत्यु से संबंधित सभी उपलब्ध आंकड़े
  5. टीकाकरण के बाद इन लड़कियों के स्वास्थ्य और प्रजनन संबंधी परिणामों की उपलब्ध जानकारी
  6. फ़ॉलो-अप से बाहर हो गयी प्रतिभागियों की संख्या और, जहां दर्ज हो, उसके कारण
  7. महामारी विज्ञान या स्वास्थ्य निगरानी के तहत इन लड़कियों से संबंधित रिकॉर्ड
  8. फ़ॉलो-अप और प्रतिकूल घटनाओं की निगरानी के लिए इस्तेमाल किये गये वैज्ञानिक प्रोटोकॉल और पद्धति
  9. बाद में राष्ट्रीय स्तर पर HPV टीकाकरण लागू करने पर विचार करते समय सरकार द्वारा इस्तेमाल किये गये साक्ष्य के आधार? और…
  10. नीति संबंधी निर्णयों के लिए बाद में जिन अध्ययनों, विश्लेषणों या साक्ष्यों पर भरोसा किया गया, उनकी फ़ंडिंग कहां से हुई, किन संस्थाओं से उनका संबंध रहा और उनके घोषित हितों के टकराव के विवरण कहाँ हैं?

पहली आठ बातें सबसे महत्वपूर्ण हैं क्योंकि सरकार या अनुदान देने वाली तथाकथित संस्थाएं जितना पैसे जागरूकता पैदा करने के लिए ख़र्च कर रही हैं, वह कई गुना कम हो सकता है यदि इन आठ बातों के उत्तर दिये जाते हैं। और यह रियल टाइम मिसाल भी बनेगा। फिर भी ऐसा न करके अन्य प्रचार माध्यमों से जागरूकता फैलाना अपने आप में संशय पैदा करता है।

भविष्य में सार्वजनिक स्वास्थ्य याचिकाओं को हतोत्साहित करने वाली न्यायिक टिप्पणी के बाद याचिका का मामला तो समाप्त हो गया है, लेकिन सवाल अभी यथावत हैं।

डॉ. आलोक त्रिपाठी

डॉ. आलोक त्रिपाठी

2 दशकों से ज्यादा समय से उच्च शिक्षा में अध्यापन व शोध क्षेत्र में संलग्न डॉ. आलोक के दर्जनों शोध पत्र प्रकाशित हैं और अब तक वह 4 किताबें लिख चुके हैं। जीवविज्ञान, वनस्पति शास्त्र और उससे जुड़े क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले डॉ. आलोक वर्तमान में एक स्वास्थ्य एडवोकेसी संस्था फॉर्मोन के संस्थापक हैं।

1 comment on “सूचना के अधिकार या सवालों से परे है HPV वैक्सीन?

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