
- September 14, 2026
- आब-ओ-हवा
- 2
विघ्नहर्ता | शशि खरे लिखित लघुकथा
अब वे उकड़ू बैठे थक गये थे, सो स्टूल उठा लाये। लेकिन वह ऊँचा था इसलिए ज़मीन पर ही आराम से पसरकर बैठ गये।
गीली मिट्टी स्टूल और उनके कपड़ों पर लग गयी थी। आत्मा ने कहा ‘कपड़ों पर मिट्टी लग गयी है, गंदे हो गये हैं।’
— तो क्या करें? सुधाकर जी ने दाँत पीसते हुए अपनी आत्मा को जवाब देकर चुप करा दिया।
अगले दिन से गणेश चतुर्थी है, दस दिन के लिए गणेश जी की स्थापना के लिए नयी मूर्ति चाहिए। ये सब नये चोचले हैं, बाज़ारवाद की चालबाज़ियों के तरीक़े हैं।
पहले तो एक-दो शहरों में ही गणेश उत्सव होता था। भक्तगण वहीं चले जाते थे। अब तो घर-घर में स्थापना… पर बाढ़ में तो बहना ही है। बाज़ार में मूर्तियांँ बहुत महँगी हैं।
रिटायर होने के बाद वे पैसे की परछाईं तक को सम्मान देते हैं। जब आदमी नौकरी में होता है, तब की बात कुछ और होती है।
मूर्ति तो मैं ख़ुद ही बना लूँगा! उन्होंने बेख़याली में मिट्टी में और पानी डाल दिया। अब वह पकौड़े तोड़ने लायक़ हो गयी थी।
सुधाकर ने माथे पर हाथ मारा ओफ़! मिट्टी गाढ़ा करने को लोंदा बनाने लायक़ करने क्यारी से खोदकर और मिट्टी मिलायी।
उन्होंने तीन-चार गोले बनाये, पालथी, पेट, सूँड़ को आकार देने की कोशिश करते रहे। काली रेतीली मिट्टी और गीली भी, उसमें गणेश जी प्रकट होने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
किसी तरह पालथी मारे पाँव बनाकर उस पर एक लंबा गोला फ़िट किया। उस पर सूँड़ वाला चेहरा लगाया। वज़न के कारण ढह न जाये इसलिए हाथ सीक जैसे पतले, सूँड़ पतली बनायी और उसके अगल-बगल में दो छोटी गोलियाँ चिपका दीं आँखों के लिए।
पत्नी आभा काम के बहाने चक्कर काट रही थी और लगातार नज़र रखे हुए थी। आख़िर रहा नहीं गया तो बोली:
— इन्हें क्या टायफ़ाइड हुआ था?
— बकवास मत करो।
— मैं बना दूँ, कितने ख़राब बनाये हैं? ऐसी गीली मिट्टी से नहीं बना सकते हो।
— मैं बनाऊँगा।
— नहीं बना पाओगे, ऐसी गीली रेतीली मिट्टी से कोई नहीं बना सकता है।
— मैं बनाऊँगा। तुमसे नहीं कुछ बनता, इसका मतलब किसी से कुछ नहीं बनेगा?
— जैसे तुम बड़ी गुणी हो। कुछ कभी सीखा भी है? लड़ने के सिवा?
— तुम्हारा पूरा ख़ानदान असांस्कृतिक है क्या जानो तुम कला क्या होती है। हमारे घर में सब कलाकार हैं।
आभा आगबबूला हो गयी…
— आज पैंतालीस साल बाद भी तुम्हारी बकवास में कोई फ़र्क नहीं आया। ऊपर से सठिया गये हो।
— हाँ तो वो क्या है कि तुम्हारे घर में हर चीज़ रेडीमेड ख़रीद लो और घड़ियाल की तरह डले रहो। बस। जबकि हमारे ख़ानदान में सारे अनुष्ठान होते हैं। हमें सब कुछ सिखाया गया है। स्वच्छता के साथ मिठाई से मूर्ति तक घर में बनायी जाती है।
— वह तो सब पता है हमें पीसा की मीनार भी तुम्हारे ख़ानदान ने बनायी थी, तभी टेढ़ी बनी हुई है। और ये सिखाया है गणेश जी की मेंढ़क जैसी आँखें!
— क्या?
दोनों ने एक साथ गणपति को देखा, जिन्हें धूप में सूखने रखा गया था, वे अपनी ऐसी आँखों पर झेंपकर धड़ सहित धरती पर औंधे हो गये थे।
— ये लो… आभा हँस-हँसकर दुहरी हो रही थी।
सुधाकर मायूस होकर मूर्ति सुधारने लगे।
आभा ने उन्हें मिट्टी में सना देखकर कहा तुम जाओ, नहा लो वरना ख़ुद मिट्टी से बने दिखायी दोगे।
इतनी गीली मिट्टी कभी कोई आकार नहीं लेगी।
अब आभा क्या तरक़ीब निकालेगी यह देखने सुधाकर वहीं खड़े रहे। आभा ने कहा, ‘सुनो रसोई में मैदा का डिब्बा रखा है, ज़रा ला दो ना, इसमें मिलाकर मिट्टी को कड़ा कर दूँगी।
सुधाकर देखना चाहते थे ये क्या करिश्मा करेगी इसलिए अनसुनी करके टस से मस नहीं हुए।
आभा खीझते बोली, ‘जाओ ना…! हमें देर हो रही है। बहुत काम है। आज हमारे तुमुल घोष महिला क्लब में सबके अपने-अपने पालतू कुत्तों की रेस का आयोजन है, जाना है अपने टाॅमी को लेकर।’
— असली नाम तो उसका वात दोष महिला क्लब होना चाहिए। सारी सहेलियां तुम्हारी वात दोष की मारी हैं… अच्छा सुनो टॉमी को मत ले जाओ, वह बीमार है मैं उसे संभाल लूँगा।
— जैसे तुमने मेरी बिल्ली लूसी को संभाला था? मार दिया था उसे। उस दिन तुम्हारे भरोसे ही तो छोड़ गयी थी। कितना समझाया था बिल्ली अपनी सफ़ाई ख़ुद कर लेती है। मत नहलाना उसे। मगर तुमने नहलाया।
— वह नहलाने से नहीं मरी थी। मेरी ग़लती नहीं थी।
उनकी बातें सुनता हुआ बेटा बोला, ‘हाँँ मम्मी, बिल्ली नहलाने से नहीं मरी थी।
— तो कैसे मरी?
— नहलाने के बाद निचोड़ने से।
सुधाकर अचकचाकर बोले, ‘अरे-अरे! शान्ति करवाने के बदले आग लगा रहा है। तेरी मम्मी सच मान लेगी… मैंने कुछ नहीं किया था। शायद उसका ही जी उकता गया था, सोचती होगी ऐसी मालकिन से तो मर जाना ही अच्छा है।’
— आभा के नेत्रों से चिंगारियांँ निकलने लगीं। बोली, ‘जी में आता है मेरी आँखों से ज्वाला निकले और तुम सती की तरह भस्म हो जाओ।
सुधाकर ने और छेड़ना ठीक नहीं समझा और खिसकने में ही अपनी भलाई समझी।
रसोई में जाकर बहुत देर उलट-पुलटकर देखने पर भी डिब्बा उन्हें नहीं मिला। वापस आये तो आभा मिट्टी को कड़ा बनाकर मूर्ति लगभग बना चुकी थी।
— नहीं मिला! हमें मालूम था, तुम्हें नहीं मिलेगा इसलिए हम पहले ही वहाँ से उठा लाये थे।
सुधाकर दाँत पीसते हुए बोले, ‘मुझे उल्लू समझा है?’
आभा जवाब में ही-ही-ही कर के काम पूरा करने में लगी रही।
— और ये क्या बेवकूफ़ी है, मैदा मिलाकर कोई मूर्ति बनाता है? शादी से पहले भी बेअक़्ली के काम करती थीं, सैंकड़ों कमियाँ थीं, आज तक नहीं सुधरीं।
— कमियाँ थीं तभी तो अच्छा वर नहीं मिला।
—–
आभा अगले दिन बहुत सुबह से गणेश स्थापना की तैयारी में थक चुकी थी। लेकिन किसी तरह जुगाड़ लगाकर उसने जो मूर्ति बना ली थी, उसके कारण सुकून मिल रहा था। प्रसन्न आनन् मूर्ति लेने गयीं लेकिन वह तो जगह से ग़ायब थी। घबराकर यहाँ-वहाँ देखा फिर आवाज़ लगायी:
— सुनते हो, गणेश जी कहाँ गये? मूर्ति ढूँढती हुई पूजा के कमरे में गयी तो वहाँ मुस्कराते हुए सुधाकर बोले- ‘ये हैं गणपति। मैं अंदर ले आया था और रात में ही रंग भी कर दिया था।

आभा नाराज़ होकर बोली, ‘जब मुझे कुछ आता नहीं है तो मेरी बनायी मूर्ति क्यों उठायी?और गीली मिट्टी पर रंग कर दिया, सब रंग गड्ड-मड्ड हो गये… हे भगवान! सारे रंग फैल गये हैं, आँखों से काजल बह रहा है।
सुधाकर बोले, ‘जब मूर्ति सूख जाएगी तो रंग अपने आप सेट हो जाएगा।
— हाँ, रंग भी तुम्हारे ख़ानदान का है ना… तो उसे बड़ी कलात्मक समझ है।
फिर मूर्ति को देखकर आभा का दिल टूट गया, ‘ये क्या किया..ऐसा रंग करता है कोई? हमें तो कुछ आता नहीं है, तो हमारे गणेश जी तुमने उठाये ही क्यों?’
— चिंता मत करो, वे बहुत सुंदर बने हैं। रंग के कारण से दिव्य लग रहे हैं।
— तुम्हारे जैसे? सुनिए महादेव!! बंटी बाज़ार से मूर्ति ले आया है। तुम जाओ उनकी स्थापना करो, इनको हाथ मत लगाओ। मेरी मेहनत सब ख़राब कर दी।
— मिट्टी तो मैंने बनायी थी, तुम्हारे कैसे हो गये?
बंटी ने बीच-बचाव करते हुए कहा, ‘चलिए चलकर टीवी देखिए। आप लोगों का प्रिय सीरियल रामायण शुरू होने वाला है। आज ताड़का-वध है।’
— तब तो ज़रूर देखेंगे। ताड़का तुम्हारी बुआ जो लगती हैं।
— एकदम ग़लत… सुधाकर चीखे, ‘बंटी ताड़का तुम्हारी सगी मौसी जी हैं।’
— बुआ जी।
— मौसी जी।

शशि खरे
ज्योतिष ने केतु की संगत दी है, जो बेचैन रहता है किसी रहस्य को खोजने में। उसके साथ-साथ मैं भी। केतु के पास मात्र हृदय है जिसकी धड़कनें चार्ज रखने के लिए लिखना पड़ता है। क्या लिखूँ? केतु ढूँढ़ता है तो कहानियाँ बनती हैं, ललित लेख, कभी कविता और डायरी के पन्ने भरते हैं। सपने लिखती हूँ, कौन जाने कभी दुनिया वैसी ही बन जाये जिसके सपने हम सब देखते हैं। यों एक कहानी संकलन प्रकाशित हुआ है। 'रस सिद्धांत परम्परा' पुस्तक एक संपादित शोधग्रंथ है, 'रस' की खोज में ही। बस इतना ही परिचय- "हिल-हिलकर बींधे बयार से कांटे हर पल/नहीं निशाजल, हैं गुलाब पर आंसू छल-छल/झर जाएंगी पुहुप-पंखुरी, गंध उड़ेगी/अजर अमर रह जाएगा जीवन का दलदल।
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मज़ेदार कहानी।