classroom, teaching hindi, teacher, students
डॉ. हंसा दीप की कलम से....

वैश्विक शिक्षण संस्थानों में हिंदी का भविष्य

            भारत और विदेशी धरती पर हिंदी अध्यापन की निरंतरता मेरा सौभाग्य रहा। बदलती सीमाएँ और बदलते देश, मुझे अपनी ज़मीन से दूर करते रहे, परंतु अपनी भाषा से अनवरत जोड़ते रहे। एक ओर कई नये अनुभवों की थाती ने मेरा स्वागत किया, तो दूसरी ओर कई चुनौतियों से सामना भी हुआ। भारत में एक दशक और फिर अमेरिका व कैनैडा में विश्वविद्यालयीन स्तर पर शिक्षण के कई रूपों से मेरा परिचय हुआ।

हम हिंदी प्रेमियों के लिए गर्व की बात है कि उत्तरी अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ायी जा रही है। तक़रीबन सभी शिक्षण संस्थानों के भाषा विभागों में चीनी, अरबी, फ़ारसी, हिंदी, उर्दू, संस्कृत, जर्मन, फ़्रेंच, इटालियन, स्पैनिश, लेटिन जैसी कई भाषाएँ “मेजर” और “माइनर” प्रोग्राम की अपने विषय के इतर कोर्स लेने की आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं। एक ही विभाग के छत्र तले पढ़ायी जा रही अलग-अलग देशों की भाषाओं में तारतम्य के लिए “कैरक्यूलम मैपिंग” है, जो भाषा विभाग में पढ़ायी जा रही हर भाषा के लिए काम करता है। इसी के साथ “कोर्स आउटलाइन्स” में समानता, निर्धारण पाठ्यक्रम में समानता तथा हर भाषा के लिए “नेटिव स्पीकर” और “नॉन नेटिव स्पीकर” के लिए कुछ निर्धारित शर्तों का पालन करते हुए “प्लेसमेंट टेस्ट” लिया जाता है। उसके माध्यम से तय किया जाता है कि छात्र किस कोर्स के लिए योग्य है।

हिंदी के लिए भी यही नियम लागू है। स्नातक कक्षाओं के पहले वर्ष के छात्रों के लिए “बिगिनर्स कोर्स” है, उसमें निर्धारित पाठ्यक्रम की ख़ास बातें हैं कि यह भाषा छात्र के लिए पूर्णत: नयी भाषा है। कोर्स के अंत तक छात्रों को रोज़मर्रा की बोलचाल की भाषा का ज्ञान हो जाना चाहिए जिसमें पठन-लेखन-बोलचाल और श्रवण ये मापदंड हैं। इन मापदंडों पर खरा उतरने के लिए शिक्षक को पूरी स्वतंत्रता है कि वह किस सामग्री का उपयोग करके अपने छात्रों को उतना वांछित ज्ञान दे सके। भाषा विभाग में हर भाषा में इस कोर्स को पढ़ाना आधारभूत कारणों से महत्वपूर्ण है।

“बिगिनर्स कोर्स” के बाद “इंटरमीडिएट कोर्स” में जहाँ भाषा की व्याकरण ख़त्म की गयी। यहाँ तक आते-आते भाषा विशेष के लिए छात्र की हिचक-संकोच कम होना चाहिए वरना वह आगे नहीं बढ़ पाएगा और “कोर्स ड्रॉप” कर देगा। नयी ग्रामर के साथ नयी शब्दावली, नयी धरा पर नये विचार लाती है। उसका विश्वास जागने लगता है कि अब वह भाषा की आधारभूत जानकारी से परिचित है।

classroom, teaching hindi, teacher, students

“रीडिंग्स” कोर्स तृतीय वर्ष के छात्रों के लिए संबल का काम करता है जिसमें भाषा विशेष के साहित्य की आसान रचनाओं के अंश लिये जाते हैं। हिंदी की लोकप्रिय पंचतंत्र की कथाएँ, लोक कथाएँ जैसी सामान्य और रोचक पठन सामग्री के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ने की कोशिश की जाती है। बड़ी कहानियाँ या कविताएँ छात्रों को डरा देती हैं। बजाय इसके एक छोटी-सी फ़िल्म दिखाकर उसके बारे में लिखने को कहा जाये तो वे अपने छोटे से निबंध में आसानी से अपनी बात लिख सकते हैं। कहने में कोई संकोच नहीं कि हिंदी में आसान भाषा में लिखा साहित्य का कोई टुकड़ा ढूँढ़ना भी टेढ़ी खीर है, जहाँ छात्रों के स्तर को समझते हुए उन्हें समझाया जा सके। कई बार स्थानीय संस्कृति से जुड़ी सीधी-सरल रचनाओं को लेना अधिक सुविधाजनक लगता है।

“एडवांस” व “मीडिया एंड कल्चर” चौथे वर्ष के कोर्स हैं जो समानांतर चलते हैं व सर्वाधिक लोकप्रिय भी होते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है कि चौथे वर्ष के अंत तक छात्र ग्रैजुएट होने के क़रीब आकर तनावरहित हो जाता है। इस समय तक अपनी नौकरी का इंतज़ाम कहीं न कहीं कर ही लेता है। शिक्षा के धरातल से एक प्रोफ़ेशनल धरातल पर अपने प्रवेश और पैसों की खींचतान से लगभग मुक्ति मिल जाती है। मीडिया एंड कल्चर में बॉलीवुड, टीवी, और पत्र-पत्रिकाओं के रोचक और रोमांचक अंशों का विषयवस्तु में शामिल होना इस कोर्स को हिंदी के सर्वाधिक लोकप्रिय कोर्स में बदल देता है। छात्र हिंदी फ़िल्मों, अभिनेता और अभिनेत्रियों के साथ संस्कृति के बारे में लिखने के लिए अपनी हिंदी को एक अलग स्तर पर ले आता है।

जब ये कोर्स थोड़े फेरबदल के साथ हर भाषा का प्रतिनिधित्व करते हैं, तो नि:संदेह संस्थान को सबसे अधिक लाभ चीनी भाषा की कक्षाओं से होता है, जहाँ हर कक्षा में जगह पाने के लिए छात्रों की होड़ होती है, प्रतीक्षा सूची होती है। इसकी वजह को उनकी जनसंख्या के आधार पर फ़ोकस करके हम छूट नहीं सकते। इसकी ख़ास वजह यह भी है कि वे अपनी भाषा को कितना मान-सम्मान देते हैं। दूसरी ओर सबसे कम लाभ हिंदी, उर्दू, संस्कृत और लैटिन भाषाओं में होता है।

टोरंटो, कैनेडा के कई शिक्षण संस्थानों में हिंदी, संस्कृत के साथ-साथ पंजाबी, तमिल और बांग्ला भी पढ़ायी जा रही है। हिंदी के इतर इन भाषाओं को प्रमुखता देने का कारण है भारतीय क्षेत्रीय भाषी लोगों की बहुलता। इस तरह हिंदी के साथ संस्कृत और फिर भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं- पंजाबी, बांग्ला और तमिल की उपस्थिति, हिंदी के वर्चस्व को कई गुना कम कर देती है। और तब क्षेत्रीय भाषाओं में बँटे हमारे देश की भाषा हिंदी अपनी कहानी कहने लगती है, जब कई छात्र यह कहकर बिगिनर्स के आगे के कोर्स नहीं लेते- “हिंदी में हमारा कोई भविष्य नहीं।” जिस घर में वे पले-बढ़े वहाँ अंग्रेज़ी के साथ उनकी अपनी क्षेत्रीय भाषा बंगाली, पंजाबी, तमिल, गुजराती और अन्य भाषाओं में से एक रही तो हिंदी के लिए उनकी रुचि न के बराबर होती है। यही वजह है कि बिगिनर्स कोर्स के अलावा अन्य कोर्स में छात्र संख्या कम होने से कई बार कोर्स निरस्त कर दिये जाते हैं।

यह हिंदी के वर्चस्व के लिए रोना-गाना नहीं है बल्कि कटु सत्य है, जिसे हम हिंदीभाषी जितनी जल्दी स्वीकार कर लें उतना ही बेहतर होगा। विदेशों में युवा पीढ़ी में हिंदी को जीवित रखने में सबसे अधिक योगदान अगर किसी का है तो वह है, हमारे हिंदी सिनेमा जगत का। हिंदी गीतों पर थिरकते पैर और कुछ नहीं तो कम से कम इन संस्थानों में हिंदी की उपस्थिति का आभास तो दे ही देते हैं। हाई स्कूल, मिडिल स्कूल और प्रायमरी स्कूलों में भी हिंदी कक्षाओं में बीस से अधिक छात्रों की उपस्थिति कक्षाओं को निरंतर चलने में मदद करती है। यहाँ भी गंभीर मुद्दा है कि हिंदी पढ़ाने वाले शिक्षक “अ आ इ ई” पढ़ाते हुए वैसे ही पढ़ाते हैं, जैसे सालों पहले उन्होंने भारत में हिंदी पढ़ना शुरू किया था। “इ इमली का” और “ई ईख का” पढ़ाकर मूल अंग्रेज़ीभाषी मासूम बच्चों की रुचि को मार देते हैं। बच्चे हिंदी से कन्नी काटते हैं और ये कक्षाएँ भी बंद होने लगती हैं। शिक्षकों को समय और स्थान के अनुसार अपनी शिक्षण शैली में परिवर्तन का आभास नहीं होता व तब, स्कूल बोर्ड के समुचित उदार प्रयासों के बाद भी अपनी इस उपेक्षा के कारण हिंदी कक्षाएँ व हिंदी शिक्षक दोनों ही अपना स्थान ख़त्म कर लेते हैं।

विदेशों में हिंदी व अ-हिंदी-भाषियों के बीच हिंदी का प्रचार-प्रसार कई समर्पित स्वयंसेवी कर रही हैं। अपना अमूल्य समय देकर हिंदी की सेवा में लगे हुए हैं। हिंदी को वैश्विक मंच पर अनवरत आगे बढ़ाने में हिंदी फ़िल्मों एवं इन समर्पित हिंदी प्रेमियों और मिले-जुले अथक प्रयासों से हिंदी बोलने वालों की संख्या तो बढ़ रही है, लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी हिंदी लिखने और पढ़ने को बढ़ावा नहीं मिल पा रहा है।

बिगिनर्स कोर्स में भी वर्णमाला को सीखना ही अ-हिंदी-भाषी छात्रों के लिए बहुत दुश्वार होता है। लिपि की दुरूहता उन्हें आगे बढ़ने से रोकने का सफल प्रयास कर जाती है। सपाट शब्दों में कहा जाये तो हमने धीरे-धीरे, एक-एक करके अपनी लिपि को जिस तरह से सजाया है, वे सारे भाषा के सौंदर्य प्रसाधन अपने “साइड इफ़ेक्ट्स” की कहानी कहने लगते हैं। स्वर और व्यंजन के मूल 44 अक्षरों में कितनी मात्राएँ जोड़कर, कितने आधे-पूरे अक्षर मिलाकर, कितने संयुक्त अक्षर बना लिये हैं, कभी गिनकर देखने का तो समय ही नहीं मिला। और फिर इनको सजाने के लिए हर तरह के बिन्दु को स्थान दिया, जहाँ जैसे जगह मिली। शिरोरेखा के ऊपर, अक्षर के नीचे। अनुस्वार अनुनासिकता के साथ, यानि बिन्दु, चंद्र बिन्दु के साथ, चन्द्र, विसर्ग, हलन्त तो ज़रूरी ही थे… अब कुछ अक्षरों के नीचे दाएँ-बाएँ भी सजा रहे हैं। अंग्रेज़ी शब्दों के लिए ऑ को लिया और उर्दू, अरबी, फ़ारसी शब्दों के लिए क ख ग ज फ में नुक़्ता लगाना ज़रूरी होता गया। आज हर उस शब्द में जहाँ क ख ग ज फ आता है, नुक़्ता लगा दिया जाता है। गुस्सा बताने के लिए भी ग़ुस्सा लिखना पड़ता है। फ़िल्म और फ़ेसबुक तो अंग्रेज़ी के शब्द हैं, वहाँ भी नुक़्ता लगाना अनिवार्य कर देते हैं हम। शायद हमारे फल वाले “फ” में इतनी ताक़त ही नहीं कि वह फ़िल्म और फ़ेसबुक को ध्वनि दे सके।

सैद्धांतिक रूप से, जितनी भाषाओं के शब्दों को हम अपनी भाषा में स्थान देंगे, उतना ही हम अपनी भाषा को उदार बनाएँगे। लेकिन यहाँ मुद्दा यह है कि हम अपनी लिपि में बहुत कुछ जोड़ते जा रहे हैं। पहले ही अक्षर के बीच में, ऊपर-नीचे, अगल-बगल, मात्राओं की, बिन्दुओं की कमी नहीं है, तिस पर हर जगह नुक़्ते ने अपनी जगह बना ली है। यह नुक़्ता कब और कैसे अपनी जगह बनाकर नीचे टिकता गया, पता ही नहीं चला। हिंदी की बिन्दी तो ऊपर थी ही, नीचे ड और ढ की बिन्दी थी। नुक़्ते ने नीचे ख़ाली जगह में अपनी जगह बना ली। हिंदी के भाषायी सौंदर्य प्रसाधनों की बढ़ोत्तरी होती ही जा रही है। बेचारे एक छोटे-से बच्चे को हम अंग्रेज़ी स्कूल में भेज रहे हैं। हिंदी के इतने अनुस्वार, मात्रा, नुक़्ते, संयुक्त व्यंजन का रट्टा लगाकर वह कैसे सीख पाएगा अपनी भाषा हिंदी! वह भी ऐसे में, जब उसकी पहली भाषा हिंदी को हम उसकी दूसरी भाषा बना चुके हैं क्योंकि पहली भाषा के रूप में तो अब अंग्रेज़ी ही स्वीकार्य है हमें। इसीलिए वह हिंदी को अंग्रेज़ी में लिखकर अपना काम चला लेता है।

मुझे इस बात का गर्व है कि हिंदी ने अपना दिल बहुत बड़ा किया है। वह हर ग्लोबल शब्द को जगह दे रही है। आज की तकनीकी उन्नति के साथ हिंदी क़दम से क़दम मिलाकर चल रही है। लेकिन यह उदारता हमें अपनी लिखित भाषा को बदलने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। आये-दिन हम अपनी लिपि में बदलाव ला रहे हैं। दूसरी भाषा के बहुप्रचलित शब्दों का दिल खोलकर स्वागत करने के लिए अपनी लिपि को बदलना कहाँ तक उचित है? अन्य भाषाएँ तो ऐसा नहीं करतीं। अंग्रेज़ी के दबदबे से हम क्यों नहीं सीख सकते, जो न जाने कितनी भाषाओं के प्रचलित शब्दों को साधिकार लेती है लेकिन अपने छब्बीस अक्षरों में कोई बदलाव नहीं करती। जो भी बदलाव करती है, उन्हीं छब्बीस अक्षरों के दायरे में। वे ही छब्बीस अक्षर दुनिया भर के शब्दों को लिखते हैं, चाहे फिर टोरंटो शहर का “ट” हो या किसी तान्या नाम की लड़की का “त”, रोमन अक्षर “टी” से ही लिखा जाता है। और नि:संदेह इन्हीं छब्बीस अक्षरों ने दुनिया में हल्ला मचा रखा है। यूँ हर भाषा के अस्तित्व को चुनौती देती अंग्रेज़ी भाषा पूरी दुनिया पर राज कर रही है।

भाषाओं का घालमेल बुरा नहीं है मगर वह एक-दूसरे के विस्तार के लिए हो, न कि अपनी जड़ों को हिलाने के लिए। अपनी लिपि को खिचड़ी बनाते हुए हम कट्टर होते जा रहे हैं। यह कट्टरता हमारी भाषा के लिखित रूप को किस क़दर प्रभावित कर रही है, यह संदेश हमारे अपने बच्चों से हर दिन मिल रहा है। सोशल मीडिया पर हिन्दी जानने वाले भी हिन्दी संदेश को रोमन लिपि में लिखकर उस संदेश का ऐसा हाल करते हैं कि समझने में दिमाग़ का अच्छा-ख़ासा व्यायाम हो जाता है। कुल मिलाकर हिंदी के प्रति जो उदासीनता बढ़ती जा रही है उसके ज़िम्मेदार हम ही हैं। भारत में ही कई नगरों-महानगरों में जहाँ काफ़ी मात्रा में हिंदी-भाषी रहते हैं, गली-मोहल्लों में साइनबोर्ड पर हिंदी तो है पर रोमन में लिखी हुई। ये हमें ग्लोबल वॉर्मिंग की तरह चेतावनी तो नहीं देते पर हाँ, संभल जाने का आह्वान ज़रूर करते हैं। जीवन की भागम-भाग में हमारा ध्यान इस मूक चेतावनी पर नहीं जा रहा है। हर किसी के पास समय की कमी होती जा रही है। ऐसे में भाषा का सरलीकरण चाहिए लेकिन हम क्लिष्टीकरण में विश्वास रखते हैं। हम वही कर रहे हैं, जो संस्कृत और लैटिन जैसी अपने ज़माने की समृद्ध भाषाओं के साथ हो चुका है। उसी राह पर ले जा रहे हैं हम हिंदी को।

यही नहीं, नॉर्थ अमेरिकन विश्वविद्यालयों में हिंदी-उर्दू कोर्स चलाये जाने की प्रथा ज़ोर ले रही है। एक ही कक्षा में देवनागरी और नस्तालीक लिपि पढ़ाना कागज़ात को और कोर्स कैलेंडर को सुशोभित करता है, बेहद सम्मानजनक लगता है, पर कक्षा की असलियत क्या होगी, बग़ैर कक्षा में जाये बताना बहुत मुश्किल है। सच्चाई तो यह है कि दुविधा में जीते छात्र हिंदी और उर्दू दोनों से कन्नी काट लेते हैं। शिक्षक अच्छी तरह जानते हैं इस सच को। वे इसलिए नहीं बोलते क्योंकि उन्हें नौकरी इस आधार पर मिली है कि वे इन दोनों भाषाओं को साथ-साथ पढ़ाएँगे। अपने हित में वे हिंदी कक्षाओं की बलि भी देते हैं और उर्दू कक्षाओं की भी।

सालाना कोर्स की शुरूआती आधी कक्षाओं में देवनागरी से परिचित होता छात्र जैसे ही नये अक्षरों में लिखना शुरू कर संतोष की साँस ले पाये, उसके पहले उस पर नस्तालीक लिपि को थोप दिया जाता है। अगली कक्षाओं में वह उससे संघर्ष करता है और इस दौरान देवनागरी दिमाग़ से देवलोक हो जाती है। बेचारा अंत तक, न तो इधर का रहता है, न उधर का। हाँ, ट्रांसस्क्रिप्ट में एक सम्मानजनक कोर्स दर्ज हो जाता है। यूनिवर्सिटी फिर से यही कवायद दोहराती है। एक-एक करके खिसकते हुए छात्रों की संख्या कम होती चली जाती है। परिणामस्वरूप अगले तीन-चार सालों में हिंदी-उर्दू कक्षाओं का नामोनिशान ख़त्म हो जाता है।

इसके विपरीत कई भाषाएँ, उदाहरण के लिए चीनी भाषा के कोर्स, साल दर साल प्रगति करते उन्हीं चार सालों में अपने बड़े-बड़े विभागों के साथ सुस्थापित हो जाते हैं। छात्रों की संख्या बढ़ती जाती है। उनकी भाषा में कुर्सी पर बैठे उनके लोग ऐसा प्रयोग करने की सोचते भी नहीं क्योंकि उन्हें अपनी आने वाली पीढ़ी को अपनी भाषा देनी है। कुर्सी पर बैठे हमारे रहनुमा ऐसा प्रयोग करते हैं क्योंकि उनके पास ऐसे कई कारण हैं। कई क्षेत्रीय भाषाओं के होते हुए उनका हिंदी प्रेम और हिंदी ज्ञान यही कहता है कि हिंदी को सदैव अन्य भाषा की बैसाखी चाहिए, जबकि स्थिति बिल्कुल विपरीत है। वह दिन दूर नहीं जब अपनी क्षेत्रीय भाषाओं को आगे लाते हमारे ये आक़ा एक दिन हिंदी-उर्दू, हिंदी-गुजराती, हिंदी-बंगाली, हिंदी-पंजाबी कोर्स शुरू कर दें और न चलने पर विश्वविद्यालयों के इतिहास में सदा-सदा के लिए अंकित हो जाये कि हिंदी के कोई भी कोर्स चलते नहीं हैं, उन्हें बंद कर दिया जाये।

यक़ीनन, काग़ज़ पर आँकड़ों का गणित हिंदी के विकास का भव्य ख़ाका खींचता है। आये-दिन वेबिनारों, सेमिनारों में हिंदी के विस्तार का महिमामंडन बेहद कर्णप्रिय होता है। अफ़सोस, ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही बयाँ करती है। भाषा के मूल को ज़िन्दा रखने के लिए आवश्यक है आने वाली पीढ़ी के भविष्य को हिंदी से जोड़ा जाये एवं मानक सरलीकरण सहर्ष स्वीकार कर, हिंदी के अस्तित्व पर मँडराते ख़तरों को टालने के प्रयास किये जाएं।

डॉ. हंसा दीप, hansa deep

डॉ. हंसा दीप

भोपाल विश्वविद्यालय, विक्रम विश्वविद्यालय के तहत विदिशा, ब्यावरा, राजगढ़, धार में विभिन्न महाविद्यालयों में तक़रीबन ग्यारह साल स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं में हिंदी अध्यापन। फिर न्यूयॉर्क, अमेरिका की कुछ संस्थाओं और कैनेडा के टोरंटो शहर के यॉर्क यूनिवर्सिटी एवं यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में शिक्षण।

1 comment on “वैश्विक शिक्षण संस्थानों में हिंदी का भविष्य

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!