
- September 14, 2026
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नियमित ब्लॉग विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....
भारतीय दर्शन और पर्यावरण चेतना
भारतीय संस्कृति में प्रकृति जड़ वस्तु, उपभोग की सामग्री या भूगोल की सीमा नहीं रही। उसे चैतन्य और सजीव मानकर परिवार के आदि-सदस्य की तरह पूजा गया है। सदियों से अबाध चली आ रही हमारी परंपराओं, त्योहारों, लोक-कथाओं और मेलों के अंतस को टटोलें, तो समझ आता है हमारे पूर्वज आज के ‘इको-सिस्टम’ (पारिस्थितिकी तंत्र) और ‘सस्टेनेबिलिटी’ के सिद्धांतों को कितनी आत्मीय गहराई से मानते थे। वे जानते थे मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका एक अंश मात्र है। इसीलिए अथर्ववेद के भूमि सूक्त में स्पष्ट उद्घोष किया गया:
“माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः।” अर्थात, यह भूमि मेरी माता है और मैं इस पृथ्वी का पुत्र हूँ।
जब मातृभाव का यह बोध रगों में बहता हो, तो शोषण की गुंजाइश स्वतः समाप्त हो जाती है। जिसे आज की आधुनिक दुनिया ‘पर्यावरण संरक्षण’ के भारी-भरकम तकनीकी नाम से पुकारती है, वह भारत के लिए कभी कोई अलग से सीखने का विषय था ही नहीं। वह तो हमारी दिनचर्या, हमारी लोरियों और हमारे संस्कारों का सहज हिस्सा था।
शायद यही सहजता आज प्रकृति के लिए हमारी उपेक्षा में बदल गयी है, जैसे अपने परिवार को ही हम ग्रांटेड ले लेते हैं।

सुबह की पहली किरण के साथ सूर्य को अर्घ्य देना हो या आकाश में मुकुट की तरह चमकते चंद्रमा की शीतलता को नमन करना, भारतीय मनीषियों ने ब्रह्मांड की हर ऊर्जा को देवत्व से जोड़ा। यह कोई अंधविश्वास या कोरी भावुकता नहीं, बल्कि उस असीम कॉस्मिक एनर्जी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक सुंदर, ललित माध्यम था, जो इस नीली धरती पर जीवन के स्पंदन को बनाये रखती है।
ईशावास्योपनिषद का पहला ही श्लोक हमें जीवन का यही संतुलन सिखाता है:
“ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥”
अर्थात: इस चराचर जगत में जो कुछ भी है, वह ईश्वर से व्याप्त है। अतः इसका उपभोग त्याग भाव से करो, किसी और के धन का लोभ मत करो।
यह ‘त्यागपूर्वक उपभोग’ ही भारतीय पर्यावरण चेतना का मूलमंत्र है, जो हमें लालच की जगह संतोष की ओर मोड़ता है।
इसी तरह, जब हम नदियों को केवल ‘पानी का विशाल स्रोत’ या ‘हाइड्रो-रिसोर्स’ न मानकर ‘माता’ कहते हैं, तो उनके प्रति हमारा पूरा दृष्टिकोण ही बदल जाता है। गंगा, यमुना, नर्मदा और गोदावरी जैसी जीवनदायिनी नदियों के तटों पर सजने वाले कुंभ या कार्तिक स्नान जैसे विशाल मेले केवल धार्मिक समागम नहीं, वे जल की महत्ता और उसकी शुचिता के प्रति सामूहिक चेतना के महा-उत्सव रहे। ये मेले याद दिलाते रहे कि नदियां केवल पानी नहीं ढोतीं, वे संस्कृतियों को सींचती हैं, सभ्यताएं इन्हीं के आंचल में जनमती और जवान होती हैं।
नदियों के साथ-साथ हमारे पर्वतों को केवल पत्थरों का सुदूर ढेर नहीं, बल्कि देवताओं का अभेद्य निवास, नदियों का उद्गम और हमारी अडिगता का प्रतीक माना गया।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए कहते हैं— “स्थावराणां हिमालयः”। स्थिर रहने वालों में मैं हिमालय हूँ।
गोवर्धन पूजा जैसी हमारी लोक-परंपराएं सीधे तौर पर पहाड़ों, जंगलों और गोधन की उपयोगिता के प्रति समाज का सामूहिक ऋण-स्वीकार हैं।
वनस्पतियों की बात करें तो पीपल, बरगद, नीम, आंवला और तुलसी को पूजनीय बनाकर हमारे पुरखों ने दीर्घायु, घनी छाया और प्रचुर ऑक्सीजन देने वाले वृक्षों की सुरक्षा की एक अचूक प्राकृत ढाल तैयार कर दी थी। ‘वृक्षायुर्वेद’ में वृक्षों की महिमा गाते हुए लिखा गया है:
“दशकूपसमा वापी, दशवापीसमो ह्रदः। दशह्रदसमः पुत्रो, दशपुत्रसमो द्रुमः॥”
अर्थात: दस कुओं के बराबर एक बावड़ी होती है, दस बावड़ियों के बराबर एक तालाब होता है, दस तालाबों के बराबर एक पुत्र होता है और दस पुत्रों के समान एक वृक्ष होता है। एक वृक्ष को दस पुत्रों के समान पुण्यदायी मानकर समाज ने वट सावित्री या आंवला नवमी जैसे त्योहारों के बहाने इन जीवन रक्षक वनस्पतियों को कुल्हाड़ी के प्रहार से बचाया और भावी पीढ़ी के लिए सुरक्षित रखा।
वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं कार्बन क्रेडिट और ग्लोबल वॉर्मिंग के लंबे अनुसधानों के बाद जो आकलित कर रही हैं, उसे हमारे मनीषियों ने न जाने कितने युगों पहले ऋचाओं में पिरोकर लोक-व्यवहार के सहज सौंदर्य में ढाल दिया था। छठ पूजा जैसा लोक-पर्व, जहां डूबते और उगते सूर्य के साथ-साथ सादगीपूर्ण प्राकृतिक सामग्रियों और ठेठ मिट्टी के बर्तनों की पूजा होती है, इस बात का जीवंत साक्ष्य है कि हमारी आस्था की जड़ें कितनी व्यावहारिक, प्रदूषण-मुक्त और प्रकृति-अनुकूल हैं।
आज जब अनियंत्रित उपभोक्तावाद और विकास की अंधी दौड़ के कारण वैश्विक तापमान, भयानक प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी महा-विपदाएं पूरी मानवता के द्वार पर दस्तक दे रही हैं, तब भारतीय संस्कृति का यह सनातन, प्रकृति-केंद्रित दृष्टिकोण ही दुनिया को विनाश से बचा सकता है।
याद करना होगा प्रकृति पर विजय पाना मानव की नियति नहीं है, बल्कि प्रकृति के सुर में सुर मिलाकर, उसके सह-अस्तित्व में जीना ही जीवन का अंतिम सच है।
जब तक पंचमहाभूतों— भूमि, गगन, वायु, अग्नि और जल— के प्रति इस पारंपरिक कृतज्ञता और विस्मय के भाव को अपने भीतर पुनर्जीवित नहीं करेंगे, तब तक पर्यावरण संतुलन का हर वैश्विक प्रयास अधूरा रहेगा। अपनी इन समृद्ध, प्रवाही और जीवंत परंपराओं की छांव में लौटकर ही हम आने वाली नस्लों को एक हरी-भरी, सांस लेती हुई और सुरक्षित पृथ्वी सौंपने के अपने दायित्व को पूरा कर पाएंगे।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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