शशिकांत सक्सेना, shashi kant saxena, mere hisse ka qissa
मेरे हिस्से का क़िस्सा... आब-ओ-हवा पर विशेष शृंखला। उम्र और सृजन का यादगार कथानक लिख चुके हस्ताक्षरों की कहानी, उन्हीं की जुबानी। तीसरी दास्तान एक ऐसे फ़नकार की जो बनना कुछ चाहता था, बनते-बनते बन कुछ और गया। 'भोपाल-बंबई-भोपाल' यानी इस फ़साने का नाम है शशिकांत। कौन शशिकांत? यह रहा ​फ़साना...

सपने, हुनर, क़िस्मत और लगन

            मुसाफ़िर ट्रेन के दरवाज़े पर बैठा हो तो ट्रेन छूटते हुए प्लेटफ़ॉर्म सरकता हुआ नहीं दिखता। खचाखच भरी थी पंजाबमेल। कभी ट्रेन की रफ़्तार महसूस होती तो कभी पटरियों के जोड़। इंजन की दिशा में देखता तो हवा में उड़ती कुछ चिनगारियां आतीं और पीछे पटरियां क्या छूट रही थीं, भोपाल की सोहबतें थीं। बचपन के कुछ सपनों को जैसे पहिये लग गये थे।

‘अपन ख़ां बम्बई उतरेंगे, तांगे वाले से बोलेंगे सीधे लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के घर, कुंडी खड़काएंगे। वहां तबला, हारमोनियम बजेगा और अपन गाएंगे और बस लक्ष्मी-प्यारे बोलेंगे लो ख़ां मिल गयी वो आवाज़, जिसका इंतज़ार था..’। यह ख़याल जायज़ इसलिए था क्यूंकि वह आकाशवाणी में गा चुका था, उससे पहले गायकी के मुक़ाबले में बरसों के चैंपियन को हरा चुका था और सुरीला गला उसे मां से विरासत में मिला ही था।

1972 में भोपाल जैसे शहर के एक नौजवान के ख़्वाब आसमानी तो हुआ करते पर फ़िल्म इंडस्ट्री की समझ होती न तांगे, कुंडी से ज़्यादा की सोच। एक उभरते सितारे की आंखों में आसमान था पर क़िस्मत के सितारे आंखों से ओझल।

दादर स्टेशन पर उतरते ही झील नगर से आयीं आंखें फटी की फटी रह गयीं। चेहरों और जिस्मों का एक समन्दर! कुछ लमहों में होश संभला, तो स्टेशन के बाहर निकलकर चौंके। न तांगा न घोड़े की ज़ात। भोपाल आते तो महावीर बड़ी लंबी-लंबी हांकते थे। उनका टूटा-फूटा पता याद था। ‘महाराष्ट्र के गवर्नर हैं क्या?’, ‘यहां मकान नंबर नहीं तो लोग पड़ोसी को नहीं जानते’, जैसे जुमले सुनते जैसे-तैसे मिला ठिकाना। देखा तो फिर हैरत। दो तल्ले मकान की सीढ़ियों के नीचे चरमरायी हुई-सी खटिया थी महावीर का कुल आशियाना।

महावीर भी चौंके। ख़ैर, अपने वतन से आये एक अपने की मेहमाननवाज़़ी में उन्होंने 90 पैसे की राइस प्लेट आर्डर की। दो आदमियों का खाना आया, दोनों ने दबाकर खाया। चल पड़े मैथिल के घर। मैथिल कालबा देवी में एक ठीक-ठाक फ़्लैट लेकर रहते और बंबई के चाल-चलन और यहां छोटे शहरों के स्वप्नदर्शियों की हक़ीक़त ताड़ने के माहिर हो चुके थे। मैथिल ने पहली नज़र में ही माजरा समझ लिया और कहा कि ‘महावीर का अपना ही प्रॉब्लम है, तू मेरे साथ रह कुछ दिन, फिर देखते हैं’।

शशिकांत सक्सेना, shashi kant saxena, mere hisse ka qissa

परदेस में एक घर मिल गया, सबसे बड़ी फ़िक्र सुलझी। रहने, खाने का बंदोबस्त सबसे बड़ी मदद हो गयी। ‘देखो ख़ां, इस मायानगरी में याद रखो कि कोई तुम्हें तुम्हारा रास्ता बनाकर नहीं देगा और कोई तुम्हारी क़िस्मत छीनकर नहीं भागेगा।’ मैथिल ने पहली ही रात यह गुरुमंत्र चिपका दिया।

अगली सुबह उठकर, पूछते-पाछते सीधे एचएमवी के दफ़्तर धमक गये। ‘अपन गायक हैं, भोपाल से आये हैं बताइए किससे मिलें!’, रिसेप्शनिस्ट ने एक पर्ची बनायी, सारे डिटेल्स भरे और बोला कि वहां जो तमाम लोग बैठे हैं, उस लाइन में बैठिए, नंबर आएगा तो शास्त्री जी से मुलाक़ात होगी। लाइन में बैठा तो गायकी के लिए और जो आये थे, उनमें थे येसुदास, कृष्णा कल्ले, सुरेश वाडेकर, चंद्राणी मुखर्जी… अलबत्ता तब ये नाम सभी के लिए अनसुने ही थे।

शास्त्री जी ने आडिशन के लिए अगले हफ़्ते की डेट दी और इन लोगों से ज़रा देर की पहचान में पता चला कि कमरा केवल येसुदास के पास था। सब वहां पहुंचे और साज़ों के साथ महफ़िल जमी। सबने एक-एक करके जो कुछ गाया, सुनाया… सुनकर उसे एक पल हैरत हुई और दूसरे पल अक़्ल आ गयी कि गायकी में कोई चान्स नहीं। यहां तो बाप लोग लाइन में बैठे हैं।

बंबई का अध्याय दो यानी गुलज़ार

रात मैथिल को उसने दिन का पूरा क़िस्सा सुनाया, तो मैथिल की मुस्कुराहट ने कहा ‘तुम ख़ां पहले हो जिसे पहले दिन में ही अक़्ल आ गयी। अब?’ ‘अब क्या! अपन चले ख़ां भोपाल।’ ‘अबे जब रहने, खाने की जगह है और आ ही गया है तो मुंबई घूम ही ले।’

बात जम गयी। अगले दिन वह पहुंचा फ़िल्मसिटी। छोटे शहरों के लड़के बंबई में और क्या देखते! स्टूडियो में एक शूटिंग चल रही थी। दूर से देखा तो वह पहचान गया कि यह वही फ़िल्मकार है, जिसका फ़ोटो और इंटरव्यू उसने धर्मयुग में देखा था। वह उनके क़रीब पहुंचा, ‘आप गुलज़ार हैं ना?’

सिगरेट सुलगाते हुए गुलज़ार ने उसे बिठाया और जाना कि आरज़ू क्या है। गायकी में ख़ुद को फ़ेल कर चुका था तो गुलज़ार के सवाल के जवाब में जाने क्या सूझा और बोल बैठा ‘मैं राइटर हूं’। अगले पल मन ही मन ख़ुद को कोसा भी लेकिन अब क्या जब तीर निकल गया कमान से। गुलज़ार ने एक पर्ची पर अपना पता लिखा और कहा, ‘एक कहानी पर फ़िल्म बनानी है मुझे लेकिन एक पेंच अटका है। हीरो का एक एक्सीडेंट हुआ है जिसके बाद वह अपनी प्रेमिका से दूरी बनाने की कोशिश करता है। अब सोचना यह है कि एक्सीडेंट में ऐसा क्या हुआ है… हाथ, पैर, आंख वग़ैरह जाना बहुत हो चुका। कुछ ऐसा सोचो कि नया भी हो और लॉजिकल भी। सोच लो तो घर चले आना, ठीक हुआ तो काम मिल जाएगा।’

रात को पूरा माजरा बताया तो मैथिल ने हंसकर कहा, ‘ऐसे ही टरकाया जाता है’। रात-बेरात आंख खुली तो उसे कहानी का प्लॉट सूझ गया। काग़ज़ पर उसने लिख डाला। सुबह-सुबह वह जा धमका, दिये गये पते पर। गुलज़ार ने दरवाज़ा खोला, बिठाया और आधे घंटे बाद दो कपों में कॉफ़ी लेकर बैठक में आये।

‘अब बताओ हीरो को क्या हुआ है’… उसने भूमिका बनाकर सस्पेंस खोला कि एक्सीडेंट में एक संवेदनशील आपरेशन की नौबत आयी और हीरो नपुसंक हो गया..’ गुलज़ार ने दो कश लगाये और कहा, कल से मेरी यूनिट में काम करो, 20 रुपये रोज़ मिलेंगे।

ये तो उसकी उचट के लग गयी थी। उसने सबको बताया तो सब हैरान। मैथिल ने कहा, तुम क़िस्मत वाले हो ख़ां, तीसरे दिन ही मुंबई में ऐसा काम मिल गया। काम शुरू हुआ। फ़िल्म निर्माण में बिल्कुल ज़ीरो को अब दिख रहा था, फ़िल्म बनती कैसे है। वह सारे विभागों में आर्डर बजाता और हर तरफ़ देखता कौन क्या करता है, कैसे करता है। एक दिन ट्रॉली चलाने का काम मिला था। गाना शूट हो रहा था, ‘कोई होता जिसको अपना..’ दो-तीन रीटेक हो चुके थे। चौथे में उसे जाने क्या महसूस हुआ, उसने ट्रॉली रोक दी और उसके मुंह से निकला, ‘यह ग़लत हो रहा है’!

सबकी आंखों में एक नाराज़गी। गुलज़ार बाहर लॉन में जाकर सिगरेट सुलगा रहे थे तब पीछे-पीछे वह पहुंचा। ‘ग़लत क्या हो रहा था?’ इस सवाल के जवाब में माफ़ी मांगी और अपनी कमअक़्ली क़बूल की, लेकिन गुलज़ार ने वही सवाल दोहराया, ‘ग़लत क्या हो रहा था?’, उसने बोला, लाइन बज रही थी, ‘पास नहीं तो दूर ही होता लेकिन..’ और कैमरा हीरो के पास जाकर क्लोज़अप ले रहा था, मुझे लगा इस लाइन पर तो कैमरा हीरो से दूर होते जाना चाहिए। चीफ़ कैमरामैन ने भी सुना, गुलज़ार ने उन्हें देखा और दोनों की आंखों में था कि बात तो सही है। फिर क्या, हालत, प्रतिष्ठा और पैसे भी बढ़ गये। ख़ैर साहब, बनती हुई फ़िल्मों में काम करते हुए काम सीखा जा रहा था। जब गुलज़ार की फ़िल्म फ़्लोर पर न होती तो वह दूसरी किसी फ़िल्म में काम करने भेज दिया करते। चुपके-चुपके, आंधी, सत्यकाम जैसी कई फ़िल्मों के निर्माण में उसने बहुत सीखा।

फिर गुलज़ार अध्याय का समापन

और अब आया 1975। मैथिल ने फ़िल्म विकास परिषद से 70 हज़ार में एक डॉक्युमेंट्री बनाने के लिए ले ली। बोला कि ख़ां! अब तुम बनाओगे फ़िल्म। यह सुनते ही फिर हालत ख़राब। अभी इतना नहीं सीखा था, ख़ुद पर इतना ऐतबार न था। लेकिन मैथिल की ज़िद। बात बढ़ी, सबसे पहले स्क्रिप्ट पर बात अटकी। गुलज़ार के पास गये लेकिन उनकी भारी-भरकम फ़ीस सुनकर बात न बनी। फिर जैसे-तैसे ख़ुद किसी दोस्त के साथ मिलकर उसने लिखी। एक नया कैमरामैन तलाशा गया तो बाबूभाई मिस्त्री का भतीजा जावेद मिला। शूटिंग हुई तो फ़ायर ब्रिगेड ने यही कहा कि अब कहीं आग लगेगी तो आपको बताएंगे। हफ़्ते भर बाद आग लगने का कोई हादसा हुआ और ये सब दौड़े। तमाम सीन शूट कर लिये गये लेकिन फ़िल्म ऐसे थोड़े बन जाती!

अब एक संपादक तलाशा गया। संपादक ने इस बेतरतीब और जैसे-तैसे बनी रीलों को पूरे सिलसिले से, एक्स्ट्रा मेहनत और हुनर देकर वाक़ई एक डॉक्यूमेंट्री की शक्ल दी और बोले अगर तुम लोगों ने अच्छा काम नहीं किया होता तो मैं इतना वक़्त नहीं देता।

आख़िरकार फ़िल्म देखी तो मज़ा आ गया। मैथिल और उसने कहा गुलज़ार को दिखाते हैं। अगले दिन गुलज़ार को हॉल में फ़िल्म दिखायी। क़रीब 40 मिनट की इस फ़िल्म को देखकर बाहर निकले गुलज़ार ने कहा, फ़िल्म में दो-तीन बारीक ख़ामियां हैं लेकिन कोई जानकार ही समझेगा। बहरहाल, फ़िल्म अच्छी बनी है और अब तुम फ़िल्ममेकर के तौर पर काम करो। कल से मेरी यूनिट में काम पर मत आना।

अब इस पर वह छाती चौड़ी करे कि छाती पीटे, कुछ समझ नहीं पाया। ख़ैर साहब, दो-चार रोज़ यूनिट में गया ज़रूर पर गुलज़ार न बात करें और न उसका वाउचर बने। वह समझ गया कि यहां से उठ गया दाना-पानी।

अब वह इधर-उधर का काम करता, कुछ फ़िल्में बनाने का काम भी मिलता। पैसे ख़ूब कमा रहा था। भोपाल जाता तो त्योहारों पर हज़ारों ख़र्च करके आता। भोपाल के साथी भी अजब पसोपेश में क्यूंकि फ़िल्मों में नाम नहीं आ रहा था और अंटी में माल ख़ूब था।

वापसी और बचपन का सपना

अब 1979 का साल। भोपाल पहुंचा तो बग़ैर पूछे-पाछे शादी तय कर दी गयी। उसने अम्मा को बताया भी कि बंबई में बहुत से काम हैं, वादे किये हुए हैं लेकिन बोलीं कि पिताजी की शक्ल देखी है, वह मानेंगे नहीं। और पिताजी, जिन्हें उस पर तब तक विश्वास न होता जब तक अपनी आंखों से न देख लेते। जैसे बेटा अच्छा गाता है, यह तब तक न माना था, जब तक रेडियो से सुन न लिया था।

असल में पिताजी अपने ज़माने में चोट खाये हुए थे। लेखक थे और अपनी कहानी पर फ़िल्म बनवाने के लिए संघर्ष कर चुके थे। कुछ एक बार बात आगे बढ़ी तो सही लेकिन कहीं पहुंची नहीं। बाप का संघर्ष और तड़प बेटा बचपन की आंखों से देख रहा था और मन ही मन सोच रहा था जो बन नहीं पा रही, पिताजी की वह फ़िल्म एक रोज़ मैं बनाऊंगा…

शादी हो गयी, बंबई छूट गयी। भोपाल में एक नौकरी कर ली। कुछ वक़्त बाद जगदलपुर ट्रांसफ़र हुआ तो नौकरी छोड़ दी। तब पत्नी को बताया तो वह बड़ी ख़ुश हुई और वह हैरान। पूछने पर बोली, ‘मैंने सुना था आप फ़िल्में बनाते थे और शादी की वजह से आपका वह काम छूट गया। अब फिर मौक़ा है, अच्छा हुआ नौकरी छूट गयी अब फ़िल्में ही बनाइए’। लेकिन फ़िल्म बनाने के लिए रक़म? पत्नी को विश्वास था कि कोई न कोई रास्ता खुल जाएगा।

उसने इस विश्वास को आधार बनाकर एक बार फिर जीवन शुरू किया। पहले फ़िल्मों की डिस्ट्रीब्यूटरी से कुछ पैसा कमाया। और फिर पिताजी की कहानी पर अपनी पहली फ़ीचर फ़िल्म ‘धरतीपुत्र’ बना डाली। पिताजी को बताया तो उन्हें कहां विश्वास होना था। स्कूटर पर बिठाकर ले गये सिनेमा हॉल। सबसे पहले उन्हीं को दिखायी फ़िल्म। पिताजी फ़िल्म देखकर घर लौटे और बोले आज खाने में कुछ ख़ास बनाओ, मेरे बेटे ने अधूरी हसरत आज पूरी कर दी।

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फ़िल्म का प्रीमियर भी शानदार हुआ। काम चल पड़ा और उतार-चढ़ाव के साथ चलता रहा। फ़िल्में बनती रहीं। कभी दूरदर्शन तो कभी किसी निजी कंपनी के लिए। मोड़ बदले हैं पर अब भी यह सफ़र थमा नहीं है। यह सफ़र किसी और का नहीं, मेरा है और इसी सफ़र ने कुछ पहचान दी, तो लोगबाग अपन को शशिकांत सक्सेना के नाम से जानते हैं।

फ़िल्म निर्माण की लंबी पारी के बाद मध्य प्रदेश में फ़िल्मकारों की पहचान के लिए आज भी अपने हिस्से का कुछ काम करता रहता हूं जैसे फ़िल्म फ़ेस्टिवल वग़ैरह। एक शौक़ रहा ज्योतिष, तो मालिक का हाथ ऐसा रहा कि अपन ने जो कह दिया, हो गया। अब वो भी एक अलग क़िस्सा है ख़ां, जब इस हुनर की वजह से पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने अपन को बुलवाया था और ढंग से मेहमाननवाज़ी की थी…

(उम्र के अमृतवर्ष में, अपने किये पर फ़ख़्र व संतोष करने वाली इस भोपाली शख़्सियत की आंखें अब भी मासूम सपने देखने के लिए बूढ़ी नहीं हुई हैं। कहते हैं, ‘अब लिखूं ​कैसे ख़ां, मेरी ज़ुबानी सुन लो आपबीती…’ ज़िंदादिली के साथ शशिकांत जी ने तमाम बातें किसी फ़ीचर फ़िल्म की लंबाई की तरह ढाई-तीन घंटे में बयान कीं, जिन्हें इस शक्ल में क़लमबंद भवेश दिलशाद ने किया।)

(चित्र परिचय: 2026 में ही आयोजित फ़िल्म फ़ेस्टिवल के मौक़े के चित्र में बाएं से कांग्रेस नेता रविकांत सक्सेना, शशिकांत सक्सेना, विक्रांत विश्वविद्यालय कुलगुरु राकेश राठौर एवं प्रसिद्ध अभिनेता राजीव वर्मा।)

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