
- September 14, 2026
- आब-ओ-हवा
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आशुतोष कुमार की कलम से....
अंग्रेज़ी के देश में हिंदी का आज और कल
ब्रिटेन की धरती पर हिन्दी की यात्रा एक भाषा की यात्रा भर नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज की स्मृतियों, संस्कारों, संघर्षों और सांस्कृतिक अस्मिता की यात्रा भी है। भारत से हज़ारों मील दूर बसे भारतीयों ने हिन्दी को केवल संवाद का माध्यम बनाकर नहीं रखा, बल्कि उसे अपनी जड़ों से जुड़े रहने का एक महत्वपूर्ण साधन बनाया। आज ब्रिटेन में हिन्दी जहां साहित्य, पत्रकारिता, शिक्षण, सांस्कृतिक गतिविधियों और डिजिटल माध्यमों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है, वहीं हिन्दी के सामने अनेक चुनौतियाँ भी हैं, विशेषकर नयी पीढ़ी को हिन्दी से जोड़कर रखने की।
ब्रिटेन में हिन्दी का आरंभिक परिवेश
ब्रिटेन में भारतीयों का आगमन कई चरणों में हुआ। प्रारंभिक दौर में भारत से आये लोगों की संख्या अपेक्षाकृत कम थी, लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद और विशेषकर बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारतीय समुदाय तेज़ी से विस्तृत हुआ। पंजाब, गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और भारत के अन्य क्षेत्रों से आये प्रवासियों के साथ उनकी भाषाएँ और बोलियाँ भी ब्रिटेन पहुँचीं।
हिन्दी को यहाँ एक विशेष लाभ यह मिला कि वह विभिन्न भारतीय भाषाई समुदायों के बीच संपर्क की भाषा के रूप में भी प्रयुक्त होती रही। भारत के हिन्दीभाषी क्षेत्रों से आये लोगों के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषा-भाषी परिवारों के लोग भी हिन्दी फ़िल्मों, टेलीविज़न, संगीत और भारतीय सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से हिन्दी से परिचित होते रहे।
ब्रिटेन में हिन्दी का प्रसार घरों तक सीमित नहीं रहा। मंदिरों, गुरुद्वारों, सामुदायिक केंद्रों, भारतीय सांस्कृतिक संस्थाओं और विद्यालयों ने भी इसके संरक्षण और प्रसार में योगदान दिया। धीरे-धीरे हिन्दी शिक्षण की औपचारिक व्यवस्था भी विकसित हुई।
आज स्थिति यह है कि हिन्दी को केवल प्रवासी भारतीयों की घरेलू भाषा के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। ब्रिटेन में हिन्दी सीखने वालों में भारतीय मूल के परिवारों के साथ-साथ ऐसे लोग भी हैं, जिनकी रुचि भारतीय संस्कृति, साहित्य, संगीत, सिनेमा अथवा भारत के साथ व्यावसायिक और अकादमिक संबंधों के कारण हिन्दी में विकसित हुई है।
हिन्दी शिक्षा की भूमिका
किसी भी प्रवासी समाज में भाषा को जीवित रखने के लिए शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण माध्यम होती है। ब्रिटेन में हिन्दी पढ़ाने वाले अनेक सप्ताहांत विद्यालय, सामुदायिक संस्थाएँ और निजी शिक्षण केंद्र लंबे समय से कार्य कर रहे हैं। इनमें बच्चों को हिन्दी पढ़ना-लिखना सिखाने के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, त्योहारों, लोक परंपराओं और साहित्य से भी परिचित कराया जाता है।

ब्रिटेन में हिन्दी को औपचारिक/आधिकारिक शैक्षिक स्तरों पर पढ़ने का अवसर है। यह हिन्दी के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है, क्योंकि इससे हिन्दी शिक्षा और अकादमिक अध्ययन के रास्ते सिर्फ़ भारतीय ही नहीं बल्कि अन्य नागरिकों के लिए भी खुल जाते हैं।
ब्रिटेन में ए लेवल से लेकर यूनिवर्सिटी स्तर तक हिन्दी शिक्षण उल्लेखनीय है। इसी प्रकार ऑनलाइन हिन्दी पाठ्यक्रम संचालित हो रहे हैं। लेकिन यहाँ एक गंभीर प्रश्न सामने आता है—क्या नयी पीढ़ी हिन्दी को केवल परीक्षा के विषय के रूप में पढ़ रही है या उसे अपने जीवन और भावनात्मक संसार का हिस्सा भी बना रही है?
यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है। भाषा तभी जीवित रहती है, जब वह केवल पाठ्यक्रम में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के संवाद, साहित्य के पठन, संगीत, कहानी और दैनिक जीवन में भी उपस्थित हो।
हिन्दी की संस्थाएँ और उनका योगदान
ब्रिटेन में हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अनेक संस्थाओं और साहित्यिक-सांस्कृतिक मंचों ने उल्लेखनीय कार्य किया है। इनका स्वरूप अलग-अलग है। कुछ संस्थाएँ हिन्दी शिक्षण पर केंद्रित हैं, कुछ साहित्यिक गतिविधियों पर, कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर और कुछ पत्रकारिता तथा प्रकाशन के क्षेत्र में सक्रिय हैं।
हिन्दी शिक्षा परिषद, यूके ऐसी संस्थाओं में है, जो ब्रिटेन में हिन्दी के शिक्षण और प्रचार-प्रसार को अपना उद्देश्य मानती है। संस्था के अनुसार वह नियमित हिन्दी कार्यक्रमों के साथ भारत के स्वतंत्रता दिवस, हिन्दी दिवस, शिक्षक दिवस और बाल दिवस जैसे अवसरों पर भी गतिविधियाँ आयोजित करती है।
इसी प्रकार गीतांजलि, संगम, गुरुकुल यूके, यूके हिन्दी समिति, वातायन, इंटरनेशनल हिन्दी सोसाइटी एवं काव्यधारा जैसी संस्थाओं ने हिन्दी शिक्षा तथा भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए अनेक सम्मेलनों, काव्य-संगोष्ठियों, सम्मान समारोहों आदि के आयोजन किये हैं।
इन संस्थाओं का महत्व इसलिए है कि ये प्रवासी समाज को एक ऐसा सांस्कृतिक स्थान प्रदान करती हैं जहाँ भाषा, साहित्य और भारतीयता पर सामूहिक रूप से विचार किया जा सकता है।
ब्रिटेन में हिन्दी साहित्य की चर्चा कथा यूके के उल्लेख के बिना अधूरी रहेगी। कथा यूके ने ब्रिटेन में हिन्दी के साथ-साथ उर्दू और पंजाबी साहित्य को भी एक व्यापक मंच देने का प्रयास किया है। कथा यूके के कार्यक्रमों में ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स और हाउस ऑफ़ कॉमन्स जैसे प्रतिष्ठित स्थानों पर साहित्यिक गतिविधियाँ आयोजित किये जाने का उल्लेख मिलता है।
ऐसे मंचों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि प्रवासी लेखक के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता केवल लिखना नहीं, बल्कि अपनी रचना के लिए गंभीर पाठक और सार्थक आलोचनात्मक संवाद प्राप्त करना भी है।
ब्रिटेन में हिन्दी के विकास में पत्रकारिता और साहित्यिक पत्रिकाओं ने भी योगदान दिया है। ‘पुरवाई’ का नाम उल्लेखनीय है। ‘पुरवाई’ ने ब्रिटेन में रहने वाले हिन्दी लेखकों को मंच प्रदान करने के साथ-साथ भारत और ब्रिटेन के साहित्यिक संसार के बीच संवाद का माध्यम बनने का प्रयास किया है।
प्रवासी हिन्दी साहित्य के लिए ऐसी पत्रिकाओं का महत्व बहुत अधिक है। इनमें प्रकाशित रचनाएँ प्रवासी समाज के अनुभवों का दस्तावेज़ बनती हैं। ब्रिटेन में लिखे जा रहे साहित्य में प्रवासी जीवन, दो संस्कृतियों के बीच का तनाव, परिवार और नयी पीढ़ी का बदलता दृष्टिकोण, अकेलापन, पहचान का प्रश्न, नस्लीय अनुभव, वृद्धावस्था, प्रवास और भारत की स्मृतियाँ जैसे विषय दिखायी देते हैं।
हिन्दी साहित्य का बदलता स्वर
ब्रिटेन में हिन्दी साहित्य की एक विशेषता यह है कि यहाँ का लेखक दो संसारों के बीच खड़ा दिखायी देता है। एक ओर भारत की स्मृतियाँ हैं और दूसरी ओर ब्रिटेन का वर्तमान जीवन।
प्रवासी साहित्यकार के लिए भारत केवल एक भौगोलिक देश नहीं रह जाता.. वह स्मृति, संस्कृति और भावनाओं का संसार बन जाता है। दूसरी ओर ब्रिटेन केवल रहने का स्थान नहीं, बल्कि उसके अनुभवों, संबंधों और संघर्षों का वास्तविक परिवेश है।
यही द्वंद्व प्रवासी हिन्दी साहित्य को विशिष्ट बनाता है।
इस दृष्टि से ब्रिटेन का हिन्दी साहित्य केवल भारतीय साहित्य की प्रतिकृति नहीं है। वह धीरे-धीरे अपने अनुभवों और संवेदनाओं से एक स्वतंत्र साहित्यिक पहचान निर्मित कर रहा है।
नयी पीढ़ी और हिन्दी की चुनौती
ब्रिटेन में हिन्दी के सामने सबसे बड़ी चुनौती नयी पीढ़ी को हिन्दी से जोड़े रखना है। पहली पीढ़ी के प्रवासियों के लिए हिन्दी या भारतीय भाषाएँ उनकी स्मृतियों और जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हैं। दूसरी पीढ़ी के सामने अंग्रेज़ी का प्रभाव अधिक है। तीसरी और चौथी पीढ़ी के लिए हिन्दी से संबंध और भी कमज़ोर हो सकता है।
घर में अंग्रेज़ी का बढ़ता प्रयोग, ब्रिटिश शिक्षा व्यवस्था, सोशल मीडिया और अंग्रेज़ी में उपलब्ध विशाल मनोरंजन सामग्री बच्चों को हिन्दी से दूर कर सकती है। यदि हिन्दी को केवल ‘माता-पिता की भाषा’ या ‘भारत की भाषा’ के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, तो नयी पीढ़ी उससे भावनात्मक रूप से जुड़ नहीं पाएगी।
इसलिए हिन्दी संस्थाओं को अपने कार्यक्रमों का स्वरूप बदलना होगा। बच्चों के लिए केवल व्याकरण और पाठ्यपुस्तक पर्याप्त नहीं हैं। कहानी, नाटक, कविता, संगीत, फ़िल्म, डिजिटल सामग्री, कॉमिक्स और सोशल मीडिया के माध्यम से हिन्दी को आधुनिक जीवन से जोड़ना होगा।
आज ब्रिटेन में कुछ संस्थाएँ बच्चों के लिए पारंपरिक कक्षा के साथ-साथ संवादात्मक और सांस्कृतिक गतिविधियों को भी जोड़ रही हैं। उदाहरण के लिए मैजिक ऑफ़ इंडिया बच्चों और वयस्कों के लिए हिन्दी कक्षाओं के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम और कार्यशालाएँ आयोजित करता है।
डिजिटल युग में हिन्दी
इंटरनेट ने हिन्दी के सामने एक नया संसार खोल दिया है। यूट्यूब, पॉडकास्ट, सोशल मीडिया, डिजिटल पत्रिका, ऑनलाइन साहित्यिक प्लेटफ़ॉर्म आदि के माध्यम से ब्रिटेन में बैठे हिन्दी लेखक सीधे भारत और दुनिया के हिन्दी पाठकों तक पहुँच सकते हैं।
डिजिटल माध्यम नयी पीढ़ी को हिन्दी से जोड़ने के लिहाज़ से प्रभावी हो सकते हैं। यदि हिन्दी संस्थाएँ युवा वर्ग के लिए आधुनिक और आकर्षक डिजिटल सामग्री तैयार करें तो हिन्दी के प्रति उनकी रुचि बढ़ायी जा सकती है।
हालाँकि डिजिटल माध्यम के साथ भाषा की शुद्धता और गुणवत्ता का प्रश्न भी जुड़ा है। रोमन हिन्दी का अत्यधिक प्रयोग, अंग्रेज़ी के बढ़ते प्रभाव और सोशल मीडिया की त्वरित भाषा के कारण देवनागरी और साहित्यिक हिन्दी के प्रयोग में कमी आ सकती है इसलिए आधुनिकता और भाषाई अनुशासन के बीच संतुलन आवश्यक है।
अब हिंदी संस्थाओं की ज़िम्मेदारी
हिन्दी संस्थाओं की भूमिका आने वाले समय में और अधिक महत्वपूर्ण होगी। उन्हें केवल वार्षिक कवि सम्मेलन या सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने तक सीमित न रहकर हिन्दी के लिए दीर्घकालीन योजनाएँ बनानी होंगी।
सबसे पहले, विभिन्न संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय हो। यदि प्रत्येक संस्था अलग-अलग सीमित गतिविधियाँ करती रहेगी तो प्रभाव व्यापक नहीं होगा। साहित्यिक संस्थाएँ, हिन्दी विद्यालय, पत्र-पत्रिकाएँ और सांस्कृतिक संगठन मिलकर एक व्यापक हिन्दी नेटवर्क बनाएं।
दूसरे, युवाओं को संस्थाओं की गतिविधियों में सक्रिय भूमिका देनी होगी। हिन्दी का भविष्य केवल वरिष्ठ साहित्यकारों के हाथ में नहीं है। युवा लेखक, विद्यार्थी, कलाकार और डिजिटल क्रिएटर हिन्दी के नये दूत बन सकते हैं।
तीसरे, ब्रिटेन में लिखे जा रहे हिन्दी साहित्य का व्यवस्थित दस्तावेज़ीकरण होना चाहिए। यहाँ के लेखकों, पत्रिकाओं, संस्थाओं और महत्वपूर्ण साहित्यिक आयोजनों का इतिहास सुरक्षित किया जाना आवश्यक है। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य साहित्यिक धरोहर होगा।
चौथे, ब्रिटेन की हिन्दी संस्थाओं को भारत की संस्थाओं से भी अधिक व्यवस्थित सहयोग विकसित करना चाहिए। साहित्यिक आदान-प्रदान, संयुक्त शोध, लेखक कार्यशालाएँ, पुस्तक प्रकाशन और डिजिटल अभिलेखागार इस दिशा में महत्वपूर्ण क़दम होंगे।
ब्रिटेन में हिंदी का कल
ब्रिटेन में हिन्दी का भविष्य न तो पूरी तरह संकटग्रस्त है और न ही पूरी तरह सुरक्षित। यह इस पर निर्भर करेगा कि हम हिन्दी को अगली पीढ़ी के हाथों में कैसे सौंपते हैं।
ब्रिटेन की बहु-सांस्कृतिक भूमि पर यदि हिन्दी केवल अतीत की स्मृति बनकर रह जाएगी, तो उसका दायरा धीरे-धीरे सीमित होता जाएगा। लेकिन यदि हिन्दी को आधुनिक तकनीक, युवा संस्कृति, साहित्य, संगीत, शिक्षा और रचनात्मकता से जोड़ा जाएगा तो वह ब्रिटेन में नये रूप में विकसित हो सकती है।
हिन्दी ने अपने लिए एक सम्मानजनक स्थान बनाया है। किंतु किसी भाषा की वास्तविक शक्ति उसकी संस्थाओं की संख्या में नहीं, बल्कि उसके बोलने, पढ़ने, लिखने और अगली पीढ़ी तक पहुँचाने वालों की सक्रियता में निहित होती है। हमें ऐसी हिन्दी चाहिए जो अपनी जड़ों से जुड़ी हो, लेकिन समय से पीछे न हो; जो भारतीय संस्कृति की संवाहक हो, लेकिन ब्रिटेन के बहु-सांस्कृतिक समाज में आत्मविश्वास के साथ अपनी पहचान बनाये; जो साहित्य की भाषा हो, लेकिन तकनीक और आधुनिक संचार की भाषा बनने से भी न हिचके।
हिन्दी का भविष्य केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि कितने लोग हिन्दी बोलते हैं, बल्कि इस पर निर्भर करता है कि आने वाली पीढ़ी हिन्दी में अपने सपने देखने, अपनी संवेदनाएँ व्यक्त करने और अपनी जड़ों को पहचानने की कितनी इच्छा रखती है।
ब्रिटेन में हिन्दी का संरक्षण केवल भाषा का संरक्षण नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण है। ब्रिटेन में हिन्दी की यात्रा वास्तव में एक ऐसे नये चरण में प्रवेश कर रही है, जहाँ आवश्यकता हिन्दी को बचाने की नहीं, बल्कि उसे जीवंत, प्रासंगिक और भविष्य निर्माण का माध्यम बनाने की है।
(चित्र परिचय: लंदन स्थित नेहरू सेंटर में संगम संस्था द्वारा आयोजित यादगार ‘हिन्दी युवा संगम’ कार्यक्रम की तस्वीर।)

आशुतोष कुमार
पेशे से कंसल्टेंट, शौक़ से रेडियो जॉकी और तबीयत से शायर। हिंदी की अनेक संस्थाओं से संबद्धता। लंदन में रहते हुए कई संस्थाओं के लिए हिंदी और साहित्य सेवा। पार्लियामेंट हाउस, लंदन में कथा यूके द्वारा ‘अंतरराष्ट्रीय साहित्य सेतु सम्मान’ सहित अनेक सम्मान व पुरस्कार। एक ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित और कई साझा संग्रहों में शामिल। कई मंचों, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स आदि से प्रस्तुति/पाठ। अनेक उपलब्धियों में मार्शल आर्ट्स में ब्लैक बेल्ट भी शामिल है। गायक और अध्ययन में विशेष रुचि। संपर्क: aasu.kr@gmail.com
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