शिखा वार्ष्णेय, आरती लोकेश, shikha varshney, arti lokesh
हिन्दी की ज़मीनें... इस अंक के लिए आब-ओ-हवा के नियमित लेखक विवेक रंजन श्रीवास्तव ने एक प्रश्नावली तैयार कर विदेशों में बसे हिन्दी साहित्यकारों की राय जानी। पत्रकार और लेखक के रूप में पहचान बनाने वाली शिखा वार्ष्णेय लंदन में रहती हैं। कई पुरस्कार और कई किताबें अपने नाम रखने वाली शिखा स्तंभकार व ब्लॉगर रही हैं। वहीं दुबई में 26 साल से रह रहीं आरती लोकेश के नाम विभिन्न विधाओं में 28 हिंदी किताबें हैं। शोधार्थियों की गाइड हैं और कई सम्मान व पुरस्कारों से नवाज़ी जा चुकी हैं। प्रस्तुत है एक अनूठी वार्ता...

दूर देस में हिन्दी के अपनों का मन-3

1. परदेस में रहते हुए अगर आपसे कोई पूछे कि आप कहाँ के हैं, तो आप क्या जवाब देते हैं? क्या अब उस जवाब में परदेस ही है?

शिखा: जवाब अधिकांशत: इस पर निर्भर करता है कि सवाल किस सन्दर्भ में पूछा जा रहा है। सामान्यत: जवाब लंदन ही होता है। यदि पूछने वाले का तात्पर्य ‘मूलत:’ से हो तो जवाब ‘भारतीय’ होता है।

आरती: मन में और ज़ुबान पर दुबई, भारत के बाद ही आता है। आप देखिए न कि हिंदी या अंग्रेज़ी किसी भी शब्दकोश में दुबई भारत के बाद ही आता है।
मेरी सूरत देखकर तो कोई भी सहज ही मुझे भारतीय पहचान लेता है। ऐसे में जब कोई पूछता है कि मैं कहाँ से हूँ, तो मेरा सीधा-सा जवाब होता है, “मैं भारत से हूँ और पिछले 26 वर्षों से दुबई में रह रही हूँ।” भारत मेरी जड़ों में है और दुबई मेरी कर्मशाखाओं में।

शिखा वार्ष्णेय, आरती लोकेश, shikha varshney, arti lokesh

2. इस देस में आपका पहला दिन और आज यह देस, दोनों के बीच सबसे बड़ा बदलाव क्या महसूस करते हैं?

शिखा: कुछ ख़ास बदलाव नहीं लगता। पहले दिन एक नया शहर अवश्य लगा था परन्तु अनजान कभी नहीं लगा। अब तो अपना घर ही लगता है। कहीं भी जाऊं, लंदन लौटकर लगता है घर आ गयी।

आरती: मैं वर्ष 2000 में दुबई आयी थी, तब भी यह एक बहुत सुंदर और व्यवस्थित शहर था। लेकिन उसके बाद जिस द्रुत गति से दुबई ने विकास किया है, वह सचमुच विस्मित करने वाला है। मैं बदलाव के अतिरिक्त निरंतरता की भी बात कहना चाहूँगी कि आगंतुक के प्रति आत्मीयता, स्वागत और सहृदयता; जो मैंने दुबई के हवाई अड्डे से ही 26 वर्ष पहले महसूस की, वह आज और भी व्यापक हुई है।

3. परदेस में रहते हुए अपने देश की कौन-सी छोटी-सी चीज़ सबसे ज़्यादा याद आती है, ऐसी चीज़ जिसे कोई पर्यटक शायद समझ भी न पाये?

शिखा: सबसे अधिक तो अपने याद आते हैं। अपनी परंपराएं, रिवाज। हालाँकि लन्दन में हमें हर भारतीय पहलू मिल जाता है, फिर भी अपना देश और अपने लोग याद आते ही हैं।

आरती: जलेबी! यहाँ जलेबी मिलती तो है, लेकिन उसे बस कामचलाऊ ही कहूँगी। अपने देश में कड़ाही के सामने खड़े होकर, आँखों के सामने गरमागरम जलेबियाँ छनते देखना और फिर उसी गर्माहट में खाना, वह स्वाद ही अलग है। मेरे बचपन के रविवार तो पापा की लायी जलेबी और खस्ता कचौड़ी से ही शुरू होते थे। शायद कोई पर्यटक इस छोटी-सी बात को उतना महसूस न कर पाये, लेकिन परदेस में रहते हुए ऐसी ही छोटी-छोटी चीज़ें सबसे ज़्यादा याद आती हैं।

4. क्या कभी किसी सड़क, मौसम, पार्क, नदी या स्टेशन ने अचानक आपको अपने शहर या अपने गाँव की याद दिलायी है?

शिखा: बिलकुल। लंदन में ऐसे कई इलाक़े हैं। साउथ हॉल, वेम्बली की ईलिंग रोड, इल्फ़ोर्ड आदि ऐसी जगहें हैं, जहाँ आपको चाट के ठेले और पान की दुकानें तक मिल जाएंगी।

आरती: हाँ, ‘बर दुबई’ में पहुँचते ही, विशेषतः इसके बाज़ार, कपड़े, आभूषण, गोटे, मसाले वाली गलियों में मुझे कई बार चाँदनी चौक की याद आ जाती है। वहाँ की छोटी-छोटी गलियाँ, भीड़-भरी गलियाँ, बाज़ार और दुकानों की चहल-पहल मुझे दिल्ली में चाँदनी चौक के अंदर समायी ‘नई सड़क’, ‘दरीबा कलाँ’, किनारी बाज़ार’, ‘कटरा नील’, ‘खारी बावली’ वाले पुराने बाज़ारों का अहसास कराती है। परदेस में रहते हुए कभी-कभी लगने लगता है सब देश एक-से ही तो हैं।

भाषा और साहित्य

5. हिंदी आख़िर आपके लिए क्या है, भाषा, स्मृति, घर, पहचान या इन सबके बीच कुछ और?

शिखा: हिन्दी मेरे लिए तो आत्मा है। मेरी ज़रूरत है और मेरी अभिव्यक्ति का सबसे प्रभावी माध्यम। वह एक ऐसी भाषा भी है, जो अद्भुत ज्ञान का स्रोत है, सौभाग्य से मेरी मातृभाषा है और उसे जानना मेरे लिए गर्व की बात है।

आरती: हिंदी मेरे लिए केवल भाषा नहीं, बल्कि संस्कृति और मेरे संस्कार हैं। यह मेरे लहू में घुला हुआ वह तत्व है, जिसके बिना मेरे अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती। हिंदी में मेरी भावनाएँ हैं, संवेदनाएँ हैं, जड़ें हैं और मेरी पहचान भी। यह मेरे लिए उस मिट्टी की सुगंध है, जिससे मैं दूर रहकर भी निरंतर जुड़ी हुई हूँ।

6. क्या विदेश में रहते हुए हिंदी से आपका रिश्ता भारत में रहने की अपेक्षा अधिक गहरा हुआ?

शिखा: मुझे ऐसा तो नहीं लगता परन्तु यहाँ रहते हुए हिन्दी से लगाव होना अधिक मान–सम्मान की बात अवश्य लगता है।

आरती: जी हाँ, ऐसा बिल्कुल कहा जा सकता है। भारत में भी मैंने आठ वर्षों तक अध्यापन किया, लेकिन वहाँ मुझे कई विषयों की कक्षाएँ लेनी होती थीं। हिंदी से मेरा गहरा और विशेष जुड़ाव दुबई आने के बाद ही विकसित हुआ। यहीं मैंने हिंदी का अध्यापन किया, पी-एच.डी. प्राप्त की। हिंदी में लेखन की शुरूआत भी दुबई में रहते हुए ही हुई।

7. आपको लगता है प्रवासी साहित्य को अलग से ‘प्रवासी साहित्य’ कहना ज़रूरी है? या साहित्य की कोई भौगोलिक नागरिकता नहीं होती?

शिखा: मेरे हिसाब से ‘प्रवासी साहित्य’ कहना पहचान और अनुभव के संदर्भ में उपयोगी है, क्योंकि इससे प्रवास, संस्कृति और दो अलग-अलग समाजों के बीच के अनुभव सामने आते हैं। लेकिन साहित्य की कोई भौगोलिक नागरिकता नहीं होती। साहित्य की पहचान उसकी भाषा, संवेदना और विषयों से होती है, सिर्फ़ इस बात से नहीं कि लेखक किस देश में रहता है।

आरती: हम किसी रचना को पढ़ते समय सबसे पहले उसके लेखक या कवि का नाम देखते हैं। वह लेखक प्रवासी हो सकता है, लेकिन साहित्य किस प्रकार प्रवासी हो गया, यह मेरी समझ से परे है। हाँ, लेखक किस देश या परिवेश में रहकर लिख रहा है, यह उसके अनुभवों, दृष्टिकोण और लेखन को विशिष्ट अवश्य बनाता है, लेकिन केवल भौगोलिक आधार पर उसे ‘प्रवासी’ कहकर अलग कर देना उचित नहीं लगता। साहित्य की पहचान उसकी संवेदना, विचार और रचनात्मकता से होती है।

8. परदेस में हिंदी लिखना और भारत में हिंदी लिखना, क्या दोनों अनुभवों में कोई मौलिक फ़र्क है?

शिखा: हाँ, थोड़ा फ़र्क तो है। भारत में हिन्दी हमारे आसपास की सहज भाषा है, जबकि लंदन में हिन्दी लिखते हुए भाषा के साथ अपनी संस्कृति और पहचान को भी बचाये रखने की ज़िम्मेदारी जुड़ जाती है। यहाँ लिखी गयी हिन्दी में प्रवास का अनुभव कुछ अधिक दिखायी देता है। लंदन में हिन्दी लिखते हुए स्थानीय जीवन का प्रभाव भी स्वाभाविक रूप से आता है।

आरती: मेरे विचार से अंतर केवल इतना है कि लेखक के अनुभवों का दायरा उसके परिवेश के साथ विस्तृत होता जाता है और वही उसके लेखन में भी दिखायी देता है। मेरे लिए स्थान से अधिक महत्त्व अनुभव की मौलिकता और उसकी प्रामाणिक अभिव्यक्ति का है।

9. क्या परदेस में रहने से लेखक को अपने देश को अधिक स्पष्टता से देखने की दृष्टि मिलती है?

शिखा: हाँ, भारत से दूर रहकर उसकी अच्छी-बुरी दोनों चीज़ों को थोड़ा निष्पक्ष होकर देख पाते हैं। साथ ही, दूरी के कारण अपनी भाषा, संस्कृति और स्मृतियों की अहमियत भी और गहराई से महसूस होती है।

आरती: ऐसा आवश्यक नहीं है। दूरी से अपने देश को देखने का एक अलग कोण अवश्य विकसित होता है, लेकिन इसे अधिक स्पष्ट या अधिक सही दृष्टि कहना उचित नहीं होगा। मुझे लगता है प्रवास व्यक्ति को अपने देश और दूसरे देश, दोनों को तुलनात्मक दृष्टि से समझने का अवसर देता है।

10. प्रवासी होने के कारण आपको भारत में कुछ ज़्यादा महत्व मिलता है? और, हिंदी साहित्य में भारत से बाहर रह रहे लेखकों की रचनाओं को क्या पर्याप्त गंभीरता से पढ़ा और समझा जा रहा है?

शिखा: कुछ हद तक प्रवासी होने के कारण एक अलग तरह की जिज्ञासा और ध्यान ज़रूर मिलता है, लेकिन मेरी नज़र में लेखक की पहचान उसके लेखन से होनी चाहिए। प्रवासी हिन्दी लेखन को अब पहले से थोड़ा अधिक गंभीरता से पढ़ा जा रहा है, लेकिन अभी भी उसे मुख्यधारा के हिन्दी साहित्य के साथ बराबरी से पढ़े जाने की गुंजाइश है। जबकि यहाँ भारत में हो रहे हिंदी लेखन की तरह ही उत्कृष्ट साहित्य रचा जा रहा है फिर भी, प्रवासी हिन्दी साहित्य का अब भी समुचित मूल्यांकन नहीं होता। उसे हिन्दी साहित्य में वह स्थान नहीं मिला है, जिसका वह हक़दार है।

आरती: मुझे लगता है महत्त्व रचना और लेखक की रचनाधर्मिता का होता है। केवल प्रवासी होने के कारण किसी लेखक को अतिरिक्त महत्त्व मिलना मुझे उचित नहीं लगता। सवाल के दूसरे हिस्से पर, मेरी दृष्टि में प्रवासी लेखकों की रचनाओं का गंभीर अध्ययन मुख्यतः शोधार्थियों तक ही सीमित है। व्यापक साहित्यिक परिदृश्य में इन रचनाओं को अभी वह स्थान और गंभीर पाठकीय मूल्यांकन मिलना बाक़ी है।

11. क्या आपको लगता है प्रवासी हिंदी साहित्य ‘भारत की याद’ से आगे निकलकर अपनी स्वतंत्र ज़मीन बना चुका है?

शिखा: जी हाँ, बिल्कुल। बात नॉस्टैल्जिया से काफ़ी आगे निकल चुकी है। आज उसमें प्रवास के साथ-साथ उस समाज की अपनी वास्तविकताएँ, रिश्ते, पहचान और बदलती पीढ़ियों के अनुभव भी आ रहे हैं। इस साहित्य को अब एक वैश्विक दृष्टि मिलती है। अब यह अपने नये परिवेश में बने जीवन और अनुभवों का भी स्वतंत्र साहित्य है।

आरती: मेरे विचार से भारत की याद से जुड़े रहना ही प्रवासी हिंदी साहित्य की वास्तविकता और उसकी पहचान है। अपनी जड़ों से जुड़ाव उसकी कमज़ोरी नहीं, बल्कि उसकी ताक़त है। प्रवासी साहित्य की अपनी स्वतंत्र ज़मीन अवश्य है, लेकिन उसकी जड़ें अपनी मूल भूमि से ही पोषण पाती हैं इसलिए भारत की स्मृति से उसका जुड़ाव रहना स्वाभाविक भी है और आवश्यक भी।

12. जहां, आप रहते हैं, उस देश में हिंदी पढ़ने, लिखने और सुनने वाले लोगों की दुनिया कैसी है? कौन लोग हिंदी से जुड़े हैं?

शिखा: लंदन में हिन्दी से जुड़े लोगों की दुनिया काफ़ी विविध है। भारत से आये लोग, ब्रिटिश-इंडियन परिवार, नयी पीढ़ी के युवा, हिन्दी के विद्यार्थी और साहित्य-संस्कृति में रुचि रखने वाले शामिल हैं। ख़ास बात यह कि हिन्दी यहाँ सिर्फ़ घर की भाषा नहीं रह गयी है; साहित्य, मंच, रेडियो, सोशल मीडिया और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के ज़रिये भी लोग उससे जुड़े हुए हैं। इसके अलावा वे विदेशी भी इस भाषा से जुड़ते हैं जो भारत और उसकी संस्कृति को जानना चाहते हैं।

आरती: दुबई में हिंदी के प्रयोग की दो समानांतर दुनियाएं दिखती हैं। हिंदीभाषी क्षेत्रों से आये प्रवासी भारतीय और उनके बच्चे प्रायः हिंदी पढ़ने-लिखने से भी जुड़े होते हैं। वहीं, हिंदी बोलने और समझने वालों की दुनिया कहीं विस्तृत है। इसमें दक्षिण भारत और भारत के अन्य राज्यों से आये प्रवासियों के साथ-साथ भारत के पड़ोसी देशों से आये कामगार और अमीराती नागरिक भी शामिल हैं। दुबई में हिंदी केवल एक भाषा-समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि अलग-अलग भाषाई और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लोगों के बीच संवाद का एक सहज माध्यम भी बन गयी है।

13. क्या नयी पीढ़ी के बच्चे, जिनकी पहली भाषा अंग्रेज़ी है, हिंदी साहित्य से जुड़ना चाहते हैं? अगर हाँ, तो उन्हें जोड़ने का सबसे अच्छा रास्ता क्या है?

शिखा: हाँ, उन्हें रुचि तो है, लेकिन उनके लिए हिन्दी को सिर्फ़ एक विरासत की भाषा के रूप में नहीं, बल्कि अपनी भाषा और संस्कृति के जीवंत हिस्से के रूप में सामने लाना होगा। हिन्दी को ज्ञान की भाषा के रूप में प्रचारित और प्रसारित करना होगा। कहानियों, कविता, संगीत, सिनेमा और डिजिटल माध्यमों के ज़रिये उन्हें हिन्दी से जोड़ना शायद सबसे प्रभावी रास्ता है। यहाँ यूके हिन्दी समिति नाम की संस्था यह कार्य करने का अच्छा प्रयास कर रही है।

आरती: नयी पीढ़ी के अंग्रेज़ी बोलने वाले बच्चों के घर में यदि साहित्य के पठन-पाठन का वातावरण है, तो वे किसी न किसी रूप में साहित्य से जुड़ते हैं। इसके अलावा, यदि वे विद्यालय में हिंदी विषय पढ़ रहे हैं, तो पाठ्यक्रम के माध्यम से भी उनका साहित्य से परिचय होता रहता है। इसके बाद साहित्य से उनका कितना गहरा जुड़ाव बनेगा, यह उनकी व्यक्तिगत रुचि और अभिरुचि पर है। मेरा मानना है बच्चों में हिंदी के प्रति रुचि जगाने के लिए उन्हें केवल भाषा सिखाना पर्याप्त नहीं है; उन्हें हिंदी साहित्य को जीने, महसूस करने और रचनात्मक रूप से अभिव्यक्त करने के अवसर भी देने चाहिए।

14. क्या हिंदी को विदेशों में बचाने की ज़रूरत है, या उसे नये परिवेश में स्वाभाविक रूप से विकसित होने देना चाहिए? और इस विकास में विश्वविद्यालयों, साहित्यिक संस्थाओं तथा प्रवासी समाज की क्या भूमिका हो सकती है?

शिखा: देखिए, मुझे लगता है किसी भी चीज़ से बचकर या किसी को नीचा दिखाकर कभी भी ऊपर नहीं उठा जा सकता। अत: भाषा को भी उसके स्वाभाविक रूप से बढ़ने देना चाहिए। हाँ, इसके लिए सकारात्मक प्रयास अवश्य किये जाने चाहिए। विश्वविद्यालय भाषा और साहित्य की गंभीर पढ़ाई का माहौल बना सकते हैं, साहित्यिक संस्थाएँ लेखकों और पाठकों को मंच दे सकती हैं, और प्रवासी समाज हिन्दी को रोज़मर्रा के जीवन और अगली पीढ़ी से जोड़ सकता है।

आरती: विदेशों में हिंदी को बचाने की बजाय उसे फैलाने की आवश्यकता है। किसी भी नये देश या परिवेश में हिंदी वहाँ के वातावरण, लोगों की आवश्यकताओं और अपनी प्रकृति के अनुरूप ही विकसित होगी। हमें उसे किसी निश्चित साँचे में बाँधने के बजाय स्वाभाविक विस्तार के अवसर देने चाहिए।

विश्वविद्यालय हिंदी के पाठ्यक्रम और अध्ययन के अवसर उपलब्ध कराएँ, साहित्यिक संस्थाएँ हिंदी के साहित्यिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करें और प्रवासी समाज अपने दैनिक जीवन तथा सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में हिंदी का अधिकाधिक प्रयोग करे। इस तरह हिंदी नये परिवेश में अपने लिए स्वयं एक सशक्त स्थान बना लेगी।

कुछ निजी बातचीत

15. कोई ऐसा लेखक या कवि, जिससे आप कभी मिले नहीं, फिर भी आपको लगता है कि उससे आपकी आत्मीय बातचीत है?

शिखा: कई हैं। निर्मल वर्मा, हरिवंश राय बच्चन, दिनकर, दुष्यंत, इवान तुर्गेनैव आदि को मैं अपनी संवेदना के काफ़ी निकट पाती हूँ।

आरती: रघुवीर सहाय जी। उनके गद्य साहित्य पर मेरा शोध रहा है और इस दौरान मैंने उनके समस्त गद्य और पद्य को बहुत पढ़ा, बार-बार पढ़ा। हर बार उनकी रचनाएँ अपनी-सी लगीं, फिर भी हर पाठ में कोई नयी अनुभूति और नया अर्थ सामने आया। उनके लेखन से मेरा रिश्ता इतना आत्मीय बन गया कि कई बार पढ़ते हुए ऐसा लगता है, जैसे मैं उनसे मिली हूँ, उनसे बातचीत कर रही हूँ।

16. अगर आपको अपने साथ केवल पाँच हिंदी किताबें परदेस लाने की मजबूरी हो, तो वे कौन-सी होंगी?

शिखा: वोल्गा से गंगा, अंतिम अरण्य, आपका बंटी, रश्मिरथी, क्या भूलूं क्या याद करूँ।

आरती: केवल पाँच चुन लेना बहुत कठिन है। फिर भी, बहुत सोच-विचार के बाद मैं चुनूँगी-
1. रामचरितमानस – गोस्वामी तुलसीदास
2. मानसरोवर — मुंशी प्रेमचंद
3. तमस — भीष्म साहनी
4. हिंदी साहित्य का इतिहास — प्रो. नगेंद्र
5. हिंदी शब्दकोश — भार्गव

हालाँकि, इससे संतोष कहाँ होगा! इसलिए ‘अगली बार’ के लिए भी पाँच पुस्तकें मैंने पहले से बचाकर रख छोड़ी हैं-
1. कामायनी — जयशंकर प्रसाद
2. मैला आँचल — फणीश्वरनाथ ‘रेणु’
3. राग दरबारी — श्रीलाल शुक्ल
4. गुनाहों का देवता — धर्मवीर भारती
5. रश्मिरथी — रामधारी सिंह ‘दिनकर’
मेरे लिए ये केवल दस पुस्तकें नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य की उस विराट दुनिया की प्रतिनिधि झलकियाँ हैं, जिसे अपने साथ लेकर चलना अपने देश और अपनी भाषा को साथ लेकर चलने जैसा है।

17. क्या लेखक के लिए देश बदलना उसकी भाषा बदल देता है, या भाषा के भीतर छिपा देश उसके साथ चलता रहता है?

शिखा: देश बदलने से भाषा नहीं भाषा के अर्थ और अनुभव बदलते हैं। मैं लंदन में रहकर भी हिन्दी में सोचती और लिखती हूँ, तो अपने साथ भारत की स्मृति, संस्कृति और बोलचाल लेकर चलती हूँ। हाँ, नये परिवेश, संस्कृति का असर भाषा पर स्वाभाविक रूप से आता है और शायद यही प्रवासी लेखन की अपनी ख़ासियत भी है।

आरती: मेरे विचार से दूसरी बात ही सही है। देश बदलने पर वहाँ की अन्य भाषाएँ हमारे व्यवहार और दैनिक जीवन का हिस्सा अवश्य बन जाती हैं, लेकिन हमारी अपनी भाषा नहीं बदलती। बल्कि वह नयी भाषा और नये परिवेश पर भी अपनी छाप छोड़ती है।

18. लिखते समय आपको कभी लगता है आप परदेस में बैठकर भारत को लिख रहे हैं, या भारत और उस देश के बीच एक तीसरी दुनिया को?

शिखा: सच कहूँ तो लिखते समय मेरे लिए यह सवाल ही नहीं रहता कि मैं कहाँ बैठकर लिख रही हूँ। जो अनुभव, स्मृतियाँ, लोग या भाव भीतर मौजूद होते हैं, वही लेखन में आ जाते हैं इसलिए यह तय करके नहीं लिखती कि भारत को लिख रही हूँ या लंदन को। शायद जगह का असर अनजाने में भाषा और दृष्टि पर आता हो, लेकिन मेरे लिए लेखन पहले है, स्थान बाद में।

आरती: दुबई में बैठकर लिखते हुए अक्सर लगता है मेरी आँखों के आगे एक दूरबीन लग गयी है… यह दूरी मुझे केवल भारत और दुबई के बीच खड़ा नहीं करती, बल्कि दोनों को एक साथ देखने की दृष्टि देती है। जैसे कोई दूरबीन मुझे 360 डिग्री का दृश्य दिखा रही हो; एक ओर मेरी अपनी मिट्टी, स्मृतियाँ और संस्कार हैं, तो दूसरी ओर वर्तमान परिवेश के अनुभव।

भारत और विदेश

19. भारत और एक इस देश को पास से देखने के बाद, दोनों समाजों की ऐसी कौन-सी विशेषता है, जिसे आप एक-दूसरे से सीखते हुए देखना चाहेंगे?

शिखा: मुझे लगता है दोनों समाजों में एक-दूसरे से सीखने की बहुत गुंजाइश है। भारत की पारिवारिक आत्मीयता, रिश्तों को निभाने की गर्माहट और सामुदायिक जुड़ाव, उत्सवधर्मिता, जीवन जीने की कला ब्रिटेन को कुछ दे सकते हैं। वहीं ब्रिटेन से व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समय और नियमों के प्रति सम्मान तथा सार्वजनिक जीवन में नागरिक ज़िम्मेदारी जैसी बातें सीखने को हैं।

आरती: भारत से हम विविधता में एकता, पारिवारिक आत्मीयता और अपनी जड़ों से गहरा जुड़ाव सीख सकते हैं। वहीं यू.ए.ई. से अनुशासन, समयबद्धता, स्वच्छता, क़ानून के प्रति सम्मान और विकास के लिए स्पष्ट एवं दूरदर्शी दृष्टि सीखने योग्य है। भारत की संवेदनशीलता और सांस्कृतिक विविधता जब यू.ए.ई. की अनुशासनप्रियता, सहिष्णुता और भविष्य-दृष्टि से जुड़ती है, तो एक ऐसे समाज की संभावना बनती है, जो एक साथ अधिक मानवीय, समावेशी और प्रगतिशील हो।

20. भारत के बारे में उस देश में सबसे बड़ा भ्रम क्या है? और उस देश के बारे में भारत में?

शिखा: ब्रिटेन में भारत को कई बार सिर्फ़ ग़रीबी, भीड़ और अव्यवस्था, सांप-सपेरे, धार्मिक रूढ़ियों के चश्मे से देखा जाता है, जबकि भारत उससे कहीं अधिक जटिल और विविध समाज है। वहीं, भारत में ब्रिटेन को अक्सर सुविधासंपन्न समाज मान लिया जाता है, जहाँ सब अच्छा-अच्छा है जबकि यहाँ भी अकेलापन, वर्गभेद और अपनी तरह की सामाजिक चुनौतियाँ हैं। इस पर मेरी एक किताब है ‘देशी चश्मे से लंदन डायरी’ जिसमें विविध विषयों पर ऐसे ही तुलनात्मक स्तम्भ हैं और इस प्रश्न के सटीक उत्तर।

आरती: भारत के बारे में यू.ए.ई. में एक आम धारणा यह है कि हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है और भारत के सभी लोग हिंदी बोलते हैं। यू.ए.ई. के बारे में भारत में भी कुछ भ्रांतियाँ हैं। एक आम भ्रम यह है कि यू.ए.ई. और दुबई एक ही स्थान के दो नाम हैं, जबकि दुबई यू.ए.ई. के सात अमीरातों में से एक है। दूसरा भ्रम यह है कि यू.ए.ई. में इस्लाम को अपनाने और स्त्रियों के लिए बुर्क़ा या नक़ाब पहनने की बाध्यता है, जबकि यहाँ सभी को अपने धर्म को मानने व अनुकरण करने की स्वतंत्रता है। यह भी एक भ्रम व्याप्त है कि बहुत सुरक्षित स्थान नहीं है, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है।

21. वहां की बहु-सांस्कृतिक दुनिया ने आपकी सोच में क्या बदला है?

शिखा: ‘वसुधैव कुटुम्बकम’। मैं पहले भी यही मानती थी, अब यह भाव और सोच और अधिक मज़बूत है।

आरती: मैंने महसूस किया कि मनुष्य की सोच, भावनाएँ, अभिव्यक्तियाँ और संघर्ष मूलतः कितने समान हैं, भले ही वह दुनिया के किसी भी हिस्से का नागरिक हो… यू.ए.ई. में रहते हुए लगभग 200 देशों की संस्कृतियों और उनकी विशिष्टताओं को जानने-समझने का अवसर मिलता है। यह अनुभव व्यक्ति के ज्ञान का विस्तार करता है, उसकी दृष्टि को उदार बनाता है और उसे दूसरे समाजों के प्रति अधिक सहिष्णु एवं सम्मानपूर्ण बनाता है। दुबई की बहुसांस्कृतिक दुनिया ने सबसे बड़ा बदलाव यही किया कि अब मैं मनुष्य को उसकी राष्ट्रीयता या संस्कृति से पहले एक मनुष्य के रूप में देखने लगी हूँ।

22. भारत में रहने वाले किसी साहित्यकार को आप वहां की साहित्यिक दुनिया के बारे में क्या बताना चाहेंगे?

शिखा: यही कि लंदन की साहित्यिक दुनिया विविध है। यहाँ हिन्दी के साथ-साथ दुनिया की कई भाषाओं में लिखा और पढ़ा जाता है। प्रवासी लेखकों के लिए भी कई मंच और पाठक हैं, लेकिन यहाँ जगह बनाना अपने आप नहीं होता— लगातार लिखना और अपने काम को लोगों तक पहुँचाना पड़ता है। और सबसे अच्छी बात यह है कि यहाँ रहते हुए भी हिन्दी में अपनी स्वतंत्र आवाज़ बनाये रखना पूरी तरह संभव है। बहुत सुन्दर है यहाँ की हिन्दी की दुनिया।

आरती: यही कि दुबई की साहित्यिक दुनिया आपसे अलग नहीं है। यहाँ के साहित्यकारों के तन में भी वही मन धड़कता है, जो आपके भीतर। उनके भीतर भी अपने देश, समाज, भाषा और संस्कृति के लिए वही प्रेम, संवेदना और समर्पण है। भौगोलिक दूरी ने हमारी भावनाओं को दूर नहीं किया है। भारत के साहित्यकार दुबई के साहित्यकारों को केवल विदेश में रहने वाले रचनाकार न समझें, बल्कि उसी साहित्यिक परिवार का हिस्सा मानें, जिसकी जड़ें एक ही सांस्कृतिक मिट्टी में हैं।

23. क्या आपको लगता है प्रवासी भारतीय अब केवल भारत की स्मृतियों के वाहक नहीं, बल्कि दो संस्कृतियों के बीच नये संवाद के रचनाकार हैं?

शिखा: इसका जवाब मैं पहले दे चुकी हूँ।

आरती: जी बिल्कुल! यू.ए.ई. के संदर्भ में तो यह बात पूरी तरह सत्य है। यहाँ रहने वाले प्रवासी भारतीय अपने देश से बहुत दूर होकर भी उससे बेहद क़रीब रहते हैं। मुझे लगता है प्रवासी भारतीय आज केवल दो संस्कृतियों के बीच पुल ही नहीं, बल्कि उन्हें एक-दूसरे के करीब लाने वाली चुम्बकीय शक्ति की तरह काम कर रहे हैं।

24. साहित्यिक पत्रिकाओं में अप्रकाशित रचना देने की परंपरा को आप किस तरह देखते हैं? व्यापक साहित्यिक हित की दृष्टि से लेखक, पत्रिका और पाठक के बीच इस संतुलन को आप कैसे देखते हैं?

शिखा: मैं अप्रकाशित रचना को प्राथमिकता देने की परंपरा को समझती हूँ। इससे पत्रिका को नये और विशिष्ट साहित्य को सामने लाने का अवसर मिलता है और आजकल के युग में चोरी की रचना को अपने नाम से छपवाने वालों पर भी लगाम लगायी जा सकती है। लेकिन तीनों के हित का संतुलन ज़रूरी है। लेखक को अपनी रचना पर अधिकार और स्वतंत्रता मिले, पत्रिका को अपनी संपादकीय गरिमा बनाये रखने का अवसर मिले और पाठक तक अच्छी रचना पहुँचे। किसी तरह यह संभव हो सके तो।

आरती: मेरे विचार से जो साहित्यिक पत्रिकाएँ रचना प्रकाशित करने के लिए उचित पारिश्रमिक देती हैं, अप्रकाशित रचनाएँ चुनने का उनका अधिकार स्वाभाविक है। लेकिन जो पत्रिकाएँ कोई मानदेय नहीं देतीं और यहाँ तक कि अपनी प्रति प्राप्त करने का ख़र्च भी रचनाकार को स्वयं उठाना पड़ता है, वहाँ अप्रकाशित रचना की अनिवार्यता मुझे उचित नहीं लगती। मेरे विचार से लेखक, पत्रिका और पाठक; तीनों के हितों के बीच संतुलन आवश्यक है।

कुछ हट के…

25. अगर वहां आपको एक दिन के लिए कोई भारतीय शहर मिल जाये, तो कौन-सा शहर चुनेंगे और उस दिन वहाँ क्या करेंगे?

शिखा: मैं कोई छोटी नदी और झरने वाला पहाड़ी शहर चुनूंगी। नदी के किनारे-किनारे चलकर झरने तक जाऊंगी। पेड़ों और पानी की आवाज़ सुनूँगी। फिर किसी जगह स्थानीय भोजन करूंगी और किसी पहाड़ी पर बैठकर कुछ लिखूंगी या चीड़ के फूलों को रंगों से भरूँगी।

आरती: काश! ऐसा सचमुच संभव होता। ऐसा हो तो मैं अयोध्या चुनूँगी। उस एक दिन में सबसे पहले श्रीराम की जन्मभूमि के पावन दर्शन कर स्वयं को धन्य अनुभव करना चाहूँगी। वैसे एक्सपो 2020 के दौरान भारतीय मंडप में वाराणसी की झाँकी देखकर मेरे मन की ऐसी ही एक साध पूरी हुई थी।

26. अगर आपकी ज़िंदगी पर लंदन की कोई सड़क, स्टेशन या नदी एक कविता लिखे, तो उसका शीर्षक क्या होगा?

शिखा: ‘बारिश में बची हुई धूप’।

आरती: ‘26 मंज़िला बुर्ज ख़लीफ़ा’। दुबई में बिताये 26 वर्षों को मैं बुर्ज ख़लीफ़ा की 26 मंज़िलों की तरह देखती हूँ। ऊपर की ओर बढ़ते हुए जैसे बुर्ज ख़लीफ़ा दुबई की ऊँचाइयों का प्रतीक है, वैसे ही मेरे जीवन की यह यात्रा भी निरंतर आगे बढ़ने, नये क्षितिज खोजने और अपनी पहचान को विस्तार देने की यात्रा रही है। इस संबंध में मेरा एक संस्मरण ‘दुबई क्रीक पर स्वर्णिम जीवन लहरें’ इसी प्रकार की भावनाओं को अभिव्यक्त करता है।

27. ऐसी कौन-सी अंग्रेज़ी अभिव्यक्ति है जिसे आप चाहते हैं कि हिंदी में भी उसी सहजता से इस्तेमाल किया जा सके?

शिखा: मुझे ‘I hear you’ बहुत पसंद है। इसका अर्थ सिर्फ़ ‘मैं तुम्हें सुन रही/रहा हूँ’ नहीं है, बल्कि इसमें सामने वाले की बात को समझने और उसकी भावना को स्वीकार करने का भाव भी है। हिन्दी में ‘मैं समझती हूँ’ कहा जा सकता है, लेकिन ‘I hear you’ की जो छोटी-सी आत्मीयता और सहजता है…

आरती: ‘Please’। ‘कृपया’ इसका सबसे निकट का हिंदी विकल्प है, लेकिन रोज़मर्रा की बातचीत में ‘कृपया’ कई बार कुछ औपचारिक-सा सुनायी देता है। हम ‘ज़रा’, ‘मेहरबानी करके’, ‘कृपा करके’ भी कह देते हैं, लेकिन इन सबमें वह सहजता नहीं है जो अंग्रेज़ी के ‘Please’ में है।

हालाँकि, मैं यह नहीं मानती कि हिंदी को अंग्रेज़ी की अभिव्यक्तियों की नक़ल करने की ज़रूरत है। हिंदी की अपनी अद्भुत अभिव्यक्ति-सम्पदा है। बदलते समय और बदलते रिश्तों के साथ हमारी भाषा भी नये, सहज और जीवंत प्रयोगों को अपनाती रहती है।

28. और हिंदी का ऐसा कौन-सा शब्द है जिसका अंग्रेज़ी में आपको कोई बिल्कुल वैसा साथी शब्द नहीं मिलता?

शिखा: “मन”, “स्पंदन”।

आरती: एक ही शब्द बताना हो तो सबसे पहले ‘नमस्ते’ मेरे मन में आता है, जिसके लिए ‘गुड मॉर्निंग’, ‘गुड नून’, ‘गुड ईवनिंग’ आदि कहने पर न ही वह सम्मान परिलक्षित होता है, न आनंद ही आता है और न ही वह सहजता। एक और शब्द मेरे ध्यान में आता है ‘शाबाश’। इससे भी मेरा एक निजी क़िस्सा जुड़ा है।

अंत की गुफ़्तगू

29. परदेस ने आपको अपने बारे में ऐसी कौन-सी बात बतायी, जो भारत में रहते हुए आप नहीं जान पाये थे?

शिखा: मेरे आत्मविश्वास में तो अवश्य ही बढ़ोत्तरी की है। मुझे समझाया कि दूरियों और अकेलेपन के बावजूद जीवन सार्थकता से जिया जा सकता है।

आरती: दुबई ने मुझे मेरे ही व्यक्तित्व के ऐसे कई पहलुओं से परिचित कराया, जिन्हें शायद भारत में रहते हुए मैं स्वयं नहीं पहचान पायी थी। सबसे बड़ी बात कि हिंदी के प्रति मेरे प्रेम और मेरी लेखन क्षमता को पहचानने और विकसित करने का अवसर मुझे दुबई में ही मिला। यहीं से हिंदी मेरे लिए केवल एक विषय नहीं, बल्कि मेरे जीवन और सृजन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गयी।

30. और अंत में, अगर ‘आब-ओ-हवा’ के पाठकों से बिना किसी औपचारिकता के बस दो मिनट गुफ़्तगू करनी हो, तो उनसे क्या कहना चाहेंगे?

शिखा: यह कि लिखने से पहले अपने भीतर की आवाज़ सुनिए। अच्छी नीयत से लिखिए और ख़ूबसूरत रचिए। ख़ूबसूरती सिर्फ़ शब्दों की नहीं, सोच की भी होती है। हम जिस दुनिया में रह रहे हैं, उसमें बहुत शोर है, इसलिए साहित्य को उस शोर में एक सच्ची और संवेदनशील आवाज़ बने रहने की कोशिश करनी चाहिए।

…और कहूँगी कि पढ़ते रहिए। लेखक की सबसे बड़ी ताक़त उसका पाठक होता है। हर किताब से सहमत होना ज़रूरी नहीं, लेकिन उसके साथ कुछ दूर चलना ज़रूरी है। अगर मेरी कोई रचना आपको कुछ देर ठहरकर सोचने पर मजबूर करती है, कोई पुरानी स्मृति जगा देती है या आपके भीतर कोई सवाल छोड़ जाती है, तो मेरे लिए उससे बड़ी बात कुछ नहीं।

आरती: मैं ‘आब-ओ-हवा’ के पाठकों से बस इतना कहना चाहूँगी कि दुनिया भर की सैर दो माध्यमों से की जा सकती है- एक, वहाँ जाकर उस जगह को प्रत्यक्ष रूप से देखकर और दूसरा, वहाँ बसे प्रवासियों से बातचीत करके।

हर देश को केवल उसकी भौगोलिक संरचना, प्रसिद्ध इमारतों, सड़कों के जाल और पर्यटन-स्थलों से नहीं जाना जा सकता। वहाँ रहने वाले लोग उस देश की असली आब-ओ-हवा, संस्कृति, जीवनशैली और अनुभवों के सबसे अच्छे परिचायक होते हैं। इसलिए यात्रा केवल पैरों से नहीं, संवाद से भी होती है। शायद इसी संवाद से आप यू.ए.ई. और यहाँ बसे प्रवासी भारतीयों को कुछ बेहतर समझ पाएँ।

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

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