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'क्वीन' के बाद: हिंदी सिनेमा में स्त्री का पुनर्लेखन

            हिंदी सिनेमा में स्त्री का प्रतिनिधित्व केवल “महिला-केंद्रित फ़िल्म” होने से नहीं बदलता, बल्कि तब बदलता है, जब स्त्री को एक स्वतंत्र मनुष्य के रूप में लिखा जाता है।

2013 में रिलीज़ ‘क्वीन’ केवल एक सफल फ़िल्म नहीं थी; वह हिंदी सिनेमा में स्त्री की बदलती पहचान का एक निर्णायक मोड़ थी। इस फ़िल्म ने कंगना रनौत को एक स्टार से कहीं आगे जाकर एक सांस्कृतिक प्रतीक बनाया। पर्दे पर उन्होंने रानी मेहरा का किरदार निभाया। एक साधारण लड़की, जो शादी टूटने के बाद पहली बार अपने भीतर के व्यक्ति से परिचित होती है। फ़िल्म के बाहर भी कंगना का व्यक्तित्व लगभग उसी यात्रा से गुज़रता दिखायी दिया। क्वीन के बाद वे बॉलीवुड की सबसे मुखर महिला आवाज़ों में से एक बनकर उभरीं। एक ऐसी अभिनेत्री, जिसने न केवल अपने लिए अलग तरह की फ़िल्में चुनीं, बल्कि उस व्यवस्था पर भी सवाल उठाये, जिसके इर्द-गिर्द दशकों से हिंदी सिनेमा घूमता रहा।

देखा जाये तो 21वीं सदी में विद्या बालन फ़िल्मों में महिला किरदारों कि वो आवाज़ बनीं, जिन्होंने इस दिशा में एक मोमेंटम शुरू करने का काम किया।

‘डर्टी पिक्चर’ में उन्होंने सिल्क स्मिता से प्रेरित रेशमा का किरदार निभाकर उस स्त्री-छवि को चुनौती दी, जिसमें महिला की कामुकता को या तो छिपाया जाता है या पुरुष की दृष्टि से परिभाषित किया जाता है। वहीं ‘कहानी’ में विद्या बागची एक बिल्कुल अलग तरह की नायिका है।

इसी तरह प्रियंका चोपड़ा की सुज़ाना, ‘7 ख़ून माफ़’ स्त्री पर केंद्रित एक और अधिक जटिल और असुविधाजनक स्तर पर पर लिखा गया किरदार है। सुज़ाना का चरित्र “अच्छी स्त्री” और “बुरी स्त्री” की पारंपरिक सीमाओं को स्वीकार नहीं करता। वह प्रेम चाहती है, विवाह करती है, बार-बार धोखा खाती है और अपने जीवन से उन पुरुषों को हटाती जाती है जो उसके लिए हिंसा, शोषण या असुरक्षा का कारण बनते हैं।

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ये फ़िल्में स्त्री की धुरी पर घूमती हैं, जो उस ट्रेंड को तोड़ती हैं, जहाँ अभिनेत्री का अस्तित्व अक्सर नायक के इर्द-गिर्द सीमित रहता था।

और फिर इसी क्रम में आती है कंगना रनौत की ‘क्वीन’। अगर विद्या बालन और प्रियंका चोपड़ा ने हिंदी सिनेमा में स्त्री के लिए एक नयी ज़मीन तैयार की, तो कंगना उस ज़मीन पर एक नयी रानी (क्वीन) के रूप में उभरती हैं।

क्वीन की सबसे बड़ी ख़ूबी रही कि ये बिना शोर-शराबे के एक स्त्री के मन में प्रवेश करती है। वो बाहरी पितृसत्तात्मक समाज, कुरीतियों, मनोदशाओं इत्यादि से लड़ती हुई नारीवाद का झंडा उठाती औरत नहीं है। एक साधारण महिला के उन क्षणों की कहानी है, जब उसे पहली बार अपने ही जीवन की नायिका होने का एहसास होता है।

कंगना ने गढ़ी एक मूरत

इसके बाद कंगना ने कई बड़े पुरुष सितारों के साथ काम करने के बजाय ऐसी फ़िल्में चुनीं, जिनमें कहानी का केंद्र स्वयं महिला पात्र था। उनके इस रवैये ने उद्योग में प्रचलित स्टार-सिस्टम, जेंडर बायस और नेपोटिज़्म पर बहस को तेज़ किया। 2013 में अनुपमा चोपड़ा को दिये एक चर्चित इंटरव्यू में उन्होंने पहली बार खुलकर इन विषयों पर बात की। यह बातचीत सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से वायरल हुई। तहलका की सुनैना कुमार ने उस समय लिखा था, “एक जैसे जवाब देने वाली और एक ही साँचे में ढली हीरोइनों के दौर में कंगना रनौत एक ईमानदार और असली आवाज़ हैं।”

फ़ैशन ने कंगना की अभिनय क्षमता को स्थापित किया, तनु वेड्स मनु ने उनकी लोकप्रियता बढ़ायी, लेकिन क्वीन ने उनकी पहचान बदल दी। इसके बाद तनु वेड्स मनु रिटर्न्स की सफलता ने यह भी साबित किया कि किसी फ़िल्म को सफल बनाने के लिए हमेशा किसी बड़े पुरुष सुपरस्टार की ज़रूरत नहीं होती। यही कारण था उन्हें बॉलीवुड की सबसे “बैंकेबल” अभिनेत्रियों में गिना जाने लगा और वो फ़िल्म उद्योग में सबसे अधिक पारिश्रमिक लेने वाली अभिनेत्रियों में शामिल हुईं। आगे चलकर उन्होंने निर्देशन की ओर भी क़दम बढ़ाये और मणिकर्णिका, इमरजेंसी तथा धाकड़ जैसी फ़िल्मों से संकेत दिया कि वे कैमरे के पीछे भी अपनी वैचारिक उपस्थिति दर्ज कराना चाहती हैं। हालांकि अब तक इसमें वो सफल नहीं रहीं।

लेकिन क्वीन का महत्व केवल कंगना रनौत की सफलता तक सीमित नहीं है। यह हमें एक बड़े प्रश्न की ओर ले जाती है: हिंदी सिनेमा में स्त्री को अब तक लिखा कैसे गया है?

सिनेमा में स्त्री का किरदार

यदि पिछले पच्चीस वर्षों की लगभग 120 उल्लेखनीय हिंदी फ़िल्मों को देखें, तो एक स्पष्ट पैटर्न दिखता है। अधिकांश फ़िल्मों में महिला पात्र कहानी का सक्रिय हिस्सा नहीं, बल्कि उसकी सजावट भर बनकर रह जाते हैं। वे पत्नी हैं, प्रेमिका हैं या नायक की भावनात्मक प्रेरणा हैं, लेकिन उनका अपना कोई स्वतंत्र जीवन नहीं है। अक्सर हमें यह तक नहीं पता चलता कि वे क्या करती हैं, उनके सपने क्या हैं, उनका पेशा क्या है या वे दुनिया को किस नज़र से देखती हैं।

लगान, नायक, तारे ज़मीन पर या दिल चाहता है जैसी उत्कृष्ट फ़िल्मों में भी महिला पात्रों का अस्तित्व मुख्यतः नायक के संदर्भ में परिभाषित होता है। यदि वे पढ़ रही हैं, तो किस विषय में पढ़ रही हैं, इसका कहानी से कोई संबंध नहीं। उनका पेशा हो भी तो वह अक्सर फ़ैशन डिज़ाइनर, इंटीरियर डिज़ाइनर या किसी ग्लैमरस पहचान तक सीमित रहता है।

लगभग अस्सी फ़िल्मों में नायिका की कोई बैकस्टोरी ही नहीं है। उसके चरित्र के भीतर कोई जटिलता, कोई नैतिक संघर्ष या कोई ग्रे एरिया नहीं होता। वह केवल “अच्छी लड़की” होती है।

हालाँकि यह भी सच है कि हर किरदार के लिए विस्तृत बैकस्टोरी आवश्यक नहीं होती। हिंदी सिनेमा के कई नायक (स्टार) भी बिना किसी अतीत के सीधे कहानी में प्रवेश करते हैं। लेकिन अंतर यह है कि पुरुष पात्र अपनी इच्छाओं, निर्णयों और संघर्षों से कहानी को आगे बढ़ाते हैं, जबकि महिला पात्र अक्सर केवल उनकी यात्रा का हिस्सा बनकर। दूसरी ओर, उड़ान, भावेश जोशी या शाहिद जैसी फ़िल्में ऐसी भी हैं, जहाँ कहानी की प्रकृति ही ऐसी है कि महिला पात्रों की अनुपस्थिति कथा को प्रभावित नहीं करती।

इन सबके बीच लगभग पंद्रह प्रतिशत फ़िल्में ऐसी मिलती हैं, जिन्होंने स्त्री को कथा के केंद्र में रखा। इंग्लिश विंग्लिश, कहानी, एक हसीना थी, चांदनी बार, पार्च्ड और क्वीन जैसी फ़िल्मों ने महिला अनुभव को अपनी कथा का आधार बनाया। वहीं लक्ष्य, रंग दे बसंती, देव डी और हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी जैसी फ़िल्मों में स्त्री मुख्य पात्र भले न हो, लेकिन वह कहानी का अपरिहार्य हिस्सा है।

मिसाल के लिए कुछ फ़िल्में

दरअसल हिंदी सिनेमा लंबे समय तक एक विचित्र प्रवृत्ति से संचालित होता रहा। जब किसी सामाजिक समूह को सामान्य बनाना होता है, तो उसके ऊपर पूरी फ़िल्म बना दी जाती है। महिलाओं के साथ भी अक्सर यही हुआ। या तो वे कहानी में केवल प्रेमिका बनकर रह गयीं, या फिर पूरी फ़िल्म “महिला-केंद्रित” घोषित कर दी गयी। लेकिन धीरे-धीरे सिनेमा ने यह समझना शुरू किया कि किसी फ़िल्म का महिला-केंद्रित होना आवश्यक नहीं; आवश्यक यह है कि महिला पात्र को भी पुरुष पात्र जितनी ही तवज्जो, ईमानदारी और बराबरी से लिखा जाये।

  • वेक अप सिड इसका सुंदर उदाहरण है। यह पूरी तरह सिद्धार्थ की कहानी है, लेकिन आयशा केवल उसकी प्रेमिका नहीं है। वह स्पष्ट सोच रखने वाली, आत्मनिर्भर, महत्वाकांक्षी और संवेदनशील स्त्री है। वह सिद्धार्थ के जीवन का नैतिक संतुलन बनती है। यदि आयशा को कहानी से निकाल दिया जाये, तो सिद्धार्थ का विकास अधूरा रह जाएगा।
  • लक्ष्य में रोमिला दत्ता की अपनी अलग पेशेवर यात्रा है। वह केवल करण शेरगिल की सफलता का इंतज़ार नहीं करती, बल्कि अपने करियर और अपने निर्णयों के साथ स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ती है। रंग दे बसंती में सू विदेशी होते हुए भी कथा की सूत्रधार है। वही बिखरे हुए युवाओं को एक साझा उद्देश्य देती है।
  • हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी की गीता की यात्रा दो पुरुष पात्रों के समानांतर चलती है। वह उनसे प्रभावित होती है, उनसे टकराती भी है, लेकिन अंततः अपनी स्वतंत्र पहचान के साथ उभरती है।
  • एक हसीना थी हिंदी सिनेमा में महिला चरित्र के सबसे प्रभावशाली रूपांतरणों में से एक है, जहाँ नायिका परिस्थितियों के साथ बदलती है और उसका परिवर्तन दृश्य, मानसिक और नैतिक—तीनों स्तरों पर दिखायी देता है।
  • चांदनी बार में तब्बू का पूरा किरदार पुरुष-प्रधान दुनिया में जीवित रहने की जद्दोजहद का दस्तावेज़ है। पार्च्ड स्त्री की स्वतंत्रता के साथ-साथ उसकी यौनिकता पर भी बात करती है—एक ऐसा विषय जिससे मुख्यधारा का हिंदी सिनेमा लंबे समय तक बचता रहा। कहानी में विद्या बागची पुरुषों द्वारा नियंत्रित व्यवस्था को उन्हीं के नियमों से मात देती है। इंग्लिश विंग्लिश में शशि की लड़ाई अंग्रेज़ी सीखने की नहीं, बल्कि आत्मसम्मान हासिल करने की है…

अब सिनेमा की ज़रूरत

इन फ़िल्मों की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि इनमें स्त्री मुख्य किरदार में है; बल्कि यह है कि इनमें स्त्री एक पूर्ण मनुष्य है। उसके भीतर इच्छाएँ हैं, असफलताएँ हैं, महत्वाकांक्षाएँ हैं, डर हैं और निर्णय लेने की क्षमता है।

यही बात इम्तियाज़ अली के सिनेमा में भी नज़र आती है। उनकी कई फ़िल्मों में स्त्री केवल प्रेम का विषय नहीं, बल्कि अपने भीतर की यात्रा पर निकला हुआ व्यक्ति है। इसी तरह तब्बू, विद्या बालन और उर्मिला मातोंडकर जैसी अभिनेत्रियों ने ऐसे किरदार निभाये, जो पारंपरिक स्त्री-छवियों से कहीं आगे जाते हैं। अंधाधुन में तब्बू का धूसर और नैतिक रूप से जटिल किरदार इस बात का उदाहरण है कि स्त्री पात्र केवल आदर्श या पीड़िता ही नहीं, बल्कि जटिल और अप्रत्याशित भी हो सकती है।

हाल के वर्षों में आलिया भट्ट ने भी इस बदलाव को आगे बढ़ाया है। राज़ी में वे एक जासूस हैं, जिसकी देशभक्ति और भावनात्मक संघर्ष साथ-साथ चलते हैं। जिगरा में उनका किरदार अपने भाई को बचाने के लिए पूरी व्यवस्था से टकराता है। राधिका आप्टे, कोंकणा सेन शर्मा, ऋचा चड्ढा और स्वरा भास्कर जैसी अभिनेत्रियों ने भी ऐसे पात्रों को चुना है, जिनकी पहचान केवल उनके जेंडर से तय नहीं होती।

यह बदलाव केवल हिंदी सिनेमा तक सीमित नहीं है। दक्षिण भारतीय सिनेमा भी अब ऐसी फ़िल्मों की ओर बढ़ रहा है जहाँ महिला पात्र केवल सहायक भूमिका नहीं निभाती, बल्कि कथा को आगे बढ़ाने वाली केंद्रीय शक्ति बनती हैं।

आख़िरकार, महिलाओं को सिनेमा में सम्मान दिलाने का रास्ता केवल महिला-केंद्रित फ़िल्में बनाना या उन्हें सुपरवुमन की तरह प्रस्तुत करना नहीं है। सबसे पहली ज़रूरत यह है कि उन्हें एक मनुष्य की तरह लिखा जाये। जब तक नायिका केवल प्रेमिका, पत्नी या ग्लैमर का माध्यम बनी रहेगी, तब तक सिनेमा जेंडर बायस वाले आरोप के दायरे में रहेगा। वास्तविक बदलाव तब आएगा, जब कहानी में उसका अस्तित्व किसी पुरुष की उपस्थिति पर निर्भर नहीं होगा, बल्कि उसकी अपनी चेतना, अपने निर्णय और अपने जीवन से निर्मित होगा। शायद यही क्वीन की सबसे बड़ी विरासत है, उसने हमें केवल एक नयी नायिका नहीं दी, बल्कि स्त्री को देखने का एक नया सिनेमाई दृष्टिकोण दिया।

मानस, विवेक त्रिपाठी, vivek tripathi, maanas

मानस

विवेक त्रिपाठी उर्फ़ मानस पूर्व बैंककर्मी हैं लेकिन फ़िल्मों के जुनून ने नौकरी छुड़वायी और फ़िल्में बनाने की दिशा में प्रेरित किया। आधा दर्जन शॉर्ट फ़िल्में बना चुके मानस की कुछ फ़िल्मों को फ़ेस्टिवलों में सराहना व पुरस्कार मिले हैं। फ़िल्म लेखन व निर्देशन के अलावा मानस का एक कहानी संग्रह 'बालकनी' प्रकाशित है। इन दिनों वह पूरी लंबाई की फ़िल्म के निर्माण के लिए संघर्षरत हैं।

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